मनुवादी व्यवस्था को खड़ा करता फिल्म आर्टिकल 15

उत्तम कुमार

 

29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा ने भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए डॉ. भीमराव आम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारुप समिति का गठन किया। जिन्हें हम संविधान के शिल्पकार कहते हैं, जो दलित जाति से आते हैं इस कारण आज भी हिन्दुस्तान का बहुसंख्यक वर्ग इस संविधान को हिकारत की नजर से देखते हैं और उनकी मूर्तियों को बार-बार खंडित करते हैं।

संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श के दौरान सभा ने पटल पर रखे गए कुल 7,635 संशोधनों में से लगभग 2,473 संशोधनों को उपस्थित कर परिचर्चा की एवं निपटारा किया। इस दौरान बाबा साहेब आम्बेडकर एक-एक दिन में 7 से 27 बार खड़े होकर संविधान सभा में अपना तर्क प्रस्तुत करते रहे।

26 नवंबर, 1949 को भारत का संविधान अंगीकृत किया गया और 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के सदस्यों ने उस पर अपने हस्ताक्षर किए। कुल 284 सदस्यों ने वास्तविक रूप में संविधान पर हस्ताक्षर किए। जिस दिन संविधान पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे, बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, मैथालॉजी को मानने वाले लोग इस संकेत को शुभ शगुन माना।

26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हो गया। उस दिन संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त हो गया और इसका रुपांतरण 1952 में नई संसद के गठन तक अस्थाई संसद के रूप में हो गया। इस अनुच्छेद में राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।

कोई नागरिक केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी आधार पर किसी तरह के दायित्व, प्रतिबंध, अयोग्यता या शर्त के अधीन नहीं होगा, इस सम्बन्ध में दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश और उसका इस्तेमाल या ऐसे कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सडक़ों और सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल जो पूर्णत या आंशिक रूप से राज्य की निधि से पोषित हैं या आम जनता के उपयोग के लिए बनाए गए हैं बाधित नहीं करेगा। इस अनुच्छेद की किसी बात से राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबन्ध बनाने में बाधा न होगी।

इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्ही वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। इस अनुच्छेद या अनुच्छेद 19 के खंड (2) के उपखंड (छ) की कोई बात राज्य को नागरिकों के किसी सामाजिक रूप से और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की प्रगति के लिए या अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए विधि द्वारा किसी विशेष प्रावधान को करने से निवारित नहीं करेगी।

जहां तक ऐसा विशेषज्ञ प्रावधान अनुच्छेद 30 के खंड (2) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के अतिरिक्त अन्य शैक्षणिक संस्थानों में, जिसमें गैर सरकारी शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं, चाहे सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हो या असाहयता प्राप्त हो, उनके प्रवेश के संबंध में वकालत करती है।

अनुभव सिन्हा की यह फिल्म आर्टिकल 15 मूल रूप से मनुवादी व्यवस्था पर आधारित जातिवादी फिल्म है। भोजपुरी गीत ‘कहब तो लाग जाई धक से, बोलब तो लाग जाई धक से’ से फिल्म की शुरूआत हुई है। यह गीत एक ओर सत्ता में बैठे धनवानों और दूसरी ओर मजदूरों व किसानों की हालतों में जमीन-आसमान के अन्तर को बड़े रोचक तरीके से आगे लाती है वहीं अपने अधिकारों के संघर्ष में सभी मेहनतकशों की एकता के नारे बुलंद किये जाते हैं।

इस गीत और फिल्म के बीच जाति तथा वर्ग का संघर्ष साफ साफ दो विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में उभर कर आता है। फिल्म मशहूर अमरीकी गायक बॉब डेलन को समर्पित है। विजन्स ऑफ जोहान्ना या टेंगल्ड अप इन ब्लू या इट टेक्स अ ट्रेन टु क्राय में वर्णित आख्यानों के सूत्रधार बॉब को नोबल मिलने से भी खुशी नहीं हुई थी।

शुरू से ही मन में यह सवाल उठता है कि फिल्म का निर्माण ‘जी समूह’ से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का शुक्रिया अदा करते हुए आखिरकार भारत के सिनेमाघरों में पहुंचाया ही क्यों गया है?

फिर आजकल ऐसे निर्माताओं निर्देशकों के साहस का पुल भी बांधा जाता है कि रील लाइफ के पीछे रियल लाईफ में जो कृत्य संविधान के मात्र एक अनुच्छेद ही नहीं सारे अनुच्छेदों के नेस्तनाबूत के लिए हो रहे हैं उसे कोलाज के रूप में फिल्म में परोसा जाए और दबे कुचले लोगों की सहानुभूति फिल्म को सिनेमाघरों में शुरू करवाने में उपयोग में लाया जाए।

रोहित वेमुला से लेकर चन्द्रशेखर रावण के बिम्बों के माध्यम से निर्देशक एक विशेष जाति के लोगों से सहानुभूति लेने दौड़ता है। जिसमें कहा गया है कि मैं राइटर बनना चाहता था... और साइंटिस्ट भी... फिर सोचा कि शायद साइंस का राइटर बन जाऊंगा। कुछ भी न हुआ साला! क्योंकि पैदा जहां हुआ वहां पैदा होना ही एक भयानक एक्सीडेंट जैसा था।

चन्द्रशेखर रावण को फिल्म में मार दिया जाता है। क्या असल जीवन में भी वर्तमान सत्ता की मंसूबा यही है। उनके बदले दलित नेता निषाद (जीशान अयूब) के संवाद है। कभी हम हरिजन बने, कभी बहुजन, कभी जन नहीं बन सकें। पर्दे पर बिजली के गरजने की तरह उभारा जाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की जेरॉक्स कापी के रूप में महंत मंच से आह्वान कर रहे हैं, जाति कोई भी हो लेकिन हिन्दुओं के एक होने का वक्त है ये... और सही दुश्मन पहचानने का भी वक्त है ये...।

2019 के युग में भी जब मेनहोल को मशीनों से साफ किया जाता है फिल्म में हीरो दलितों के नेता से मिलकर मेनहोल साफ करवाने में मदद मांगता है। इस एक डॉयलॉग से जितने लोग बार्डर पर शहीद होते हैं उससे ज्यादा गटर साफ करते हुए हो जाते हैं... पर उनके लिए तो कोई मौन तक नहीं रखता...।

बंधक बनाकर ले जाए जा रहे निषाद के भीतर आत्ममंथन चल ही रहा होता है, कभी मुझे कुछ हो गया तो आप लोगों को गुस्सा आएगा... उसी गुस्से को हथियार बनाना है लेकिन उसके अलावा कोई हथियार बीच में नहीं आना चाहिए दोस्तों! क्योंकि जिस दिन हम लोग हिंसा के रास्ते पर चल देंगे, इनके लिए हमें मारना और भी आसान हो जाएगा। लेकिन बिना हथियार चलाए पुलिस के वर्दी के पीछे वे कौन लोग थे जो तुम्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिए।

दरअसल अभिनव सिन्हा और गौरव सोलंकी की लिखी फिल्म आर्टिकल 15 का हर संवाद सुने जाने जैसा लगता है। छोटे-छोटे दृश्यों और निरंतर चलने वाले संवादों से बुनी गई यह एक बड़ी फिल्म है। संवादों का इस फिल्म में एक धारावाहिक है। छोटे-छोटे इन मारक संवादों का कोलाज दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के खिलाफ उभर रहे भयानक दृश्यों को तो दिखाता है लेकिन जिस देश का संचालन विश्व का सबसे बड़े संविधान से होता है वहां वास्तव में मनुस्मृति असल में संविधान के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ रही है।

अयान रंजन यानी आयुष्मान खुराना बॉब डेलन को सुनते हुए लखनऊ एक्सप्रेस-वे से होकर गुजर रहे होते हैं। How many roads must a man walk down / Before you can call him a man? / How many seas must a white dove sail, / Before she sleeps in the sand? कैमरा उसके फोन के बगल में रखी किताब पर हल्का-सा फोकस करते हुए पहली बार नायक की तरफ घूम जाती है उस ओर जहां जवाहरलाल नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया रखी रहती है।

वह तेजी के साथ सरसराती बोलेरो से यूरोपीय देश में अध्ययन के बाद जातिवादी देश में अनायस चला आता है। फिल्म में वह लगताार अपनी दिल्ली में रहने वाली मित्र अभिनेत्री ईशा तलवार एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री है जों मुख्यत: मलयालम सिनेमा में काम करती हैं।

एक मॉडल के रूप में काम करने के बाद व साथ में कई विज्ञापनों में काम करने के बाद उन्होंने 2012 में अपनी पहली मलयालम फिल्म थट्टाथिन मारायथु में काम किया से चैट के जरिए संवाद करता रहता है। अयान दूसरी पीढ़ी के पुलिस अधिकारी हैं। फिल्म को देखते हुए हम जान जाते हैं कि अयान के पिता आइएफएस थे। रिटारमेंट के बाद किताब लिखी। अयान की पढ़ाई विदेश में हुई है। वह कहता है कि सजा के तौर पर लालपुर नौकरी पर चला आया।

जहां से उसे वह उस भारत को देखता है जो निश्चित तौर पर जवाहर लाल नेहरू के डिस्कवरी ऑफ इंडिया के भारत से भिन्न है। अर्थात ढाई सौ साल से जातीय सडांध में गंधाता भारत।ब्राह्मणवादी व्यवस्था के परौकारों की भयानकता इस फिल्म में साफ नजर आती है। यानी उसके मुताबिक, ब्राह्मण और क्षत्रिय श्रेष्ठ तथा दलित तो इस व्यवस्था से ही बाहर हैं।

फिल्म में महज 3 रुपए दहाड़ी बढ़ाने की मांग पर दलित बच्चियों के साथ अत्याचार, बलात्कार और हत्या का मुख्य दोषी अंशु नहारिया कहता है कि उनकी कोई ‘औकात’ ही नहीं, जो वे देते हैं वही दलितों की ‘औकात’ है। इसी पाठ को सिखाने के लिए वह बच्चियों के साथ क्रूर तथा घिनौना अपराध करता है। नाटकों की भाषा में कहूं तो गजब के ब्लॉक फिल्म में बनाए गए हैं।

सुबह के धुंधलके में लटकी लाशें, दबाव में लिखे जा रहे बयान, गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट, तीन लड़कियों के साथ बलात्कार। धुंध में पेड़ से लटकी मार दी गई दलित लड़कियों के दृश्य तथा मेनहोल के भीतर गोता लगाकर निकलता सफाई कर्मचारी।

कचरा खाकर बीमार हुए कुत्ते की चिंता करते पुलिसवाला ब्रह्मदत्त सिंह। जो अंशु नहारिया दलित उत्पीडऩ के लिए मुख्य विलेन बनकर आता है उसे एक दूसरा सत्ता का विलेन ब्रह्मदत गोली मार देता है।

लड़कियों का बलात्कार करने वाला पुलिसवाला निहाल सिंह ग्लानि में ट्रक के नीचे आकर आत्महत्या कर लेता है। कानून के उलट उसकी नाबालिक बहन पुलिस अधिकारी आयुष्मान के घर खाना बनाने की कार्य करती है। फिल्म खलनायकों से धीरे-धीरे अपनी पकड़ कमजोर करती है और सड़ चुकी व्यवस्था की परतें खोलती है।

लेकिन साजिशन भीमा कोरेगांव पर फिल्म की रील बनने से पहले ही काट दी गई है। और इस दलित आंदोलन के बाद गिरफ्तार लोगों की सुध नहीं ली है। सिस्टम की परतों में सदियों से चली आ रही जाति-व्यवस्था की सडांध सामने आती है। लेकिन पूरी फिल्म में लेखक, निर्देशक और निर्माता ने अपने आप को मनुस्मृति के दायरे में रखा है।

दलितों और पिछड़ों की ओर से किसी तरह का प्रतिरोध नहीं बताया है इस फिल्म ने बस सबकुछ सहते चले जाइए अर्थात आग लगी हो तो न्यूट्रल रहने का मतलब यह होता है कि आप उनके साथ खड़े हैं जो आग लगा रहे हैं!

मजदूरों के लिए आंदोलन करने वाले कभी सफाई कर्मियों पर आंदोलन नहीं करते हैं यही जातिव्यवस्था है जो जाती ही नहीं है। हमारे कमोड्स में अब जेट स्प्रे लग गए हैं। परन्तु आज भी मेनहोल में सफाई के लिए जिंदे लाश नंगे उतरते हैं, मादरजात नंगे...अनुभव की फिल्म के सभी संवाद तीर की तरह कलेजे में चुभते हैं।

फिल्म में दलित नेता को भूमिगत दिखाया जाता है और उसे मुख्यधारा से जबरन हाशिए में डाल दिया जाता है। दलित नेता की प्रेमिका गौरा हीरो की फर्जी मुठभेड़ के बाद अपने जाति के पुलिस के पास जाकर रोती है। गौरा जो कि खुद सामाजिक कार्यकर्ता है।

खुद कुछ भी नहीं कर पाती है इस तरह अंतत: वह पुलिस पर ही आश्रित रहती है। उसके समुदाय के बाकी लोग भी निरीह से लगते हैं जबकि अयान रंजन जो कि ब्राह्मण है, सत्ता में उच्च पद पर बैठे शास्त्री जी के साथ मिलकर केस सुलझा लेता है और अंत में अभियान में लगे सभी पुलिसकर्मियों को दलित महिला की दुकान से रोटी खिलाकर जाति के कोढ़ से मुक्त भी कर देता है।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट सही बनाने वाली दलित डॉक्टर को साहस और सुरक्षा देने का काम भी यही पुलिस अधिकारी ही करता है। खुद वह दबंगों की डर से यह साहस नहीं जुटा पाती है। फिल्म में दर्शाए गए बदायूं के बलात्कार की यह घटना सपा सरकार के समय की है, वर्तमान सरकार को उसमें एक महंत के रूप में दिखाया गया है, जिसका इन घटनाओं से कुछ लेना देना नहीं है, वह केवल इस घटना का फायदा उठा रहा है, और फिर चुनाव जीत भी जाता है।

हां यहां बहुजन समाज पार्टी की सामाजिक समरसता की बू जरूर आती है।फिल्म को तकनीकी रूप से बहुसंख्यक वर्ग की तुष्टिकरण करती दिखाई गई है। जब ब्राह्मण पुलिस अधिकारी एक दलित बस्ती में दुकान से मिनरल वॉटर की बोतल खरीदने को कहता है और उसके मातहत पुलिस कर्मी यह कहकर मना कर देते है कि इनकी छाया भी वर्जित है तो उसे ये बात समझ से परे लगती है और वह वहीं से पानी खरीदने की जिद करता है और खरीदे गए पानी को पीकर दम लेता है।

पूंजीवादी बाजार का ब्राह्मणवाद से सांठगाठ साफ नजर आता है। लेखक गौरव सिंह सोलंकी और निर्देशक अनुभव सिन्हा की होशियारी इस फिल्म में साफ नजर आती है उन्होंने बाजार के मुनाफेदारों के हक में फिल्म का निर्माण को सडक़ तक लाने में सफल हुए हैं। हाल ही में उन्होंने ब्राह्मण समाज को भरोसे में लेने के लिए ट्विट किया है कि ‘आपको जानकर हर्ष होगा कि फिल्म के बनाए जाने में मेरे कई ब्राह्मण साथी भी हैं, कई कलाकार भी।

कोई कारण नहीं है कि ब्राह्मणों का निरादर किया जाए। वैसे मेरी पत्नी भी ब्राह्मण हैं सो मेरे पुत्र के अस्तित्व में भी ब्राह्मण समाते हैं।’ उन्होंने बड़ी चालाकी से क्षमा मांगते हुए हिन्दूराष्ट्र पर अनायस ही ट्विट कर बैठा कि यह फिल्म उसी राष्ट्र के सम्बंध में है जिसके निर्माण में आप सभी तन-मन-धन से लगे हुए हैं जो बहुत ही खतरनाक संकेत की ओर हमारी समझ को ले जाती हैं।

यह पूरा प्रसंग स्पष्ट करता है कि दरअसल अयान के रूप में यह फिल्म सामाजिक समरसता के रूप में बरसों से कुंडली मारे बैठी जाति व्यवस्था को तोडऩा नहीं चाहती बल्कि उसे नए सिरे से कायम करना चाहते हैं। यह महात्मा गांधी के उस दर्शन की ओर नजर ले जाती है कि जाति व्यवस्था ठीक है, पर छूआछूत जैसी चीजें नहीं होनी चाहिए।

लिहाजा यह फिल्म जाति की बात तो करती है और यह भी कहती नजर आती है कि दलितों पर अत्याचार तथा भेदभाव तो होता है लेकिन उसका समाधान नहीं ढूंढ पाती। बल्कि पुलिस अधिकारी इसमें ‘उद्धारक’ या ‘मसीहा’ की शक्ल में उसी ‘संतुलन’ के अपडेटेड नायक की तरह उभरने की कोशिश करते हैं।

भले ही पुलिस अधिकारी बार-बार फिल्म में सफाई देते फिरते दिखे कि वे कोई हीरो नहीं हैं। वरना आखिरी दृश्य में गुमशुदा लडक़ी की बड़ी बहन और निषाद की प्रेमिका गौरा (सयानी गुप्ता) ‘एहसान’ के बोझ तले दबी और अयान की ओर कृतज्ञतापूर्वक हाथ जोड़े नजर आती है।

यह फिल्म एक बार फिर से गांधी और आंबेडकर को आमने-सामने ला खड़ी करती है। आंबेडकर ने गांधी के बारे में बीबीसी को दिए साक्षात्कार में कहा था कि गांधी हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे।

उन्होंने खुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और खुद को लोकतांत्रिक बताया था। लेकिन उन्हें अधिक रूढि़वादी व्यक्ति के रूप में देखते हैं। वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढि़वादी सिद्धांतों के समर्थक थे। गांधी जाति-व्यवस्था का जोरदार समर्थन किया और छूआछूत का विरोध किया है।

डॉक्टर आंबेडकर ने छूआछूत के उन्मूलन के साथ समान अवसर और गरिमा पर जोर दिया था और दावा किया कि गांधी इसके विरोधी थे। उनके मुताबिक गांधी छूआछूत की बात सिर्फ इसलिए करते थे ताकि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें। वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें।

गांधी एक कट्टरपंथी सुधारक नहीं थे और उन्होंने ज्योतिराव फूले या फिर डॉक्टर आंबेडकर के तरीके से जाति व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास कतई नहीं किया। फिल्म ने समसामयिक राजनैतिक-सामाजिक घटनाओं के प्रतीकों का भरपूर उपयोग किया है। जैसे, गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई जैसे दृश्य और भीम आर्मी जैसा एक संगठन।

निषाद के रूप में भले ही एक मजबूत संभावनाओं वाला दलित पात्र है लेकिन उसके लिए इस लोकतंत्र में जीते रहने की गुंजाइश नहीं दिखी। असल में यह फिल्म उसी पर केंद्रित होनी चाहिए थी, पुलिस अधिकारी रंजन पर नहीं। इसकी वजह भी है वर्तमान समय में ऊना से लेकर भीमा कोरेगांव तक सभी मर्मों का विरोध दलितों ने सशक्त ढंग से दर्ज किया है।बात सिर्फ कहने से बड़ी नहीं होती है।

चुनौतियों का सामना और समाधान भी निकलना चाहिए। आपने जितने भी हीरो टाइप फिल्में देखी होगी उसमें हीरो को सफलताओं की ओर बढ़ते दिखाया गया है लेकिन संविधान, कानून व्यवस्था के बावजूद देश में वास्तव में राजा का ही शासन है यह बताने में मौजूदा फिल्म असफल रही है और ब्राह्मण, ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना का नाश इस फिल्म में नहीं बताया गया। फिल्म के बारे में बहुत लोग लिख चुके हैं। एक अच्छी फिल्म वह भी होती है जो उभरते सवालों के साथ समाधान भी जुटाए।

फिल्म में पुलिस की गाड़ी बुलेट ट्रेन लगती है। जो सरपट दौड़ती तो है लेकिन मात्र एक बलात्कार से पीडि़त बच्ची को बचाने के अलावा ऊपर से सैटिंग भी करती है।बहरहाल आर्टिकल'5 देखिए और विवेक के साथ शासक वर्गों की साजिशों को भी पहचानिए। यह फिल्म आपके भीतर भारत में मौजूद दो देश को दिखाएगा।आप देखकर महसूस करेंगे कि जब फिल्म निर्माता, लेखक और निर्देशक भारत की मूल समस्या को जानते ही हैं तो उसका निराकरण क्यों नहीं निकाल पाए?

हो सकता है कि इन चुनौतियों का सामना करने का साहस पूरी फिल्म की टीम में नहीं थी। फिल्म के प्रदर्शन पर हो रहे हो हल्ला को मैं फिल्म पद्मावत के साथ तुलना करता हूं कुछ भी तो नहीं था फिर विरोध और समर्थन का नाटक कैसा?

उमेश शुक्ला की फिल्म ओएमजी भी आई थी और उसके बाद राजकुमार हिरानी की फिल्म पीके भी आई। लब्बोलुआब यह कि श्रमिकों के लिए आंदोलन करने वाले कभी सफाईकर्मियों के अधिकारों के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। फिर हम किसी फिल्म से जातिवाद का विनाश की कल्पना कैसे कर सकते हैं जब उसे ब्राह्मणवादी के पोषक निर्माण कर रहे हो।


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