क्या आप जानते हैं शिवनाथ नदी को बेचा गया था
उत्तम कुमारदेश में पहली बार साल 1998 में मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने राजनांदगांव के एक व्यापारी कैलाश सोनी को सदावीरा शिवनाथ नदी का पानी बेचने की अनुमति दी थी। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद जब राज्य की सत्ता अजीत जोगी के हाथों में आई तो उन्होंने भी वही किया जो पूर्ववर्ती सरकारें कर रही थी। निजीकरण, उदारीकरण और जगतीकरण के पक्ष में उनकी खुली सहमति से राज्य के नदियों की पानी को बेचे जाने की प्रक्रिया भी जारी रही।

जोगी के सत्ता से हटने के बाद रमन सरकार ने भी निजीकरण को बढ़ावा देने का खेल जारी रखा। छत्तीसगढ़ की रोगदा बांध, महानदी और हसदेव नदी के पानी को निजी कंपनियों के हाथों सौंपने का फैसला किया है। दुर्ग जिले की शिवनाथ नदी का पानी भी बोरई में स्थापित एक उद्योग के लिए ( BOOT) बूट यानी बिल्ड ऑरटेट-ऑन-ट्रांसफर पद्धति पर कैलाश सोनी नाम के व्यापारी को बेचा गया था।
मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने साल 1998 में कैलाश सोनी की कंपनी रेडियस वाटर को शिवनाथ नदी पर एक स्टापडेम बनाने की अनुमति दी थी।
वैसे मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम भी नदी पर एनीकट का निर्माण कर सकता था, लेकिन निगम ने धन की कमी का बहाना बनाकर जिस व्यापारी को एनीकट बनाने का जिम्मा सौंपा था, उसने एनीकट बन जाने के बाद गांववालों के मछली मारने और नदी के पानी के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था।
भ्रष्ट अधिकारियों ने शासन को अंधेरे में रखकर अनुबंधित कंपनी को उद्योगों को पानी आपूर्ति के लिए पांच करोड़ रुपए की लागत से निर्मित इटैंक वैल, ओण्हर हैड रैकं और बिछी पाइलाइन सहित 176 एकड़ जमीन, करीब दस करोड़ रुपए की परिसम्पतियां सिर्फ एक रूपए वार्षिक लीज पर 20 साल के लिए दे दी गई थी।
भ्रष्ट्राचारियों से फर्जी अनुबंध के आधार पर रेडियस वाटर लिमिटेड़ ने नदी के तटवर्ती गांववालों की करीब 42 हेक्टेयर ज़मीन पर कब्जा भी कर लिया और पानी पर नैसर्गिक अधिकार को उलतकर मछली मारने पर पूरी तरह रोक लगा दी तथा किसानों के नैसर्गिक अधिकार पर आक्रमण करते हुए पानी लेने और मत्स्याखेट पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।
मीडिया में जब यह मामला उछला तब छत्तीसगढ़ विधानसभा की लोक लेखा समिति ने संज्ञान लेते हुए इस मामले की जांच पड़ताल का फैसला किया। 9 फरवरी 2003 को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने इस मामले में जांच की अनुमति दी और कांग्रेस विधायक रविंद्र चौबे सभापति नियुक्त हुए।
वहीं इस समिति में विधायक विजय अग्रवाल, संजय ढ़ीड़ी, सिद्धनाथ पैंकरा, इंदर चोपड़ा, लाल महेन्द्र सिंह टेकाम, डॉ. शक्राजीत नायक, गणेश शंकर बाजपेयी, भूपेश बघेल व विधानसभा सचिवालय के चार सदस्यों के साथ प्राक्कलन समिति के सभापति कमलभान सिहं को रखते हुए विस्तृत जांच की गई।
विधानसभा लोक लेखा समिति के 64वां प्रतिवेदन जो 16 मार्च 1997 को विधानसभा में प्रस्तुत किया, में खुलासा हुआ कि देश में पहली बार जहां अधिकारियों ने भ्रष्टाचार की सीमा लांघते हुए छत्तीसगढ़ की एक बड़ी नदी को नियम खिलाफ बेच दिया गया था। आश्चर्य की बात यह कि यह कारनामा मध्यप्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम रायपुर (एकेबीएन) ने कर दिखाया था।
जल संसाधन विभाग से बिना अनुमति लिए एकेबीएन ने औद्यागिक केंद्र बोरई जिला दुर्ग के उद्योगों को पानी अपूर्ति के लिए एनीकट निर्माण की जरूरत बताते हुए 23 मई 1990 को टेण्डर का प्रकाशन किया, जिसमें बूट आधारित एनीकेट निर्माण हेतु निविदांए आमंत्रित की गई थी।
इस टेंडर के साथ ही भ्रष्टाचार का खेल शूरू हो गया था। लोकलेखा समिति 2006-2007 की, जिसमें औद्यौगिक विकास केंद्र बोरई को जल प्रदाय परियोजना को बूट आधार पर निजी क्षेत्र में सौपें जाने के प्रकरण में पूर्णतः दोषी पाया गया था।
जांच रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब दुर्ग जिले में स्थापित उद्योग मेसर्स एचईजी लिमिटेड द्वारा सन 1996 को एकेबीएन से 25 लाख लीटर पानी प्रतिदिन प्रदान करने की मांग की गई तब निगम ने बताया कि निगम कंपनी को चाही गई मात्रा में पानी की आपूर्ति कर सकती है लेकिन गर्मी के मौसम में मुश्किल आएगी।
इस पानी आपूर्ति के लिए पर्याप्त पानी का भंडारण करना होगा और इसके लिए एनीकेट का निर्माण करना होगा जिसमें करीब साढ़े सात करोड़ रुपए लागत आयेगी। इस पर एचईजी ने निगम को बोरई में संयुक्त उपक्रम में एनीकट निर्माण का प्रस्ताव दिया और राशि निवेश की सहमति भी दी।
एचईजी की मांग आपूर्ति के लिए पांच करोड़ रुपए की लागत से उद्योगों को जल आपूर्ति हेतु राज्य शासन के चार करोड़ 39 लाख रूपए के अनुदान से इंटेकवेल, ओवर हेड़ टैंक और पाइप लाइन सहित आवश्यक अधोसंरचना विकसित किया जा सकता था।
उद्योगों को 3.6 एमएलडी पानी सामान्य मौसम में और 2.5 एमएलडी लीज पीरियड़ में आपूर्ति किया जा रहा था। बाद में इसी अधोसंरचना को एकेबीएन को मात्र एक रूपए लीज पर रेडियस वाटर को नियम विरूद्ध दे दिया जबकि इसके लिए शासन से अनुमति ली जानी चाहिए थी।
एचईजी लिमिटेड की जरूरत और सक्रियता को देखते हुए एकेबीएन के अधिकारियों को इसमें भ्रष्टाचार का खेल समझ में आ गया और भ्रष्टाचार के इस खेल में वे भी शामिल हो गये।
उन्होंने बूट के लिए निविदा आमंत्रित की उसमें भी एचईजी को शतिराना तरीके से बाहर कर कैलाश इंजीनियरिगं कार्पोरेशन लि. राजनांदगांव की निविदा स्वीकृत की गई लेकिन 24 घंटे के भीतर ही निविदाकार कंपनी के स्थान पर एक पृथक कंपनी रेडियस वाटर लि. अस्तित्व में आ गई।
लोक सेवा समिति ने इसे अत्यंत आपत्तिजनक मानते हुए प्रक्रियाओं के विपरीत अवांछित लाभ पहुंचाने वाला आपराधिक कृत्य माना है। कैलाश इंजीनियरिगं कार्पोरेशन लिमिटेड़ ने बूट आधार पर एनीकट निर्माण के लिए स्वीकृत निविदा के अनुरूप अनुबंध करने के रेडियस वाटर से अनुबंध करने का कोई प्रस्ताव भी नहीं दिया।
अतः ऐसे में रेडियस वाटर से मध्यप्रदेश औद्यौगिक केन्द्र विकास निगम लि. ने कैसे अनुबंध किया यह रहस्यमय ही है।इसके लिए समिति ने एमपी एकेबीएन के तत्कालीन प्रबंध संचालक व आईएएस अधिकारी गणेश शंकर मिश्रा को शासन को अंधेरे में रखकर आपराधिक कृत्य करने का दोषी करार दिया है।
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रष्ट अधिकारियों ने रेडियस वाटर से मांग से ज्यादा न्यूनतम चार एमएलडी पानी 12 रुपए 60 पैसे क्यूविक मीटर से खरीदने का अनुबंध सीधे-सीधे रेडियस वाटर को लाभ पहुंचाने के लिए किया।
इस प्रकाऱ अनुबंध तिथि को लगभग दस करोड़ रुपए की परिसम्पतियां रेडियस वाटर को नाम मात्र एक रुपए में 20 वर्ष के लिए प्रदान करके ये अधिकारी भ्रष्टाचार की नई कीर्तिमान स्थापित किया।
जांच समिति को गांव वालों की 42 हेक्टेयर ज़मीन की अधिग्रहित कर रेडियस वाटर को सौंपे जाने का जानकारी भी हुई लेकिन एकेबीएन ने यह जमीन अधिग्रहित कर रेडियस वाटर को उपलब्ध करवाई या नहीं यह जांच का विषय नहीं बना और शिवनाथ नदी के सौदागर यानी मिश्रा के खिलाफ़ अविलंब कार्यवाही करना तो दूर की बात उल्टा उसे लगातार एक जिले से दूसरे जिले में कलेक्टर बनाकर पुरूष्कृत किया गया।
Add Comment