'जय भीम' को देखना फिर से आदिवासी इतिहास को पलटने जैसा है

उत्तम कुमार

 

फिल्म में आदिवासियों के साथ बाकी के गैर आदिवासी समाज, पुलिस, अदालतों और सरकार का रवैया छत्तीसगढ़ के जमीनी पत्रकारिता करने वाले किसी भी पत्रकार से अछूता नहीं है। मैंने स्वयं ही सारकेगुड़ा, एडसमेटा, नुलकातोंग और नई पुलिस कैम्प पोटाली पर आदिवासी जीवन पर ग्राउंड रिर्पोटिंग की है। 

इस फिल्म को देखते हुए वह सारे मामले मेरी आंखों के सामने घूम रहे थे जो मैंने अपनी जिंदगी में खुद जज्ब किया है। पुलिस आदिवासियों को पीट रही थी तो मुझे बस्तर और उत्तर छत्तीसगढ़ के आदिवासी महिलाओं और इस आदिवासी बची पीढ़ी के यातना को सलवा जुडूम शिविर और उसके बाद भोग रहा था। 

आदिवासियों की आंखों में मिर्च पाउडर डालने के दृश्य से मुझे वह दृश्य याद आ रहा था जब दंतेवाड़ा के एसपी अंकित गर्ग के बंगले पर आदिवासी पत्रकार लिंगाराम कोड़ोपी के मलद्वार में मिर्च और तेल से डूबा हुआ डंडा घुसा दिया गया था और सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर डाल दिये गये थे उसे चूढिय़ां खिला दी गई थी। और इस पुलिस अधिकारी को गेलेन्ट्री अवॉर्ड से नवाजा गया था।

फिल्म के दृश्य में जब मारे गए आदिवासी की पत्नी अपने पति की लाश का फोटो देखती है और बाकी की महिलाएं उसे चुप करा रही हैं वे दृश्य देख कर मुझे सिंगाराम गांव  की याद आ रही थी जहां पुलिस ने 19 आदिवासियों को लाइन में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया था। मामला अब भी चल रहा है।

वह दृश्य भी याद आ गये जब नगा बटालियन अपनी कू्ररता को पूरा करते हुवे आदिवासियों की हत्या करते हुवे उनके कटे सिर को घर के दहलीज में लटका रहे थे। खैर ऐसे दृश्य फिल्म में नहीं हैं होते तो सेंसर हो जाता।

पुलिस यातनाओं की हमारे देश में अंतहीन कहानियां है। लॉकडाउन के दौरान देश के कई हिस्सों से कथित तौर पर पुलिस की बर्बरता और यातनाओं की ख़बरें आती रही हैं। इस फिल्म ने पुलिस के रवैये को लेकर फिर बहस छेड़ दिया है। तमिलनाडू के जयराज तूतीकोरिन जिले (थुतुकुड़ी) के सतानकुलम के निवासी थे। सतानकुलम में उनके बेटे बेनिक्स की एपीजे मोबाइल्स नाम से एक मोबाइल की छोटी दुकान को पुलिस बंद करवाने आई थी। 

उसके बाद सतानकुलम पुलिस ने बेनिक्स और उनके पिता के खिलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कर ली जिसके बाद जयराज को पुलिस स्टेशन ले जाया गया। पिता के पीछे-पीछे बेनिक्स भी पुलिस स्टेशन पहुंच गए और उन्हें भी पिता के साथ हवालात में बंद कर दिया गया।

पुलिस की एफ़आईआर के अनुसार लॉकडाउन में पुलिस जब तय समय के बाद खुली दुकानों को बंद करवाने के लिए पहुंची उस वक्त जयराज, बेनिक्स और उनके कुछ दोस्त उनकी दुकान के सामने खड़े थे। पुलिस ने उन्हें अपने-अपने घर जाने के लिए कहा जिस पर उन्होंने पुलिस को गालियां दीं और पुलिस को उनका काम नहीं करने नहीं दिया। 19 जून को हिरासत में लेने के बाद जून 21 को दोनों को कोविलपट्टी सब जेल भेजा गया।

इस दौरान दोनों के साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया। कोविलपट्टी के सरकारी अस्पताल में सोमवार की रात बेनिक्स की मौत हो गई और इसके बाद मंगलवार सबेरे जयराज की मौत हो गई। तमिलनाडु में लॉकडाउन उल्लंघन के आरोप में पकड़े गए एक बाप और उनके बेटे की कथित तौर पर पुलिस हिरासत में पिटाई और यौन यातना से मौत की घटना को लेकर पूरे राज्य में आक्रोश फैल गया।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की साल 2017 - 18 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच टीम ने कुल 5,371 मामलों की जांच की जिनमें से 2,896 मामले न्यायिक हिरासत में मौत से जुड़े थे। और 250 मामलों में पुलिस हिरासत में पीडि़तों की जान गई थी।

बताया जा रहा है कि फिल्म ‘जय भीम’ तमिलनाडु में 1993 में घटी एक घटना पर आधारित है। असल में हुआ क्या था? इसे जानने के लिए बीबीसी मराठी ने इस मामले में 2006 के मद्रास हाईकोर्ट के एक फ़ैसले का अध्ययन किया है। और तब घटनाओं के सिलसिले को समझा जा सका। बताया जाता है कि ये बात मार्च 1993 की तमिलनाडु के मुदन्नी गांव की है। उस गांव में कुरवा आदिवासी समुदाय के चार परिवार रहते थे। कुरवा समुदाय पहले कभी ‘अपराधी जनजातियों’ की श्रेणी में शामिल रहा है।

राजकन्नू और सेंगई नाम के दंपत्ति उसी गांव में रहते थे। 20 मार्च की सुबह कुछ पुलिस वालों ने सेंगई के घर का दरवाज़ा खटखटाया। पुलिस ने सेंगई से पूछा, ‘तुम्हारा पति कहाँ है?’ सेंगई ने जवाब दिया, ‘काम पर गए हैं।’ इसके बाद पुलिस ने कहा, ‘पास के गांव में डेढ़ लाख के आभूषण चोरी हो गए हैं। उसके लिए हम तुम्हारे पति को खोज रहे हैं।’ पुलिस की उम्मीद के अनुसार, सेंगई के जवाब न देने पर पुलिस ने उन्हें, उनके बच्चों, उनके पति के भाई और बहन को वैन में बिठाकर थाने लेकर गए।

पुलिस ने उन लोगों से कहा कि यदि राजकन्नू का पता बता दोगे तो हम तुम लोगों को जाने देंगे। इस अपराध में एक और व्यक्ति गोविंदराजू का नाम शामिल था। पुलिस ने उसे पड़ोस के गांव से गिरफ़्तार किया था। पुलिसकर्मी कम्मापुरम पुलिस स्टेशन 20 मार्च, 1993 को शाम 6 बजे पहुंचे थे।

सेंगई को पुलिस थाने के बाहर एक शेड में ले जाया गया। बाक़ी को पूछताछ के लिए अंदर ले जाया गया। उसी समय एक स्थानीय पुलिस अधिकारी (थाना प्रभारी) ने सेंगई को डंडे से पीटा। उसके बाद जो हुआ बहुत ही दर्दनाक। यह फिल्म इस घटना पर केन्द्रीत है।

दक्षिण भारतीय फिल्मों में मारधाड़ और आश्चर्यजनक ढंग से पुलिस की जीत की कहानी हीरो की जीत के साथ  दर्ज की जाती है लेकिन पिछड़े तबके के प्रश्नों को भी दक्षिण भारत ने इस बीच प्रमुखता के साथ दर्शाया है। बॉलीवुड अक्सर हमें एक काल्पनिक दुनिया में ले जाता है। ऐसी दुनिया जिसकी असल दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता है।

खासकर पिछड़े, आदिवासी, दलित, महिला, मुस्लिम समाज को लेकर उनकी अपनी अलग ही समझ है कि आदिवासी सारे के सारे माओवादी नक्सलवादी और चंदन तस्कर विरप्पन के सगा हैं। यहां की फिल्मों में मुस्लिम वही है जो टोपी पहनता है, दाढ़ी बढ़ाता है और वह आतंकवादी होता है। लेकिन यह फिल्म आदिवासी सहित पिछड़े तबकों के जीवन और उसके दर्द को बारीकी से दिखाने की कोशिश है।

फिल्म में आम्बेडकर के तस्वीर हैं लेकिन उनका जीवन परिचय कहीं नहीं है पहली बार है कि कोई फिल्म किसी व्यक्ति के नाम पर बना और उसके समाज की पीड़ा को फिल्म में बखूबी दर्शाया गया। फिल्म में संविधान और कानून व्यवस्था के बीच की खाई को बखूबी दिखाया है। इस फिल्म में पांचवी - छठवीं अनुसूची, पेसा कानून और पेसा नियम का ना बनना और कानून का पालन नहीं होना पर भी दिखाया जाता तो और भी अच्छा होता। बहरहाल फिल्म सच पर से पर्दा हटाता है। 

फिल्म ने पहली बार भारत में आदिवासियों के समस्याओं को भारतीय एजेंडे में लाया है वह भी डीटी/एनटी आदिवासियों के पीड़ा को, जिनके सिर पर छत नहीं हैं। फिल्म ने बताया कि एक बहुसंख्यक समाज जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। जहां शिक्षा के नाम सिर्फ मौत और यातना है। यह इतने पिछड़े हैं कि देश के लोकतंत्र में इनका कोई उल्लेख नहीं है। राशन कार्ड से लेकर कोई भी सरकारी पत्र इनके पास नहीं है।

इनके मां-बाप, बच्चे कभी भी जान गंवा सकते हैं क्योंकि जहां कोई भी अपराध होगा वहां इन्हें सबसे पहले बेगुनाह होते हुए भी पकड़ा जाएगा। वास्तव में यह फिल्म उस सच को दिखाती है जो यह बताता है कि हम जानते हैं कि तुमने कोई अपराध नहीं किया लेकिन तुम्हारा आदिवासी होना ही तुम्हारा अपराध है। यह फिल्म हमें सलवा जुडूम और आदिवासियों के खिलाफ चलाये गये जनजागरण अभियान की याद ताजा कर देती है। 

फिल्म में चंद्रु नाम का वकील है जो कि मार्क्स, आम्बेडकर और पेरियार की विचारधारा को मानता है। वह कानूनी लड़ाइयां मुफ्त में लड़ता है। वह एक लंबा समय लेता है और बार-बार अपने नये तर्क और दलील पेश करता है और निर्दोष लोगों की जान बचाने में जुटा दिखता है। वह अंधा कानून को बहरा और गूंगा होने से बचाता है। 
यह पहली फिल्म है जो नायक प्रधान होने के बावजूद एक गर्भवती पीडि़त स्त्री के इर्दगिर्द घूमती है। और यही आदिवासियों में मातृसत्ता की प्रतीक भी है। इस वजह से देखा जाये तो छत्तीसगढ़ सहित भारत के जेलों में अधिकांश आदिवासी महिलायें नक्सली और माओवादी होने के जुल्म में कैद हैं।

फिल्म में महिलाओं के कमजोर पक्ष को जीत में बदलते दिखाया गया है कि किस तरह वह दु:ख और पीड़ा झेलते हुवे जीत के लिये कोर्ट की लड़ाइयों में भी शामिल होती है। यह दृश्य हमें सोनी सोरी पर यातना और उसकी मुक्ति की कहानी से मिलता - जुलता लगता है।

वह भी अपने पति को खोती है। यातनायें और अपमान झेलती है और सुप्रीम कोर्ट से जमानत में रिहाई के बाद आज भी लड़ रही है। उनके साथ लडऩे वाली महिलायें जेलों में कैद हैं और पुलिस और व्यवस्था की असहनीय यातनाओं की शिकार हैं।

फिल्म में बार-बार उस महिला को खरीदने की कोशिश की जाती है, केस वापस लेने के लिए उस पर दबाव बनाया जाता है लेकिन वह टस से मस तक नहीं होती। वह अपने संवाद में कहती है-‘क्या तुम इस हालत में केरल तक जा सकती हो? ‘मैं उनके लिए कहीं भी जा सकती हूं’।

फिल्म में दर्शाये दृश्य की उम्मीद है कि एक बार फिर से भारत के जेलों में बंद कैदियों और न्यायालय में चल रहे प्रकरणों और लापता और फरार करार कर दिये लोगों की फिर से तलाश शुरू होगी। अन्याय के खिलाफ न्याय मिलेगा और दोषियों पर मामला और सजा दर्ज किये जायेंगे। 

फिल्म भले ही मार्क्स के झंडे और व्यक्तियों को दिखाती है लेकिन डॉ.आम्बेडकर के मूल सिद्धांत ‘शिक्षित बनो’,‘संघर्ष करो’,‘संगठित रहो’ पर टिकी दिखती है। इस पिछड़े समाज को इस सूत्र में बंधने की आज ज्यादा जरूरत है। राजा के दो भाई जो पांडुचेरी के जेल में बंद थे उनकी रक्षा संगठित होकर ही की गई।

पूरी फिल्म में महिला और उसका समुदाय, जीवन और न्याय के लिए संघर्ष करते हैं। अंत में चंद्रू के साथ सिंघिनी की बेटी का चंद्रू के अंदाज में बैठकर स्वाभिमान से अखबार पढऩा शिक्षा की ओर उनका प्रयास है। व्यक्ति शिक्षित होगा तो वह उसकी जगह ले सकता है, जिसको समाज बड़ा मानता है।

बहरहाल यह फिल्म देश में चल रहे अन्याय, जातिव्यवस्था, शोषण, अत्याचार पर आधारित एक अलग तरह की फिल्म है। जो कई बार आपके रोंगटे खड़े करने, दिमाग को चेतनाशील बनाने की ताकत बटोरता है और हाशिए के समाज की वह सच्चाई भी है जो अधिकतर लोग नकारते हैं।

देश का विकास शहरों से नहीं उसके गांवों से तय होगा। फिल्म महिला को न्याय के लिए तब भी और अब भी लगातार भटकना ही पड़ता है को दर्शाता है। कुछ तो न्याय मिलते मिलते मर जाती हैं। कब किसे पकडक़र बलात्कार कर दिये जाये। उसके स्तन काट दिये जाये। करंट के झटके दिये जाये। मार दिया जाए, गायब कर दिया जाए नहीं पता। 

वास्तव में शहर वैश्विक लूट का केन्द्र और एक कल्पना है और गांव खुशहाल भारत का यथार्थ और इसी सच को पेश करती फिल्म है ‘जय भीम’। हां फिल्म में मसाला और आइटम सांग नहीं है।  और ना ही अपनी भड़ास निकालने के लिये फाइट सिन।

यह फिल्म हर उस हीरोवादी काल्पनिक फिल्म का जवाब है जिसे देख कल्पना में हम अपने दु:ख दर्द का अनायस ही स्खलन करते हैं। पत्रकार उर्मिलेश जी से मैं सोलह आने सहमत हूं कि नींद नहीं आएगी! और हालात यूं ही रहे तो कभी नींद नहीं आएगी!!!


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