एक दलित कांग्रेसी कार्यकर्ता की पीड़ा
अक्सर यह देखा गया है कि दलितों तथा आदिवासियों की स्थिति अमूमन किसी भी क्षेत्र में पिछड़ों का ही होता है। राजनैतिक पार्टियों में उनकी स्थिति और भी बुरा है। भीड़ तथा लोगों को इकट्ठा करना, फूलमाला लाना, कालिन बिछाने से लेकर झंडा -डंडा और पंडाल और माईक लगाना नारेबाजी जैसे कामों से ही उन्हें संतुष्टि करनी होती है। और अगर किसी को आईना दिखा दिये तो कुटाई भी हो जाती है। और अब सोशल मीडिया में इन्हें ट्रोल करने के लिए हथियार के रूप में उपयोग में लाया जाता है।

सत्ता में आने के बाद पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं के लिए काम/टेंडर निकालती है लेकिन रोड नाली, खदान का ठेका विशेषकर रेत और मोरम खदानों जैसे बड़े कामों व ठेकों को रसूखदारों को ही बांट दिया जाता है।
मेरे परिचित में एक दलित कांग्रेस कार्यकर्ता लंबे समय से संघर्ष के बाद भी ना पार्टी के ऊंचे ओहदे में पहुंच पाया है और ना ही उसके लिये सम्मानजनक आय का रास्ता ही खोला गया है।
अपनी पीड़ा सुनाते हुवे विकास गजभिए कहते हैं कि -‘हमारे जैसे कार्यकर्ता को कौन पूछता है। हमारा हाल तो और गया गुजरा है।’
वे कहते हैं कि -‘कुछ लोग कहते है भीड़ बढ़ाने के लिए भी तो नेताओं को लोग चाहिए। हमारे जैसे कार्यकर्ताओं का उपयोग इसी तरह हो रहा है। ’
विकास आरोप लगाते हुवे कहते हैं कि -‘जो लोग घर में बैठे रहते हैं उनको बैठे ठाले पोस्ट दे दिए जाते हैं।
और तो और बीजेपी वालों को बुला - बुला के टिकट और निगम में काम दिया जाता है।
चापलूसी करने वालों का कदर किया जाता है। ऐसे चापलूस तमाम नेताओं को एक नहीं 4 -5 पोस्ट दे दिये जाते हंै।’
विकास अपनी उपेक्षा पर कहता है कि -‘माफ करना सच्चाई कड़वा होता है और दीवारों के भी कान होते हैं। नेताओं के कान भरने वाले कम नहीं हैं।’
लंबे समय से उपेक्षित विकास कहता है कि -‘झूठा शान दिखाने वाले को ही सम्मान मिलता है। सच्चे सिपाही को एक ‘श्रीफल’ तक से भी नहीं सम्मानित करते हैं।’
विकास आगे कहते हैं कि-‘कुछ बोलूँ तो लोग बोलते है कि बहुत बोलता है और जब नि:स्वार्थ काम करते हैं तो न तो अखबारों में नाम आता है और न ही किसी के जुबान में?’
वह यहीं चुप नहीं रहता हैं एक प्रसिद्ध मुहावरा का उपयोग करते हुवे कहते हैं कि ‘यह उक्ति कुछ ज्यादा ही फिट लगती है- जब रास्ते में कांटे ही कांटे हो तो समझदार आदमी को अपने रास्ते बदल लेना चाहिए?’
इन सबको के बावजूद वह हार नहीं माना है कहते हैं कि-‘पर हम तो ठहरे सच्चे सिपाही कांटे के डर से रास्ते बदलते नहीं है, हिम्मत और लगन से काम करते चले जाते हैं।’
बहरहाल विकास से बातचीत से यह तो स्पष्ट हो ही गई है वह पार्टी संगठन में दलित समाज से प्रतिनिधित्व करता है और उसके साथ दलित की हैसियत से ट्रीट किया जाता है।
कई दभा देखा है कि वह लगातार पार्टी गतिविधियों में उसकी उल्लेखनीय भूमिका रही है लेकिन संगठन में उच्च पद तो दूर सत्ता में रहने के बावजूद उसे जीवकोपार्जन तक के लिये कठोर संघर्ष करना पड़ता है।
हाल ही में कोरोना के दौरान उनकी पत्नी का देहांत हो गया है अपने दो बच्चों के साथ उनका पालन-पोषण से लेकर पार्टी गतिविधियों में उनकी भूमिका जगजाहिर है।
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