पंडिताइन के मुंह में आब-ए-ज़मज़म
प्रदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार का बेहद आत्मीय संस्मरण
प्रदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकारअम्मा ने उन्हें अपने हाथ से बनाए मीठे खुरमे के साथ पानी पिलाया। कई दिन बाद मालुम हुआ कि शाह साहब ने उस दिन खाना नहीं खाया था। उनमें खुद्दारी बहुत थी। पार्टी से होलटाइमर के लिए तय अलाउंस वह दुनियादारी पर भी खर्च कर कर दिया करते थे। मैंने अम्मा को शाह साहब के भूखे रह जाने की बात बताई, तो वह रुआंसी हो गईं। उस दिन के बाद से शाह साहब जब कभी घर आते, अम्मा उन्हें रोटी-पराठा या दाल-चावल जो भी घर में होता, खाए बिना जाने नहीं देतीं।

मेरी मां राज कुमारी आत्मजा संत बख्श श्रीवास्तव, जिन्हें मैं अम्मा कहता था, की शख्सियत दिलचस्प थी। सोलह साल की उम्र में उनका विवाह मेरे पिता ओम प्रकाश से हुआ था। विवाह के समय उनकी अवस्था उन्नीस या बीस रही होगी। अम्मा के दिलचस्प होने की कहानी मेरे ननिहाल से जुड़ी हुई है। मेरे गांव सदरपुर से उनका गांव एरिया, जिला बहराइच सोलह मील था। बीच में बहुत चौड़े फाट वाली घाघरा नदी पड़ती थी।
वाराणसी में इस समय गंगा का जो रूप है, उससे भी बड़ी थी घाघरा। मुझे अब भी याद है, इस पार से उस पार तक नीले जल वाली घाघरा की तलछट साफ़ दिखाई पड़ती थी। ननिहाल यात्रा के दौरान न जाने कितनी बार मैंने घाघरा का पानी पिया होगा। कभी बीमार नहीं पड़ा। मैं और मेरी बड़ी बहन अम्मा के साथ बैलगाड़ी से घाघरा के किनारे तक पहुंचते थे और बैलगाड़ी लौट जाती थी। कुछ देर बाद ही नाव किनारे आ लगती। मेरे मामा का नौकर केवट को एक रुपया पहले ही दे चुका होता था। इसलिए वह हम लोगों को बाअदब नाव की वीआईपी सीट पर बैठा देता। नाव पर लदे जानवरों और फटे-पुराने कपड़ों में ग्रामीणों को मैं कौतुहल से देखता। कौतुहल इसलिए कि नेपाल की सीमा से लगा गांजर का यह इलाका मेरे गांव के मुकाबले अधिक पिछड़ा था।
नाव के किनारे लगते ही मेरे मामा का दलित नौकर घुटने भर पानी में खड़ा मिलता था। बैलगाड़ी थोड़ी दूर रहती थी। उसने अम्मा को गोद खिलाया था और मैं उसे गोपी मामा कहता था। अम्मा को देखते ही गोपी मामा बड़े सहज ढंग से ज़ोर से बोलते थे,'' बिटिया आइ गय, बिटिया आइ गय।'' अम्मा के रोने का पहला राउंड गोपी मामा से गले लगने से शुरू होता।
फिर वह घाघरा किनारे की बलुहर मिट्टी माथे पर लगाकर बुदबुदातीं ,'' घाघरा मैया हमार सोहाग तुमरे सहारे, हमार लरिका तुमरे सहारे। ''मामा के घर पहुंचते ही कोहराम मच जाता। अम्मा नाउन-कहारिन से लेकर नानी-नाना, मामी-मामा और पड़ोसियों तक के गले मिलतीं और पंद्रह-बीस मिनट तक रोने का क्रम जारी रहता। अनवरत रुदन सुनकर मैं भी रोने लगता।
इस बीच कुछ लोग मुझे भी पुचकारने लगते। पायरिया या तंबाकू की बदबू मुझे इतना परेशान कर देती कि छटपटा कर मैं भाग निकलता। रोने-धोने की औपचारिकता के बाद अम्मा अपनी बाल्यावस्था में लौट आतीं। सदरपुर में एक हाथ का घूंघट काढ़े रहने वाली अम्मा की धोती अचानक सिर से गायब हो जाती। गांव के एक-एक घर का हाल पूछतीं ।
किसकी बिटिया कुंआरी बैठी है, कौन ब्याह गई, किसके कितने बच्चे हैं, जैसे सवालों की झड़ी लग जाती। अम्मा उसी दिन चाचियों-बहिनियों के साथ बाग़-बगीचे ताल-तलाव देखतीं। अगर गर्मी का मौसम हुआ तो अपनी या किसी की बाग़ से कच्चे-पक्के आम सब खाते। तब तक एरिया में परंपरा थी कि गांव की ब्याही बिटिया और उसके साथ चलने वाली महिलाओं को किसी बाग़ से आम तोड़ने या खेतों से चना, मटर, मूंगफली खाने पर रोक नहीं थी।
मेरी अम्मा सहृदय और भावुक होने के साथ ही कड़क मिजाज की थीं। दो संतानों में बड़ी, अम्मा नाना-नानी की हद से ज्यादा दुलारी थीं। नाना उन्हें पूत कहते थे। शादी के बाद भी अम्मा अपने मायके वालों पर चलाती थीं। मामा भी उनसे डरते थे। सदरपुर में अम्मा थोड़ा बदल कर रहती थीं। अम्मा का यह कड़क स्वभाव पांच-छह साल की गर्दिश झेलने में बड़ा काम आया। एरिया में मुस्लिम आबादी शायद नहीं थी। इसलिए मुसलमानों के बारे में अम्मा की राय अधिकतर हिंदुओं की तरह कुछ-कुछ नकारात्मक थी।लेकिन बाबू ( मेरे पिता ) के प्रभाव में उनका व्यवहार बदलने लगा।
गांव के हज्जाम, करम अली से बाबू बहुत खुश रहते थे। ज्यादातर लोगों के लिए कर्म अली नउवा बाबू के लिए शेख साहब थे। शेख साहब की पत्नी को बाबू शेखाइन भौजी कहते थे। झगड़ू महरा करीब तीस साल तक हमारे घर में बर्तन साफ़ करते रहे। झगड़ू बाबा बूढ़े हो गए तो बाबू ने डरते-डरते सुझाव दिया कि बर्तन सफाई के लिए शेखाइन भौजी को लगा लिया जाए। अम्मा के मन में धारणा थी कि मुसलमान इतने गंदे होते हैं कि शौच के बाद हाथ ठीक से नहीं धोते, नहाना तो दूर।
बाबू ने उन्हें मिसालें देकर समझाया कि गंदे रहने या दिखने का संबंध धर्म से नहीं, गरीबी से होता है। खैर, शेखाइन भौजी और मेरी नाउन चाची बर्तन साफ़ करने घर में आने लगीं। कुछ दिन बाद घर की सफाई का काम भी उन्हें मिल गया। चाची तामचीनी की दो प्लेटें हमारे घर ले आई थीं, जो वह घर के बाहर लेकिन परिसर में ही फुलवारी के कोने में रखती थीं।
मक्की की चार मोटी रोटी, दाल, सालन और अचार उनका दोपहर का खाना होता था। बड़को चाची, महराना फूफू और चौधराइन चाची लगभग रोज़ अम्मा के पास आकर बैठती थीं। बाबू ने इसे प्रपंच सभा का नाम दिया था। नाउन चाची भी इस सभा की सदस्य बन गईं। नाउन चाची के बर्तन मांजने, घर में खाना खाने और प्रपंच सभा में शिरकत के कारण बाबू अम्मा को चिढ़ाते थे ,'' पंडिताइन बेधरम हो गई। ''
शेख साहब के बड़े बेटे 24 साल के अली अहमद की टिटनेस से मौत होने पर बाबू फूट-फूटकर रोए थे। अम्मा भी रोई थीं। बाबू उसके जनाज़े में गए थे और कब्र में मिट्टी भी डाली थी। उस दिन नाउन चाची के घर के सात लोगों का खाना मेरे घर से गया था।
मुसलमानों से अम्मा की दूरी फिर भी बनी रही। अम्मा गंदे से गंदे कायस्थ या ब्राह्मण को अपने बर्तनों में खाना खिला सकती थीं, मगर साफ-सुथरे मुसलमान के साथ यह व्यवहार संभव नहीं था, हालांकि अम्मा की जिंदगी में मुसलमानों का ख़ास स्थान था। बीमार होतीं तो हकीम जी की दवा से ठीक होतीं, हाथ-पैर में दर्द होता और प्रसूतावस्था में संतान शोक के बाद यह प्रायः होता था, नाउन चाची ही कबूतर के खून से, हकीम जी के बनाए तेल की मालिश से उन्हें आराम पहुंचातीं।
मौलवी साहब पांच रुपये के ट्यूशन पर मुझे हिसाब और उर्दू पढ़ाने आते थे। अम्मा को तब बहुत बुरा लगता, जब बाबू उनसे मौलवी साहब के लिए चाय बनाने को कहते। गांव में बाबू के सबसे खास दोस्त हाजी साहब थे। हाजी साहब,सेठ इब्राहिम, हकीम जी और उनके छोटे भाई, कंपाउंडर साहब के लिए बाबू ने तीन कप, तीन प्लेटें और चार रकाबियां अलग कर रखी थीं। ये बर्तन बैठके की अलमारी में रखे रहते थे। इसके आगे नहीं। अम्मा ने यह लक्ष्मण रेखा खींच रखी थी।
दो बार यह रेखा बुरी तरह टूटी। आमतौर से हकीम जी अम्मा का हाल सुनकर दवा देते या नुस्खा लिख देते। रतनू की दूकान पर सभी जड़ी-बूटियां मिल जाती थीं। बाबू हकीम जी को दस-पंद्रह रुपये देकर उन्हीं से दवा बनवा लिया करते थे। एक बार अम्मा को बुखार के साथ दस्त लग गए। कई दिन बीत गए। कोई फायदा नहीं। तब नब्ज देखना ज़रूरी हो गया।
लेकिन पांचो वक्त के अनुशासित नमाज़ी, हकीम जी किसी गैर औरत का जिस्म छू नहीं सकते थे। इसका रास्ता निकाला गया यह अम्मा की चारपाई के पास पर्दा किया गया। पर्दे के साथ ही कुर्सी डाली गई। अम्मा ने पर्दे के बाहर कलाई निकाली। नब्ज पर हाथ आते ही हकीम जी के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखने लगीं। हकीम जी ने सीतापुर के मशहूर डॉक्टर श्याम सुंदर मिश्रा के पास ले जाने की सलाह दी।
तब अम्मा को ठीक होने में दो महीने लग गए थे। डेढ़-दो साल के बाद अगले बच्चे की मृत्यु ने अम्मा को फिर बिस्तर लगा दिया। उनका हाज़मा ऐसा ख़राब हुआ कि तीन-चार दिन दीर्घशंका महसूस नहीं हुई। अम्मा को फुलवारी में पर्दे में लिटाया गया। हकीम जी के निर्देश के अनुसार, नाउन चाची ने अम्मा के एनीमा लगाया। अम्मा को राहत मिली।
हकीम जी ने अपने घर पर बनी काढ़े जैसी कोई दवा दी और खाने में मूंग की पतली दाल व नाश्ते में पतला साबूदाना बताया था। अम्मा अड़ गईं कि मुसलमान के घर उसके गेड़ुए ( टोंटीदार लोटा ) के पानी से बनी दवा नहीं पिएंगी क्योंकि मुसलमान जो गेड़ुआ लेकर संडास जाते हैं, उसी में पानी पीते हैं। ( यह सच नहीं था।
सच तो यह था कि गांव के हिंदू घर में इस्तेमाल होने वाला लोटा लेकर दिशा-मैदान को जाते थे। ) अम्मा की प्रपंच सभा ने दुलार और डाट-फटकार कर दवा पीने को राजी किया था। बड़को दादी का एक डायलॉग मुझे अब भी याद है,''पंडित हम आन और हमसे ज्यादा पंडिताइन ई बनी हैं। '' उसके बाद अम्मा को सभी पंडिताइन कहने लगे थे।
इस संबोधन से वह खुश भी होती थीं।
अम्मा का सामूहिक स्तर पर मुसलमानों से साबका पड़ा 1974 में। किसी भी हालत में गांव की चौखट न छोड़ने पर अड़ी, अम्मा बड़ी मजबूरी में लखनऊ आई थीं। आठ दिन की मूसलाधार बारिश ने पूरे गांव को तबाह कर दिया था।
एक अधपक्की कोठरी को छोड़ मेरे सात कमरों-कोठरियों वाले मकान में कुछ नहीं बचा था। डहरियों में भरा अनाज बेकार हो गया था। मेरे प्यारे, पुश्तैनी कुएं का पानी पीने लायक नहीं रहा था। घर के पीछे वाले तालाब का पानी पांच-छह फुट चढ़कर फुलवारी तक आ गया था। दो एहसानमंद पड़ोसियों और बड़को दादी ने तीन रात अम्मा को ' पहरे ' में रखा था। चौथे दिन मैं अम्मा को लखनऊ ले आया था। डेढ़ कमरों के किराये के मकान को देखकर अम्मा रुवासी हो गई थीं लेकिन अम्मा को यह बहुत खुशगवार लगा कि ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाली मकान मालकिन सजातीय थीं, अवधी बोलती थीं और तीज-त्यौहार,कर्मकांड का उन्हें व्यापक ज्ञान था।
लखनऊ में कई नजदीकी रिश्तेदार भी रहते थे। उनका आना-जाना शुरू हो गया। घर के पीछे किराना बाजार था और गड़बड़झाला बाज़ार भी। सुबह गांव के लोग सब्जी बेचने आते थे। सदरपुर में कभी बाजार न जाने वाली अम्मा अमीनाबाद में शॉपिंग करने लगीं। इस तरह नए परिवेश में अम्मा का मन लगने लगा।
एक दिन सुबह जब मैं अम्मा के हाथ के बने गरम-गरम पराठे आलू-गोभी की सब्जी के साथ खा रहा था, मोहम्मद शोएब अचानक आ धमके। शोएब से दोस्ती 1967 में यूनिवर्सिटी के दिनों में हुई थी, जो आज तक कायम है। अम्मा शोएब का नाम ध्यान से नहीं सुन पाईं। उन्होंने पराठों का ब्रेकफास्ट और लंच अपनी थाली में एक साथ करा दिया। शोएब ने रामचरित मानस की चौपाई जोर से पढ़ी,'' आज सुरन मोहिं दीन्ह अहारा।'' शोएब के जाने के बाद अम्मा ने नाम पूछा तो मैंने बताया मोहम्मद शोएब।
अम्मा को यकीन नहीं हुआ। बोलीं- ऊ तौ रामायण पढ़ि रहे रहयं। अजब इत्तफाक था, उसी दिन शाम को नदीम आ गए। अम्मा के सामने आते ही नदीम ने उन्हें नमस्ते किया। लेकिन अम्मा कुछ सनक गईं। चाय-पकौड़ी के बाद मैं नदीम के साथ गंजिंग करने निकल गया। शहर के पॉश मार्केट हज़रतगंज में आवारागर्दी को गंजिंग कहते थे। हम लोग धनी वर्ग की सजी-संवरी सुंदर लड़कियां देखने के साथ ही किताबों-मैग्जीनों की दुकानों के भी चक्कर लगाते थे।
गंजिंग करके लौटा तो अम्मा भरी बैठी थीं। सवाल दागा- तुमरे सारे दोस्त मुसलमानय हैं ? कोई हिंदू नाइ रहिगा ? '' मैंने अम्मा को चिढ़ाते हुए जवाब दिया,''ऊ तौ बाबू केर परंपरा आय।''
कुछ दिन बाद अम्मा की तबियत ख़राब हुई। घर से थोड़ी दूर एक डॉक्टर के पास अम्मा को ले गया। उन्होंने बड़े गौर से बोर्ड देखा। इस पर लिखा हुआ था-इरफ़ान क्लिनिक। इसके नीचे डॉक्टर का नाम था: डा. सैयद इरफ़ान कदीम एमबीबीएस, एमएस ( केजीएमसी ) ।
अम्मा भिनकीं - लेव डॉक्टरवा मुसलमान। धीरे-धीरे शोएब, नदीम और डा. इरफ़ान से हमारे पारिवारिक संबंध हो गए। संबंध क्या, अटूट रिश्ते हो गए। अम्मा की किसी बात का ये तीनों बुरा नहीं मानते थे।
एक बार एक दुखद घटना हो गई। नदीम सपत्नीक आए हुए थे। रानी ( मेरी पत्नी ) ने क्रॉकरी में चाय नाश्ता करीने से सजाया। अम्मा ने रानी से इशारे में कहा, यह क्या कर डाला? नदीम ने अम्मा के इशारे को देख लिया था। एक अरसा बाद मुझसे कहा- तुमसे दोस्ती की खातिर मैं फ़ौरन उठके नहीं चला आया था। मगर अम्मा के प्रति उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आई थी।
एक-दो साल बाद अम्मा का नेक फीमर का फ्रैक्चर हो गया था। डा. इरफ़ान की सलाह पर उन्हें बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया था। मेरे पत्रकार होने के नाते अच्छा प्राइवेट रूम मिल गया था। सुबह-शाम नाश्ता, लंच और डिनर अस्पताल की तरफ से मिलता था। एक दिन शाम को मलका भाभी ( शोएब की पत्नी ) आकर बैठी ही थीं कि खाने की ट्रे आ गई। लंबा प्लास्टर लगे होने की वजह से अम्मा उठकर बैठ नहीं सकती थीं। भाभी ने बड़े सहज ढंग से कहा,''अम्मा मैं हाथ धोकर आती हूं। आप को खाना खिला दूं।'
'' अम्मा ने चट जवाब दिया,'' अस्पताल में भंगी-मेहतर सबै छुइ रहे हैं। अब का। खिलाय देव खाना।'' हम सब ठहाके लगाने लगे। भाभी भी ठहाकों में शामिल थीं। अम्मा तो जगत अम्मा थीं। भाभी ने बुरा नहीं माना।
शोएब, नदीम और डा. इरफ़ान की अकसर आवाजाही का नतीजा यह हुआ कि अम्मा का धार्मिक दुराग्रह साल-डेढ़ साल में ख़त्म हो गया। अम्मा खुद घर के बर्तनों में उन्हें खाना खिलाती थीं। इन लोगों की बेलौस मोहब्बत ने अम्मा का दिल जीत लिया था। कभी-कभी कहती थीं '' तुमरे दोस्त तव देवता जस हैं। ''
कुछ दिन बात मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जुझारू सिपाही ज़ाहिद अली शाह भी हमारे परिवार के सदस्य बन गए। कामरेड शाह सीपीएम की वैचारिक मासिक पत्रिका ' सोशल साइंटिस्ट ' और साप्ताहिक मुखपत्र ' पीपल्स डेमोक्रैसी ' मुझे मुहैया कराते थे। कभी शहर में मिल जाएं तो मुझे पत्रिकाएं पकड़ाने लगते। एक बार मैंने उनसे कहा, आप का दफ्तर मेरे घर के पास ही तो है, अम्मा को दे दीजिएगा। मई का महीना रहा होगा, एक दोपहर शाह साहब (मैं उन्हें इसी तरह संबोधित करता था ) पत्रिकाएं देने घर आए।
अम्मा ने उन्हें अपने हाथ से बनाए मीठे खुरमे के साथ पानी पिलाया। कई दिन बाद मालुम हुआ कि शाह साहब ने उस दिन खाना नहीं खाया था। उनमें खुद्दारी बहुत थी। पार्टी से होलटाइमर के लिए तय अलाउंस वह दुनियादारी पर भी खर्च कर कर दिया करते थे। मैंने अम्मा को शाह साहब के भूखे रह जाने की बात बताई, तो वह रुआंसी हो गईं। उस दिन के बाद से शाह साहब जब कभी घर आते, अम्मा उन्हें रोटी-पराठा या दाल-चावल जो भी घर में होता, खाए बिना जाने नहीं देतीं।
एक दिन शाह साहब ने मुझसे शिकवा किया,'' तुम्हारी वजह से मेरा पेट ख़राब हो गया। मैं शर्मा भोजनालय से खाना खाकर तुम्हारे घर गया था। अम्मा ने मुझे दो पराठे जबरदस्ती खिला दिए। मैं उनके इसरार को टाल नहीं सकता। तुमने न जाने क्या अम्मा से बोल दिया। '' उस दिन तय हुआ कि जब कभी वह मेरे घर बिना खाना खाए आएंगे, बिना किसी तकल्लुफ अम्मा से मांगकर खाएंगे।
करीब तीन साल तक शाह साहब हमारे घर के सदस्य बने रहे। हम लोग उसके बाद दिल्ली आ गए थे। अम्मा, शाह साहब को अकसर याद करती थीं। अम्मा 1985 से फ़रवरी 2010 तक दिल्ली, कानपुर और रायपुर मेरे साथ रहीं। स्वर्गवास के समय उनकी उम्र 90 से ऊपर रही होगी। तीन-चार बार हड्डियां टूटने से वह काफी अशक्त हो गई थीं। वह जब-तब मुझसे पूछतीं,''दिल्ली म तुमार कोई मुसलमान दोस्त नाइ है।''
आखिर के तीन-चार महीने डायपर उनके शरीर का हिस्सा बन गया था। फ़रवरी के पहले हफ्ते में डा. इरफ़ान घर आए थे। उन्होंने अम्मा को पहली नज़र के बाद ही मुझसे बहुत दुखी होकर कहा था, अम्मा इसी महीने की मेहमान हैं। अम्मा 26 की रात चली गईं।
रानी ने बेटी पूजा से कहा-तुलसी की पत्ती और गंगा जल जल्दी से लाओ। बेटी का हाथ गया आब-ए-ज़मज़म की शीशी पर, जो नवभारत टाइम्स में मेरे सहयोगी हबीब अख्तर ने हज से लौटने के बाद मुझे दिया था। मुझे यकीन है, हरिद्वार या बृजघाट की गंगा के जल के बजाय, हज़ारों साल से कुदरती सोते से निकल रहे आब-ए-ज़मज़म ग्रहण कर अम्मा ने पूजा को असीमित आशीर्वाद दिया हो।
प्रदीप कुमार, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, अमर उजाला आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे है। यह उनकी संस्मरण श्रृंखला की एक बानगी है।
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