LIC फिर से एक बार बड़ा नुकसान उठाने जा रहा है...
गिरीश मालवीयIDBI बैंक में LIC और सरकार ने अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है कुछ महीने पहले मोदी सरकार की आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी मिल थी लेकिन तब यह तय नही किया गया था कि कितनी हिस्सेदारी बेची जाएगी लेकिन अब यह तय हो गया है कि सरकार और LIC अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचेगा. इस वक्त आईडीबीआई बैंक में भारत सरकार का 45.48 प्रतिशत ओर एलआईसी का 49.24%प्रतिशत शेयर है.
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दरअसल IDBI बैंक में LIC से सर पे बंदूक रख कर निवेश करवाया गया तीन साल पहले 2018 में LIC ने IDBI में 21000 करोड़ रुपये का निवेश करके 51 फीसदी हिस्सेदारी ख़रीदी थी.
इसके बाद LIC और सरकार ने मिलकर आईडीबीआई बैंक के रीकैपिटलाइजेशन के लिए 9300 करोड़ रुपये IDBI बैंक को दिये थे. इसमें एलआईसी की हिस्सेदारी 4,743 करोड़ रुपये थी.
यह भी तब किया गया जब IDBI बैंक एनपीए के मामले में भारत का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बैंक था उस वक्त आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 27.95% तक पहुंच गया था यानी 100 रुपये में से 28 रुपये एनपीए में बदल गया था लेकिन तब उसे नही बेचा गया उसमे LIC के जरिये हमारे खून पसीने की बचत को डालकर बचाया गया... ओर अब उसे बेचा जा रहा है.
खुद LIC बढ़ते हुए NPA से जूझ रहा है पांच साल में कंपनी का एनपीए दोगुना हो गया है। दो साल पहले एलआईसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 30 सितंबर, 2019 तक कुल 30,000 करोड़ रुपये का सकल एनपीए है.
अब यह फिगर बेतहाशा बढ़ चुका होगा क्योंकि LIC ने DHFL दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड, IL&FS इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनैंशल सर्विसेज और अनिल अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंस ग्रुप सहित कई संकटग्रस्त कंपनियों को भारी-भरकम कर्ज दे रखा है. यह रकम कुल 4 लाख करोड़ रुपये की बताई जाती है.
ऐसे ही निवेशों पर मजबूर किये जाने के कारण एलआईसी के चेयरमैन एस के राय ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से दो साल पहले 2016 में ही इस्तीफा दे दिया एलआईसी के इतिहास में अभी तक किसी चेयरमैन अपना समय पूरा होने से पहले इस्तीफा नहीं दिया था.
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