शंकर गुहा नियोगी और... नक्सलवाद

सुशान्त कुमार

 

आप भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्य पर कब लगे?
घोषाल- मैं 16 फरवरी सन् 1962 में भिलाई इस्पात संयंत्र (भिइस) में कार्य पर लगा।

आप मजदूर आंदोलन से कैसे जुड़े?
घोषाल- मैं जूनियर ऑपरेटिव ट्रेनिंग पूरा कर भिलाई इस्पात संयंत्र के ब्लॉस्ट फर्नेस में नाइट सिफ्ट में ड्यूटी कर रहा था। तब देखा कि हमारा अधिकारी भाटिया मजदूरों को टेपिंग करने के लिए लात मारकर उठा रहा है। मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए मजदूरों के साथ इस प्रकार किए जा रहे व्यवहार के लिए चेतावनी दी कि वे मजदूरों के साथ इस तरह पेश नहीं आ सकते। फिर क्या था अधिकारी ने नौकरी से निकाल देने की धमकी दे दी। मैंने भी उत्तर में उन्हें दुबारा इस तरह हरकत करने पर ब्लॉस्ट फर्नेस में डाल देने की धमकी दे दी। फिर मजदूरों में मेरा एक स्थान बन गया और मजदूरों के साथ दुव्र्यवहार व अन्य मांगों को लेकर ब्लॉस्ट फर्नेस संघर्ष समिति का गठन किया। 1970 में अप ग्रेडेशन के मांगों को लेकर सफलता मिली। जिसके बाद प्लांट में फायर ब्रिगेड यूनियन व बाबुओं के संगठन ने हमसे आकर जुडऩे की इच्छा जाहिर की। इस प्रकार पूरे प्लांट में एक पहचान बन गया। यह मेरे मजदूर आंदोलन की पहली सीढ़ी थी।

नियोगी से आपकी पहली मुलाकात कब और कैसे हुई?
घोषाल- सन् 1967 में ब्लॉस्ट फर्नेस संघर्ष समिति के संघर्षो व मेरे नेतृत्व के कारण नियोगी जो कोक ओवन में कार्यरत थे मुझसे ब्लॉस्ट फर्नेस में आकर मिले। हम दोनों की यह पहली मुलाकात थी। उन्होंने हमारी व समिति के संघर्षो के संंबंध में अवगत कराने की बात कही। क्योंकि वे उस समय स्फुलिंग (चिंगारी) नाम से पत्रिका प्रकाशित करते थे। उस समय नियोगी ने अपना परिचय धीरेश गुहा नियोगी के रूप में दिया। यह हमारी पहली व अच्छी मुलाकात थी।

क्या आप और नियोगी नक्सलबाड़ी की घटना से प्रभावित थे?
घोषाल- मैं तो नहीं था। हां नियोगी प्रभावित थे।

क्या आप दोनों भिलाई में ऑल इंडिया को-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रेवोल्यूनरीश से जुड़े थे?
घोषाल- मैं इस प्रकार के किसी संगठन से नहीं जुड़ा था। नियोगी के अनुसार वे इस संगठन से संबंध रखते थे।

क्या उस समय वे चारू मजुमदार व उनकी कॉर्डीनेशन कमेटी फिर बाद में सीपीआई (एमएल) से प्रभावित थे?
घोषाल-इस संबंध में मुझे कोई जानकारी नहीं हैं।

कई सूत्रों से यह खबर है कि उनका कमेटी से मतभेद था? आप कुछ बता सकेंगे?
घोषाल- जन संगठनों का निर्माण विशेषकर ट्रेड यूनियन के गठन व जेल में बंद किसी बंदी को छुड़ाने व कामकाज में व्यक्तिवादी रूझानों के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था। यह जानकारी मुझे उन्होंने दी थी, लेकिन मेरी माक्र्सवाद-लेनिनवाद पर प्रतिबद्धता थी। इस आधार पर हम लोगों ने भविष्य में इन वैज्ञानिक विचारधाराओं के आधार पर मजदूर व किसान संगठन बनाने नई शुरूआत की।

आप लोगों ने छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संगठन व छमुमो का गठन कब किया?
घोषाल- उस समय एटक, इंटुक व अन्य नामधारी ट्रेड यूनियन ने बोनस को लेकर संघर्ष प्रारंभ किया। उस वक्त स्थाई मजदूरों की अपेक्षा असंगठित ठेका श्रमिकों, स्थाई मजदूरों की तुलना में 1/4 बोनस देने की मांग उठी। इस मुद्दे पर हमने संघर्ष भी किया। 21 मार्च 1977 में रायपुर जेल से नियोगी के छूटने के बाद दल्लीराजहरा में बंशीलाल साहू के नेतृत्व में काल बेक वेजेस, झोपड़ी मरम्मत व बोनस के मुद्दे को लेकर संघर्ष तेज हुआ। जिसमें नियोगी की साफ व ईमानदार छवि व समस्याओं पर उनकी गहरी पैठ के कारण उन्हें दल्ली बुला लिया गया। जहां 1977 में छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संगठन का गठन किया गया। जिसके रजिस्ट्रेशन के लिए नियोगी स्वयं इंदौर गए। बाद में 1980 के आसपास छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के रूप में जनसंगठन का गठन किया गया।

क्या आप लोगों की कभी नक्सलियों से किसी प्रकार की चर्चा हुई है?
घोषाल- मेरी आज तक किसी नक्सली से चर्चा नहीं हुई है।

क्या नियोगी भिलाई आने के बाद भी नक्सली आंदोलन के समर्थक थे?
घोषाल- पता नहीं?

जैसा कि विश्वरंजन कहते हैं 1968 में एक नक्सली वाईएस मूर्ति पकड़ाया था? वे उनसे मिलने जगदलपुर भी गए। बाद में दीवाल पर नक्सली नारा लिखने के कारण जगदलपुर पुलिस ने उन्हें 151 सीआरपीसी के तहत पकड़ा था? और कुछ घंटों बाद जगदलपुर कोतवाली में रोककर छोड़ दिया था? इस सवाल पर आपका मत क्या है?
घोषाल- यह नियोगी के ऊपर सरासर गलत आरोप है। वे मूर्ति से स्फूलिंग के पत्रकार के रूप में मिलने गए थे। उनके रोबदार तेवर से पुलिस अधिकारी उद्वेलित हो उठे और उन्हें जेल में डाल दिया। किसी प्रकार के पर्चा व पोस्टर चिपकाने की बात कोरा बकवास है।

क्या मूर्ति के छूटने के बाद मूर्ति, नियोगी, राय व जीत आदि ने सेंट्रल आर्गेनाजिंग कमेटी का गठन किया था?
घोषाल- हम दोनों ही माक्र्सवाद-लेनिनवाद विचारधाराओं से लैस थे और मैं तो अब भी हूं, लेकिन इन विचारों के आधार पर जनसंगठन व समाज में परिवर्तन कैसे होगा इस पर हमारा सोच-विचार केन्द्रित रहता था, लेकिन किसी प्रकार की कमेटी का गठन हम लोगों ने कभी नहीं किया। जितने नाम आप गिना रहे हैं यह भी किसी व्यक्ति के दिमाग की कोरी कल्पना ही है।

क्या उन्होंने भिलाई से कोई नक्सली पत्रिका निकाली थी, साथ ही एक लाइब्रेरी का गठन भी किया था?
घोषाल-हां वे स्फुलिंग का प्रकाशन करते थे, लेकिन यह नक्सली पत्रिका है ऐसी जानकारी मुझे नहीं है। जहां तक लाइब्रेरी का सवाल है वह भी हमारे बीच नहीं था।

क्या बाद में मूर्ति, गुहा व चारू मजुमदार के मध्य 70 के शुरू में ही अलगाव प्रारंभ हो गया?
घोषाल- ऐसी किसी अलगाव के संबंध में मुझे कोई जानकारी नहीं है।

1970 में मूर्ति पर दोबारा केस लगे और 13 साथियों के साथ गिरफ्तार हुए। जिसमें नियोगी, असति चटर्जी, जोगी राय, जगनिवास राय, एन लक्ष्मण राव, अताऊर रहमान आदि का नाम गिनाया गया है। इस पर आपका क्या कहना है? क्या वे पार्टी यूनिटी के सदस्य थे?
घोषाल- आप घटनाक्रम को तोड़-मरोडक़र पूछ रहे हैं? हम लोगों ने ब्लॉस्ट फर्नेस संघर्ष समिति का गठन किया था। उस समय इस संगठन को हम माक्र्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर संचालित करना चाहते थे, लेकिन लोगों में इस विज्ञान के संबंध में जानकारी का अभाव था। हम भी उन्हें समझाने में असफल हुए, लेकिन प्रतिष्ठित एटक व इंटुक के रहते हम लोगों ने पीएस नायर के नेतृत्व में स्टील मंत्री को एक ज्ञापन सौंपा था। जिसमें काफी लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। आपने जिन नामों को गिनाया उसमें से कोई भी हमारे संगठन का सदस्य नहीं था और न ही हमारा पार्टी यूनिटी के साथ ही कोई संबंध था।

क्या छमुमो व जमुमो में सीपीआई (माओवादी) घुसपैठ करने व हाईजैक करने की कोशिश कर रहे हैं?
घोषाल- हाईजेक के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

हाल ही में डीजीपी विश्वरंजन के बयान से दल्लीराजहरा में जन मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में दल्ली बंद रहा तथा राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई व रायपुर में विरोध हुआ। अब नियोगी व नक्सलवाद को लेकर चर्चाएं गर्म हुई हैं? इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
घोषाल- मैं इसे आश्चर्यजनक व गंभीर नहीं मानता हूं। क्योंकि पूर्व में भी मध्यप्रदेश सरकार ने भी नियोगी को नक्सली कहा। आज डीजीपी नक्सली कह रहे हैं। मेरा उनसे सीधा सवाल है कि वे नक्सलवाद व नक्सली से क्या अर्थ निकालते हैं? नक्सलबाड़ी की घटना माक्र्सवाद-लेनिनवाद से प्रभावित था। चारू मजुमदार ने उसे माओवाद कहा। माओ तो चीन के थे तो चीन भी नक्सलवादी हो गया। छत्तीसगढ़ की जनता की चहमुखी विकास के लिए नेतृत्व ने रूस के सहयोग से भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना की वे व रूस ने भी माक्र्सवाद व लेनिनवाद से प्रभावित होकर सोवियत संघ का गठन किया, तो रूस, नेहरू व भिलाई का संयंत्र भी नक्सलमय हो गया, उन सारे लोगों व संयंत्र पर नक्सली का आरोप मढक़र सब खत्म कर देना चाहिए। डीजीपी जो कुछ कह रहे हैं वह स्वभाविक है। वे पूंजीवादी व्यवस्था के पि_ू हैं। जाहिर है वे इस प्रकार उभर रहे सारे आंदोलन जो सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध कर रहे हैं उसे कुचलने कुछ तो हथकंडा अपनाना होगा। यह सब कुछ डीजीपी कर रहे हैं। यह उनका स्वभाविक कर्तव्य भी है।  डीजीपी वास्तव में जनविरोधी व मजदूर विरोधी व्यवस्था के रक्षक (पुलिस) हैं। वे अपनी सारी कविताओं, अध्ययनों व वाकपटुता से इस सड़े-गले व्यवस्था को टिकाए रखते हुए अपने सड़ी व्यवस्था की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने में लगे हुए हैं। उनका यही चरित्र रहा, तो इतिहास उन्हें सबक सिखाकर रहेगा। यह ऐतिहासिक सत्य है। जीत के नेतृत्व में दल्लीराजहरा में जमुमो व अन्य क्षेत्रों में छमुमो ने उनके खिलाफ जिस प्रकार आवाज उठाया है। यह थमने वाला नहीं है। यह और तेज होगा। डीजीपी को अपने नैतिक मूल्यों की थोड़ी भी फिक्र है, तो इस पद से त्यागपत्र देकर जनता से तत्क्षण माफी मांगे। जिस प्रकार वे दमन का सहारा लेकर संगठन व आंदोलन को कुचलने की चेष्टा कर रहे हैं इससे वे बाज आएं।

नियोगी बीएसपी में कार्यरत थे? उन्होंने कोक ओवन में एक्शन कमेटी का गठन भी किया था। उन्हें किस आरोप में निकाल बाहर किया गया?
घोषाल- लगभग 1965 की यह घटना है। उन्होंने बोनस के मुद्दे को लेकर एक्शन कमेटी का गठन किया था। मैनेजमेंट के समक्ष कोई मुद्दा नहीं था। मात्र कमेटी गठन के आधार पर उन्हें निकाल बाहर किया गया था।

सन् 1968 में भिलाई के बोरिया कांड जहां हिन्दू-मुस्लिम के बीच दंगा भडक़ाया गया था। आप लोगों की उस समय क्या भूमिका थी?
घोषाल- मेरा फस्र्ट सिफ्ट था। पता चला किसी ने गाय का बछड़ा हलाल कर दिया। फिर क्या था दंगे भडक़ उठे। हम लोगों ने अपने-अपने संगठनों के माध्यम से कर्मचारियों की बैठक लेकर लोगों को दंगे की असलियत व शासकों की चालाकियों से अवगत कराया। यह भी कि किस प्रकार राजनैतिक पार्टियां दंगों को आयोजित करती है। इसका भंडाफोड़ किया। लगातार बैठकों व राजनैतिक चर्चाओं का परिणाम यह हुआ कि दंगे पर अंकुश लगा। क्योंकि सारे प्रभावित लोग संयंत्र के कर्मचारी ही थे। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। लोगों के मध्य एक अच्छा संदेश भी उस समय पहुंचा कि श्रम संगठन किस प्रकार सामाजिक मुद्दों का भी हल खोज सकता है।

आप नियोगी के हम सफर, हम दोस्त रहे हैं। नियोगी की संगठन क्षमताओं व नेतृत्वकारी गुणों पर कुछ बताएंगे?
घोषाल- वे कर्मठ, मेहनती व ईमानदार व्यक्ति थे। शोषित-पीडि़तों के लिए उनके मन में विशेष इच्छाशक्ति व प्रेम था। वे मेहनतकशों के लिए एक समर्पित योद्धा थे। जिसके स्थान को कभी पूरा नहीं किया जा सकता है।

राजेन्द्र सायल की गतिविधि व छमुमो के मध्य संबंधों पर ढेरों सवाल उठे हैं आप क्या जानते हैं?
घोषाल- मेरी जानकारी अखबारों के समाचार के आधार पर यह है कि वे छमुमो के हितैषी है, लेकिन उनकी भूमिका पर मेरा ज्ञान कच्चा है। हां इतना और कि वे पीयूसीएल के बड़े पदाधिकारी भी हैं।

राजेन्द्र सायल पर भी नियोगी की हत्या की सुंई घुमती है। क्या है सच्चाई?
घोषाल- इस पर खोजबीन करिए। जहां तक मेरी समझ है। स्वयंसेवी संगठन जुझारू संगठनों में घुसपैठ कर उसे भ्रष्ट व खत्म कर देती है, यह लोगों की हत्या से भी ज्यादा खतरनाक है। एक उदाहरण देकर समझाता हूं-मान लीजिए एक गांव में ग्रामीण पानी को लेकर आंदोलन करते हैं। सरकार एक स्वयंसेवी संगठन को वहां भेजकर बोरिंग लगवा देती है। लोग उस संगठन के भक्त हो जाते हैं। उसके बाद सरकार पर लोगों का गुस्सा ठंडा पड़ जाता है। इस गुस्से को लचीला कर उसके लड़ाकू स्वभाव को ये संगठन मुर्दा बना देते हैं। साथ ही विदेशी एजेंट व बहुराष्ट्रीय कंपनी अपना पांव पसार लेती है। लोग इस प्रकार के छोटे-छोटे  सुधारवादी लालच में फंस जाते हैं। वास्तविक कारणों से लोगों का ध्यान हट जाता है। अंत में कंपनियां व सरकार चांदी काटती हैं।

दल्ली, राजनांदगांव व बैलाडीला की उपलब्धियों पर आपके क्या विचार हैं?
घोषाल- हमने आर्थिक आंदोलन को शिखर तक पहुंचाया है, लेकिन मजदूरों में राजनैतिक चेतना के बीज बोने में नाकाम रहे हैं। हां नियोगी ने संघर्ष के साथ निर्माण के रूप में अस्पताल, गैरेज व स्कूल बनावाए ये सारे सुधारवादी कामकाज है। जब तक मेहनतकशों के हाथ व्यवस्था की चाबी नहीं होगी। ये संघर्ष भी धाराशाही हो जाएगी। हो सकता है कल इसे नक्सली ने बनवाया है बोलकर तुड़वा दिया जाए। यदि राजनैतिक व्यवस्था की चाबी हमारे हाथों विशेषकर मेहनतकशों के हाथ होगी तब ऐसे ढेरों निर्माण कार्य खड़े किए जा सकते हैं। यह एक तरह का यूटोपियन ख्याल है। हमें उससे बाहर आकर आर्थिक मुद्दों की हर मोड़ में राजनैतिक व्यवस्था में बहाली करने के संघर्षो के साथ जोडक़र आंदोलनों को तेज करना चाहिए। तब हम कह सकते हैं कि यह हमारी उपलब्धि हैं।

नियोगी के हत्यारों को सजा नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से नियोगी का परिवार व आंदोलन प्रभावित हुआ? आशा की टिप्पणी थी कि मोर्चा ने नामी वकील की नियुक्ति नहीं की थी। जबकि मोर्चा के पास भीष्म किंगर, कनक तिवारी, एमएल चटर्जी जैसे नामी-गिरामी वकील थे? आप इस पर क्या कारण खोजते हैं?
घोषाल- आशा की प्रतिक्रिया भावनात्मक है। इस व्यवस्था में जुझारू संघर्षो को जीत तक पहुंचाना बड़ा कठिन काम है। दत्ता सामंत, ललित माकन से लेकर नियोगी के हत्यारों को सजा नहीं मिली और मिल भी नहीं सकती क्योंकि अदालत गरीब जनता के आकांक्षाओं के अनुरूप न्याय नहीं कर सकती है। यह इस व्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। पूंजीवादी व्यवस्था कभी भी नहीं चाहेगी कि मजदूर नेताओं के हत्यारों को सजा हो? या फिर उनकी मांगे मान ली जाय। स्वभाविक है जीत उनकी होनी थी, जो हुआ।

आपको छमुमो से क्यों निकाल बाहर किया गया? जबकि नियोगी ने भविष्य के आंदोलन के संदर्भ में आपके नाम की चर्चा की थी?
घोषाल- छमुमो के नेताओ (जनक लाल ठाकुर, गणेश राम चौधरी, अनुप सिंह, शेख अंसार, भीमराव बागड़े) का कहना था कि दादा (घोषाल) के कारण समझौता नहीं हो सकता है। क्योंकि वे मालिक से मिलकर रुपए खा रहे हैं और नेहरू नगर के पास मार्डन टाऊन मेें निवास कर रहे हैं। लोगों को कुछ नहीं सूझा हां मेरे निवास स्थान ने उनको आधार दे दिया। मजदूरों में भी राय बन गई क्योंकि वे काफी दिनों से कार्य से बाहर थे। वे शीघ्र ही काम में वापस जाकर घर की आर्थिक रीढ़ को सीधा करना चाह रहे थे। इस प्रकार वे नेताओं के चालबाजियों को नहीं समझ सकें। यह वैसे ही है जब एक भूखे इंसान के सामने से यदि कोई निवाला हटा दे तो भूखा उसे हटाने वाले पर टूट पड़ता है। अंत में स्थिति मेरे खिलाफ बन गई। आज पूरा दृश्य साफ है। मांगे जस की तस पड़ी हुई है। मजदूर आज भी कारखाने से बाहर भटक रहे हैं। हां कई नेताओं ने मुझसे व्यक्तिगत मिलकर पूर्व में किए गए गलतियों को स्वीकार किया है। मुझे मोर्चा से निकालने का निर्णय बेबुनियाद था।

अब आपके संरक्षण में जन मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ है। साथ ही सार्वजनिक संपत्ति एवं संसाधन बचाओ आंदोलन भी खड़ा किया गया है। इनकी भविष्य  की योजनाओं पर अपना मत बताएंगे?
घोषाल- इन सभी मोर्चाओं की बुनियाद जनता है। यदि पीडि़त जनता अपने हक व अधिकार के लिए संघर्ष जारी रखेगी तो उन्हें सफलता मिलेगी। नहीं तो ये सारे संगठन धाराशाही हो जाएंगे।

नए नेतृत्व के संबंध में बताएंगे?
घोषाल- नेतृत्व एक महत्वपूर्ण सवाल है। इसे नई पीढ़ी ही पूरा कर सकती है। विशेषकर मजदूर वर्ग से। हां बुजुर्ग नेताओं की सलाह से कार्य व रूपरेखा तय करने में मदद मिलेगी। नेतृत्वकर्ता को राजनैतिक ज्ञान से लैस होना अनिवार्य है। मौजूदा विश्व परिदृश्य में सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) फायदे-नुकसान, वैज्ञानिक आधार पर माक्र्सवाद-लेनिनवाद पर पकड़, वर्गीय दृष्टिकोण, दूरदर्शिता की समझ, शोषणविहीन समाज का नवनिर्माण, आर्थिक आंदोलन के प्रत्येक मोड़ पर वर्तमान व्यवस्था के स्वरूप के छद्म रूपों का भंडाफोड़ करते हुए भविष्य में नई व्यवस्था के गठन के लिए क्रांति का पौधा बोना होगा। देश में शासन कर रहे नायकों के सद्गुण व अवगुणों, उनकी पार्टी के चरित्र को लोगों के बीच नंगा करके ही एक नई द्वंद्वात्मक समझ-बूझ के साथ ही हमें नेतृत्वकारी गुणों को तेज करना होगा।

आप ‘मजदूर मार्ग’ के नाम से अखबार का प्रकाशन भी करते थे? अभी उसकी क्या स्थिति है?
घोषाल- विभिन्न प्रकार की बीमारी के कारण मैं अस्वस्थता की स्थिति में पहुंच गया हूं, जिसके कारण इसका अंतिम अंक 2006 में ही निकला था। उसके बाद अखबार निकालना संभव नहीं हो सका। अब यह अखबार बंद है।

छमुमो स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती मनाता है, लेकिन मई दिवस क्यों नहीं मनाता?
घोषाल- इस सवाल का जवाब आप छमुमो के अध्यक्ष से पूछेंगे तो सटीक होगा। 

16 अक्टूबर 1988 को नियोगी से पत्रकार सुनील कुमार ने साक्षात्कार लिया था। जिसमें उन्होंने नियोगी से कम्युनिस्ट पार्टी के संबंध में सवाल उठाया था। जिस पर नियोगी ने दो टूक जवाब दिया था कि वे माक्र्स को मानते हैं गांधी व सर्वोदय पढ़ते हैं, जेपी से प्रभावित थे। सबको मिलाकर नई विचारधारा के साथ वे काम करते थे? क्या आप बता सकते हैं। वह नई विचारधारा क्या थी। जिस पर चलकर वे छत्तीसगढ़ व देश को नई दिशा देना चाहते थे?
घोषाल- उनकी वह नई विचारधारा क्या थी? जैसे कि कहते हैं नियोगी व्यक्ति नहीं एक धारा थे एक धारा हैं? ऐसे विचारों पर मुझे व आपको छमुमो के नेताओं से पूछना होगा। वहां कोई जवाब मिल जाए। हां मेरा जहां तक ज्ञान है, नियोगी मूलरूप से माक्र्सवाद व लेनिनवादी थे। जिस पर निर्भर होकर वे समाज का परिवर्तन करना चाहते थे। मेरा यह भी कथन है कि छमुमो कोई राजनैतिक संगठन नहीं है। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से समाज बदलता। यह आज साफ हो गया है। जब तक भारत शोषणविहीन देश अथवा छत्तीसगढ़ शोषण से मुक्त ना हो जाए यह असंभव है।

सारे प्रजातांत्रिक आंदोलनों में हमने देखा है कि आम लोगों की मांगे नहीं मानी जाती हैं। जैसे ईराक में अमेरिका का विरोध, मणिपुर में ईरोम शर्मिला का भूख हड़ताल, असम में आदिवासियों की मांग व भिलाई व इसके आसपास आप लोगों की लड़ाई? फिर सवाल यह उठता है कि जुझारू आंदोलन का स्वरूप कैसे तय करें?
घोषाल- जहां तक प्रजातांत्रिक आंदोलनों का सवाल है। नेतृत्वकारी लोगों में संगठन को मजबूत व क्रियाशील बनाए रखने में संगठन को मजबूत व क्रियाशील बनाए रखने में चेतना का अभाव है। नए-नए आर्थिक, औद्योगिक, कृषि व अन्य नीतियों के कारण लोगों में विरोध का स्वर उठ रहा है। जिसे सरकार अपने एजेंटों के माध्यम से कुचल देती है। यदि इससे भी हल नहीं निकलता तो काले कानूनों का डंडा दिखाकर आंदोलनों को कुचला जा रहा है। नेताओं को गिरफ्तार कर मौत के घाट उतार दिया जा रहा है। इससे लोग भयभीत हैं। संघर्षशील लोगों का अंग्रेजों के रोलैक्ट एक्ट के बाद जन सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों का डर व्याप्त है। साथ ही साथ बेरोजगारी भी एक मुख्य कारण है। जब बेरोजगार हक व अधिकार के लिए संघर्ष करता है, तो उसे कार्य से बाहर कर दिया जाता है। इससे उनका पूरा परिवार प्रभावित होता है। इसलिए लोग आंदोलन व दमन के बारे में सोचकर चुप रहना श्रेयष्कर समझते हैं।

भिलाई में मजदूर आंदोलन में नियोगी के हत्या के पूर्व ही शिथिलता आ गई थी। मजदूर बाहर हो गए थे? सरकार व प्रशासन चुप्पी साधे बैठी थी? प्रशासन व पुलिस दमन तेज कर दिया था? क्या ऐसी स्थिति में उस समय छमुमो की विजय संभव थी?
घोषाल- एक कार्यकर्ता के रूप में मेरा विश्लेषण यही था कि उस समय विजय संभव नहीं था। दल्ली में विजय का स्वरूप अलग था। वहां का मालिक केंंद्रीय सरकार थी। जहां किसी प्रकार के मांग की पूर्ति सरकार के मातहत संभव था। प्रबंधक को लेना-देना नहीं था। जबकि भिलाई में सारे उद्योग निजी उद्योगपतियों के थे। छमुमो के पूर्व से ही इन उद्योगपतियों की तानाशाही जगजाहिर था। आंदोलन में टुकड़ों में हमले होते थे। कभी केडिया के गुंडे हमला करते थे, तो कभी सिम्पलेक्स के। हमें गांवों व शहरों को जोडक़र सभी वर्गो की भागीदारी तय करनी चाहिए थी। जो संभव नहीं हुआ। नए तरीकों का इजाद करना जरूरी था, जो हम नहीं कर सके। इन सभी कारणों से आंदोलन सुस्त होता गया।

आज भी मजदूर कार्य से बाहर हैं? आप जैसे कई नेताओं की स्थिति यह है कि वे कोर्ट-कचहरी में दौड़-भाग कर रहे हैं? इन सब स्थिति में आप संभावनाओं की तलाश कैसे करते हैं?
घोषाल- मौजूदा समय में छमुमो की तौर-तरीके व सरकार की मजदूर व किसान विरोधी नीतियों को ध्यान में रखकर यदि मनन करेंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि मजदूरों व किसानों की समस्याओं का हल असंभव है। आज अदालत से न्याय मिल पाना असंभव है।

यदि नियोगी जीवित रहते तो भिलाई आंदोलन का स्वरूप क्या होता? परिणाम क्या होता?
घोषाल- मुझे लगता है आपका यह सवाल नाजायज है? नियोगी कोई पहाड़ नहीं थे। वे अकेले कुछ भी नहीं कर सकते थे, जब तक संघर्षशील शक्तिशाली जनता तैयार न हो, उनमें नेतृत्व व जीत की जज्बा न हो यह सवाल तौर-तरीके व वस्तुगत परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नई तरीकों का उपयोग करने से है, बिना इसके आंदोलन की रूपरेखा व उसकी गंभीरता को तेज नहीं किया जा सकता है, जो आगे चलकर सफलता की ओर बढ़ेगी। जहां तक दल्ली व भिलाई में आंदोलन का सवाल है दोनों ही जगहों में भौगोलिक स्तर पर संघर्ष में विरोधी तत्वों की प्रकृति व कार्यनीतियों में रचनात्मक प्रयोग आवश्यक था।

वैश्वीकरण, निजीकरण व उदारीकरण के इस दौर में मजदूर आंदोलन की भूमिका को कैसे तय करेंगे?
घोषाल- आज पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद का दबदबा कायम है। विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवाद की नीतियां। हमारे देश में उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण उन्हीं नीतियों का एक रूप है। जिससे पूरी व्यवस्था का संचालन होता है। इन सब के खिलाफ मजदूर वर्ग ही नेतृत्व का संचालन करेगा, लेकिन यह एक बहुत ही छोटा तबका है। उसे अपने वर्गीय चरित्र व दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर विभिन्न अन्य वर्गो को भी इस संघर्ष में शामिल करना होगा। जो शोषण में जकड़ा है और मुक्ति चाहता है। इस वर्ग में व्यापक मध्यम वर्ग, बुद्धिजीवियों, किसानों, आदिवासियों, महिलाओं व दलित वर्ग को एकजुट कर अपने विरोधी के नीतियों के फायदे व नुकसान को स्पष्ट कर व्यापक आंदोलन की रूपरेखा तैयार करनी होगी। मत लड़ाई साम्राज्यवादी ताकतों उनके गुर्गो के खिलाफ होगा। साथी ही विश्व साम्राज्यवाद के खिलाफ भी हमें सतत् संघर्ष करना होगा।

नियोगी कहते थे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ेंगे? जुझारू आंदोलन करेंगे? जिससे सामाजिक परिवर्तन आएगा। सडक़ें व रेल लाइनें रोकेंगे, काम रोक देंगे? और पुलिस बैरकों में चले जाएंगे? इन सभी लड़ाइयों से उभरकर हम सच्चे लोकतंत्र को कैसे प्राप्त करेंगे?
घोषाल- मेरी नजर में वर्ग विभाजित समाज में लोकतंत्र दो प्रकार की होती है। पहला-पूंजीवादी व दूसरा समाजवादी। सही मायने में भारत में पूंजीवादी लोकतंत्र चल रहा है। दूसरे अर्थो में पूर्ण पूंजीवादी भी नहीं? क्योंकि शासक वर्ग पूर्णरूप से पूंजीपतियों द्वारा शासित नहीं हो रही है। बल्कि वह दलाल पूंजीपतियों के साथ सामंती प्रभुओं के प्रतिनिधियों के कठपुतली है। दोनों ही शक्तियों के पीछे साम्राज्यवादी नीति-निर्देशों का वर्चस्व कायम है। इसलिए मैं भारत को स्वतंत्र पूंजीवादी देश भी नहीं कह सकता हूं। इसलिए यह लोकतंत्र भी पूंजीवादी लोकतंत्र भी नहीं है। इसका वास्तविक लक्षण प्रत्येक चुनाव में पार्टी तथा प्रत्याशियों द्वारा लालच, धन व डर के माध्यम से वोट हासिल करना है और विरोधी तत्वों की सत्ता में काबिज होना उदाहरण है। यही लोकतंत्र का स्वरूप है। जिसने मुखौटे के रूप में लोकतंत्र को ओढ़ रखा है। मैं जिस लोकतंत्र की वकालत करता हूं वह समाजवादी लोकतंत्र से है, जिसे संविधान में भी न्यायसंगत ढंग से जोड़ा गया है। जो भारत में मौजूद ही नहीं है, मात्र संविधान में मौजूद है।

विस्थापन, सेज व किसानों की आत्महत्या के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?
घोषाल- विस्थापन किन कारणों से हो रहा है हमें गौर करना होगा। इसके पृष्टभूमि में जाकर फायदों-नुकसानों का जायजा लेना होगा। तभी हम सही कारणों तक पहुंच सकेंगे। मुख्य रूप से विस्थापन के पीछे विशेष आर्थिक क्षेत्र मुख्य कारण है। किसानों की उपजाऊ जमीन को हड़पकर उसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों व देशी दलालों के बीच बांटा जा रहा है। जिसे व्यापक पैमाने पर किसान व आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं। पूंजीपतियों के स्वार्थो को ध्यान में रखकर बड़े-बड़े फैक्टरियों व शापिंग मालों की खेती हो रही है। कहीं बांध के नाम पर विस्थापन, तो कहीं खनिज उत्खनन के कारण, लेकिन मेहनतकश जनता की स्वार्थो को बलि देकर सेज के तहत छोटे-छोटे विदेशी धनी देशों को साम्राज्य सौंपा जा रहा है। यानी हमारी जमीन पर हम फिर गुलाम हो रहे हैं। बहुराष्ट्रीय व देशी दलालों के गुलाम हो जाएंगे। फिर बीज वे तय करेंगे, खाद वे देंगे फिर फसल भी वहीं लेंगे। हम कर्जों के बोझ तले दबकर मात्र आत्महत्या के आंकड़ों में इजाफा करेंगे। यह वास्तव मेंं पूंजीपतियों व साम्राज्यवादियों के इशारे पर तयशुदा नीति है। फायदा उनका नुकसान हमारा। यह सब हमारे राजनैतिक कारिंदों की जनविरोधी नीतियों का परिणाम है।

वर्तमान समय में ट्रेड यूनियन आंदोलन की चुनौतियों के संबंध में आपके क्या विचार हैं?
घोषाल- मजदूर आंदोलन में जहां तक चुनौतियों का सवाल है। हमें आर्थिक आंदोलन के साथ सभी परिस्थितियों में व्यवस्था के परिवर्तन के सवाल को प्रधानता देनी होगी। हमने दत्ता सामंत का आंदोलन देखा है। ललित माकन का आंदोलन देखा है और अब नियोगी के आंदोलन के परिणाम सामने हैं। एक मूलमंत्र हमें गांठ बांध लेनी होगी ‘पीडि़त वर्ग की मुक्ति मजदूरों के हाथों’ तब हम आने वाले चुनौतियों का सामना कर सकेंगे।

श्रम कानूनों में हाल में किए गए परिवर्तनों व तालाबंदी को आप किस रूप में देखते हैं?
घोषाल- इन नीतियों के माध्यम से सरकार अपनी असली स्वरूप को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रही है। श्रम कानूनों में परिवर्तन, तालाबंदी व हायर एंड फायर नीतियों को लाकर वे साम्राज्यवादी मंसूबों का पक्ष पोषण कर रही है। देश नवउपनिवेश के रूप में अपने आप को बदल रहा है। वे संविधान को धार्मिक ग्रंथ बना दिया है। जिसे हाथ में रखकर देश के साथ वे गद्दारी की कहानी गढ़ रहे हैं।

ज्योति बसु कह रहे हैं पूंजीवाद आज जरूरी है। मतलब माक्र्सवाद व्यर्थ हो चुका है। आपकी धारणा क्या है?
घोषाल- भारत सहित पूरे देश में लाल झंडा व माक्र्सवाद को कलंकित किया जा रहा है। उन्हें माक्र्सवाद के वैज्ञानिक स्वरूप से डर है। ज्योति बसु के साथ चीन व अन्य देश जो समाजवाद के पैरोकार थे वे पूंजीवादी सोच व पूंजीवादी व्यवस्था के लिए संक्रमण में अग्रसर हैं। वे निजी कंपनी का पक्षपोषण कर रहे हैं। एक दमनकारी राज्य को गढ़ रहे हैं। उन्हें विज्ञान को झूठलाने का कोई हक नहीं है। क्या ज्योति बसु या फिर खुश्चेव के कहने से सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाएगा या फिर पृथ्वी सूर्य का। इस सच्चाई को नजरअंदाज करने वाले गोयबल खड़े हो रहे हैं? माक्र्सवाद कोई कपोल कल्पना नहीं यह वास्तविकता है। जो समय के साथ अपने स्वरूप में उभरकर आएगी। यह विज्ञान आधारित सिद्धांत है। मानव के विकास के सिद्धांत को जिस प्रकार नकारा नहीं जा सकता, उसी प्रकार समाज के विकास के सिद्धांत में माक्र्सवाद अजेय अमर है। 

सारे खनिज सम्पदा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में हैं। उसकी लूट, गरीबी, भूखमरी के खिलाफ उठ रहे आवाजों पर अंकुश लगाने सरकार विशेष जनसुरक्षा कानून का उपयोग कर रही है? बिनायक सेन, सुरजू टेकाम जेलों में बंद हैं तो इस कानून की प्रासंगिकता आज कहां तक है?
घोषाल- देखिए भगत सिंह, सुखदेव व आजाद आदि क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश सरकार ने आतंकवादी व देशद्रोही का आरोप लगाकर काले कानूनों में जकडक़र फांसी दे दिया था। आज हमें पता चलता है। वे देशभक्त थे। उस समय देश को अंग्रजी साम्राज्यवाद से मुक्त करना था। आज जो लोग साम्राज्यवादियों एवं पूंजीपतियों के खिलाफ लड़ रहे हैं, उन्हें रोलैक्ट एक्ट के बाद जन सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसा जा रहा है। इससे विचलित होने की जरूरत नहीं है, बल्कि सरकार के जनविरोधी नीतियों व कानूनों के खिलाफ एकजुट होने की आवश्यकता है। अब तो देशभक्तों को पाकिस्तानी व बांग्लादेशी एजेंट, आइएसआई एजेंट, नक्सलवादी, आतंकवादी जैसे नामों से गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसा जाएगा या फिर गोलियों से मार दिया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों की भाषा, अस्मिता, संस्कृति व सभ्यता की बानगी को बनाए रखने के लिए आपके विचार क्या रूप लेते हैं?
घोषाल-  सरकार को चाहिए कि वे आदिवासी संस्कृति व परंपरा के लिए उचित कदम उठाए। कानूनों के तहत उसका पालन करें। अंतत: उनके संघर्षों की व्यापक समाजवादी संघर्षों के रूप में चिन्हित करके ही हम उनके हक व अधिकारों की रक्षा कर सकेंगे।

भारत में राष्ट्रीयता का सवाल एक अहम मुद्दा है। क्या झारखंड, छत्तीसगढ़ या तेलंगाना को उनके संघर्षो को सही अर्थो में राष्ट्रीयता के साथ जोडक़र देख सकते हैं?
घोषाल- राष्ट्रीयता का सवाल वहां निवास कर रहे लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकारों से सरोकार रखता है। इसके पीछे भी वर्गीय सोच ही प्रमुख होती है। साथ ही व्यवस्था किस वर्ग के हाथ है। यदि छत्तीसगढ़ पूंजीपतियों की बपौति है तब तो यह व्यर्थ की राष्ट्रीयता व मुक्ति हुई। संस्कृति, भाषा के साथ मजदूर वर्ग का शोषण न हो। 80 प्रतिशत अबादी को उसका फायदा मिले। वे ही इसके कर्णधार हो, तब राष्ट्रीयता का महत्व है। छत्तीसगढ़ को ही लीजिए खुद छत्तीसगढ़ी ही छत्तीसगढ़ का शोषण कर रहे हैं। पूंजीपतियों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तिजोरी भर रहे हैं। फिर ऐसे अलग राज्य का क्या महत्व है। यह तो शोषण का कारखाना बन गया है।

अंत में भविष्य के संबंध में आपकी क्या सोच है?
घोषाल-  भविष्य उज्जवल है। भविष्य के संबंध में दुनिया का इतिहास हमें मार्गदर्शन करता है। निश्चित तौर पर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ चारों ओर व्यापक मजदूर, किसान, बुद्धिजीवियों, महिलाओं व दलितों के आंदोलन संयुक्त रूप से विश्वयुद्ध की स्थिति तैयार कर रही है। उस वक्त पूरे देश में जनता को नेतृत्व देने के लिए माक्र्सवाद-लेनिनवाद पर आधारित एक वैज्ञानिक सोच-समझ वाली कम्युनिस्ट पार्टी की जरूरत रूप ले लगी। अंतिम रूप में जीत जनता की होगी। साम्राज्यवादी व पूंजीवादी ताकतों की शिकस्त होगी। यही सर्वमान्य सच्चाई है। जिस पर मेरा अटल विश्वास है।


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