निष्काम कर्मयोग की साधिका ममतामयी मिनीमाता
डॉ. दादूलाल जोशीतथाकथित सभ्रान्तजनों के द्वारा सतनामी समाज के नारियों के बारे में बलात स्थापित और प्रचारित प्रसारित झूठे तथा मनगढंत मनोविज्ञान को मिनीमाता ने अपने महान व्यक्तित्व और कृतित्व के माध्यम से ध्वस्त कर दिया। उसे असत्य साबित कर दिया। माता नारी जागरण की साक्षात् प्रेरक शक्ति स्वरूपा थी।
ममतामयी मिनीमाता की याद आते ही एक ऐसा नारी व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है, जिसकी मिशाल न केवल छत्तीसगढ़ में अपितु पूरे भारतवर्ष में अत्यंत दुर्लभ है। उन्होंने एक बेटी, माँ, बहिन, पत्नि, समाज सेविका, गुरुमाता और एक राजनीतिज्ञा के रूप में श्रेष्ठ आदर्शों को स्थापित करती हुई न केवल अपने जीवन को भरपूर जिया बल्कि नारी जीवन को सार्थक और प्रेरणाप्रद बनाया।
जिस तरह उनके पूरे जीवन की गाथा विलक्षणताओं से परिपूर्ण रही, उसी तरह उनका देहावसान भी आश्चर्यजनक ढंग से वीरोचित हुआ। अपने दृढ चरित्र, श्रेष्ठ चिंतन और ऐतिहासिक जनहितकारी कार्यों के माध्यम से उन्होंने जमाने को दिखा दिया कि छत्तीसगढ़ की नारी अपने संपूर्ण दायित्वों और कर्तव्यों के निर्वहन में किसी से भी पीछे नहीं है।
ममतामयी मिनीमाता का बचपन आसाम की सुरम्य वादियों में बीता था गृहस्थ जीवन सतनाम धर्म के गुरू अगमदास की जीवन संगिनी के रूप में प्राप्त हुआ था। असमय वैधव्य की पीड़ा को झेलती हुई माता कभी भी किंचित विचलित नहीं हुई। वे इस सच्चाई को कभी भी नहीं भूली कि वे भारतवर्ष में निवासरत साठ लाख सतनामियों की गुरुमाता है। उन्होंने सतनाम धर्म के साथ-साथ दायित्वों और जिम्मेदारियों को अपने जीवन में सर्वोपरि रखा। लौकिक जगत में नित सक्रियता और संलग्नता के बावजूद उनका चिंतन का धरातल अलौकिक था। गुरू अगमदास जी के सतलोकवासी होने के बाद माता जी ने
सदकृत्यों के मूल अभिप्रेत को विशिष्ट नजरिये से जानना-समझना। अत्यंत आवश्यक है क्योंकि उन्होंने अन्ततः निष्काम कर्मयोग की पद्धति को अगीकार कर लिया था। लेकिन यह ध्यान में रखने योग्य तथ्य है कि उनके मन में निष्काम कर्मयोग की साधना का भाव महज दुखद वैधव्य के कारण अनायास आ गया था, ऐसी बात नहीं है।
दरअसल माता के प्रेरणा स्रोत गुरुबाबा घासीदास थे। माता के समक्ष गुरुबाबा के सात उपदेश और बयालीस रावटियाँ थी जिनमें सूत्र रूप में निष्काम कर्मयोग की शिक्षा सन्निहीत है। बाबाजी के सातों उपदेश लौकिक जीवन को सफल और सार्थक बनाने का विधान है तो बयालीस राबटियाँ अलौकिक जीवन की ओर अग्रसर होने का प्रेरक दिशाबोध है। गुरु बाबा कहते हैं इस तरह के विचार और संदेश निष्काम कर्मयोगी ही दे सकता है।
पौराणिक मान्यताओं से मिलते जुलते विचार गुरू बाबा सीदास के भी थे। उन्होंने भी चार पुरुषार्थ के सिद्धांत को मान्यता दी है। चार पुरुषार्थ इस प्रकार हैं अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष। अर्थ, काम और धर्म का संबंध सामाजिक जीवन से है अर्थात लौकिक है। ये तीनों पुरूषार्थ मानव जीवन में आवश्यक होते हुए भी जीवन के चरम लक्ष्य नहीं है। जीवन का परम ध्येय या चरम लक्ष्य तो मोक्ष है। भारतीय दर्शन शास्त्र के अनुसार मनुष्य का शरीर प्राण, मन, बुद्धि तथा आत्मा का अधिष्ठान माना जाता है और उसके अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष चार पुरुषार्थ मूल्य माने गये हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विकास के भौतिक आध्यात्मिक साधन और उपादान है।
गुरु बाबा के विचारों में मोक्ष अर्थात मुक्ति सीमित अर्थ में नहीं है। मोक्ष पारिभाषिक शब्द है, इसके भावार्थ को विस्तृत रूप से समझाना होगा। गुरु बाबा के मोक्ष का लक्ष्यार्थ परमार्थ है जब वे कहते हैं हंसा अमरलोक जइबो तब वो केवल अपनी ही आत्मा की मुक्ति की बात नहीं करते थे, बल्कि लाखो-कराड़ों की मुक्ति की बात करते थे। यदि खुद की मुक्ति की कामना होती तो तपस्या के पश्चात् जंगल से समाज में वापस नहीं आते। वही तपस्या करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर लेते लेकिन वे मानव समाज के मध्य पधारे और अपनी मुक्ति के साथ-साथ लाखों-करोड़ों की मुक्ति का अभियान आजीवन चलाते रहे।
ममतामयी माँ मिनीमाता के मन में सबके प्रति समान मैत्री भाव था। उसके हृदय में उच्चकोटि की करुणा थी। इसीलिये वे सबकी समान रूप से सेवा और कल्याण के लिये सदैव तत्पर रहती थी।
उनकी सेवा के फल का स्वाद हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई. अमीर-गरीब, शोषित पीडित और असहाय, सभी ने समान रूप से चखा। उन्होंने किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। उनकी नजर में सभी बराबर थे। गुरुबाबा के इस रावटी के अनुरूप करिया हो कि गोरिया हो। छोटका हो कि बड़का हो, इहाँ के हो या उहाँ के हो। मनखे हा मनखे आय।
रावटी का माता अक्षरशः पालन करती थी। वस्तुतः दे त्याग, सेवा, स्नेह, ममता और नैसर्गिक न्याय की प्रतिमूर्ति थी। उनका हृदय संतत्व से ओतप्रोत था। माता जी पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन के कठोर धरातल में सदैव संघर्षशील रही किंतु उनकी आत्मा उन कर्मों में कभी भी लिप्त नहीं हुई। उन्होंने जो जन सेवा की उसके बदले में कुछ भी प्रतिदान की कामना नहीं की। आज के राजनेता जनसेवा के बदले वोट की कामना करते हैं या फिर नोट की, किंतु माता जी ने कभी वोट के लिये लोगों को आकर्षित करने का प्रयास नहीं किया।
चुनाव के दौरान माता अपनी पार्टी के अन्य प्रत्याशियों के चुनाव क्षेत्र में जाकर प्रचार करती थी अपने क्षेत्र में नहीं। कई बार उनसे कहा जाता था कि माता जी आप अपने चुनाव क्षेत्र में भी जाइये और प्रचार कीजिये आपको भी विजयी होना है। तब वे हँस कर कहती थी मैं नई जावं गा जेकर वोट देये के मर्जी होही त मोला वोट देहीं, मर्जी नई होही त मत दीही। इसके बावजूद माता जी भारी मतों से विजयी होती थी राजनीति में ऐसा उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलेगा जीत-हार के प्रति भी उनकी किसी प्रकार की आसक्ति नहीं थी।
वे लौकिक कर्म करती हुई भी कर्म के बंधन में नहीं थी। उपनिषदों में उल्लेख है कि हमें समाज सेवा के द्वारा ही कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। जब तक हम स्वार्थ को लेकर काम करते हैं, हम कर्म बंधन के नियम के अधीन रहते हैं। जब हम निष्काम कर्म करते हैं तो मोक्ष को प्राप्त करते हैं। ईशोपनिषद में भी ऐसा ही विचार है जब तक तुम इस प्रकार निष्काम कर्म करते हुए जीवन व्यतीत करते हो ऐसा कोई कारण नहीं हो सकता कि कर्म तुम्हे बंधन में डाल सके।
मिनीमाता के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व का जब सूक्ष्म अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि उनका सारा जीवन निष्काम कर्म योग पद्धति पर आधारित था। माता जी की अपनी कोई संतान नहीं थी किंतु उन्होंने गुरु विजय गुरु को एक स्व माता से भी अधि एक स्नेह व संरक्षण दिया। विना होती हुई भी उनका पुत्र प्रेम माता यशोदा समान था। माता जी के पास धन-वैभव की कमी नहीं थी। ये जिधर इशारा कर देती उधर से ही करोड़ों का उनके कदमों बिछ जाते किंतु उनके लिये धन-संपत्ति, पद मान बढ़ाई सभी थे। इसीलिये उन्होंने कभी धन एकत्रित करने का प्रयास नहीं किया। उनके मन में अपना स्वार्थ भाव नहीं था जो था वह केवल परमार्थ भाव या यह मी जगत के संपूर्ण चराचर के प्रति उनके निष्काम कर्मयोग की साधना को उनके जीवन की यह एक घटना स्वयं सिद्ध कर देती है।
नई दिल्ली स्थित उनके निवास में प्रतिदिन लोगों की भीड़ रहती थी। सबके लिये माता भोजन और शयन की समुचित व्यवस्था करती थी। एक बार की बात है। ठंड का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। उनके निवास में उस दिन लोगों की काफी भीड़ थी। रात में सबके लिये दरी, चादर कबल इत्यादि की व्यवस्था उन्होंने कर दी ताकि वे सर्दी से बच सकें और सुखपूर्वक सो सकें। सबको कपड़े दे देने के बाद माता जी के पास मात्र एक ही कंबल रह गया, जिसे उन्होंने स्वयं ओढ़ रखी थी। रात ग्यारह बज रहे थे। सभी अतिथि सो रहे थे।
अब माता भी अपने कमरे में सोने हेतु जा रही थी किंतु उनके मन में ख्यात आया कि एक बार सबको देख लिया जाये कि कोई कष्ट में तो नहीं। है। इस विचार के आते ही वे सब को घूम-घूम कर देखने लगी। तभी उनकी नजरें एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो दरवाजे के पास बिना बादर या कंबल के खुला पड़ा था और ठंड से कांप रहा था। माता जी ने अपना ओढ़ा हुआ कंबल उस व्यक्ति को ओढ़ा दिया और अपने कमरे में चली आई। उस दिन उसके पलंग का गददा भी नहीं बचा था। बिछाने और ओढने के लिये उसके पास कुछ भी नहीं था।
उन्हें ठंड का एहसास होने लगा था, इसलिये उन्होंने नौकरानी से कोक वाली सिगड़ी जलाने के लिए कहा। कुछ देर बाद नौकरानी सिगड़ी जलाकर ले आई माता जी ने उसे पलंग के नीचे रखी और दरवाजा बंद करके सो गई। रात में कमरे के भीतर सिगड़ी का पुओं भर गया। माता जी नींद में थी। वह अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठी। धुओं से उनका दम घुटने लगा था अर्ध बेहोशी की हालत में वे दरवाजे तक पहुंची। किसी तरह दरवाजा खोल पाई और तुरंत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी गिरने की आवाज सुनकर आसपास सोये हुए अतिथिजन जाग गये और उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। इस घटना से सारे राजनेता सक्ते में आ गये थे। इंदिरा गांधी स्वयम् उन्हें देखने अस्पताल गई थी।
माता से जुड़ी हुई यह एक ऐसी घटना है, जो उनके हृदय के त्याग, सेवा, करुणा और स्नेह को साकार रूप देती है। अपने सुख के साथ अपने प्राणों का भी परवाह नहीं करने वाली ममतामयी मिनीमाता जी सचमुच निष्काम कर्मयोग की अनन्य साधिका थी।
भारत के पूरे दलित समाज अपना नेता मानते थे। क्योंकि उनके द्वारा ही संसद में छुआछूत निवारण बिल पेश किया गया था, जो आगे चलकर कानून का रूप धारण किया। सौ दो सौ फालोवर्स या कार्यकर्ताओं के साथ होने पर ही लोग अकड़ने लगते हैं। पद या शक्ति प्राप्त होते ही अहंकार के वशीभूत हो जाते हैं लेकिन साठ लाख लोगों की गुरुमाता होकर भी माता जी बेहद सहज-सरल थी।
धन-वैभव के होते हुए भी साधारण सूती साड़ी ही उनकी वेशभूषा थी। इंदिरा गाँधी की अनन्य सहेली होकर भी अहंकार का नामोनिशान नहीं था। न किसी से बदला लिया, न किसी को सताया और न ही किसी का अपमान किया। उन्होंने अपने विशाल हृदयसागर से केवल स्नेह लुटाया सबके लिये। उन्नीस वर्षों के राजनीतिक जीवन में वे सदैव अविवादित रहीं। उन्होंने अपने लौकिक कर्मों में लेशमात्र भी चूक नहीं की। सतनामी समाज की तो वे सच्ची संरक्षिका थी। इस महान विभूति का देहावसान दिल्ली के निकट की पहाड़ियों में, 11 अगस्त 1972ई0 को वायुयान दुर्घटना में हुआ। अन्ततः उनकी हंसा अमरलोक चली गई, और परमपिता सतनाम में समाहीत हो गई।
'दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया की भांति उन्होंने अपने जीवन रूपी चदरिया को अंत तक स्वच्छ रखी और प्रभु को वापस लौटा दी। आज सतनामी समाज उनकी कमी को शिद्दत के साथ महसूस करता है।
उपेक्षित काल-पीड़ित सत्य के समुदाय लेकर साथ मेरे लोग असंख्य स्त्री-पुरुष बालक भटकते हैं किसी की खोज है उनको ।
माताजी का जन्म आसाम प्रांत के लौंदग्राम में साल 1913 ई. को होलिका दहन के दिन हुआ था। मिनीमाता का वास्तविक नाम मीनाक्षी देवी था। वे सातवीं कक्षा उत्तीर्ण थी तथा हिन्दी, अंग्रेजी, असमी और बंगला भाषा जानती थी। छत्तीसगढ़ का हसदो बांगो बांध उन्हीं की देन है। भिलाई में छत्तीसगढ़ श्रमिक कल्याण संघ एवं छत्तीसगढ़ कल्याण कालेज की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। किसी का काम कराने हेतु उस व्यक्ति को पीछे-पीछे आने के लिए कह कर वे संबन्धित कार्यालय में स्वयम् पहले पहुंच जाती थी। कितने ही बड़े और दमदार अधिकारी या नेता हो, माता के तर्कों के आगे नतमस्तक हो जाते थे। ऐसी थीं ममतामयी मिनीमाता ।
ममतामयी मिनीमाता आज हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनसे जुड़ी हुई, कुछ भूली-बिसरी यादें यदाकदा हमारे मनोमस्तिष्क में उभरती हैं। तब महसूस होता हैं कि उनका व्यक्तित्व कितना सहज, सरल लेकिन विराट था। उनकी वाणी मधुर और व्यवहार ममतापूर्ण व स्निग्ध होते थे। उनके सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने समझने को मिलता था।
व्यक्ति चाहे कितने ही ऊँचे पद पर पहुँच जाय, कितनी ही संपत्ति का मालिक बन जाय उसे अपना काम स्वयं करना चाहिये तथा शारीरिक श्रम से जी नहीं चुराना चाहिये। साथ ही अपने समर्थकों से तथा समाज से बहुत ज्यादा सुविधा व मान-सम्मान पाने की कामना भी नहीं करनी चाहिये।
"विदेशों में नारियाँ अपने अधिकारों के प्रति बहुत जागरुक हैं। इसका कारण यह है कि वहाँ महिलाएँ शत प्रतिशत पढ़ी-लिखी होती हैं। आप लोग भी अपनी बेटियों को खूब पढ़ाओ-लिखाओ। खासकर सतनामी समाज की प्रत्येक बालिका को अनिवार्य रूप से स्कूल भेजना होगा।"
अपनी विदेश यात्रा के संस्मरण सुनाते हुए महिला जागृति और महिला शिक्षा पर जोर दिया था। उन्होंने कहा "बालिकाओं को हर हालत में स्कूल भेजो और उन्हें भरपूर शिक्षा दिलाओ। इसी में आपका परिवार और सतनामी समाज का सही कल्याण हो सकता है। 11 अगस्त 1972 को अखबार के मुख पृष्ठ के हेडलाइन था वायुयान दुर्घटना में सांसद मिनीमाता का निधन। नीचे दुर्घटना का विस्तृत ब्यौरा दर्ज था। माता की मृत्यु पर केवल सतनामी समाज ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ शोक संतप्त हो उठा था।
माता जी के दशगात्र के दिन प्रत्येक गाँव में जहाँ सतनामी समाज के लोग निवास करते हैं, उनके द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन किया गया। परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर दशगात्र के दिन जिस तरह का क्रियाकर्म सम्पन्न किया जाता है ठीक वैसा ही क्रियाकर्म माता के दशगात्र के दिन गाँव-गाँव में सम्पन्न किया गया। उसी दिन जाना कि सतनामी समाज अपने रहनुमाओं का कितना सम्मान करता है। जो लोग सतनामी समाज के हित में निःस्वार्थ भाव से काम करते हैं, सतनामियों की एकता, समृद्धि और प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना खून पसीना बहाते हैं, सतनामियों के दुखदर्द को ईमानदारी से दूर करने का प्रयास करते हैं, उन्हें सतनामी समाज अपने हृदय में बैठा लेता है और उन्हें भरपूर आदर और सम्मान देता है। मिनीमाता के दशगात्र के दिन यह तथ्य स्पष्टतः उभर कर सामने आया।
उस दिन एक और अच्छा काम यह हुआ कि जिन लोगों को किसी कारणवश समाज से छोड़ दिया गया था अथवा बहिष्कार कर दिया गया था, उन्हें भी बिना शर्त के माता के मृत्युभोज में शामिल कर लिया गया।
इस तरह ममतामयी मिनीमाता जी अपने जीवन भर सतनामियों की एकता के लिए प्रयास करती रहीं। विभिन्न समस्याओं को हल करने में जुटी रहीं, वहीं अपने मृत्यु के बाद सतलोकवासी होकर भी सतनामी समाज को एकता के सूत्र में बांध दिया।
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12/08/2021
KUMAR LAHARE
बहुत अच्छा लेख है माता जी के व्यक्तित्व और महानता के अनुरुप इसके लिए जोशी जी आप प्रशंसा के पात्र हैं. लेकिन आपने अपने लेख मे पौराणिक व अन्य विचारधारा के शब्दावली का प्रयोग किया है जिससे मैं व्यक्तिगत रूप से निराश हुआ. वैसे आपका लेख सामान्य रुप से बहुत अच्छा है इसे पढ़ते हुए मैं अपने भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाया गला भर आया. महान कार्यों और विचारों के लिए माताजी को क्रांतिकारी सैल्यूट!! सतनाम!!

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