धरती के आबा बिरसा मुंडा और उनका उलगुलान
आदिवासी अस्तित्व व सभ्यता को कुचलकर मूलभूत विकास संभव नहीं
उत्तम कुमारयूएनओ के मानवाधिकार चार्टर 1994 के अनुसार मूल निवासी घोषित कर खनिज संपदा पर रायल्टी, कंपनियों में शेयर, रोजगार में भागीदारी, बजट में 25 से 30 फीसदी तक खर्च, उच्च तकनीकी व वैज्ञानिक शिक्षा, सेवाक्षेत्र में आरक्षण, संचार केन्द्रों को हर पंचायत स्तर पर क्रियान्वयन, आदिवासी सरकार व पब्लिक लिमिटेड कंपनियों की स्थापना, खेती में सिंचाई, उनके बच्चे व जच्चे को पूर्ण पोषणहार देकर स्वस्थ बनाने, जंगल संपदा की आय से आदिवासियों का विकास करना, उनकी जमीन वापस लौटाना जैसे कार्य को प्राथमिकता से पूराकर हम बिरसा के उत्तराधिकारियों को सम्मान व गरिमा लौटा सकते है।

आदिवासी पहचान अधिकार व विद्रोह के प्रतीक बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1872 को झारखंड के चलकद गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा उलीहातु व माता करमी अयुबहानुं (झारखंड)के निवासी थे। कोमता व कानू दो भाई व दसकीर व चंपा उनके दो बहनें थी। उनकी मौत जेल में हैजा से हो जाती है। उनका अंतिम दाहसंस्कार 10 जून को जेल के भंगी द्वारा लुकेछुपे कर दिया जाता है। उनके मृतशरीर को गोबर के कंडे में जलाया गया था।
उनकी मौत 9 जून 1900 में 27 वर्ष 6 माह व 24 दिन की अल्पायु में हो जाती है। उनका जीवन हमें आमूलचूल बदलाव के कार्य को पूरा करने उद्देश्य व अपनी मुक्ति स्वयं करने की संदेश देती है। आज के दौर में मूलनिवासियों के आंदोलन को कामयाब करने की दिशा भी देता है। उन्होंने अंग्रेजी मिशन स्कूल में अपर प्रायमरी तक पढ़ाई की थी। कुल 3 वर्ष तक उन्होंने पढ़ाई की। यही पढ़ाई उन्हें दुश्मनों से भेद करना सीखा दिया था। उनका संघर्ष व कार्यों की प्रासंगिकता आज भी आदिवासियों को संस्कृति-सभ्यता की रक्षा व अस्तित्व से लडऩे की जज्बा देती है। उनकी लड़ाई अंधियारी की आंतों को चिरते हुए आज भी गुलामी की जंजीरों को तोड़ते हुए नए समाज की नींव रखने की स्फूर्ति देती है।
क्या था उलगुलान (विद्रोह)?
सामंति व औपनिवेशिक धिकुओं(दुश्मन) के खिलाफ 1900 शताब्दी में झारखंड, बंगाल, ओडिसा व छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहने वाले बहादुर आदिवासियों ने सामंती व्यवस्था यानि राजा, जमींदारों, ठेकेदारों व औपनिवेशिक व्यवस्था यानि इसाई मिशनरियों व अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध आंदोलन का बिगुल फूंक दिया था। उन्होंने मूलरूप से साहूकारी, आजीविका, स्त्रियों का शोषण, व्यापार व अनैतिकता के खिलाफ लंबी लड़ाई लडऩे राजनैतिक कार्ययोजना बना डाली थी। जो आज हमें मार्गदर्शन करती हैं।
इतिहास में दर्ज है कि विदेशी आक्रमणकारियों के पूर्व आदिवासी असूर संस्कृति को मानने वाले थे। लिंगबोगा उनका टोटेम (प्राकृतिक श्रद्धा का केंद्र) था। उनका संस्कृति वैदिक पूर्व नागवंशीय अनार्यों की संस्कृति है। उनकी संस्कृति वर्णविहीन व जातिविहीन समाज व्यवस्था का है। जो भाईचारा, समानता व एकता के आधार पर खड़ी है। उनकी संस्कृति प्रकृति व विज्ञान पर आधारित है। आज भी उनकी संस्कृति अन्य धर्मों के कारण प्रभावित हो रही है।
हिंदू धर्म के संक्रमण के बाद 1882 में अंग्रेजों ने फॉरेस्ट एक्ट बनाया जिससे जंगलों के आदिवासियों की जमीन सरकार की हो गई। अंतत: वे सुदूर जंगलों की ओर धकेल दिए गए। यहीं से उनका विद्रोह इतिहास में दर्ज होने लगा। 1831-32 का कोल विद्रोह, 1789 से 1832 का मुंडा विद्रोह, 1855-56 तक सिद्धू-काणू का संथाल विद्रोह, 1888 से 1890 तक जमीन के लिए मुलकुई विद्रोह 1800 से 1900 के बाद बस्तर के 10 बड़े विद्रोह की तार बिरसा विद्रोह से जुड़ते है।
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी प्रशासन, इसाई मिशनरियों की खिलाफत, जमींदारी व्यवस्था, श्रम का दोहन, जमीन हासिल करने, संस्कृति की रक्षा को व्यवहारिक उद्देश्यों व विचारधारा के संकल्पना में बुनने का काम किया। यह संघर्ष आदिवासी राज की ओर उन्हें स्थापित करती है। 1895 में चलकद से 1900 डुम्बारी तक आदिवासी संस्कृति को उन्होंने खाद-पानी दिया। उन्होंने प्रकृतिवाद, कर्मवाद, नैतिकतावाद व सत्यवाद पर बल दिया। यह उनका नैसर्गिक दर्शन कहलाता है। यह उनका नया धर्म था। इसके लिए 18 अगस्त 1895 को उन्हें पुलिस द्वारा अनावश्यक भीड़ न खड़ी करने की चेतावनी दी गई थी।
उनके नेतृत्व में 23 अगस्त 1895 को पंचायतों में भूमि व अन्य जातियों के अतिक्रमण के खिलाफ आंदोलन प्रारंभ किया था। उन्होंने भाईचारा, समानता व सामूहिकता पर आजीवन बल दिया था। बलिप्रथा, हवन-पूजन, धर्म के नाम पर खर्च, शराब, चोरी व अंधविश्वास का विरोध किया। उनके विचारों से हिंदूओं व क्रिश्चियन मिशनरियों को दुविधा में डाल दिया था। उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण अंग्रेजों ने 19 नवंबर 1895 को आईपीसी की धारा 505 के तहत उपद्रव फैलाने के आरोप में बिरसा को 2 साल की जेल में डाल दिया गया। कठोर कारावास के बाद उनका हौंसला टूटने की अपेक्षा और भी बढ़ा।
आंदोलन की शुरूआत
30 नवंबर 1897 को मुंडा रिहा हुए। उन्होंने मुंडा, उरांव व संथाल को आदिवासी राज के लिए संगठित किया। उन्हें विचारधारा के हथियारों से संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। जरूरत पडऩे पर हथियार उठाकर विरोध करने की दीक्षा भी दी। 1897 में अधिनियम 6 के रूप में सरकार ने भूमि संबंधी सेवाओं में मनमर्जी परिवतर्न करने की ताकत हासिल कर ली थी। इसके खिलाफ 24 दिसंबर 1899 से 29 जनवरी 1900 तक रांची और सिंहभूम जिले के उत्तर भागों में तीर-कमान व कुल्हाडिय़ों से इसाइयों, देश के गद्दारों व अंग्रेजी प्रशासकों के खिलाफ उन्होंने निर्मम संघर्ष किया।
इन संघर्षों में उन्हें अपने 8 साथियों की कुर्बानी देनी पड़ी। उनके मौत के बाद मई 1900 में उनके 482 अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। 98 के विरूद्ध आरोप सिद्ध हुआ। 44 व्यक्तियों को आजीवन कारावास की सजा हुई। 3 को मृत्युदंड दिया गया। 296 निर्दोष बरी किए गए। इसी कड़ी में 22 अक्टूबर 1901 में उनके आंदोलन को खत्म करने एक और पाशविक कदम उठाया गया। उनके पुत्र सानरे को सुबह 6 बजे फांसी दे दी गई। इससे आंदोलन थमा नहीं। बल्कि उनकी लड़ाई ने वैचारिक तत्वों को आधार देकर एक नए समाज के लिए संवैधानिक, लोकतांत्रिक मार्ग प्रशस्त किया। यही मूलरूप में बिरसा का मार्ग हैं।
अंग्रेजों के चले जाने के बाद देश ने बिरसा मुंडा का सम्मान करते हुए रांची का हवाई अड्डा, रल्वे स्टेशन का नामकरण किया। 15 नवंबर 1988 को उनकी डाक टिकट व 16 अक्टूबर 1989 को संसद के मुख्य हाल में उनकी प्रतिमा लगाई गई, लेकिन आदिवासियों के उत्थान आज भी नगण्य हैं। आज सरकार उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण सहित सेज की विकासवादी नीतियों को अमल में लाकर 8 करोड़ में से 1 करोड़ आदिवासियों को जमीन से बेदखल कर दिया है। वनसंपदा का पूंजीपति लगातार दोहन कर रहे हैं। 5 वीं व 6 वीं अनुसूचियों को कारगर ढंग से लागू न कर उन्हें मालकियत के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। जल, जंगल व जमीन पर आदिवासियों को अधिकार से दूर रखा गया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के समक्ष भारत की सरकार उन्हें मूलनिवासी मानने को तैयार नहीं है। देश का सुप्रीम कोर्ट लगातार मूलनिवासियों को अधिकार व जीवन जीने आदेश जारी कर रही है। साथ ही आदिवासी व गैर आदिवासियों के द्वंद्व को खत्म करने की कोशिश जारी है। आंदोलन की रूपरेखा में उन्होंने बताया था कि धार्मिक व राजनैतिक स्वतंत्रता मूल जरूरत है। धिकुओं और विदेशियों को मार भगाएंगे व उन्हें मौत के घाट उतार देंगे। बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज कायम करने के साथ कोई भी सरकार का हुक्म न मानेगा बल्कि बिरसा का ही आदेश मानेगा। मालगुजारी किसी भी रूप में न दी जाएगी और जमीन पर कर व लगान माफ समझा जाएगा। बिरसा से लेकर आज का आदिवासी अपनी किस्मत की रेखा खुद खींच रहे हैं।
आदिवासियों की उपेक्षा व अधिकार
आदिवासियों को यूएनओ के मानवाधिकार चार्टर 1994 के अनुसार मूल निवासी घोषित कर खनिज संपदा पर रायल्टी, कंपनियों में शेयर, रोजगार में भागीदारी, बजट में 25 से 30 फीसदी तक खर्च, उच्च तकनीकी व वैज्ञानिक शिक्षा, सेवाक्षेत्र में आरक्षण, संचार केन्द्रों को हर पंचायत स्तर पर क्रियान्वयन, आदिवासी सरकार व पब्लिक लिमिटेड कंपनियों की स्थापना, खेती में सिंचाई, उनके बच्चे व जच्चे को पूर्ण पोषणहार देकर स्वस्थ बनाने, जंगल संपदा की आय से आदिवासियों का विकास करना, उनकी जमीन वापस लौटाना जैसे कार्य को प्राथमिकता से पूराकर हम बिरसा के उत्तराधिकारियों को सम्मान व गरिमा लौटा सकते है। इसके साथ अधिसूचित क्षेत्र से अमानवीय संस्कृति, धर्म व पतनकारी व्यवस्था को बाहर लाना होगा।
उनकी भाषा को 8 वीं सूची में जोडक़र उनके संवर्धन के कार्य करने होंगे। उन्हें अनुसूचित जातियों, दलित, पिछड़े, भटके लोगों के साथ एकतामय करना होगा। हमें उनकी संस्कृति, संवैधानिक अधिकार व संरक्षण के कार्यों को प्रमुखता देनी होगी। उनके संघर्षों से आज के आदिवासियों के मध्य आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक फर्क के खाई को हमें हर हाल में पाटना ही होगा। तब जाकर कहीं हम उनके लिए नए समाज की बुनियाद रख सकेंगे। मुंडा का वाक्य कि - ‘मैं एक दिन वापस आऊंगा और अपने राज को प्राप्त करूंगा तब तक आप उस दिशा की ओर देखें।’
ज्यों का त्यों हमें उनके दशा व दिशा सुधारने की यह चुनौति भी है। साथ ही उनके अधूरे सपना को पूरा करने की चुनौती भी। अतत: बिरसा से लेकर आज का आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत व हांसिए में खड़े हैं। उनकी मुक्ति के बिना समाज में तरक्की संभव नहीं है। उनके अस्तित्व व सभ्यता को कुचलकर हम किसी भी रूप में मूलभूत विकास को नहीं गढ़ सकते हैं।
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