छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर में कुपोषण और भूख : दशा और दिशा
तुहिन देबबस्तर में बच्चों में कुपोषण से होने वाली बीमारियों का प्रतिशत 33.9% है। आदिवासी माताएं कम वजन वाले बच्चों को (Low birth weight) जन्म देती हैं। बस्तर में 5 साल से छोटे बच्चों में कुपोषण 39.6% है। उसी उम्र समूह के 39.2% बच्चे कम वजन के हैं। 5 साल से छोटे बच्चों में आधे की मृत्यु का कारण कुपोषण या अल्पपोषण है। जिन्हें हम भूख से होने वाली मृत्यु कह सकते हैं।

हाल ही में वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 55 वें स्थान से खिसक कर 100 वें पायदान पर पहुंच गया है। एशिया में अफगानिस्तान और यमन दो ही देश ऐसे हैं जो सूचकांक में भारत से पीछे हैं। बाकी सभी पड़ोसी देशों की स्थिति भारत से अच्छी है।आरएसएस के मार्गदर्शन में संचालित केंद्र की धुर दक्षिणपंथी बीजेपी सरकार को पूरी दुनिया में हो रही अपनी इस शर्मिंदगी से बहुत परेशानी है। वैश्विक स्तर पर वह फर्जी तरीके से अपनी वाहवाही करवाती है। लेकिन भूख के सूचकांक जारी होने पर वह नाराज है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स की प्रक्रिया गलत है ऐसा आरोप लगा रही है।
2017 के ग्लोबल हंगर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मे भूख एक गंभीर समस्या है और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को इसके प्रति बड़ी मज़बूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है। भारत सरकार के द्वारा मज़बूत अर्थव्यवस्था का ढोल पीटने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग भूखे सोने को मजबूर हैं। बीजेपी के घोर कॉरपोरेट परस्त फासिस्ट सरकार ने पिछले 7 साल में देश की जनता के हालात बद से बदतर बना दिया है।बीजेपी सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण छत्तीसगढ़ जैसा एक छोटा आदिवासी बहुल राज्य कैसे कुपोषण व भूख के मकड़जाल में फंसता है ये हम आगे देखेंगे-
पृष्टभूमि
1992 में छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर के बिजाकुरा गांव के आदिवासी समुदाय की जकली बाई की भूख से मौत हो गई। उसके बेटे की भी भुखमरी से मृत्यु हो गई थी। दोनों की मौत की खबर ने लोगों को दहला दिया था। खूब हंगामा हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को यहाँ आना पड़ा था। इस घटना के बाद राष्ट्रीय खाद्य नीति बनी थी। वो अलग बात है कि वर्ष 2030 तक जीरो हंगर के राष्ट्रीय लक्ष्य से देश बहुत पीछे है। वर्ष 2015 में बीजेपी के शाषन काल में उत्तर छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल सरगुजा जिले में एक आदिवासी बच्चे की भूख से मौत हो गई। उस वक़्त भी इस मुद्दे पर काफी हो हल्ला मचा था। प्रगतिशील जन संगठनों ने रमन सिंह की सरकार पर यह आरोप लगाया था कि प्रशाषन द्वारा पीड़ित परिवार का राशनकार्ड निरस्त कर दिया था।
उस गांव में कई महीनों से राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना का काम बंद पड़ा था।पीड़ित परिवार ने 3 - 4 दिन से खाना नहीं खाया था।इस घटना की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग व राज्य मानवाधिकार आयोग में कई गई थी। भूख से मरने वाली हालात तब पैदा हुई जब छत्तीसगढ़, देश में खाद्य सुरक्षा कानून बनाने वाला पहला राज्य था।
पहले छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की तारीफ देश भर में होती थी, मगर जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई है तब से PDS व्यवस्था पूरे देश में कमज़ोर हो गई है। और अगर अम्बानी-अडानी के निर्देश पर कृषि के कॉरपोरेटीकरण के लिए लाए गए तीन कानून लागू हो गए तो PDS के साथ साथ स्कूलों में मध्यान्ह भोजन योजना ( डे मील) बंद हो जाएगी और देश की खाद्य सुरक्षा भी खत्म हो जाएगी। बीजेपी सरकार ने छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में NREGA के मद में मिलने वाली राशि में काफी कटौती कर दिया है।
छत्तीसगढ़ :एक नज़र में
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS -4) के अनुसार
कुल आदिवासी जनसंख्या - 59.09%
कुल चिन्हित कुपोषित बच्चे - 4.3 लाख (जनवरी 2019),
37.7% बच्चे कुपोषित हैं
47% महिलाएं (15 - 49 उम्र समूह) रक्ताल्पता से पीड़ित (Anaemic)
43 से भी अधिक आदिवासी समुदाय
5 आदिम आदिवासी समूह (PTG) हैं
कुपोषण स्थिति (15 - 49 उम्र समूह) सामान्य बॉडी मास इंडेक्स (BMI) के नीचे महिलाएं (शहरी 17.6 %, ग्रामीण 29.6%)
पुरुष सामान्य BMI के नीचे (शहरी 21%, ग्रामीण 25.2%)
छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों से जनता को रौंदने वाली बीजेपी को जनता ने नवंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में उखाड़ कर कांग्रेस के हाथ सत्ता सौंपा था। घोर जन विरोधी आदिवासी विरोधी बीजेपी की जगह सही विकल्प के अभाव में कांग्रेस को चुनकर जनता ने अपनी अपेक्षाएं स्पष्ट कर दी थीं। शुरुआत में प्रगतिशील तेवर दिखाने के उपरांत कांग्रेस ने बीजेपी के गर्म हिंदुत्व की जगह नरम हिंदुत्व की नीति तथा बीजेपी की ही तरह अडानी, एस्सार, जिंदल जैसे कॉरपोरेट के हित साधने में लगी हुई है (हसदेव परसा के जंगल को कोल् ब्लॉक के लिए अडानी को अनुमति देकर)।
2019 के 2 अक्टूबर को ग़ांधी जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ सरकार ने कुपोषण से मुक्ति के लिए मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान के नाम से एक अभियान शुरू किया है। सरकार के अनुसार 4 लाख कुपोषित बच्चों में से अब सिर्फ 3 लाख बच्चे ही कुपोषित रह गए हैं। छत्तीसगढ़ की महिला एवं बाल विकास विभाग,"कुपोषण छोड़ पोषण की ओर, थामें क्षेत्रीय भोजन की डोर" नारे को लागू करने का प्रयास कर रही है। कुपोषण से मुक्ति पाने की योजनाओं के बावजूद हालात में कोई बड़ा सुधार दिखता नहीं।
2 साल पहले कांग्रेस सरकार ने स्कूली बच्चों में कुपोषण से मुक्ति के लिए मध्यान्ह भोजन में अंडा देने की योजना शुरू की तो इसे मांसाहार कहकर बीजेपी के साथ जैन समाज और कबीरपंथियों ने आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी। मजे की बात है कि वेदविरोधी महावीर स्वामी तथा भौतिकवादी कबीर की शिक्षाओं को भुलाकर उपरोक्त्त समाज के धर्मगुरुओं ने मनुवादी हिंदुत्व का अनुसरण किया। कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे पर ढुलमुल रवैया अपनाया तो प्रगतिशील ताकतों ने इसकी बहुत आलोचना की।
बस्तर की स्थिति
बस्तर के बारे में सभी जानते हैं कि इसके 7 जिले - दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, बस्तर, कांकेर, सुकमा और कोंडागांव उग्र वामपंथ प्रभावित क्षेत्र है। लेकिन जो सब नहीं जानते वो ये कि छत्तीसगढ़ या बस्तर के लोग "अमीर धरती के गरीब लोग हैं"।लोहा, टीन, तांबा, डोलोमाइट, हीरा, कोयला आदि खनिज संपदा और नदियों समेत गहन वनों का क्षेत्र है बस्तर।जिसपर देशी विदेशी कॉरपोरेट की लोलुप निगाहें लगी रहती हैं।
बस्तर के बारे में एक बात प्रचलित है कि यहां तबादला होने पर सरकारी कर्मचारी जाते हैं रोते - रोते, मगर आते हैं हंसते-हंसते। इसका अर्थ ये है कि यहां पुलिस, जंगल विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, व्यापारी, कॉरपोरेट कंपनी, शाषक वर्ग की पार्टियां, आदिवासी जनता और प्राकृतिक संपदा की लूट में भागीदार बने हुए हैं।बस्तर में आदिवासियों के जनसंहार के लिए कुख्यात ताड़मेटला कांड (अर्धसैनिक बलों द्वारा) की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त बस्तर के पूर्व कलेक्टर और जनपक्षधर बुद्धिजीवी हर्षमंदर ने आदिवासियों के भूख से होने वाली मौत का खुलासा किया है।
उनकी जांच में आया है कि सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी ग्रामों में की गई आगजनी और हमले के बाद मोरपल्ली गांव में हुई भगदड़ के दौरान कई दिनों तक आदिवासियों को भोजन नहीं मिल पाया, जिससे उनकी मौत हो गईं। वैसे भी आदिवासी को आदिवासी से लड़ाने के लिए और प्राकृतिक संपदा के कॉरपोरेट लूट के लिए बीजेपी सरकार ने कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्मा के साथ मिलकर खूनी खेल सलवा जुडूम 2005 में चालू किया था।
सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्कालीन कांग्रेसी गृह मंत्री चिदंबरम के पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था। इस पूरे हिंसक कार्यक्रम के चलते लाखों लाख आदिवासी जनता का जबरिया विस्थापन हुआ था।बहुत सारे पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश में शरण लिए थे तो हजारों लोगों को सलवा जुडूम शिविरों में बीजेपी सरकार के रहमो करम पर जीना पड़ा था। सुरक्षा बलों और तथाकथित माओवादियों के बीच लड़ाई में बहुत सारे निरपराध आदिवासी मारे गए, हज़ारों जेल में सड़ते रहे।
साथ ही साथ बड़े पैमाने पर महिलाओं , बच्चोंसमेत आम लोगों में कुपोषण और भूख की समस्या बढ़ती गई। बस्तर में मूल आदिवासी जनता - माड़िया, मुड़िया, गोंड, अबुझमाड़िया, धुर्वा, दंडामि माड़िया, दोरला जनजाति से संबंधित हैं। बस्तर में बच्चों में कुपोषण से होने वाली बीमारियों का प्रतिशत 33.9% है। आदिवासी माताएं कम वजन वाले बच्चों को (Low birth weight) जन्म देती हैं। बस्तर में 5 साल से छोटे बच्चों में कुपोषण 39.6% है। उसी उम्र समूह के 39.2% बच्चे कम वजन के हैं। 5 साल से छोटे बच्चों में आधे की मृत्यु का कारण कुपोषण या अल्पपोषण है। जिन्हें हम भूख से होने वाली मृत्यु कह सकते हैं।
दंतेवाड़ा की कहानी
पहले का दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिला अब टूटकर बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा 3 जिला बन गया है। दंतेवाड़ा की कुल जनसंख्या-283479 है जिसमें 48574 परिवार हैं।इनमें से 57% गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के हैं। बस्तर में कुपोषण का स्तर करीब 30% है। सरकारी योजनाओं का प्रमुख उद्देश्य अधोसंरचना का निर्माण करना है बनिस्बत की मानव विकास सूचकांक को बेहतर बनाने के।बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में सरकार की वितृष्णा (कोई भी पार्टी की सरकार हो) साफ नजर आती है।
स्कूलों में जहां पक्के मकान हैं वहां सुरक्षा बलों के शिविर बने हुए हैं। हिंसा, दमन के कारण अंदरूनी इलाकों में स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन सही रूप से नहीं हो पाता।हाल ही में बीजापुर के सिलगेर में अर्ध सैनिक बलों के शिविर खोलने और बस्तर के सैन्य करण के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे आदिवासी युवाओं का पुलिस ने हिंसक दमन किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह की तरह पूरे बस्तर में पुलिस राज कायम करना चाहते हैं इसीलिए आदिवासी समाज के विरोध के बावजूद एक के बाद एक नया अर्धसैनिक बलों के शिविर की स्थापना कर रहे हैं।
साथ ही धर्मनिरपेक्षता की नीतियों को तिलांजलि देकर आरएसएस के लाइन पर चलके राम वन गमन यात्रा और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं। जिसका की आदिवासी समाज विरोध कर रहा है। दंतेवाड़ा जिले को कांग्रेस सरकार , पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कुपोषण को न्यून बनाने के लिए जिला खनिज फण्ड (DMF) के मद से मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान संचालित कर रही है।
इस कार्यक्रम के तहत 5 वर्ष उम्र समूह तक के छोटे बच्चे, गर्भवती महिला व बालिकाओं को पोषक आहार प्रदान करने के लिए 300 आहार (पका भोजन) केंद्र खोले गए हैं जो आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़े हैं। इन केंद्रों को चलाने की जिम्मेदारी स्व सहायता समूह (SHG) को दी गई है। जिसके लिए जिला प्रशासन द्वारा SHG को प्रति व्यक्ति 3 रुपये 50 पैसे प्रदान किया जाता है। इस योजना की सफलता का दंतेवाड़ा जिला प्रशासन बहुत प्रचार करता है।
छत्तीसगढ़ के 10 वी कक्षा के सामाजिक विज्ञान के नए पाठ्यक्रम में 'खाद्य सुरक्षा' पर एक अध्याय है। पर इसी छत्तीसगढ़ में गत 29 जून 2020 में कोरोना की प्रथम लहर के दरम्यान रायपुर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निवास के सामने धमतरी के हरदेव सिंह नामक एक व्यक्ति आत्मदाह करता है जो भूख से कई दिनों से परेशान था। असल बात ये है कि सरकार बदलने से शोषणकारी व्यवस्था नहीं बदलती।नॉकरशाही का गरीब विरोधी, दलित - आदिवासी विरोधी रवैया नहीं बदलता। पूरी दुनिया की करीब आधी आदिवासी आबादी का निवास भारत है।
देश की कुल जनसंख्या में से आदिवासी जनसंख्या 9 % है लेकिन तथाकथित विकासीय परियोजनाओं के कारण 55 % आदिवासी आबादी विस्थापन का शिकार हैं। कुपोषण एक मौन आपातस्थिति (Silent Emergency) है जो भुखमरी की ओर ले जाती है। गरीबी-कुपोषण-बीमारी, फिर गरीबी,यह दुष्ट चक्र (Vicious Circle) हर गरीब, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक व मेहनतकश देशवासी की नियति बन गई है।
बस्तर को अगर करीब से देखें तो पाएंगे कि वहाँ जितना जोर सरकार द्वारा तथाकथित माओवाद या वामपंथी चरमपंथ को मिटाने में दिया जाता है उतना जोर गरीबी, कुपोषण और भूख से मुक्ति पर नहीं दिया जाता। भले ही वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल घोषणा करें कि कुपोषण, नक्सलवाद से बड़ी समस्या है लेकिन आज भी बस्तर में गर्भावस्था में माता और बच्चे की बेहतर देखभाल, दोनों का समुचित टीकाकरण, ICDS योजना के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों को मजबूत बनाना और विस्तार देना, पोषण व सुपोषित भोजन आदतों को घर घर तक पहुंचाने के लक्ष्य से सरकार, कोसों दूर है।
आदिवासी इलाकों में बदतर सामाजिक आर्थिक स्थिति आज भी बदल नहीं पाई है। कोई भी जन कल्याणकारी राज्य का प्रमुख कर्तव्य है जनता को गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी से मुक्ति दिलाना तथा निशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ पेयजल व सुपोषण प्रदान करना। इसके लिए राज्य सरकार को पूर्व की बीजेपी सरकार की आदिवासी विरोधी, कॉरपोरेट घरानों के हित में सैन्यकरण (Milirarization) तुरंत बंद करना होगा। बस्तर में शांति ,प्रजातंत्र व मानवाधिकार को स्थापित करना होगा। क्रांतिकारी भूमि सुधार के जरिए हर आदिवासी परिवार को जमीन का टुकड़ा देना होगा।
साल में 365 दिन रोजगार सुनिश्चित करना होगा, नरेगा जैसी योजनाओं को ज्यादा मजबूती से लागू करना होगा। सिर्फ दंतेवाड़ा ही नहीं बल्कि बस्तर क्षेत्र के सातों जिले में सुपोषण अभियान चलाना होगा। स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों से सुरक्षा बलों के शिविरों को हटाना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम को प्राथमिकता में सबसे आगे रखना पड़ेगा। आदिवासी जनता के लिए ऋण मुक्ति की घोषणा करनी होगी। PDS को मजबूती से लागू करना होगा। राशन कार्ड बनाने और खाद्यान्न योजना से किसी भी नागरिक को वंचित न किया जाय।
आंगनवाड़ी केन्दों का फैलाव सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में करना तथा सहायक भोजन की उपलब्धता को सुनिश्चित करना, माता और बच्चों के स्वास्थ्य, सफाई व पोषण को लेकर युद्ध स्तर पर कार्यक्रम चलाए जाएं तभी इस स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है।
सिर्फ आदिवासी लोक नृत्य महोत्सव करके या नाम के वास्ते किसी एक जिले में कुछ करने से कुछ नहीं होगा। जिस तरीके से 1942 - 45 के द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल के द्वारा मानव निर्मित अकाल के जरिए लाखों बंगाल वासियों को मार डाला गया था उसी प्रकार अभी कॉरपोरेट घरानों के दलाल बीजेपी के प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश को उसी अंधकार मय युग में ले जाया जा रहा है। ऐसी सूरत में बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कॉरपोरेट विकास के जरिए विनाश नहीं, बल्कि समाज के 90 फीसदी आम जनता के लिए जन पक्षीय विकास करना वक़्त की जरूरत है।
Add Comment