कहानी : लाश

चर्चित कथाकार इलिका प्रिय की नई कहानी

इलिका प्रिय

 

बारिश जो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी, उस गहरी रात को और भी भयानक बना रही थी। ममता ने बरसते बूंदों की ओर देखा, जो बाहर अंधकार में सिर्फ  झर-झर की आवाज के साथ कभी बिजली चमक जाने पर नजर आ जा रही थी।

‘‘काश की इन बूंदों में उसकी भी सारी समस्याएं बह जाती।’’-उसके मन में आशा की किरणें आकर निकले जा रही थी। माथे पर सिकन था। अब तक डॉक्टर साहब भी ऑपरेशन हॉल से बाहर नहीं आए थे। ‘‘जाने... राज का क्या हाल होगा...और आज के बाद क्या होगा...यदि आज के ऑपरेशन के पैसे नहीं दिये गये तो, क्या डॉक्टर आगे का इलाज करेगा?’’-यह विचार ममता की बेचैनी बढ़ा रही थी।

क्योंकि वह जानती थी, सारे जेवरों को बेच देने के बाद भी वह इतना पैसा नहीं जुटा सकती थी जो आज के इलाज में लग रहे थे, वह जानती थी सिवाय राज की नौकरी के उनके पास और कोई ऐसी सम्पत्ति नहीं थी, जिससे वह इलाज के पैसे इकठ्ठे कर सके, और फिर उनके सम्पर्क में ऐसा कोई व्यक्ति भी तो नहीं था, जो इतनी बड़ी रकम में उनकी मदद कर सके। 

आखिर उन पांचों प्राणियों का तो बस एक ही सहारा था, राज बस राज! यह सोचकर ही उसके आंसू निकल पड़े। ‘‘जाने वह कौन-सी मनहूस घड़ी थी कि राज ने बाहर जाने की सोची। ना ही वह उस काली रात में बाहर जाता और ना ही यह हादसा होता जिसने उनकी जिंदगी ही बदल दी थी।’’-जब कोई उपाय नहीं बचता तो समय को कोसना शायद सबसे आसान होता है।

‘‘डॉक्टर को कैसे कंविंस किया जाएगा?... वे उसकी मदद करेंगे इंसानियत के नाते?’’-ममता के मन में उथल-पुथल मचा हुआ था कि सहसा ऑपरेशन हॉल का दरवाजा खुला-‘‘कुछ दवाईयां चाहिए थी। ’’-कम्पाउंडर ने आकर कहा।
‘‘हां! हां अभी लाती हूं।’’-ममता ने लपककर पूर्जे हाथ में लिये और बाहर की ओर दौड़ी, पर तेज बारिश ने उसके कदम अचानक से रोक दिये। बिजली की कडक़ड़ाहट और बारिश-‘‘दवा तो लाना ही होगा। दवाखाना कुछ दूरी पर ही तो है।’’-ममता बुदबुदाई।

‘‘मैडम! लाइए मैं दवा लेते आता हूं।’’-एक हाथ उसकी ओर बढ़ा। ममता ने देखा सर पर गमछा लिये एक तंग चेहरे वाला आदमी उसके सामने हाथ फैलाए खड़ा था। एक अनजाने विश्वास के साथ ममता ने पैसे और पूर्जा उसे दे दिये। कुछ ही देर में वह दवा लेकर लौट आया। 

‘‘मैडम! मेरा लडक़ा बहुत बीमार है! डॉक्टर से बोलिये ना! उसे एडमिट कर ले!’’-दवा देतेे हुए वह लडख़ड़ाकर बोला। ममता ने देखा वह आदमी उसके सामने हाथ जोड़े खड़ा है।

‘‘पैसे हम दे देंगे! मैंडम! प्लीज डॉक्टर को बोलिये ना! मेरे बेटे का इलाज कर दे। वह मर जाएगा।’’-वह सिसक पड़ा था। ममता ने उसकी ओर असहाय आंखों से देखा, फिर दवा लेकर चल पड़ी। उसने दवा कम्पाउंडर को दे दी।

‘‘वहां एक आदमी अपने बेटे के इलाज की बात कर रहा है....वो!’’-ममता ने कम्पांडर से कहा।

‘‘अरे वह पागल है! इतने बड़े हॉस्पिटल का बिल भरने का पैसा नहीं, इलाज के लिये उठा कर लेते आया यहां। यह धर्मशाला थोड़े ही हैं कि मुफ्त में इलाज हो जाएगा। अभी एकांउट पेमेंट करे, तुरंत भर्ती ले लिया जाएगा।’’-कम्पाउंडर रूखेपन से बोले जा रहा था।

‘‘पर वह कह रहा था कि वह पैसे दे देगा।’’
‘‘अरे मैडम आप अपना देखिए! शुक्र मनाइए डॉक्टर साहब पहले इलाज कर रहे हैं वरना यहां पहले पैसे लेने का नियम हैं।’’- कम्पाउंडर के इतना कहते ही ममता चुप हो गयी। एक पल को उसका ध्यान राज से हट गया था, पर फिर वह राज के सोच में डूब गयी।

‘‘अभी उसे ठीक होने में कितना समय लगेगा! डॉक्टर बोल रहे थे बहुत गंभीर चोट है, बचने का चांस भी नहीं! साल लग जाएंगे ठीक होने में तब तक क्या होगा?’’-ममता दुबारा भविष्य की चिंता में डूब गयी थी। अभी-अभी ही बच्चों का स्कूल भी खुला था, अब उसे बंद करना पड़ेगा, फीस कहां से आ पाएगा। ओह! शायद वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है।’’-उसने अपने आप को झकझोरा।

‘‘देखिए मैडम 3 लाख का बिल हो चुका है।’’- उसे सारे हिसाब दिये जा रहे थे। बैंच पर बैठे-बैठे उसे नींद आ गयी थी। दो दिनों से वह बिल्कुल नहीं सोई थी। 
‘‘चार लाख का बिल।’’-अचानक वह चौंक कर उठी। ओह! नहीं वह सपना था। बिल तो 3 लाख के ही थे। 

‘‘मैडम! किसी ने आवाज लगाई।’’
‘‘आपके साथ और कोई नहीं है यहां!’’
‘‘मेरा भाई है आता ही होगा, क्या बात है?’’-ममता ने सशंकित होकर पूछा।
‘‘उन्हीं से बात करनी है।’’-वह कम्पाउंडर कहता हुआ चला गया।

इस रहस्यमयी अंदाज ने ममता के मन को बूरी तरह डरा दिया, आखिर ऐसी क्या बात हो सकती है? वह उठकर इधर-उधर देखने लगी, अब रहा न जा रहा था, उसने दूसरे कम्पाउंडर से पूछा-‘‘भाई साहब! बेड नम्बर - 8 का मरीज ठीक तो है ना!’’
‘‘बेड नम्बर - 8 का मरीज! वह तो मर गया मैडम!’’-कम्पाउंडर ने अवाक् ही कह दिया, उसके बाद क्या हुआ ममता को कुछ होश न रहा। वह वहीं मूच्छित हो गई थी।

यह काली रात जाने कितनी काली थी और लम्बी भी जो कट ही नहीं रही थी। ममता के तीनों बच्चे और भाई हॅास्पिटल आ चुके थे, अन्य रिश्तेदार भी आ चुके थे। मां बच्चों का रो-रो कर बूरा हाल था। सभी उन्हें सांत्वना दे रहे थे।

पूरा परिवार, बच्चों का भविष्य... सब उस काली रात में कहीं गुम हो रही थी। 
सुबह होते -होते वे सारे लोग आ चुके थे, जिन्हें आना था। अब बात क्रियाक्रम की हो रही थी। बस लाश मिल जाए, उसके बाद जल्दी-जल्दी सब कम खर्चे में ही निपटा दिया जाए।’’-आकाश ने कहा और डॉक्टर के चैंबर में चला गया। 

‘‘कब तक मिलेगी लाश! कितना समय हो चुका है?’’-किसी की आवाज ममता के कानों में पड़ी। उसे भी ख्याल आया वे और बच्चे कब से उन्हें देखने के लिए इंतजार कर रहे थे। एक घंटे और गुजर गये। कुछ लोग वापस लौट गये थे और कुछ इंसानियत के नाते वहीं बैठे हुए थे। 

‘‘लाश मिलने में और कितना समय लगेगा?’’-किसी ने कम्पाउंडर से पूछ लिया। 
‘‘पैसा पेड करिये सर तभी तो लाश मिलेगा? डॉक्टर साहब ऐसे ही लाश नहीं ले जाने देंगे।’’- कम्पाउंडर कहता हुआ चला गया। ममता डॉक्टर के चैंबर की ओर दौड़ी, जहां उसका भाई आकाश डॉक्टर से लाश ले जाने की मिन्नते कर रहा था। 

‘‘देखो भाई इंसानियत के नाते हमने पैसा लेने के पहले इलाज शुरू कर दिया, अब तुम्हारे मरीज के भाग्य में जीवन नहीं लिखा था तो मेरी क्या गलती? अब लाश तो तब ही मिलेगी, जब पूरे पैसे पेड हो जाएंगे... पांच लाख का बिल है चलो पूरे नही तो... कम से कम आधे तो कर दो!’’

‘‘बिल तो तीन लाख का बना था।’’- ममता चीखी।
‘‘ बाद में ऑपरेशन भी हुआ मैडम। ’’
‘‘ आप लोग मुर्दे का भी ऑपरेशन करते हैं?’’
‘‘ऑपरेशन के बाद आपके पति मरे, पर ऑपरेशन तो हो गया न!’’- डॉक्टर कहता हुआ अपने चेम्बर से बाहर निकल गया। 
‘‘डॉक्टर साहब कहां गये?’’-आकाश ने पूछा।
‘‘वे तो चले गये।’’
‘‘कब आएंगे?’’
‘‘आज तो नहीं आऐंगे।’’
‘‘और लाश?’’
‘‘वह तो वही बताएंगे।’’

दोपहर हो चुकी थी। राज की लाश के इंतजार में ममता, उसके बच्चे और आकाश हॉस्पिटल के चक्कर काट रहे थे, कभी यहां कभी वहां, पर लाश रिलीज करने के लिए कोई तैयार नहीं था। झगडऩे के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। और एक साधारण सी प्राइवेट नौकरी करने वाले के लिए ढाई लाख रूपये देना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। ममता अपने बच्चों को लेकर बाहर आ बैठी थी। बारिश छूट चुकी थी धूप निकल आया था, पर मन की बैचैनी वैसी ही बरकरार थी। 

‘‘क्या बोल रहे हैं वे लोग?’’-ममता ने हताश होकर आकाश से पूछा। 
‘‘दीदी! बोल रहे हैं डेढ़ लाख भी दे देंगे तो लाश दे देंगे, पर बाण्ड पेपर साइन करके कि कुछ दिन में बाकि पैसे भी दे देंगे।’’

‘‘हमारे पास बीस हजार भी नहीं होंगे, डेढ़ लाख कहां से लाएंगे?’’-ममता फूट - फूट कर रो पड़ी थी। माना कि उसकी जीवन में आर्थिक कठिनाईयां हमेशा बनी रही थी, पर आपसी प्यार ने उनके परिवार की सारी कमी पूरी कर दी थी, दोनों अपने आप को किसी कहानी के पात्र से कम नहीं समझते थे, तंगहाल जिंदगी में भी आपसी प्रेम ने जो रंग भरे हुए थे, वे सारे सुख से ज्यादा सुखद थे, पर आज उसी प्यार के बीच यह पैसे दीवार बन कर खड़े थे। जिंदगी की कठिनाइयां तो कभी उन्हें जूदा नहीं कर पाई, मगर मरने के बाद उसे देख पाने के लिए भी पैसे ने उन्हें तरसा दिया था। 

‘‘क्या मुझे अपनी ‘जान’ का अंतिम चेहरा देखना भी नसीब न होगा?’’-ममता के लिए यही तो सांत्वना की अंतिम उम्मीद थी, वह भी छिनी जा रही थी। उसने अपनी किस्मत को कोसा। यह वास्तविक जिंदगी थी, जहां जादू जैसी कोई चीज नहीं हो सकती थी, राज मर चुका था, उसके लिए पैसे देने में परिवार असमर्थ था, ममता का प्यार पैसे की कमी पूरी नहीं कर सकता था, हॉस्पिटल के नियम मानवता से कहीं उपर जा चुके थे, डॉक्टर के लिए इंसानियत बस पैसे में बसा था, इन सब में कुछ नहीं बदल सकता था क्योंकि यह हकीकत में कहानी थी।

रात के सात बज रहे थे। आकाश बच्चों को लेकर घर लौटने की तैयारी में था। राज की लाश मुर्दाघर में पैसों का इंतजार कर रही थी। आकाश और ममता स्थिति के सामने झूक चुके थे। अभी वे हॉस्पिटल से बाहर निकले ही थे कि ममता की नजर उसी अधेड़ व्यक्ति पर पड़ी जो एक लाश के सामने बैठा सिसकियां ले रहा था। अवाक् ही ममता उस ओर बढ़ चली।

‘‘मैडम ! एंबुलेस के पैसे नहीं है, बेटे का इलाज तक नहीं किया... कहते रहा भर्ती कर दे, इलाज कर दे नहीं किया... अब बेटा मर गया तो बाहर लाकर फेंक दिया है लाश को, कहते हैं जगह नहीं है रखने का... विनती किया कुछ देर रहने दो... एंबुलेस से घर पहुंचा देते बेटे को...पर नहीं। लावारिश की तरह बाहर निकाल दिया मेरे लाल को! मेरा बेटा नहीं मरा मैडम मानवता मरी है, इंसानियत मर गया...’’- वह सिसकियां ले - ले कर बोले जा रहा था, यह देखे बगैर कि कौन सुन रहा है उसकी बात!

ममता एक पल को बूत बनी रह गयी। कितनी अजीब बात थी। एक लाश मुर्दाघर में गिरवी इसलिए रख ली गई थी कि उसे छुड़ाने के लिए परिजन के पास पैसे नहीं थे और दूसरी लाश हॉस्पिटल के बाहर इसलिए फेंक दी गई थी कि उसके अपनों के पास बेड के लिये पैसे नही थे, एंबुलेंस के पैसे नहीं थे...।

वह आदमी उठा सिसकियां भरते हुए उस लाश को अपने कंधे पर रखा और लडख़डाता हुआ बेसुध सा चल पड़ा।  ममता को लगा चारों ओर पैसे लटक रहे हैं और हंस रहे थे, उस बाप के कंधे पर ढोई जा रही लाश पर, मूर्दाघर में गिरवी पड़ी लाश पर...। 

अचानक ममता के आंसू रूक गये-‘‘ क्या यह आंसू और किस्मत को कोसना इस सड़ी व्यवस्था को बदल सकता हैं, जहां जाने हर रोज कितने जिंदा इंसान व्यवस्था की विफलता पर लाश बन जाते होंगे! ’’- अचानक से उसे लगा उसका दर्द कुछ हल्का हो गया। अब वह रोकर, किस्मत को कोस कर खुद को सांत्वना नहीं दे सकती थी, अब वह चुपचाप इस दर्द को सहन नहीं कर सकती थी।

‘‘मैं खुद न्याय ना पा सकी तो क्या, उसे पाने के लिए लड़ तो सकती हूं, बदहवास होकर पड़े रहना से तो लडऩा बेहतर है।’’- अब तक जो कदम डगमगाए हुए थे संभल गये। और एक दृढ़ संकल्प मन में उभर आया-‘‘अब वह इस व्यवस्था के लिए लड़ेगी, जो इंसान को लाश बनने से बचा सके, इंसानियत को मुर्दा घर में सडऩे और सडक़ों पर मरने से बचा सके।

उन जिंदा इंसानों के न्याय के लिए जो लाश बनाए जाने के लिए अब भी उन हॅास्पिटल के बेड पर या अहाते पर पड़े इलाज की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वह रात काली तो थी पर उतनी भी नहीं जिसके विरूद्ध वह संघर्ष की आवाज न उठा सके। 


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