समाज के अंतस के अवाज लोकगीत : लक्ष्मण मस्तुरिया

गनपत लाल

 

रायपुर दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिक लोकसुर के निर्माता लक्ष्मण मस्तुरिया के बड़ सुरता आवत हे। पांच साल पहली लक्ष्मण मस्तुरिया संग लोकगीत ल लेके मोर गोठ-बात होय रहिस। ओहर मोर जम्मो सवाल के जवाब बड़ सुघ्घर ढंग ले दे रहिस।        

सवाल- लोकगीत के सुरूआत कइसे होइस होही?    
मस्तुरिया- लोकगीत ह बहुत जुन्ना आय। जब समाज बनिस तभे लोकगीत बनिस। समाज के सुख-दुख ह लोकगीत म सुने ल मिलथे। तुलसी के दोहा ले पहली लोकगीत रिहिस हे। ओ समय तुलसी दास ह “बन निकल चले दूनो भाई” गीत ल लोकगीत कहे हे। एकर बाद अइसने-अइसने तुलसी अउ कबीर के गीत अउ पद ल मनखेमन लोकगीत माने लागिस। फेर संस्कार के गीत जइसे बिहाव, सोहर गीत ल घलो लोकगीत मानिस। 

सवाल- त लोकगीत आपमन का ल मानथंव?
मस्तुरिया- जउन ह जनसमूह के सरल गीत हे, उही लोकगीत आय। एमा भासा अउ बियाकरन के बंधना नइ रहाय। लोकभासा ले ही लोकगीत बने हे। जउन गीत ह मनखे मन ल भा जथे अउ ओकर बीच छा जथे उही ल लोकगीत कहे जाथे। जउन समय कोनो मनोरंजन के साधन नइ रिहिस, तब समुदाय म उच्छाह अउ खुसी बर गाना गाए जाए। अइसन गीत ह गांव-गांव म चले ल धर लय। वइसे कोनो गीत ल लोकगीत बने बर अबड़ बेरा लागथे।

सवाल- आप के गीत ल गांव के मनखेमन लोकगीत मानथे अउ उच्छाह के मउका म गाथे-गुनगुनाथे। का अपन गीत ल लोकगीत मानथंव?
मस्तुरिया- मैं अपन गीत ल कइसे लोकगीत मानहू। अउ कहूं त ए अपने गुन गवइ असन होगे। लोकगीत तो लोगन मन तय करथे। मैं ह तो बस देवार डेरा के जउन गीत रहिस ओला सुधार के सरल अउ सुघ्घर बनाय हंव। अगर लोगन मन मोर गीत ल लोकगीत मानथे त लोकगीत आय। ए तो समाज के ऊपर निरभर करथे। जब गांव-गांव म कोनो गाना ल खास मउका म गाय जाथे अउ लोगन के जुबान म रइथे उही ह लोकगीत कहलाथे।

सवाल- देवार डेरा के गाना ल सुधारे बर काबर परिस?
मस्तुरिया- पहली देवार डेरा के गाना म भासा ल समझे बर थोकन दिक्कत होवय। जइसे ‘दौना म गोंदा केजुआ मोर बारी म आबे काल रे’ एला सुधार के ‘चौरा म गोंदा रसिया मोर बारी म’ करेंव। इही परकार के ‘चंदर छबीला रे बघली ल’ सुधार के ‘मंगनी म रे मया नइ मिलय रे मंगनी म’ करे हंव। अइसन कइ ठोक गीत ल सुधारे के जरूरत परिस। एकर ले ए गीतमन सारथक होगे।

सवाल- गीत लिखइ अउ गवइ काम म कब ले भीड़े हव?
मस्तुरिया- वइसे तो 1960 ले गीत अउ कबिता लिखे के सुरू कर दे रहेंव। एकर बाद 1971 म इही बुता म पूरा रम गेंव। ओ समय कृष्ण रंजन, पवन दीवान अउ मैं ह शिक्षक रहेन। फेर मैं गुरुजी के नौकरी ल छोड़के ‘चंदैनी गोंदा’ मंच ले जुड़ेंव। एकर बाद मैं ह देवार डेरा के गीत ल सुधारे के काम करेंव। एकर अलावा कारी लोकनाट्य म घलो बहुत अकन गीत के सिरजन करेंव। ओ समय सबझन छत्तीसगढ़ी के सेवा निसुवारथ ढंग ले करय।

सवाल- अब तक आप कतेक अकन गीत लिखे अउ गाए हव?
मस्तुरिया- वइसे तो मैं गाना बहुत कम गाए हंव। मोर संग चलव रे, बखरी के तुमा नार, मैं छत्तीसगढ़िया अंव, चल गा किसान असाढ़ आगे, मन काबर आज तोर उदास हे अउ कुछेक गाना गाए हंव। उही लगभग 300 ले जियादा गीत के रचना करे हंव। मोर गाना ल कइ ठोक छत्तीसगढ़ी फिलिम म साामिल घलो करे हे।

सवाल- पहली अउ अब के गाना म का बदलाव देखथव?
मस्तुरिया- बदलाव होय हे। पहली के गीत म संदेस रहाय, लेकिन आजकल के गीत म संदेस तो छोड़ कुछ समझ घलो नइ आय। आजकल धंधा जियादा होगे हे। गीत के नाम म काही ल पोरसत हे। 

गणपत पेशे से पत्रकार हैं।


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