अखबार के धंधे में गुलामी से जूझते पत्रकार

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर आजाद कौन?

उत्तम कुमार

 

इसी कड़ी में जशपुर कांग्रेस कमेटी ने कुनकुरी थाना में एफआईआर दर्ज कराया गया है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस ने दो पत्रकारों को गिरफ्तार किया है। दोनों पर गलत और भ्रामक खबर लगाने का आरोप है। सिविल लाइंस थाना क्षेत्र की पुलिस ने कांग्रेस विधायकों की शिकायत पर भ्रामक और आधारहीन खबर प्रकाशित करने के आरोप में स्थानीय वेब पोर्टल के दो पत्रकारों को पकड़ा है। पुलिस अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

बिहार के मधुबनी जिले के इस स्थानीय पत्रकार अभि झा अविनाश को इसलिएजिंदा जला दिया जाता है क्योंकि वह स्थानीय अस्पतालों में सक्रिय माफियाओं के खिलाफ खबर लिखता है।

5 अक्टूबर 2020 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने स्वतंत्र पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को गिरफ्तार कर लिया. कप्पन उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित युवति के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की रिपोर्ट करने जा रहे थे. उन पर देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम जैसे कठोर कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया।

 15 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उनकी बीमार मां से मिलने के लिए पांच दिन की जमानत दी लेकिन उन्हें मीडिया से बात करने की इजाजत नहीं दी। हाल के महीनों में कप्पन की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती जा रही है और 21 अप्रैल को उनकी कोविड - 19 जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उसी दिन कप्पन को इलाज के लिए मथुरा के केएम मेडिकल कॉलेज ले जाया गया जहां उन्हें जंजीरों से बांधकर रखा गया और शौचालय का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया।

 29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सिद्दीकी को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। 30 अप्रैल को पत्नी रेहाना दिल्ली पहुंचीं लेकिन उन्हें अपने पति से मिलने नहीं दिया गया। 6 मई की रात को उत्तर प्रदेश पुलिस कप्पन को उनके परिवार या वकील को बताए बिना वापस मथुरा जेल ले गई। इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय कप्पन के स्वास्थ्य की स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता को माना जाता है। जिसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिम्मेदार भी माना जाता है। लेकिन इस संबंध में तीनों अन्य स्तंभों का दबाव भी उस पर बना रहता है। हम जानते हैं अंग्रेजों को देश से भगाने में इसकी महती भूमिका रही है। आज भी यह सरकार की नीतियों, भ्रष्टाचार, तानाशाही, घोटाला, निरंकुशता व अलोकतांत्रिक कार्यों का निरंतर पर्दाफाश करते आ रहा है।

अमेरिका के वाटरगेट कांड से लेकर टू जी, चारा घोटाला, व्यापमं, नसबंदी, नान व मंत्री के शिक्षा जैसे जिम्मेदारी में रहते हुए अपने पत्नी को डिग्री दिलवाने के लिए दूसरे को बैठाना जैसे घोटालों सहित सैकड़ों घटनओं को प्रेस व मीडिया ने भंडाफोड़ कर अपना अलग स्थान बनाया है। मेरा मानना है अखबार बेरोजगारी दूर करने का एक अच्छा साधन है जहां ढेरों संभावनाएं हैं। इस काम में सच, निर्भिकता, स्वतंत्रता, रोमांच व सनसनीखेज से लेकर जान को जोखिम में डालने की संभावनाएं निहित है।

पिछले दिनों सरकार ने अपने टुकड़ों पर कुछ नामी - गिरामी पत्रकारों को पर्यटन करवाया जहां वे इस यात्रा का दुरूपयोग करते हुए ताजा जिस्मों का स्वाद भी चखा। कई अखबारों ने इन करतूतों को समाचार भी बनाया। ये घटनाएं अखबारों को भ्रष्ट करने के लिए काफी हैं। तहलका की विश्वसनीयता व उसके सम्पादक की करतूतों के कारण पत्रिका तार-तार हो कर रह गई है।

आज पत्रकारों का पेशा ऐशो आराम, रोमांच से लेकर जोखिम भरा इसलिए है कि लोगों ने इस धंधे को विवधता प्रदान किया हैं। आज छत्तीसगढ़ में ही किसी ने भूख की असलियत से पर्दा उठाया है तो किसी ने किसानों व आदिवासियों से जुड़ी सच्चाईयों को समाचार बनाया है। किरीट दोषी, लिंगाराम कोडोपी, कमलेश पैकरा व ईरा झा जैसे पत्रकारों को शासन-प्रशासन के भय का सामना समय - समय पर करना पड़ा है।

और कुछ पत्रकारों ने सत्ता की चाटुकारिता में अपना सबकुछ होम कर दिया है। इन विपरित परिस्थितियों के बीच से कुछ बहादुर पत्रकारों ने अपने पेशे को चुनौतीपूर्ण स्थिति तक पहुंचाया है। 4 जुलाई को मध्यप्रदेश के चर्चित व्यापमं घाटले के सिलसिले में खबर एकत्रित करने गए झाबुआ के मेघनगर में टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई।

भारत को तो पत्रकारों का जेल कहा जाता है। मालद्वीप, ईराक, चीन, क्यूबा, इथोपिया में पत्रकार जेलों में बंद हैं। दक्षिण एशिया में पत्रकारों का सबसे बुरा हाल है। पाकिस्तान में पत्रकारों का अपहरण कर लिया जाता है। आईएसआईएस, बोकोहरम, अलकायदा व नक्सलियों की हाथ पत्रकारों के कत्ल से रंगे हैं।

फ्रांस में चार्ली हेब्दो के 10 सम्पादक व पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। श्रीलंका व पाकिस्तान में पत्रकार सिर पर कफन बांध कर कार्य कर रहे हैं। पाकिस्तान में तो स्थिति यह है कि वहां के खुफिया एजेंसी, जमींदारों व मौलियों के प्रकोप भी पत्रकारों को झेलना पड़ा हैं। कुछ दिन पहले पाकिस्तान के पत्रकार हामिद मीर के ऊपर जानलेवा हमला किया, जब वे करांची हवाई अड्डे से अपने घर आ रहे थे।

यद्यपि हत्या का प्रयास विफल रहा और वह बच गए, पर उन्हें संदेह है कि उन पर फिर से हमला होगा। इससे पहले लाहौर में रजा रूमी पर हमला हुआ था। अब कई पत्रकारों को रोज धमकियां मिलती है तुम्हारी जान खतरे में है और तुम्हें शीघ्र ही मार दिया जाएगा। वर्ष 2001 से लेकर अब तक पाकिस्तान मं 50 पत्रकार अपनी जान गंवा चुके हैं पाकिस्तान की प्रेस का दुर्भाग्य है कि न सिर्फ आईएसआई बल्कि अन्य संगठित गिरोह भी पत्रकारों के जीवन को खतरे मेें डाले हुए हैं।

अमेरिकी राज्य वर्जीनिया के एक स्थानीय टीवी चैनल पर एक इंटरव्यू के सजीव प्रसारण के दौरान दो पत्रकारों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। डब्ल्यूडीबीजे 7 चैनल के जनरल मैनेजर जेफरी मार्क्स ने बताया कि 24 वर्षीय रिपोर्टर एलिसन पार्कर और कैमरापर्सन 27 वर्षीय एडम वार्ड की बुधवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अनुसार आसाम में दैनिक असम के संपादक डॉ. एन चक्रवर्ती व दैनिक अग्रदूत के संपादक कनकसेन डेका को उल्फा ने पत्रकारिता से हटने की चेतावनी दी है।

जेल व कैदियों के हालातों के खुलासे को रोकने के लिए भारत की केंद्र सरकार ने जेल में बंद कैदियों से मुलाकात पर अंकुश लगाने के लिए फरमान जारी किया है। आज भी पत्रकार गांवों में किसानों की आत्महत्या, पलायन, विस्थापन, घोटाला, भ्रष्टाचार, हत्या, आगजनी व घरेलू हिंसा जैसे घटनाओं को प्रमुखता से उजागर कर दैनिक अखबारों के प्रसार में वृद्धि किया है। यही नहीं पत्रकारिता को नया आयाम दिया है। इसके बावजूद तमाम बड़े अखबार आज भी धनपतियों के हाथ में केन्द्रित है, जिसके मनमर्जी पर अखबार का बागडोर चलता है।

जिस ढंग से श्रमिकों, बुनकरों, दलितों, महिलाओं, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों व बाल मजदूरों का शोषण होता है। ठेला, खोमचे वाले खुदरा धंधा करने वालों को हासिए में रखा गया है। ठीक उसी प्रकार जागरूक ज्ञानवान पत्रकारों, गैर पत्रकार, व निचले कर्मचारियों को चापलूस व ताकतवर सम्पादक, मालिक, प्रबंधकों व पत्रकारों के द्वारा शोषण किया जाता है। अब तो खबरें ताकतवारों के हाथों से छन कर निकलने लगा है। अगर विज्ञापन चाहिए तो उनकी लिखिए।

अब तो विज्ञापन चाहिए तो अखबार निकालिए हो गया है। छत्तीसगढ़ में दो बड़े प्रतिष्ठित अखबारों के हड़तालों से हम सभी रूबरू हैं। जहां कुछ रूपए में श्रम विभाग द्वारा हड़ताल तोड़ दिया गया।

छत्तीसगढ़ में युगधर्म के बंद होने के बाद वहां के श्रमजीवी पत्रकारों की स्थिति बदतर हालातों में बदल गई। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले हॉकर, छोटे कर्मचारियों तथा मशीनों से जुड़े लोगों की स्थिति आज भी भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। इनके द्वारा किसी भी प्रकार के विरोध की संभावनाओं को उठने से पहले ही दबा दिया जाता है। श्रमजीवी पत्रकारों के संघर्षों के बल पर आज प्रेस में पत्रकारों की आजादी कुछ कुछ बची हुई है शेष पत्रकार भी चौतरफा शोषण के शिकार हैं।

श्रम विभाग कई योजनाओं व मजिठिया जैसे आयोग के प्रस्तावों को लागू करने तत्परता से दौड़ लगाती है फिर कुछ दिनों में उनकी दौड़ धीमी पड़ जाती है। फिर कुछ दिनों  के बाद उनके रास्ते बदल जाते हैं। हड़तालों को अवैध घोषित कर दिया जाता है। इस प्रकार अखबार के कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं को लेकर फर्जी किस्म की कागजी खानापूर्ति एक रस्म अदायगी की तरह चलते रहता है और सत्ता कानों में उंगलियां रख अखबारों की खड़खड़ाहट सुनते रहती है।

कई बड़े अखबारों में इन छोटे कर्मचारियों के संघर्षों के बल पर उपलब्धियां भी हासिल हुई है। किसी का वेतन बढ़ा है तो किसी को ईएसआई की सुविधा मिली है। किसी का प्रोविडेंट फंड भी कट रहा है। अब तो पत्रकारों का वेज रिविजन भी हो रहा है। इन संघर्षों के बाद अब पत्रकारों को निवास भी आबंटन हो रहा है। कई दफे एक ही व्यक्ति के नाम पर कई भूखंड या मकान भी मिल रहे हैं।

जहां तक निवास हासिल करने की बात है, आम पत्रकारों की हैसियत से बाहर की बात हो गई है। जिसका बैंक बैलेंस हो या कुछ जमा पूंजी वही भूखंड या मकान हासिल कर सकता है, लेकिन नियम शर्तों के तहत मकान नहीं बनवा सकने के कारण भूखंड औने-पौने दाम पर बेच देते हैं। आज कई बड़ पत्रकारों, मालिकों, प्रबंधकों की अच्छी खासी चल पड़ी है। इन सबके बावजूद कुछ पुराने पत्रकार व गैर पत्रकारों की हालात बदहाली से कम नहीं है। जो अपने ज्ञान व विवेक से अखबारों को एक मुकाम तक पहुंचाया था।

आज वे सब भटक रहे हैं या फिर गरीबी में अपना दिन काट रहे हैं। पत्रकारों, सम्पादकों व प्रबंधकों के संबंध में यहां तक कहा जाता है कि यदि उनकी मालिकों के साथ अच्छी पकड़ हो एवं सत्ता के साथ अच्छी तालमेल हैं तब तो उनकी चल पड़ी। कुछ भी हो लेकिन सारे अखबारों की अस्तित्व से लेकर उसके व्यवस्था में छोटे समझे जाने वाले कर्मचारियों व गैर पत्रकारों की ताकत पर ही अखबारों की सारी दारोमदार व लड़ाई टिकी होती है। इन छोटे कर्मचारियों के ताकत व जज्बा के कारण ही बड़े कहे जाने वाले अखबारों को उनके हक व अधिकार हासिल हुए हैं।

यदि कहा जाए कि पत्रकारों की लड़ाई पत्रकारों के भरोसे लड़ी गई है तो इतनी सुविधाएं नहीं मिल पाती। आज भी उन गैर पत्रकारों की भूमिका किसी भी अखबार के गरिमा के लिए ताकत व उमंग देती है। यही नहीं आने वाले भविष्य की अंधकार में रोशनी का रास्ता भी यही हैं। जिस प्रकार सरकार लोगों की कमजोर आस्था का रग धर्म को कुरेद कर भावनाआं के साथ खिलवाड़ करता है। ठीक आम लोगों के विश्वास का केन्द्र भी अखबार से जुड़े धंधे है।

एक बात तो तय है कि अखबार लोगों के जिंदगियों से जुड़ें तथ्यों को लिपिबद्ध करने वाला दैनिक इतिहास है। इसकी यह गति प्रिंट मीडिया के सशक्त स्वरूपों में से एक व अभिन्न है। सभी क्षेत्रों में बदलाव आ रहे हैं। वाट्स एप व फैसबुक जैसे सोशल मीडिया ने जहां पत्रकारिता के नए विकल्प दिए हैं वहीं ये लिखित जानकारियों के खजाना को खत्म करने व लंबी लेखन क्षमता को तहस-नहस भी किया है।

अखबार भी सभी द्वंद्वों से गुजरकर तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। इसका अस्तित्व कभी खत्म नहीं होने वाला। दैनिक अखबारों से निकल कर कई पत्रकारों ने साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्र - पत्रिकाओं में कार्य कर रहे हैं उन्हें प्रेस क्लब में सदस्यता नहीं दी जाती है तब ऐसे पत्रकार ऐसे वक्त पर संघर्षों से अलग-थलग पड़ जाते है। प्रेस क्लब को ऐसे पत्रकारों को भी अपनी सदस्या देनी चाहिए जिससे उनके संघर्षों को भी आवाज मिल सके।

रही बात साधनों का साधनहिनों के हाथों आने का वह भी इस धंधे में बेहतरीन संभावनाओं की ओर आगे बढ़ रहा है। यहां महत्व की बात जिसका जिक्र होना आवश्यक है कि स्वतंत्रता के संग्राम से लेकर इंदिरागांधी के आपात स्थितियों में अखबार को अपनी अभिव्यक्ति के कारण सत्ता का कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। यही वह परिस्थितियां है जब अखबार मजबूत भी हुई है और सरकारी कानून-कायदों की मार भी उसे झेलनी पड़ी है। अखबार लोगों को जागृत करती है। दैनिक इतिहास के साथ लोगों को आईना दिखाती है।

श्रम करने वाले पत्रकारों को चाहिए कि वे जिस तरह एक अच्छे विपक्ष की भूमिका के साथ कार्य को पूरा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं तथा सत्ता से लेकर सारे चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने परिपक्वता की पहचान को नई रूप दे रहे हैं उसे बरकरार रखें। जिस प्रकार साहित्यकारों व कलाकारों के लिए पेंशन व अन्य सुविधाओं की बात हो रही है उसी प्रकार पत्रकारों, छायाकारों के साथ विशेषकर गैर पत्रकारों व हॉकरों के वजूद के लिए भी कुछ योजनाएं बनाई जाए।

पत्रकारिता के क्षेत्र में पुरस्कारों की घोषणा हो रही है फैलोशिप की भी इसके दायरे में कुछ ऐसे पत्रकारों को लाया जाए जो ईमानदारी के साथ व पूरे मेहनत से अखबार को नई ऊंचाई दे रहे हैं। ऐसे कई बुजुर्ग पत्रकारों की सुध लेनी की जरूरत है जो बदहाली में अपना जीवन जी रहे हैं इन सब के साथ स्वतंत्र पत्रकारों की भी एक कारगर भूमिका है जो अपने साधनों से समाचारों का संकलन कर अखबारों में विचारोत्तेजक की भूमिका निभाने में सहुलियत होगी।

उनकी कार्यों को सूचिबद्ध कर नई योजनाओं में उन लोगों को भी शामिल करने की जरूरत है, जिससे उनके कामों का आंकलन व उनकी बेहतरी के लिए कुछ हो सके। मानों या न मानों नामी पत्रकारों की गिनी चुनी सूची में छोटे पत्रकारों व गैर पत्रकारों की भूमिका को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। उनके भविष्य के प्रति चिंता आवश्यक बन गया है।


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment