शहादत की अप्रतिम गाथा : सरदार उधम

‘द कोरस’ के पन्ने पर पढ़िये पीयूष कुमार की फ़िल्म समीक्षा

पीयूष कुमार

 

इस फ़िल्म की खासियत यह है कि इसने बॉयोपिक फ़िल्म निर्माण की अब तक की तमाम फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की शानदार फ़िल्म बनकर प्रस्तुत हुई है। यूँ तो उधम सिंह को लोग एक क्रांतिकारी के नाम से जानते हैं पर उनके व्यक्तित्व, जलियांवाला बाग कांड का प्रभाव और पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर की हत्या के लिए 21 साल की धैर्यपूर्ण तैयारी को कम ही लोग जानते हैं।

यह फ़िल्म इसी आज़ादी के दीवाने के बारे में है जो बर्बर ब्रिटिश प्रताड़नाओं के आगे नहीं टूटा और न ही माफीनामे का रास्ता चुना। यह एक ऐसे नौजवान की कहानी है जिसने अपना नाम एक धर्मनिरपेक्ष इंसान के रूप में ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ रखा था। यह शहीद जो राजनीतिक आज़ादी के साथ इंसानी आज़ादी का हिमायती था, जो भगतसिंह की परम्परा को बनाये रखना चाहता था।

शहीद उधम सिंह (1899 - 1940) पर बनी इस फ़िल्म की शुरुआत अपने मिशन के लिए मुश्किल रास्तों से होकर विदेश जाने के लंबे दृश्यों के साथ शुरू होती है और उनका चरित्र खामोश दिखाई पड़ता है। यह खामोशी लोकेशन के कोहरे और बर्फ के साथ कहानी की वह जमीन बनाती है जिसमें प्रतिशोध की यह ज्वाला ठंडा लोहा बनकर जमाने के सीने में भविष्य में उतरने वाला है।

इन दृश्यों के साथ साथ यह एहसास भी होने लगता है कि यह फ़िल्म एक इतिहास बनाने जा रही है। फ़िल्म का यह स्लो ट्रीटमेंट स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘सिंडिलर्स लिस्ट’ जैसी फिल्मों की याद दिलाती है। फ़िल्म में यह पूरा इम्पेक्ट फ़िल्म के स्क्रीन राइटर रितेश शाह और शुभेंदु भट्टाचार्य की जोड़ी के लेखन से आया है।

फ़िल्म ने उधम सिंह के लंदन प्रवास और ओ’ड्वायर की हत्या की तैयारी करने को बारीकी से दर्ज कर लिया है। ओ’डायर की हत्या के बाद स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस द्वारा उधम सिंह की गिरफ्तारी और पड़ताल के बीच 1930 के दशक के उत्तरार्ध की तमाम घटनाएं भी चलती रहती हैं।

उधम सिंह का इन वर्षों में ब्रिटेन स्थित क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ काम करना, एक जर्मन (दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है –  संवाद) से हथियार खरीदना, उधर सोवियत यूनियन के नेताओं से सहयोग के लिए बातचीत करना और साथ ही माइकल ओ’ड्वायर की हत्या का अभ्यास करना, यह सब खामोशी के साथ चलते रहते हैं।

इस खामोशी को यूरोप के सर्द मौसम के साथ मिलाकर निर्देशक शूजीत सरकार ने कल्ट रच दिया है। यह हैरतअंगेज सत्य है कि उधम सिंह ने अपने मिशन के लिए 21 वर्षों तक का धैर्य, संघर्ष और पीड़ा सही।

फ़िल्म पर पर्याप्त रिसर्च किया गया है। इससे बहुत सी बातें जो जमाने को नहीं पता थीं, वे जाहिर हो सकी हैं। फ़िल्म ने जहां तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन का रवैय्या लंदन में ब्रिटिश क्राउन और चर्चिल के माध्यम से जाहिर किया है, वहीं पंजाब में जनरल डायर और गवर्नर ओ’ड्वायर की सोच और कार्यवाही क्या और कैसी रहती है को स्पष्ट किया है।

इधर भारत के क्रांतिकारियों को क्या करना है, यह भगतसिंह के माध्यम से फ़िल्म में कहलवाया गया है। इन सभी बातों के बीच उधम सिंह बदले की भावना में जीते रहते हैं साथ ही 1931 में भगतसिंह की शहादत के बाद संगठन को जीवित रखने का प्रयास भी करते रहते हैं। फ़िल्म में संवाद वास्तविक हैं। कुछ दृश्य तो कमाल हैं जैसे, पूछताछ के दौरान अधिकारी भगत सिंह के बारे में बात करता है। उधम सिंह उससे कहते हैं, “आप 23 की उम्र में क्या कर रहे थे” तो अंग्रेज अधिकारी ख़ुशी से कहता है, “शादी की थी और एक बच्चा भी था, बढ़िया जीवन था।”

उधम सिंह कहते हैं- “तुम भगतसिंह पर बात करने के लायक नहीं हो।” एक सीन उनके अकेले बात करने का है जो भावुक करता है। पकड़े जाने की जगह पर और कोर्ट में उधम सिंह का बयान ऐतिहासिक महत्व का है जो यह बताता है कि साम्राज्यवादी नीतियों और मनुषगत अधिकारों की स्थापना के लिए युवाओं को क्या किया जाना चाहिए।

इस सब्जेक्ट और डायरेक्टर शूजीत सरकार के बीच यह अद्भुत समानता है कि जहां उधम सिंह ने अपने प्रतिशोध को 21 सालों के सब्र के बाद पूरा किया, उसी तरह शूजीत सरकार ने 20 साल पहले ही जब वह जलियांवाला बाग घूमने गए थे, तब से से यह सब्जेक्ट चुन लिया था और तैयारी करते रहे थे जिसे अब जाकर क्लासिक रूप में दे सके। इस फ़िल्म के तीन नायक हैं, पहला नायक है फ़िल्म का सब्जेक्ट अर्थात उधम सिंह और दूसरा नायक है, डायरेक्टर शूजीत सरकार।

जब आप 1930 - 40 के बीच के लंदन और यूरोप के वातावरण में फ़िल्म को आगे बढ़ते देखते हैं तो यकीन नहीं होता कि यह कोई हिंदी फिल्म है। इसके लिए शूजीत ने दुनिया भर के तकनीशियनों की मदद ली है। उन्होंने अपने कैनवास पर कहानी के साथ देशकाल – वातावरण, ड्रेसिंग और तत्कालीन जीवन को अद्भुत रचा है। इस लिहाज से यह फ़िल्म रिचर्ड एटनबरो के ‘गांधी’ से भी बेहतर बन पड़ी है। इस फ़िल्म का तीसरा नायक है, उधम सिंह के रूप में विकी कौशल।

विकी ने उधम सिंह जैसा दिखने की कोशिश नहीं की है बल्कि उन्हें जिया है। हमने उधम सिंह को नहीं देखा है पर जैसा विकी कौशल ने उन्हें जिया है, वे वैसे ही रहे होंगे। बदले की भावना को जज्ब किये 21 सालों तक जिलाये रखने के भाव को विकी कौशल ने एक्सप्रेशन में जैसा पेश किया है, वह बेमिसाल है, अभूतपूर्व है। यह भाव उधम सिंह को सौ साल पहले या आज इस फ़िल्म में विकी कौशल से क्योंकर हुआ, उसकी वजह है फ़िल्म का आखिरी आधा घन्टा।

इसमें जलियांवाला बाग में हुई फायरिंग और उसके बाद का लम्बा बेहद- बेहद तकलीफदेह सीन है। रोंगटे खड़े कर देनेवाले इस लंबे दृश्य को लगातार देख पाने की ताब हर किसी में नहीं है। जब यह सीन खत्म होता है, दर्शक खुद को जेहनी तौर पर वहीं खड़ा पाता है, जहां 1919 के बाद उधम सिंह खड़े थे। आज़ादी कितनी तकलीफों से मिली है,समकालीन सस्ती और खोखली देशभक्ति के दौर में उसे ठीक से समझने के लिए यह फ़िल्म बहुत जरूरी है। फ़िल्म की टीम इसके लिए बधाई की पात्र है।

अन्य सभी कलाकारों ने भी फ़िल्म में बेहतरीन काम किया है। बनिता संधू उधम की दोस्त रहती हैं। उनका चरित्र मूक है सो उनकी आंखें और एक्सप्रेशन सहज और वास्तविक प्रभाव छोड़ते हैं। वे फ़िल्म में कहीं कहीं पर आई हैं और उनके आने से स्क्रीन के साथ मन में भी खुशगवारी आती है। शॉन स्कॉट, स्टीफन हॉगन सहित ज्यादातर कलाकार यूरोपीय मूल के हैं जिन्होंने विश्वसनीय अभिनय किया है। फ़िल्म का एक सबल पक्ष है शांतनु मोइत्रा का शानदार बैकग्राउंड स्कोर।

वे इस फ़िल्म से दिवंगत संगीतकार वनराज भाटिया की जगह को रिप्लेस कर रहे हैं। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा का माइलस्टोन है और इतिहास के नाम पर भव्यता की आड़ में कचरा परोसनेवालों को नजीर है कि पीरियड फिल्में कैसे बनाई जाती हैं या विषय का चुनाव कैसे किया जाता है। बिना गानों की दो घण्टे बयालीस मिनट लम्बी यह फ़िल्म भारत की ओर से ऑस्कर के लिए भेजी जाये और कोई अवार्ड हासिल हो जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


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