झारखंड में आदिवासी युवकों पर सुरक्षा बलों ने चलायी गोली, एक की मौत और एक घायल

झारखंड से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार की रिपोर्ट

रूपेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार

 

सुरक्षा बलों की गोली से पिरी निवासी 23 वर्षीय ब्रह्मदेव सिंह की मौके पर ही मौत ही गयी और इसी गांव के दीनानाथ सिंह घायल हो गये।

मृतक ब्रह्मदेव सिंह के पिता सुशीलचन्द्र सिंह समेत कई ग्रामीणों का कहना है कि गांव के 6 युवक शिकार करने जंगल जा रहा थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने युवक को गोली मार दी।

मृत युवक के साथ गांव के ही रघुनाथ सिंह, सुकुल देव सिंह, गोविंद सिंह, राजेश्वर सिंह और दीनानाथ सिंह साथ में गये थे। ग्रामीणों का कहना है कि उनलोगों के पास 'भरूटवा बंदूक' था।

ग्रामीणों का कहना है कि युवाओं पर जब सुरक्षा बल गोली चला रहे था, उस समय युवाओं ने हाथ उठाकर बताया भी था कि हमलोग माओवादी नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण हैं। फिर भी सुरक्षा बलों  ने गोली चला दी।

लातेहार एसपी प्रशांत आनंद का कहना है कि कुमंडी इलाके में सीआरपीएफ, कोबरा व झारखंड जगुवार टीम के द्वारा माओवादियों के विरूद्ध संयुक्त रूप से अभियान चलाया जा रहा था। इसी दौरान पिरी जंगल के पास कुछ युवकों को हथियार के साथ देखा गया। उन्होंने पुलिस को जैसे भी देखा, सभी ने फायरिंग कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में एक युवक मारा गया।

युवक के साथ गये और 5 युवकों को पकड़ा गया है, उनसे पूछताछ की जा रही है। युवकों ने पुलिस को बताया कि वे शिकार करने जा रहे थे कि एक जानवर को देख गोली चला दी थी। इन युवकों के पास से 5 भरूटवा बंदूक भी बरामद किया गया है।

मालूम हो कि आज सुबह ही झारखंड के तमाम प्रमुख समाचारपत्र (प्रभात खबर, दैनिक भास्कर व दैनिक जागरण) के वेब पोर्टल पर खबर लगा दी गयी थी कि सुरक्षा बलों व माओवादियों के बीच मुठभेड़ हुई है, जिसमें एक माओवादी मारा गया है और 4 - 5 हथियार समेत कई सामान बरामद हुआ है। लेकिन शाम में लातेहार एसपी का बयान आने के बाद सभी ने खबरों को हटाकर संशोधित खबर चलायी है।

लातेहार एसपी और ग्रामीण आदिवासियों के बयान को देखने के बाद स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि सुरक्षा बलों ने घोर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार किया है। माओवादी समझकर गोली चलाने से पहले क्या उन्होंने उनके ड्रेस व हथियार को नहीं देखा?

क्योंकि सभी सिविल ड्रेस में थे और भरूटवा बंदूक के साथ थे। अगर सुरक्षा बल गोली चलाने से पहले थोड़ी सी भी इंसानियत और ईमानदारी दिखाते, तो आज एक मासूम युवा आदिवासी की जान नहीं जाती।

दरअसल झारखंड में माओवादी के नाम पर फर्जी मुठभेड़ की एक लम्बी लिस्ट है और किसी भी मामले में सुरक्षा बलों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है, इसीलिए सुरक्षा बल गोली चलाने से पहले उसके अंजाम के बारे में नहीं सोचते हैं। अब देखना यह होगा कि झारखंड सरकार इस हत्याकांड में सुरक्षा बलों पर एफआईआर दर्ज करती है या नहीं?


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