राजिम में मनाया जाएगा शंकर गुहा नियोगी शहादत दिवस

द कोरस टीम

 

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के सचिव बंसत साहू ने बताया कि शहीद शंकर गुहा नियोगी की हत्या ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान 28 सितम्बर 1991 को राज्य के उद्योगपतियों द्वारा सरकार से साठगांठ कर भाड़े के गुण्डे से कराई गई थी।

सी.बी.आई. जांच के पश्चात् दुर्ग जिला न्यायालय के शेषन कोर्ट से 23 जून 1997 को सिम्पलेक्स समूह के उद्योगपति उनके भाड़े के गुण्डों को आजीवन कारावास एवं गोली चलाने वाले भाड़े के हत्यारे को फांसी की सजा दी गई।

26 जून 1998 को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इन सभी आरापियों को बरी कर दिया। 20 जनवरी 2005 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा भाड़े के हत्यारे को आजीवन कारावास एवं  उद्योगपति सहित अन्य उनके सहयोगी गुण्डों को बरी कर दिया गया।

न्यायमूर्ति बी.आर.कृष्ण अय्यर ने का. शंकर गुहा नियोगी के प्रथम शहादत दिवस 28 सितम्बर 1992 के स्मृति व्याख्यान में कहा था - ‘आने वाले दौर में नियोगियों को समाजिक कार्यवाही, सामाजिक गोलबंदी और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षो की चिंगारी एक बार फिर फूंकनी होगी। भले ही उन्हें गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया जाये मगर वह फीनिक्स की तरह बार-बार अपनी राख से उठकर हुंकार भरेंगें।’

नियोगी सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं है । इस शब्द के मायने इससे कहीं बढ़कर हैं। नियोगी एक इंसानी वज्र थे, पूंजीवादी लूट के खिलाफ एक बिगुल, बेनाम - बेआवाजों के संगठित प्रतिरोध का प्रतीक, वह उन असंख्य लोगों की आवाज थे जो एक मनुष्य की न्यूनतम प्रतिष्ठा से भी महरूम हैं।

जो अपने वजूद और उन तमाम अधिकारों की चाह दिल में संजोये हुये हैं जिनका समाजवादी, लोकतांत्रिक और संप्रभु भारतीय गणतंत्र में हर मनुष्य को आश्वासन मिला है। नियोगी ने संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त की गई भावनाओं को पूरी संजीदगी से लिया।

उन्होंने अस्तित्व के हर आयाम में भारतीय लोगों को मुक्ति दिलाने के लिये अपने समूचे जीवन का उत्सर्ग कर दिया। उन्होने संविधान में दिये मूल्यों, न्याय सामाजिक - आर्थिक एवं राजनीतिक  समानता के लक्ष्यों के लिये अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

बंसत साहू कहते हैं कि लम्पट गुंडो और पुलिस व राजनेताओं के दम पर पलने वाले शोषक माफिया गिरोहों के खिलाफ अपने संघर्ष में मजदूरों को शंकर गुहा के रूप में एक ऐसा नेता मिला जो अपने उसूलों के लिये हर हद तक जाने को तैयार था। जिसकी नजर सदा सामाजिक न्याय के लक्ष्य पर लगी रहती थी और जिसका मिशन 'करो या मरो’ के जज्बे के साथ हर मेहनतकश की आजादी था।

इसके लिये वह प्रबंधन के आतंकवाद, 'ठेका व्यवस्था’ के नाम पर चल रही गुलामी और राज्य तंत्र की मिलीभगत से  कानूनों की अवहेलना, हर चीज का मुकाबला करने को तैयार थे। 

लाल-हरा झण्डा के तले चल रहे मजदूर आंदोलन पर 1977 में दल्ली राजहरा में जनता पार्टी की सरकार द्वारा गोली चलाई गयी 11 मजदूर शहीद हुये 12 सितम्बर 1984 को राजनांदगाँव के मजदूर आंदोलन में कांग्रेस की सरकार द्वारा गोली चलाई गयी 4 मजदूर शहीद हुये।

भिलाई में मजदूर आंदोलन पर 1 जुलाई 1992 को भाजपा सरकार द्वारा गोली चलाई गयी। 17 मजदूर शहीद हुये इस प्रकार से छत्तीसगढ़ माईंस श्रमिक संघ एवं छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के आंदोलन को कुचलने की तमाम कोशिशों के बाद भी आंदोलन जारी है।

क्योंकि शहीद शंकरगुहा नियोगी एक व्यक्ति नहीं एक विचार है शहीदों की कुरबानियों के विचारों को लेकर देश के विभिन्न स्थानों पर आंदोलन आज भी जारी है।


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