भिलाई में शहीद श्रमिकों को श्रद्धांजलि देने सैकड़ों की संख्या में जुटे

कौन कौन हुवे शामिल 

द कोरस टीम

 

भिलाई-रायपुर-टेडेसरा के 4200 मजदूरों का आंदोलन शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में न्यूनतम वेतन, 8 घंटे काम, हाजिरी कार्ड, पी.एफ., ई.एस.आई. के जायज मांगों के साथ-साथ अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये संघर्ष शुरू हुआ था। इन्हीं मांगों के लिए सन् 1992 में मजदूर अपने बाल-बच्चों सहित अप्रैल-मई व जून के महीने में भरी गर्मी, तूफान, तपती जमीन पर पड़ाव दर पड़ाव भिलाई के अलग-अलग बस्तियों से गुजर कर छावनी बस्ती से पावर हाऊस फिर रेलवे स्टेशन की पटरी पर आ पहुंचा। 

17 श्रमिकों को मौत के घाट उतार दिया गया

उस समय की भाजपा सरकार उनके जिलाधिकारियों व मजदूरों के खून-पसीने को लूटने वाले उद्योगपतियों ने श्रम कानूनों का पालन करने-कराने, मजदूरों के जायज मांगों को पूरा करने से बचते हुये खूंखार जानवर की तरह निहत्थे असहाय मजदूरों के साथ खूनी खेल खेला गया। 1 जुलाई का वह दिन आज भी मजदूरों के दिलों-दिमाग पर मौजूद है। 17 मजदूरों की मौत, सैकड़ों लोग अपंग और तो और महिलाओं के साथ जो अश्लील, अभद्रता हुई उस जख्म को दुनिया की कोई भी दवा नहीं भर सकती।

इस खूनी खेल के बाद भी सरकारें व उद्योगपतियों ने उन मजदूरों के जायज मांगो को पूरा करना तो दूर मजदूर नेताओं पर ही झूठा केस लगाकर जेलों में ठूंस दिया। उस दिन भिलाई के मेहनतकश व जनप्रेमी जनता ने भाईचारा दिखाते हुये घायल मजदूरों के साथ मदद की मिसाल कायम की, जो बेहतरीन उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किये, लाठी चार्ज, गोलीचालन, पुलिस के वहशीपन, दरिन्दगी से बचाने न सिर्फ आगे बढ़े बल्कि अपने घरों में पनाह भी दिये, खाने-पीने और इलाज का भी ध्यान रखा। यह मेहनतकशों के इतिहास में दर्ज हो गया।

जीने लायक वेतन की मांग

वर्तमान में न्यूनतम वेतन भुगतान करना तो दूर, वेतन भुगतान में अनिश्चितता, बेरोजगारी, ठेकाप्रथा, भारी मंहगाई, आर्थिक मंदी, छंटनी, निजीकरण और लगातार मजदूर हित के कानूनों को उद्योगपतियों के हितों में बदलाव (संसोधन), के कारण मजदूरों ने अपने संघर्षों से प्राप्त अधिकारों, सुविधाओं को भी गंवाने के कगार पर है साथ ही असहनीय उत्पीडऩ और जीवन-मरण के सवालों पर मजदूर वर्ग अपने स्वाभिमान के लिये भी अक्षम दिखाई दे रहे है। ऐसे कठिन समय में मजदूरों, किसानों, जनेप्रेमी, देशप्रेमी, जवानों की एकबार फिर से एक बड़ी भाईचारा निभाते हुये कुर्बानी से ओत-प्रोत होते हुये संघर्ष करना ही एकमात्र रास्ता है।

सरकारी व्यवस्था कार्पोरेट के हाथ सुपुुर्द

नेताओं ने कहा कि अगर लहरों (संघर्षों) की बागडोर सृष्टि के देवता उत्पादक वर्ग (मजदूर-किसान) के हाथ में रहेगी तो वर्तमान सड़ी-गली व्यवस्था ध्वस्त होगी और नई व्यवस्था का निर्माण होगा और अगर यह लहरों (संघर्ष) की बागडोर अनउत्पादक (निठल्ला लुटेरा) पूंजीपति वर्ग या निम्न पूंजीपति वर्ग के हाथों रहेगी तो यही सड़ी-गली व्यवस्था बरकरार रहेगी। लोकतंत्र ध्वस्त होगा, भूख की छाया देश में फैलती रहेगी एवं उत्पादक मजदूर किसान कमजोर होता जायेगा। उत्पादक मजदूर किसान (वर्ग) की स्थिति को मजबूत करने के लिये ही क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन की जरूरत है- (साभार संघर्ष और निर्माण पृष्ठ क्रमांक 275 से)।  कार्पोरेट परस्त सरकार से कितनी उम्मीद रखी जा सकती है?

न्याय आज भी अधूरा

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की 5 सदस्यीय टीम ने छत्तीसगढ़ सरकार से मुलाकात किया। उक्त मुलाकात में मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया की भिलाई आंदोलन के पूरे मामले को पूर्व के दिग्विजय सिंह सरकार ने ट्रिबनल (कोर्ट) में डाला था लेकिन आज तक उसका लाभ मजदूरों को नहीं मिला है।

सुधा भारद्वाज जेल में

दल्ली राजहरा, राजनांदगांव, भिलाई मजदूर आंदोलन में अभी तक लगभग 40 मजदूर पुलिस की गोली से शहीद हो चुके है। परंतु छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की तरफ से आक्रोशित होकर कहीं भी किसी तरीके के अप्रिय घटना, सामाजिक अनहित जैसे कोई कदम नहीं उठाया है। परंतु विडंबना की बात है कि आप छत्तीसगढ़ सरकार जानती है की मजदूर नेत्री, सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज नियोगी की सिपाही है। हर संघर्ष में यहां डटी रही है। कोर्ट और रोड की लड़ाई में अपना योगदान निभाई है। जिनके खिलाफ देशद्रोही जैसे यूएपीए कानून लगाकर बायखुला जेल मुंबई में रखा गया है। आप छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से उनकी रिहाई के लिये, उनके अच्छे स्वास्थ सुविधा के लिये एनआईए से लेकर केन्द्र और महाराष्ट्र सरकार को भी पत्र लिखिए।

कोरोना वॉरियर की दुर्गति 

छत्तीसगढ़ के अंदर नगरीय निकायों नगर पंचायतों, शासकीय विभागों में सार्वजनिक उद्योगों में काम करने वाले सफाई कर्मियों ने कोरोना महामारी में अपनी जान से खेलकर कोविड मरीजों की और वातावरण को स्वच्छ बनाने सफाई के काम में लगे रहे है परंतु उन कोरोना वारियरों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। जिसमें छंटनी करना, वेतन 2-3 माह तक नहीं देना, जबरन कारण बताओ नोटिस देना, कोरोना वारियर के रूप में बीमा नहीं होना, मानदेय के नाम पर पी.एफ. और ई. एस. आई. से दूर रखना यह लगातार जारी है जिसका समाधान करना छत्तीसगढ़ सरकार की जिम्मेदारी है।

दमन कायम है

मोर्चा के नेताओं ने किसानों की 3 कृषि बिल एवं मजदूरों के 4 श्रम कोड को रद्द करने कहा। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा भलीभांति जानता है कि वर्तमान में केन्द्र की सरकार या राज्य की सरकार कार्पोरेट घरानों के आगे नतमस्तक हो रही है उसी का खामियाजा है। किसानों को गुलाम बनाने के लिये किसानों से बिना पूछे 3 कृषि कानून बिल पास कर लिये है जो गैर कानूनी ही नहीं बल्कि आलोकतांत्रिक है। सरकार अपनी जनविरोधी चेहरों को छुपाने के लिये और जनता को दबाने के लिये सामाजिक कार्यकर्ताओं, सांस्कृतिक कर्मियों, मानव अधिकार कार्यकर्ताओं एवं किसानों को यूएपीए देशद्रोह जैसे कानून में फंसाया जा रहा है। यह स्वतंत्र भारत में काले अक्षरों में लिखा जायेगा की अपने ही देश की सरकार अपने हि किसानों और मदजूरों के खिलाफ युद्ध जैसी परिस्थिति पैदा करती है जो संविधान का खुलेआम उल्लंघन है। आदिवासियों पर दमन बदस्तूर जारी है।

सिलगेर जैसी घटनाओं पर भी नजर

नेताओं कहा कि वर्तमान में बस्तर के सिलगेर में दसियों हजार आदिवासी धरनारत है। उनकी मांग है कि आदिवासी अपने जल जंगल-जमीन को बचाने के लिये कार्पोरेट घराने के विरोध में लामबंद है। मुख्य बात है कि सिलगेर में अचानक सरकार द्वारा मिलिट्री केम्प का फरमान जारी होता है और रातों रात बन भी जाता है। जबकि बस्तर के आदिवासी इस तरह के केम्पों, मिलिट्री, मिशनरी से खासा पीड़ित है।

आये दिन एनकाऊंटर निरीह आदिवासियों की नक्सली की आड़ में जेल, महिलाओं के साथ बलात्कार, राजद्रोह जैसे केस आदिवासियों के खिलाफ लगाई जा रही है। इसी तरह की घटनायें हो रही है। एक तरह से बस्तर को युद्ध जैसी परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया है। केवल और केवल जल-जंगल-जमीन और खनिज संपदा की लूट के लिये आदिवासियों को विनाश की रणनीती लगातार बनाई जा रही है। जो आजाद भारत के लिये गहरी काली अंधेरी की तरह दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि  इसलिए संविधान और लोकतंत्र को बचाने नियोगी जी का ही रास्ता सर्वोपरि है।

भिलाई इस्पात संयंत्र का निजीकरण?

भिलाई इस्पात संयंत्र एवं औद्योगिक क्षेत्र की हालात बद से बदत्तर है, ठेका श्रमिकों की हालत बहुत ही दयनीय है उन्हें ना हि न्यूनतम वेतन, ना बोनस, ना पी.एफ. ना ई. एस. आई. यहां तक की गेट पास, हाजिरी कार्ड भी नहीं मिलता। ठेकेदारों द्वारा कमाया पैसा को भी हड़प लिया जाता है। वर्तमान में तो भिलाई इस्पात संयंत्र को निजीकरण की ओर ढकेला जा रहा है जिससे वेतन समझौता से लेकर तमाम कार्मिकों के अधिकार को अनदेखा किया जा रहा है।

कौन कौन हुवे शामिल 

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा समन्वय समिति के नेतृत्व में नेताओं में भीमराव बागड़े, जनकलाल ठाकुर, बंशी साहू, सुकलाल साहू, कलादास डहरिया, लखन साहू, जय प्रकाश नायर, नीरा, रिनचिन, श्रेया, शालिनी, संगीता, चुन्नी बाई, चमेली, खेमिन, एजी कुरैशी, तुलसी देवदास पुना राम साहू, राम गोपाल गोयल, मंथीर साहू, खूमराज खरे, प्रेमनारायण वर्मा, बसंत साहू, सुरेश यादव, सुरेन्द्र मोहंती, कल्याण सिंह पटेल, रमाकांत  सहिल सैकड़ों की संख्या में श्रमिक और मारे गये श्रमिकों के परिजन एकत्र हुवे। 


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