दिल्ली के सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
तेजराम विद्रोहीयह झूठ है क्योंकि आंदोलन में शामिल हरिंदर कौर बिन्दु, रणजीत कौर, किरणदीप कौर, अनिता मान, डॉ ऋतु सिंह, मेहरून निशां, देवेंदर कौर जैसी महिलाओं ने बताया कि इस आंदोलन में हम अपनी मर्जी से शामिल हुए हैं। इस किसान आंदोलन के साथ जुडक़र कंधे से कंधा मिलाकर लडऩे की जरूरत इसलिए है क्योंकि केवल यह कानून खेती को नष्ट नहीं करेगा बल्कि इससे जुड़ा हुआ हर वर्ग, उपभोक्ता को प्रभावित करेगा व व्यवसाय को नष्ट करेगा आगामी खाद्यान्न संकट से बचने के लिए तमाम लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस आंदोलन में शामिल हो।

केन्द्र सरकार द्वारा पारित कॉरपोरेट हितैषी तथा किसान, कृषि और आम उपभोक्ता विरोधी कानून के खिलाफ किसानों का आंदोलन विभिन्न राज्यों से देश की राजधानी दिल्ली को जोडऩे वाली राष्ट्रीय राजमार्गों की सीमाओं जैसे सिंघु-कुंडली, टीकरी, गाजीपुर, शाहजहांपुर, पलवल में जारी है। 26 जनवरी को किसान ट्रैक्टर परेड के दौरान भाजपा- आरएसएस के लोगों द्वारा किये गए कृत्य और सरकार पोषित मीडिया के दुष्प्रचारों से ऐसा लग रहा था कि आंदोलन अब कमजोर हो गया है लेकिन आंदोलन बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से आज भी मजबूती से जारी है।
दिल्ली सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन भाग - 1 में किसान आंदोलन की संक्षिप्त समीक्षा किया गया था और लिखा था कि आंदोलन के कई पहलू है जिसको समझना बहुत ही जरूरी है। तो आज हम जारी ऐतिहासिक किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को जानने का प्रयास करेंगे।
आदिकाल की परिस्थितियों को देखते हैं तो हम पाते हैं कि कृषि की विकास में मुख्य रूप से महिलाओं का ही योगदान है। चाहे वह पशुपालन हो या खेत में अनाज उत्पादन और उसके लिए बीज का संग्रहण हो सभी में महिलाओं की योगदान को ही याद किया जाता है। यहां तक कि नेशनल कॉउन्सिल ऑफ एम्प्लॉयड इकॉनामी रिसर्च के मुताबिक वर्ष 2018 में देश के कृषि क्षेत्र के कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत है।
ये आंकड़े बताते हैं कि कृषि आज भी महिलाओं पर कितनी निर्भर है जबकि महिलाओं को जमीन की मालिकाना 2 प्रतिशत है। आदिकाल में कृषि के विकास में महिलाओं की योगदान को याद करते हुए आज जारी ऐतिहासिक किसान आंदोलन में दिल्ली के एक एक सीमाओं पर हजारों महिलाओं की उपस्थिति यह बताती है कि समाज के विकास के लिए जारी हर संघर्ष में महिलाओं की उपस्थिति के बिना जीत संभव नहीं है। ऐसा नही है कि जैसा हमेशा शासकवर्ग यह दिखाने का कोशिश करते हैं कि पुरुष अपने आंदोलनों में महिलाओं को इसलिए शामिल करते हैं ताकि पुलिस की कार्यवाही से बचने के लिए सुरक्षा उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
यह झूठ है क्योंकि आंदोलन में शामिल हरिंदर कौर बिन्दु, रणजीत कौर, किरणदीप कौर, अनिता मान, डॉ ऋतु सिंह, मेहरून निशां, देवेंदर कौर जैसी महिलाओं ने बताया कि इस आंदोलन में हम अपनी मर्जी से शामिल हुए हैं। इस किसान आंदोलन के साथ जुडक़र कंधे से कंधा मिलाकर लडऩे की जरूरत इसलिए है क्योंकि केवल यह कानून खेती को नष्ट नहीं करेगा बल्कि इससे जुड़ा हुआ हर वर्ग, उपभोक्ता को प्रभावित करेगा व व्यवसाय को नष्ट करेगा आगामी खाद्यान्न संकट से बचने के लिए तमाम लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस आंदोलन में शामिल हो।
महिलाओं ने किसानों के ट्रैक्टर परेड से पहले सुप्रीम कोर्ट के उस संबोधन का आलोचना किया जिसमें उन्होंने कहा था कि आंदोलन से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को चले जाना चाहिए। महिलाओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की बातों से मानना पड़ेगा कि आज भी पुराने और नये विचारों के बीच टकराव जारी है। आज भी धर्म,जाति, परिवार और यहाँ तक कि कोर्ट में भी मर्दवादी सोच हावी है लेकिन महिलाएं इन परिस्थितियों को बदलना चाहती है। भारतीय संविधान के मुताबिक महिलाओं को भी बराबर की कानूनी हक हासिल है। संविधान के मुताबिक औरतें कोई दोयम दर्जे की नागरिक नहीं है तो क्यों महिलाओं को आंदोलन से चले जाना चाहिए।
रही बात पुलिस दमन की तो मजदूरों के लिए काम करने वाली नवदीप कौर, पर्यावरण कार्यकर्ता कम उम्र की लडक़ी दिशा रवि के ऊपर दमन करने से उनको गिरफ्तार करने से पुलिस नहीं कतराई की ये महिलाएं हैं। बल्कि कॉरपोरेट हितैषी सरकार के लिए सभी प्रकार की दमन करने के लिए तैयार हो गए और तो और भाजपा-आरएसएस के गुंडों ने जब स्थानीय के नाम पर सिंघु बार्डर पर आंदोलनकारी किसानों के ऊपर पथराव किया जिसमें रणजीत कौर सहित महिलाएं व पुरुष किसान चोटिल हुए तब भी पुलिस मूकदर्शक बनी रही दो घंटे बाद वे हरकत में आये और माहौल को शांत कराया।
किसान आंदोलनों में भागीदारी महिलाओं की इस बात का पुष्टि कराती है कि वो कृषि क्षेत्रों में अपने अदृश्य योगदान से पर्दा उठाकर देश को यह एहसास कराए कि खेती बाड़ी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण है। विरोध प्रदर्शन के जरिए महिलाएं किसान कानून पर अपनी राय का भी इजहार कर रही है जो उनके हिसाब से महिला विरोधी है। 18 जनवरी 2021 को दिल्ली सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन के मंचों पर मनायी गई ‘महिला किसान दिवस’ के अवसर पर लाखों महिलाओं की उपस्थिति ने इसे स्थापित किया। यह आयोजन न केवल दिल्ली सीमाओं पर आयोजित किया गया बल्कि देश के कई हिस्सों में किए गए आयोजन में लाखों लाख महिलाएं सम्मिलित हुए।
दिसंबर 2012 में निर्भया मामले के बाद इंडिया गेट पर अपने हौसले और दृढ़ता से महिलाओं ने सरकार को यौन हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाने के लिए बाध्य किया। मार्च 2018 में नासिक से मुंबई तक किसानों ने एक लंबी रैली निकाली जिसमे महिलाओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया जिसमें बुजुर्ग महिला के पांव में छाले ने सारे संवेदनशील लोगों को द्रवित किया। नवम्बर 2018 में कर्ज माफी की मांग को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों से किसान महिलाएं विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुंची थी।
ठेकेदारों द्वारा बड़े पैमाने पर पेड़ो की कटाई के विरोध में 1973 में उत्तर प्रदेश के चमोली जिले जो आज उत्तराखंड में है वहां पेड़ों की रक्षा के लिए हुए ‘चिपको आंदोलन’ में महिलाओं ने बढ़ चढक़र हिस्सा लिया। जिसका नारा था ‘क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार - मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार’। चिपको आंदोलन के बाद सरकार को 1980 में वन संरक्षण अधिनियम पारित कर कानून बनाना पड़ा और पर्यावरण मंत्रालय का गठन हुआ। हालांकि वर्तमान में उक्त कानून का कॉरपोरेट घरानों के हित में धज्जियां उड़ाई जा रही है जिसका दुष्परिणाम हाल में चमोली में हुए भूस्खलन की घटना ने दिखाया है।
आज जारी किसान आंदोलन का ध्येय वाक्य है ‘किसान नहीं तो भोजन नहीं - भोजन नहीं तो जीवन नहीं।’ सुप्रीम कोर्ट के संबोधन और भाजपा- आरएसएस के गुंडों द्वारा किये गए हमलों के खिलाफ मुकाबला करते हुए महिलाएं किसान आंदोलन के साथ कदम दर कदम एकजुट होते जा रही है।
किसान आंदोलन भाग -2
लेखक अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के सचिव हैं।
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