मुर्दहिया से डर क्यों?
वीरेन्द्र यादवदिवंगत साथी प्रो तुलसीराम (1जुलाई, 1949-15 फरवी, 2015) की आज जयंती है. विरेन्द्र यादव ने उनकी मशहूर किताब ‘मुर्दहिया’ के संदर्भ में लिखा अपना एक लेख आज शेयर किया है। संक्षिप्त होने के बावजूद वह बहुत जरुरी लेख है। पत्रकार उर्मिलश लिखते हैं कि तुलसीराम कई कारणों से हमारे साहित्य और विचार जगत के महत्वपूर्ण लेखक हैं। अच्छी बात है, उनकी ‘आत्मकथा’ पर काफी लिखा-पढ़ा गया। यहां तक कि शोध कार्य भी हुए हैं। एक विचारक के रूप में भी वह हमारे समय के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। वे उत्पीडि़त समाज से आये लेखकों-विचारकों में विशिष्ट नजऱ आते हैं।
इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ को लेकर माहौल सरगर्म है। लखनऊ विश्वविद्यालय में इसे एमए के अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल करने से फिलहाल इनकार कर दिया गया है, जबकि कई अन्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में यह वर्षों से शामिल है। विरोध यहां तक है कि इस समूचे प्रसंग पर आयोजित परिसंवाद को परिसर में करने की अनुमति भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों के एक संगठन को नहीं दी।
लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने तो अखबारों में यह बयान तक दे डाला है कि ‘मुर्दहिया’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने से वैमनस्य बढ़ेगा। उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा और ओम प्रकाश बाल्मीकि की कृतियों को भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग मानकों के अनुकूल न बताते हुए इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल न करने का तर्क दिया है, जबकि आयोग की नेट परीक्षा में इन सभी रचनाकारों पर प्रश्न तक पूछे गए हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ. दीक्षित देश की शीर्षस्थ साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी के हिंदी समन्वयक और ‘व्यास सम्मान’ सरीखी कई पुरस्कार समितियों के सदस्य आदि भी रहे हैं। यह सचमुच हैरत की बात है कि बरसों बरस उच्च शिक्षा और पठन-पाठन से जुड़े बौद्धिक भी आज इतनी पुरातनपंथी और प्रतिगामी सोच से लैस हो सकते हैं कि उन्हें ‘मुर्दहिया’ जैसी कृति 'सामाजिक वैमनस्यों का स्रोत लग सकती है। गनीमत है कि सामाजिक वैमनस्य फैलाने के आरोप में अभी तक डॉ. तुलसी राम के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई की मांग नहीं की गई है!
दरअसल ‘मुर्दहिया’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने का यह समूचा विवाद तब शुरू हुआ, जब लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के नए विभागाध्यक्ष डॉ. काली चरण स्नेही ने पाठ्यक्रमों में अन्य परिवर्तनों के क्रम में दलित, खी, अल्पसंख्यक और आदिवासी विषयवस्तु भी पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव रखा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के इतिहास में पहले दलित विभागाध्यक्ष होने के कारण उनके प्रति असहयोग का भाव होना तो स्वाभाविक ही था लेकिन पाठ्यक्रम को नवीनीकृत करने और इसके जनतांत्रिक विस्तार का जिस तरह से योजनाबद्ध ढंग से विरोध किया गया, यह अकादमिक जगत में उच्च द्विज जातियों की जकड़बंदी और प्रतिगामी वर्चस्व का ही परिचायक है ‘मुर्दहिया’ के विरोध में फैकल्टी बोर्ड की बैठक में इसके कुछ हिस्सों को प्रसंग से काटकर इसे अश्लील कृति के रूप में पेश किया गया।
एक महिला प्रोफेसर ने तो इसे इतना अश्लील माना कि नाटकीय मुद्रा अपनाते हुए बैठक में इसे पढऩे से इनकार कर दिया। कभी राही मासूम रजा के उपन्यास ‘आधा गांव’ को भी अश्लीलता के इसी तर्क के आधार पर जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल होने से रोका गया था। इक्का-दुक्का अपवादों को छोडक़र स्थानीय मीडिया ने भी इस मुद्दे पर एकपक्षीय रुख अपनाने या समूचे प्रकरण से आंख मूंदने की जो नकारात्मक भूमिका अपनाई, वह भी कम चिंता की बात नहीं है।
सच तो यह है कि इस दौर में लिखी गई दलित आत्मकवाओं में ‘मुर्दहिया’ एक ऐसी आत्मकथा है, जिसमें न तो दलित आक्रोश के जाने- पहचाने आक्रामक तेवर हैं और न प्रतिशोध की अंतर्धारा अपनी आपबीती के माध्यम से इसमें डॉ. तुलसी राम ने उत्तर भारतीय हिंदी समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को अत्यंत सहज मुहावरे में उद्घाटित किया है। वे अपने परिवार और समुदाय के पीढय़िों से चल रहे शोषण के दुष्चक्र को बिना किसी के जिस तरह अभिव्यक्त करते हैं, वह विरल है।
बानगी स्वरूप एक उद्धरण यहां प्रस्तुत है- ‘मेरे दादा परदादा गांव के ब्राह्मण जमींदारों के खेतों पर बंधुवा मजदूर थे। उन जमीदारों ने ही कुछ खेत उन्हें दे दिया था। गांव के अन्य दलित भी उन्हीं जमींदारों के यहां हरवाही (हल चलाने का काम करते थे। यह हरवाही पुस्त-दर-पुश्त चली आ रही थी। मेरे पिताजी को खानदानी हरवाही से कभी मुक्ति नहीं मिली।
वे अक्सर कहा करते थे कि यदि हरवाही छोड़ दूंगा तो ‘ब्रह्मणहत्या’ का पाप लगेगा अत्यंत धर्मांध होने के कारण वे हरवाही को अपना जन्मसिद्ध अधिकार एवं पवित्र कार्य समझते थे।’ दरअसल हिंदू धर्म की वर्णाश्रमी व्यवस्था के इस शोषण तंत्र का खुलासा ही ब्राह्मणवादी शक्तियों के ‘मुर्दहिया’ के प्रति आक्रोश का असली कारण है। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से राजनीति का जनतांत्रीकरण और हाशिये के समाज का हस्तक्षेप बढ़ा है, उसी तेजी से प्रतिगामी पुरातनपंथी शक्तियां बौद्धिक धरातल पर इसे निष्फल बनाने के लिए गोलबंद हैं।
अभी पिछले दिनों कन्नड उपन्यासकार योगेश मास्टर को उनके उपन्यास ‘धुन्डी’ को धार्मिक वैमनस्य फैलाने वाली कृति बताकर गिरफ्तार तक कर लिया गया था और उपन्यास की बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस उपन्यास में आर्यों के आगमन और उनके द्वारा आरण्यक, शूद्रों व दस्युओं पर आधिपत्य जमाने की प्रक्रिया को औपन्यासिक बनाया गया था।
इस उपन्यास पर भी अश्लीलता और धार्मिक चरित्रों के प्रति अनादर प्रदर्शित करने का आरोप लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि उपन्यास पर प्रतिबंध और लेखक की गिरफ्तारी की मांग श्रीराम सेने के प्रमोद मुबालिक की मांग और अदालती कार्रवाई की पहलकदमी पर हुई थी। इसके पूर्व मुंबई विश्वविद्यालय के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से रोहिंग्तन मिस्त्री के उपन्यास ‘ए फाइन बैलेंस’ को शिवसेना की मांग पर हटाया जा चुका है। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के पाठ्यक्रम से एम के रामायण संबंधी निबंध को भी इसी तरह धार्मिक कट्टरपंथियों के उकसावे पर पाठ्यक्रम से निकाला जा चुका है।
विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों के प्रति धार्मिक पूर्वग्रहों और कट्टरतावादी तत्वों के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता प्रकट करते हुए रोमिला थापर, यूआर अनंतमूर्ति, गोपाल कृष्ण गांधी, एन. राम आदि सहित देश के शीर्ष बुद्धिजीवियों और अकादमिक विद्वानों ने उचित ही यह मांग की है कि साहित्य, मानविकी और समाज विज्ञानों के पाठ्यक्रम में गलत रुझानों और प्रतिगामी प्रवृत्तियों को चिन्हित करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया जाए। जरूरत है इस दिशा में अविलंब हस्तक्षेप की, ताकि ‘मुर्दहिया’ सरीखी श्रेष्ठ रचनाओं को हाशिये पर जाने से समय रहते बचाया जा सके।

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