बीएसपी में वेज रिवीजन को लेकर आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज, कई कर्मचारी घायल

द कोरस टीम

 

बता दें कर्मचारी वेज रिवीजन सहित कई मांगों को लेकर बीएसपी के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। बताया जा रहा है कि कर्मचारियों को संयंत्र के भीतर ले जाने के दौरान विवाद हो गया। विवाद बढऩे के बाद पुलिस ने ताबड़तोड़ लाठी चार्ज किया, जिसमें 10 लोग और यूनियन नेता घायल हो गए।

ऐक्टू सहित कई श्रमिक संगठनों ने हड़ताल के दौरान भिलाई इस्पात संयंत्र के मेन गेट पर पुलिस द्वारा श्रमिकों पर लाठीचार्ज की निंदा की है और इसे उकसाने वाली कार्रवाई बताया है। जानकारी है कि अधिकांश संयंत्रों में हड़ताल 80 से 100 प्रतिशत सफल रही है। 

श्रमिकों ने कहा है कि महामारी संकट के कठिन समय में ऑक्सीजन की जरूरतों को पूरा करने वाले सार्वजनिक उपक्रमों में सेल पहला होने के बावजूद मोदी सरकार  एक ओर श्रमिकों के उनके अधिकारों और मेहनत की कमाई से वंचित कर रहा है, और दूसरी ओर, संकट को अपने कॉर्पोरेट मित्रों के लिए अवसरों में बदलने पर आमादा है। स्टील, रेलवे का निजीकरण कर रहा है और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों और राष्ट्रीय संसाधनों को निजी हाथों में बेच रहा है।

श्रमिक नेता बृजेन्द्र तिवारी ने बताया कि भारत के राष्ट्रपति ने 30 जून को, ‘इसेंशियल डिफेंस सर्विसेस, अध्यादेश 2021’ (आवश्यक सुरक्षा सेवा अध्यादेश, 2021) की घोषणा की है और इसके द्वारा किसी भी ऐसे ‘प्रतिष्ठान में जहां सुरक्षा से संबंध रखने वाले किसी भी तरह के सामान या उपकरणों का उत्पादन हो’ या ‘जो संघ की सशस्त्र सेना से संबंधित हो, या सुरक्षा से संबंधित कोई अन्य प्रतिष्ठान या कोई स्थापना हो वहां, ‘हड़ताल’ पर रोक लगा दी गई है’।

यह दमनकारी अध्यादेश इसलिए लाया गया है ताकि डिफेंस सेक्टर में 26 जुलाई से कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन देशव्यापी हड़ताल को रोका जा सके जिसका आहृान यहां के ज्वाइंट एक्शन फोरम ऑफ डिफेंस फेडरेशनस ने किया है। इस फोरम में एआईडीईएफ, आईएनडीडब्ल्यूएफ, बीपीडब्ल्यूएस, एनपीडीईएफ, एआईबीडीईएफ और सीएडीआरए शामिल हैं। ये हड़ताल केन्द्र सरकार की देश के डिफेंस सेक्टर के कोरपोरेटीकरण/निजीकरण के फैसले के विरोध में है।

नेताओं ने कहा कि आवश्यक सुरक्षा सेवाओं की हिफाजत और देश एवं जनता के जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा के बहाने से इस अध्यादेश को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। तो, ऐसा बहाना इस अध्यादेश को फौरन लागू करने का बनाया गया है।

प्रदर्शनकारी श्रमिकों ने कहा कि यह अध्यादेश सिर्फ हड़ताल पर ही रोक नहीं लगाता, बल्कि हर तरह के विरोध पर रोक लगाता है और आईआर (औद्योगिक संबंध) कोड के अनुच्छेद 2 (जेड के) की परिभाषा से भी आगे तक बड़ा देता है, जिसे केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के विरोध के वावजूद संसद में पास किया जा चुका है।

यह अध्यादेश हड़ताल को सिर्फ ‘काम रोकने’ तक ही परिभाषित नहीं करता, बल्कि, ‘धीरे काम करना, धरना देना, घेराव, टोकन हड़ताल और मास कैजुअल लीव’ को, और यहां तक कि - ‘ओवरटाइम से इन्कार करने या कोई अन्य व्यवहार जो आवश्यक सुरक्षा सेवा के काम में बाधा हो या गतिरोध आता हो, या काम रुकता हो’ को भी ‘गैरकानूनी हड़ताल’ के दायरे के अंदर ला दिया गया है।

इस हड़ताल को तोडऩे के लिए पुलिस को अंधाधुंध शक्तियां दे दी गई हैं, और अनुच्छेद 11 पुलिस ऑफिसर को लाइसेंस देता कि वो, ‘इस अध्यादेश के अंतर्गत किसी भी तरह के अपराध का समुचित शक होने पर किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है’।

इस अध्यादेश ने अफसरों को पूरा अधिकार दे दिया है और क्लॉस 15 कहता है कि इस अध्यादेश को लागू करने पर, ‘केन्द्र सरकार या किसी अन्य अफसर के खिलाफ कोई मुकदमा, या अभियोग या कोई अन्य कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी’

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह अध्यादेश साफ तौर पर सैन्य-औद्योगिक समूह बनाने के उद्देश्य से लाया गया है। यह हमारे संविधान में प्रतिष्ठापित लोकतांत्रित अधिकारों का हनन मोदी सरकार के फासीवादी शासन का नग्न कार्य है जिसका पूरे देश में मजदूर वर्ग के संगठित आंदोलन के एकजुट प्रतिरोध द्वारा विरोध होना चाहिए।


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