बेटे की तलाश में दर-दर भटकती मिली छत्तीसगढ़ की महिला

अखिलेश खोब्रागढ़े

 

‘दुनिया में कितना गम है... लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया...’ 1986 में आई फिल्म अमृत के गीत को शायद ही कोई भुला हो। आज मेरे सामने से वाक्य गुजर रहा था। उसे देख कर मुझे भी इस गीत के बोल याद आ गए।

गोंदिया स्टेशन में अपने शहर वापसी के लिए रिटर्न टिकट रिजर्वेशन करवाने पहुंचा। उस समय देखा कि स्टेशन के ठीक सामने पार्किंग वाले एरिया में एक महिला अपने छोटे बच्चे के साथ बहुत मायूस गुमसुम सी बैठी थी। उस महिला के सामने एक दो लोग और भी खड़े थे मामला समझने के लिए मौके पर पहुंच गया। लेकिन घटना सुनने के बाद टिकट रिजर्वेशन करवाने वाला अपना काम घंटों के लिए रोकना पड़ा।

जो महिला अपने छोटे बच्चे के साथ बैठी थीं। मैंने उस महिला से बात करने का प्रयास किया तो उस महिला ने बहुत झुंझलाहट में मुझे बुरा भला कहने लगी। लेकिन मुझे समझते देरी नहीं लगी मैं भी अपने तासीर वाले फितरत में आ गया। और काफी देर तक उसकी बातें सुनी लेकिन कुछ देर बाद जब महिला ने आंसू बहाना शुरू किया उसके बाद अपनी आपबीती बता ही दी।

ओ अपना पता-गंजपारा, थाना रेल्वे स्टेशन रायपुर (छत्तीसगढ़) निवासी बताया। महिला का नाम संगीता पति सूरज कुशवाहा (उम्र-24 वर्ष)है। साथ ही अपने 2 वर्षीय छोटे बेटे भावेश कुशवाहा को लेकर महीनों से भटक रही है जबकि इस महिला का 8 वर्षीय बड़ा बेटा आवेश कुशवाहा नागपुर से गुम हो चुका। संगीता कुशवाहा के अनुसार उसका पति लगातार उससे मारपीट करते रहता है। वर्तमान में उसके पति ने दूसरी पत्नी लाकर उसे घर से निकाल दिया है। 

दोनों बच्चों को लेकर वह दर-दर भटक रही है संभवत: रोजी रोटी के लिए नागपुर चली गई थी। इसी दौरान जब वह काम पर थी। तब उसका बेटा गुम हो चुका है। अब वह भूखे प्यासे हताश परेशान होकर अपने बेटे की तलाश में दर-दर भटक रही है।

अपने बड़े बेटे को तलाशते हुए महिला महाराष्ट्र के दूसरे स्टेशन गोंदिया में पहुंची लेकिन उसकी परेशानी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है एक तो बड़े बेटे की चिंता दूसरी जिम्मेदारी जो उसके गोद में पल रहे छोटे बच्चे की है। जिसके लिये दूध रोटी और खुद के जीवन चलाने के लिए हाथ में कुछ भी नहीं है। ऐसी स्थिति में एक मां का सब्र और इंतेहा बहुत कठिन दौर से गुजर रहा है। 

बुरे वक्त में एक महिला का साथ एक महिला ही दे सकती है यह कहावत नहीं बल्कि सच्चाई है। गोंदिया शहर की मददगार महिला जो अनाथ बच्चों और महिलाओं के सहयोग के लिए जानी जाती है वह उस वक्त मौजूद थी और मैंने उसे चर्चा की। इस दौरान एक महिला पुलिसकर्मी भी पहुंच चुकी थी। वह भी इस भटकती हुई महिला के लिए बहुत मददगार साबित हो रही थी। 

मेरे रहते तक मौके पर मददगार महिला डॉ. सविता बेदरकार और एक महिला पुलिसकर्मी मौजूद थी। महिला पुलिसकर्मी ने अपने संबंधित अधिकारी से सारी जानकारी संज्ञान में दे रखी है। मददगार महिला डॉ. सविता बेदरकार ने फिलहाल महिला और बच्चे को अपने घर पर पनाह दे रखी है उसके बाद अपने फॉर्म हाउस में उसे काम पर रखेगी ऐसा उनका कहना है।

जब कुछ लोगों से बात की तो मददगार महिला डॉ. सविता बेदरकार की काफी तारीफें सुनी और वह हर बार किसी ने किसी की मदद करने पहुंच जाती है। बहरहाल भटकती महिला और बच्चें को पनाह तो मिल गई है लेकिन अपने गुम बड़े बेटे की चिंता उसे लगातार खाए जा रही थी। 

आप लोगों से भी गुजारिश है कि जितना हो सके इस मामले को संज्ञान में लेवें। ना जाने ऐसे कितने बच्चे होंगे जो इसी तरह गुम होंगे या उन्हें गायब कर दिया गया होगा। और ना जाने वो किस हाल में होंगे।

लेखक पेशे से पत्रकार हैं और राजनांदगांव छत्तीसगढ़ में रहते हैं।


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