पत्रकारों पर बनते मामले और पत्रकार सुरक्षा कानून
उत्तम कुमारजिस तरह पूरे प्रदेश में आदिवासियों, किसानों-मजदूरों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों पर उत्पीडऩ और लैंगिक भेदभाव बढ़ता जा रहा है पत्रकारिता दो भागों में बंट गया है। जो पत्रकार या सम्पादक इन आंदोलनों का समर्थन करते हैं वे सरकारविरोधी हो गये हैं और जो सरकार का समर्थन करते हैं वे मुख्यधारा के मीडिया में गिने जाते हैं। सलवा जुडूम के बाद से पत्रकारों की हत्या और उनके खिलाफ मामले बनने लगे हैं।वैकल्पिक मीडिया के रूप में जो लोग सोशल मीडिया में कार्य कर रहे हैं वे भी आत्मनिर्भर नहीं है। जिन पत्रकारों व सम्पादकों ने कार्पोरेट, सरकार और राजनैतिक पार्टियों के मदद के बगैर काम शुरू किया है उन्हें हासिये का समाज भी मदद करने से हिचकिचाते हैं। ऐसे स्थिति में जनपक्षधर पत्रकारिता कुछ तो बंद हो गये हैं या या जो बचे हैं उन्हें बंद कर देने की साजिश हो रही है।

इन्हीं सब मुद्दों को लेकर ह्यूमन राईट लायर्स नेटवर्क ने रायपुर में हाल ही में दो दिन का कार्यक्रम रखा था। जिसमें सारे मुद्दों को एक जगह लाकर उसके लिये संघर्ष, संविधान की रक्षा और कानूनी कार्यवाही के लिये रास्ता निकालने की कोशिश शुरू की गई है।
छत्तीसगढ़ में ही फरवरी 2019 को पत्रकार सुमन पांडे पर बीजेपी कार्यालय में हमला बोला गया। उसके समर्थन में पत्रकार अनिश्चितकालीन आंदोलन में उतर आये थे। सितम्बर 2020 में सतोष यादव और कमल शुक्ला पर हमला हुआ। बताया जा रहा है कि यह रेत उत्खनन और जमीन माफिया से जुड़ा मामला था। अक्टूबर 2020 को नवभारत के पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर को जशपुर स्थाननान्तर कर दिया गया क्योंकि वे लंबे समय से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग के साथ पत्रकारों के हित में संघर्षरत थे।
नवम्बर 2020 को छत्तीसगढ़ पोस्ट के पत्रकार मनीष सोनी पर डॉक्टर और कांग्रसियों ने झूठी शिकायत दर्ज करा दी। दिसम्बर 2020 को अभिषेक झा को जेल में डाल दिया गया क्यांकि वे कांग्रेस के पूर्व विधायक व एक मठ के महंत के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल कर रहे थे। गुंडे उन्हें रायपुर से उठा ले गए, जमकर मारपीट की और उनके खिलाफ झूठा मामला बना कर जेल भेज दिया।
12 फरवरी 2021/ज्ञानेंद्र तिवारी/रायपुर/एबीपी लाइव ने खबर प्रकाशित की कि नक्सलियों ने प्रेस नोट जारी कर पत्रकारों को धमकी दी है। छत्तीसगढ़ में पहली बार नक्सलियों ने प्रेस नोट जारी कर पत्रकारों को धमकी दी है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) दक्षिण सब जोनल ब्यूरो की तरफ से जारी प्रेस नोट में पत्रकारों के नाम लिखकर उनके ऊपर सरकार के साथ चलने का आरोप लगाया गया है। प्रेस नोट में बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा के साथ लीलाधर राठी, पी विजय, फारुख अली, शुभ्रांशु चौधरी के नाम शामिल थे।
26 अक्टूबर 2021/नीतिन लारेंस/आईडीपी 24 ने खबर बनाया कि आलाकमान ने भूपेश सरकार को दी पत्रकारों पर दबाव बनाने की छूट चाटुकार बनो या तो पत्रकारिता छोड़ो की नीति।
जिला कांग्रेस कमेटी जशपुर के अध्यक्ष मनोज सागर यादव का दबदबा इस हद तक सार्वजनिक है जिनकी मौजूदगी में कांग्रेस नेता के बदसलूकी का वीडियो बनाकर एक पत्रकार गुनहगार बन गया शर्म की बात यह है कि उनके इस दादागिरी पर खुद को बड़े संस्थान के पत्रकार कहने वाले पत्रकारों की बोलती भी बंद है। मनोज सागर यादव की मौजूदगी में पूर्व जिला अध्यक्ष के साथ मंच पर बदसलूकी की गई। धक्कामुक्की की गई। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना मीडिया की मौजूदगी में हुई। मीडिया ने खबर बनाई, दिखाई। अपना काम किया।
अब खबर लिखना और दिखाना यादव साहब को नागवार गुजरा। यादव साहब ने सभी मीडिया समूहों पर एफआईआर दर्ज करने का पत्र थाना प्रभारी कुनकुरी को लिखा है। इस पत्र को लेकर खुद संसदीय सचिव यूडी मिंज थाने पहुंचे थे। उन्होंने टीआई साहब को साफ शब्दों में कह भी दिया है कि एफआईआर दर्ज हो जाना चाहिए।
7 अक्टूर 2021 सीजीटॉप -24/36 ने खबर बनाया कि गरियाबंद में राशन माफिया गैंग ने पत्रकार को बंधक बनाकर की मारपीट की, पुलिस ने कर रही महज खानापूर्ति, सिर्फ दो के खिलाफ मामला दर्ज, मुख्यमंत्री तक हुई शिकायत।
गिरिश गुप्ता मैनपुर के खबर के अनुसार पत्रकार रविशंकर बघेल पर बड़ा हमला किया गया जिसमें बघेल ने भाग कर बचाई अपनी जान 10 से 15 लोगों ने जान से मारने की कोशिश में लग हुए थे। जिसके बाद मुश्किल से उनकी जान बच पाई है। बता दें कि रविशंकर बघेल नान अधिकारी गरियाबंद में आरटीआई की आवेदन दे कर के मैनपुर आया। उसके बाद पेट्रोल पंप में पेट्रोल डालने के लिए जा रहे थे उसी समय 9 : 00 बजे होरा ट्रांसपोर्ट की दो गाड़ी महिंद्रा शोरूम नूरी खान टायर के पास खड़ी थी।
वहां वह खबर बनाने के लिए गाड़ी की फोटो ले रहे थे तब उसी समय परिवहन चालक ने तत्काल अपने मुंशी आशीष को फोन किया उसके बाद आशीष ने छोटी गाड़ी पीकप में 10 से 15 लोगों को ले कर आया उसके बाद दो-तीन ट्रांसपोर्टरों की गाड़ी भी और पहुंच गई उसी दरम्यान गाली गलौज कर मारने की धमकी दी गई और कहा कि आप बाल - बच्चे वाले हो हमारा भी बाल - बच्चा है आप खबर लगा दिए ऐसा कह कर मारपीट करने में उतारू हुए और मारपीट करने लगे जिससे बघेल के गर्दन में चोट लगी है।
बताया जा रहा है कि लोग काफी शराब पिए हुए थे और शराब को संवाददाता के मुंह में डाल भी रहे थे छिडक़ रहे थे ताकि यह भी लगे कि पत्रकार शराब सेवन किया है और फंसा दिया जाए फिर पत्रकार की अच्छी कुटाई कर ले ऐसा इन लोगों की पहले से ही मंशा बनाकर के घात लगा कर के बैठे हुए थे।
मनोज नायक ने रायपुर से 3 फरवरी 2019 को हरिभूमि के लिये खबर बनाया कि भाजपा कार्यालय में समीक्षा बैठक में पत्रकारों के साथ हुई बदसलूकी का मामला अभी थमता नजर नहीं आ रहा है। आरोपियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए पत्रकार देर रात तक धरने पर बैठे रहे। चारों नेतााओं की पार्टी से बर्खास्तगी की मांग उठाया गया। सभी पत्रकार अनिश्चितकालीन आंदोलन में चले गये। जिसके बाद बीजेपी कार्यालय में पत्रकार सुमन पांडे के साथ मारपीट मामले में जिलाध्यक्ष राजीव अग्रवाल सहित तीन आरोपियों को रात में ही मौदहापारा पुलिस ने गिरफ्तार किया और बाद में जमानत मुचलका पर रिहा कर दिया।
नारायण बैन/2 फरवरी 2021/जोहार छत्तीसगढ़ के खबर के अनुसार सत्तारूढ़ पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष आई टी सेल ने जो लिखा है उसका सच क्या है? उसकी जांच होनी चाहिए।
पत्रकार आशुतोष मिश्रा पर हुए एफआईआर पर पूर्व विधायक हृदय राम राठिया ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि पत्रकार के खिलाफ बिना जांच पड़ताल के कराया गया इस तरह का एफआईआर पत्रकारों की अभिव्यक्ति का हनन है। पत्रकार, शासन प्रशासन का आईना होते है।
अगर प्रशासन जनहित में प्रकाशित समाचारों को लेकर इस प्रकार पत्रकारों को निशाना बनाएगा तो इससे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहलाये जाने वाले पत्रकार स्वतंत्रता पूर्वक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन क़भी नही कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि आशुतोष मिश्रा पर जिस तरीके से एफआईआर दर्ज की गई प्रशासन को इसका जवाब देना चाहिए जबकि जैसा कि आवेदन में जिक्र है एक भी आरोप पर किसी तरह की एफआईआर बनती ही नहीं है।
रायपुर, 30 सितंबर 2020 को आरएनएस ने खबर बनाया है कि रायपुर प्रेस क्लब ने दो अक्टूबर को कांकेर में पत्रकार के साथ हुई मारपीट के मामलें में आयोजित मुख्यमंत्री निवास के तथाकथित घेराव को समर्थन देने से इंकार कर दिया है। प्रेस क्लब से जारी सूचना में प्रेस क्लब अध्यक्ष ने समर्थन देने वाली बात को दुष्प्रचार बताया है।
ज्ञात हो कि कुछ दिनों पहले कांकेर में पत्रकार सतीश यादव व कमल शुक्ला के साथ कुछ लोगों द्वारा मारपीट की गई थी जिसका वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन एक्शन में आया तथा तत्काल मारपीट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी हालांकि आरोपियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया था।
केशरी भारत ने 19 फरवरी 2021 को खबर बनाया कि छत्तीसगढ़ राज्य में पत्रकार अब सुरक्षित नहीं...। बस्तर संभाग हो या अंबिकापुर संभाग, दुर्ग हो या बिलासपुर, रायपुर...,कोई भी, कहीं भी शिकार हो सकता है। कभी राजनैतिक, कभी प्रशासनिक, कभी उद्योगपतियों का तो कभी अपराधिक गुण्डा तत्वों का, माओवादियों का भी...
आज विषम परिस्थितियों के बीच जूझते हुए सरकार और जनता के बीच की कड़ी के रूप में पत्रकारिता करना दुभर हो गया है।
सूरजपुर के पत्रकार चंद्र प्रकाश साहू के द्वारा जिले में धान की अफरातफरी के मामले को उजागर करने वाली अपनी निर्भीक पत्रकारिता की वजह से वे रंजिश का शिकार हुए हैं जानकारी के अनुसार 16 फरवरी को भी वह बारिश से भीग रहे धान की रिपोर्टिंग करने के लिए आदिम जाति सेवा सहकारी समिति गए थे, जहां उनकी खबरों से रंजिश रख रहे समिति के प्रबंधक मोहन राजवाड़े ने पत्रकार चंद्रप्रकाश पर गुंडों से हमला करवा कर उन्हें घायल कर दिया...!
हमला होने के 24 घंटे बाद तक बचाव का खेल चलता रहा ...! सरगुजा संभाग के पत्रकार एकजुट होकर आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर थाना कोतवाली में लामबंद हुए तो जिले की पुलिस प्रशासन हरकत में आई और आरोपियों के विरुद्ध मामला दर्ज कर आनन - फानन में गिरफ्तार किया और मुचलके पर छोड़ भी दिया ।
प्रबुद्ध जनता प्रबुद्ध जनता, नवम्बर 17 2021 को खबर बनाया कि पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी गई तथा आरोपी के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया। पखांजूर थाना अंतर्गत में बीते दिनों दो व्यक्तियों ने उसके दुकान कापसी में जाकर गाली गलौज करने का मामला प्रकाश में आया हैं। पखांजूर पुलिस ने दो आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच में जुट गई। मिली जानकारी के अनुसार कापसी के टीबी वन न्यूज के रिपोर्टर किशोर बाला पीवी 3 का निवासी को पीवी 34 के बीरेंद्र मंडल जोगेन बिसवास ने उसके दुकान पर जान से मारने की धमकी दी हैं ओर पत्रकारिता करना छोड़ दो इसी में भलाई हैं कहकर गाली गलौज किया है, जिसे लेकर पखांजूर के पत्रकारों ने एक होकर मामला दर्ज कराया है।
इस मामले को लेकर पत्रकार का एक दल पखांजूर थाने में लिखित शिकायत कर कड़ी कार्यवाही करने की बात कही है। असुरक्षित पत्रकार, राष्ट्रपति से गुहार विषय में कृष्णकांत ने 16 मई, 2016 को तहलका में एक विस्तृत रिपोर्ट लिखा है। उन्होंने लिखा कि छत्तीसगढ़ में 2012 से अब तक छह पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। इन हत्याओं के सिलसिले में कोई भी आरोपी पकड़ा नहीं गया है। चार पत्रकार जेल में हैं। छह पत्रकार डर के मारे फरार हैं। कुछ को धमकियां मिल रही हैं।
कुछ को डराया जा रहा है। कुछ को कई तरीकों से प्रताडि़त किया जा रहा है। कुछ ने पत्रकारिता छोड़ दी है। कुछ पर छोडऩे का दबाव है। कुछ सिर्फ सरकारी विज्ञापन को खबर बनाकर लिखते हैं, कुछ ऐसा कभी नहीं करना चाहते। कुछ ने सवाल करना छोड़ दिया है। कुछ ने पत्रकारिता ही छोड़ दी है और ठेकेदार बन गए हैं। उन्हें प्रसाद स्वरूप सरकारी ठेके भी मिल गए हैं। कुछ ने अन्य तरीकों से समझौता कर लिया है और कुछ अभी डटे हुए हैं।
इस रिपोर्ट में बस्तर में नक्सली का सहयोगी बताकर और फर्जी मामलों में फंसाकर एक वर्ष के भीतर चार पत्रकारों- सोमारू नाग, संतोष यादव, दीपक जायसवाल और प्रभात सिंह को जेल भेजा गया है जबकि पूरे प्रदेश में कई पत्रकारों के खिलाफ फर्जी प्रकरण दर्ज करके उन्हें जेल भेजने की कोशिश की जा रही है।
बस्तर में पत्रकार साथी नेमीचंद जैन और साईं रेड्डी को पुलिस मुखबिर बताकर नक्सलियों द्वारा मौत के घाट उतारा जा चुका है। इनमें से साईं रेड्डी को नक्सली का सहयोगी बताकर राज्य सरकार ने ‘छत्तीसगढ़ राज्य जनसुरक्षा अधिनियम’ के तहत दो वर्ष बंद रखा था।’
पत्रकारों ने पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति के तहत निरपेक्ष पत्रकारिता के विरुद्ध बने इस माहौल के खिलाफ पिछले एक वर्ष से आंदोलन छेड़ रखा था। जेल में बंद पत्रकारों की रिहाई के साथ ही पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर 21 दिसंबर, 2015 को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिले में पत्रकारों ने जेल भरो आंदोलन किया था।
इस रिपोर्ट में पत्रकार नितिन सिन्हा बताते हैं, ‘जगदीश कुर्रे मानवाधिकार के मामलों की रिपोर्टिंग करते थे। काफी मामले उन्होंने उठाए कि आदिवासी लड़कियों को दिल्ली और बाहर के शहरों में ले जाकर बेचा जा रहा है। इससे सरकार बदनाम हो रही थी। दो-तीन बार उनको धमकी दी फिर उसी में से एक मामले में मानव तस्करी का आरोप लगाकर फंसा दिया गया।’
मनीष सोनी जी-न्यूज में रिपोर्टिंग करते थे। सोनी ने पुलिस विभाग के खिलाफ कई मामले उठाए थे। पहले जी-न्यूज ने उनको निकाल दिया। जी-न्यूज से निकाले जाने के बाद ही पुलिस विभाग ने उनके पूरे परिवार के खिलाफ मामले दर्ज कर लिए।
ऐसी ही एक दूसरी घटना के बारे में वे बताते हैं, ‘हिंडाल्को मामले में रिपोर्टिंग करने वाले सौरभ अग्रवाल ने जिंदल समूह पर सवाल उठाए। हिंडाल्को की वजह से मिझोर आदिवासियों की पूरी बस्ती रात भर में हटा दी गई थी। उस मामले को कवर करने गए सौरभ का मोबाइल जब्त कर लिया गया और उनके खिलाफ केस दर्ज कर दिया। फिलहाल सौरभ फरार चल रहे हैं।’
रिपोर्ट में पत्रकार सौरभ ने बताया कि ‘रायगढ़ में कॉरपोरेट घरानों का राज है। जो पत्रकार सच्चाई लिख रहे हैं, जो पत्रकार कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ कुछ लिख रहे हैं, उनके खिलाफ फर्जी एफआईआर दर्ज कर दी जा रही है। धमकियां दी जा रही हैं। मुख्यमंत्री पूरी तरह कॉरपोरेट के कंट्रोल में हैं। रिपोर्टिंग के दौरान मेरा मोबाइल जब्त कर लिया गया और मुझे धमकी दी गई।’
ज्ञापन में कहा गया था कि ‘बस्तर संभाग में पुलिस आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी सीधे पत्रकारों को फोन करके धमकाते हैं कि पत्रकार अगर सरकार के खिलाफ लिखेंगे तो उन्हें भुगतना पड़ेगा। इस माहौल में पूरे प्रदेश के पत्रकारों में भय व्याप्त है।
डोंगरगांव में कवरेज के लिए गए मीडियाकर्मियों पर रेत माफिया ने किया हमला। 19 मई, 2021 को ईटीवीभारत ने खबर बनाया कि छत्तीसगढ़ के डोंगरगांव में पत्रकारों के साथ मारपीट का मामला सामने आया है। रात में चार-पांच की संख्या में मीडियाकर्मी अवैध रेत उत्खनन का कवरेज करने गए थे। आरोप है कि मौजूद रेत माफियाओं ने मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट की। कैमरा और माइक को तोड़ दिया है। महिला पत्रकार के साथ छेड़छाड़ भी की गई है।
हिन्दुस्तान, रायपुर ने 29 मार्च 2020 को खबर बनाया कि कोरोना वायरस महामारी के वक्त आदिवासियों की तरफ से पत्ते का मास्क बनाकर उसे पहनने की तस्वीर सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्म पर वायरल होने के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने बस्तर में एक स्थानीय पत्रकार के खिलाफ केस दर्ज किया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक एफआईआर दर्ज होने के बाद स्थानीय पत्रकार जीवनाथ हलदर जो कि एक टेलीविजन चैनल में काम करते हैं, ने एक बयान जारी कर कहा कि तीन अन्य लोगों के साथ अमाबेड़ा गए थे ताकि यह पता लगाया जा सके कि जब हाट-बाजार बंद है, तो ऐसे में लॉकडाउन के वक्त आदिवासी कैसे जिंदगी बिता रहे हैं।
जैसे ही वहां पर पहुंचे, स्थानीय लोगों ने ड्रम बजाया जो वहां का स्थानीय रीति रिवाज है। बातचीत में गांववालों ने बताया कि उन लोगों ने बीमारी फैलने के बारे में सुना है, इसलिए पत्ते के बने मास्क लगा रहे हैं और हाथ साफ करने के लिए राख का इस्तेमाल कर रहे हैं। गांववालों ने बताया कि जब से लॉकडाउन का ऐलान हुआ है पत्रकारों के अलावा प्रशासन की तरफ से यहां पर कोई नहीं आया।
भड़ास मीडिया ने दिसम्बर 9, 2020 को खबर बनाया कि छत्तीसगढ़ के बेबाक टीवी पत्रकार को विधायक से सवाल पूछने पर पुलिस ने भेजा जेल। अभिषेक झा छत्तीसगढ़ के बेबाक पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें वाट्सअप में प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ अपना डीपी भी लगा रखी है।
बावजूद इसके छत्तीसगढ़ पुलिस ने इन झा साहब को जेल में ठूंसने में तनिक गुरेज न किया। झा साहब फिलहाल प्रदेश सरकार की ‘पत्रकार अत्याचार नीति’ का शिकार होकर राजधानी से सैकड़ों किलोमीटर दूर जांजगीर जेल में निवास कर रहे हैं।
भड़ास ने लिखा है कि इन पत्रकार महोदय का अपराध यह बताया जाता है कि ये बेधडक़ सवाल करते हैं, बिना डरे सरकार के खासमखास पूर्व विधायक महंत राम सुंदर दास मठाधीश से भी उसने कुछ सवाल कर लिए। फिर उनके गुंडों ने उन्हें उठाकर उनके किसी मठ के अंदर दो से तीन दिन जमकर पीटा। फिर राजधानी से बाहर अपने इलाके (शिवरीनारायण) ले जाकर फर्जी मामले लगाकर सीधे जेल भिजवा दिया।
रामसुंदर और छत्तीसढ़ सरकार ने एक सप्ताह तक इस पूरे मामले को दबाये रखा। अब कुछ पत्रकारों के प्रयास के चलते यह प्रकरण बाहर आ सका है। भड़ास लिखता है कि ज्ञात हो कि अभिषेक झा जी न्यूज के ब्यूरो चीफ रह चुके थे पंजाब केसरी में काम कर चुके हैं। खरी खरी बात कहने पूछने के कारण अक्सर अभिषेक किसी न किसी प्रकरण में फंस या फंसा दिए जाते हैं।
बहरहाल महाराष्ट्र में पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कर दिया गया है और छत्तीसगढ़ में विचाराधीन है। छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षा प्रस्तावित कानून में यहां के पत्रकारों ने पत्रकारों की सुरक्षा हेतु समिति ने एक पुलिस अधिकारी जो अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक से निम्र पद का न हो को शामिल करने को लेकर आपत्ति दर्ज करा चुके हैं। इसके अलावा प्रस्तावित कानून में और भी कई सारे सवाल उठाये हैं।
इस राज्य स्तरीय कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कॉलिन गोन्जाल्विस, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता किशोर नारायण, रजनी सोरेन, डिग्री प्रसाद, चौहान, दंतेवाड़ा से क्षितिज दुबे, आशीष बेक, अमरनाथ पांडेय, संगीता साहू (राइट टू फूड), गौतम बन्धोपाध्याय (छत्तीसगढ़ हॉकर्स फेडरेशन), लखन सुबोध (लोक सृजनहार यूनियन), सोनी सोरी (आदिवासी कार्यकर्ता), हिमांशु कुमार (सामाजिक कार्यकर्ता) सुजित कर्मा (बंदी रिहाई मंच), श्रेया (छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा), ममता कुजूर (मानवाधिकार कार्यकर्ता) कंचन शेन्द्रे (एलजीबीटी कार्यकर्ता), जंगसाय पोया (भारत जन आंदोलन), सजल मधु (हाथी मेरा साथी, चिरंगा), जैकब कुजूर, वीएन प्रसाद राव, अखिलेश एडगर (अल्पसंख्यक इसाई कार्यकर्ता), लिंगाराम कोडोपी, मनीष सोनी, प्रभात सिंह (पत्रकार), गोल्डी एम जार्ज (दलित मुक्ति मोर्चा), संजित बर्मन (दलित अधिकार कार्यकर्ता) तथा प्रितम सिंह सहित सैकड़ों सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ता उपस्थिति थे।
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