बिरसा का उल्लगुलान और टाना भगत का अहिंसक आंदोलन

विशद कुमार,  स्वतंत्र पत्रकार

 

बिरसा के बारे में

कहना ना होगा कि बिरसा के बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है। फिर भी कुछ प्रारंभिक जानकारी के साथ वर्तमान दौर में झारखंड उन्हें कैसे याद करता है या झारखंड में आज बिरसा की क्या प्रासंगिकता है? साथ ही बिरसा का उल्लगुलान (आंदोलन) के कुछ वर्षों बाद टाना भगत का अहिंसक आंदोलन को भी देखने की जरूरत है। 

बताना होगा कि रोगोद (रोगोतो) गाँव, जो पश्चिमी सिंहभूम के बंदगांव प्रखण्ड के टेबो पंचायत में आता है। यह गाँव बंदगांव से करीब 25 किमी की दूरी पर है और टेबो से 7-8 किमी दूर है, जो पोड़ाहाट के जंगलों के बीच बसा है।

बिरसा के अनुयायी पश्चिमी सिंहभूम के केयंटाई और जोंकोपई गांव के आसपास करीब 8 - 10 गांवों में रहते हैं। “कोरेंटिया बुरू” पहाड़ी का यह वही क्षेत्र है जहां बिरसा मुंडा अपने आखिरी समय में संघर्ष कर रहे थे। यह बंदगांव से करीब 25 किलोमीटर और टेबो से 7 - 8 किलोमीटर दूर है। 

पश्चिमी सिंहभूम के रोगोद (रोग्तो), जहां संकरा के एक स्कूल में बिरसा मुंडा की पहली बार गिरफ्तारी हुई थी। यहां तक जाने का रास्ता आज भी काफी कठीन है। इतना दुर्गम है कि केवल पैदल ही जाया जा सकता है। बरसात के दिनों में तो इस इलाके में जाना खतरे से खाली नहीं है। इसी इलाके में है कोरोंटेया बुरु पहाड़ी और इसके आसपास करीब 10 - 12 गांव हैं।

इन गांवों में लगभग 200 घर बिरसाइत लोगों के हैं, जिनकी जनसंख्या करीब एक हजार होगी। ये लोग बिरसा की ही पूजा करते हैं। ये किसी भी तरह का नशा नहीं करते। इन्हें विश्वास है कि एक दिन बिरसा आएगा तब इनके तमाम दुख दर्द समाप्त हो जाएंगे। अगर इनके घर लड़का पैदा होता है तो ये उसका नाम बिरसा रखते हैं। 

झारखंड के अन्य इलाकों में भी बिरसाइत हैं। जो बिरसा के विचारों पर आधारित धर्म के अनुयायी हैं। यही उनका धर्म है। उन्हें आज भी उम्मीद है कि उनके धरती आबा फिर वापस आएंगे और “जल - जंगल - जमीन” को मुक्त कराएंगे।

इलाके में सिंबुआ पहाड़ है जिसकी चोटी समतल है। उलगुलान के दिनों में बिरसा मुंडा इसी पहाड़ की चोटी पर यदा - कदा बैठकें किया करते थे। यहाँ से आधे मील दूरी पर सरवादा चर्च है, जिसपर बिरसा के अनुयायियों ने तीर चलाया था। क्योंकि चर्च द्वारा धर्म प्रचार करके यहां के लड़कों को इसाईयत की ओर प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।

बिरसा मुंडा के परपोते कन्हैया मुंडा को नाज है कि उनके परदादा की कुर्बानी बेकार नहीं गयी। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि “अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है। पहले अंग्रेज स्थानीय सूदखोर महाजनों व जमींदारों को प्रश्रय देते थे और जंगल से वनोत्पाद व खनिज ले जाते थे। आज भी यह सब हो रहा है, लेकिन स्वरूप बदला है। इसलिए आज भी उलगुलान की जरूरत है।”

कन्हैया मुंडा की उम्र करीब 22 साल है। वे रांची के जगन्नथपुर इलाके के योगदा सतसंग महाविद्यालय में छात्र हैं। इनकी और इनके परिजनों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। उनके पिता मंगल सिंह मुंडा पढ़े लिखे नहीं हैं। अत: गाँव में ही मजदूरी वगैरह करते हैं और किसी तरह कन्हैया की पढ़ाई हो पा रही है। 

‘बिरसा मुंडा की याद में’ शीर्षक से यह कविता आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा ने लिखी हैं- 

“मैं केवल देह नहीं

मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ

पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं

मैं भी मर नहीं सकता

मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता

उलगुलान!

उलगुलान!!

उलगुलान!!!”

‘उलगुलान’ यानी आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी का संघर्ष

1894 में छोटा नागपुर में भयंकर अकाल और महामारी फैली। बिरसा ने मात्र 19 साल की उम्र में पूरी तन्मयता और समर्पण के साथ अपने लोगों की सेवा की। उन्होंने लोगों को अन्धविश्वास से बाहर निकल कर बीमारी का इलाज करने के प्रति जागरूक किया। उसी वक्त वे आदिवासियों के लिए ‘धरती आबा’ यानी ‘धरती पिता’ हो गये।

बिरसा मुंडा आंदोलन की समाप्ति के करीब 13 साल बाद टाना भगत आंदोलन शुरू हुआ। वह ऐसा धार्मिक आंदोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। वह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नये 'पंथ' के निर्माण का आंदोलन था। इस मायने में वह बिरसा आंदोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धरित किये थे।

टाना भगत आंदोलन

टाना भगत आंदोलन में उन आदर्शों और मानदंडों के आधर पर जनजातीय पंथ को सुनिश्चित आकार प्रदान किया गया। बिरसा ने संघर्ष के दौरान शांतिमय और अहिंसक तरीके विकसित करने के प्रयास किये। टाना भगत आंदोलन में अहिंसा को संषर्ष के अमोघ अस्त्र के रूप में स्वीकार किया गया। बिरसा आंदोलन के तहत झारखंड में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ, जिसको क्षेत्रीयता की सीमा में बांधा नहीं जा सकता था।

टाना भगत आंदोलन ने संगठन का ढांचा और मूल रणनीति में क्षेत्रीयता से मुक्त रह कर ऐसा आकार ग्रहण किया कि वह गांधी के नेतृत्व में जारी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन का अविभाज्य अंग बन गया।

उपलब्ध इतिहास के अनुसार वर्ष 1914 के दौर में जतरा उरांव के नेतृत्व में एक अहिंसक आंदोलन के लिए जो संगठन तैयार हुआ वह नये पंथ के रूप में विकसित हुआ, जिसमें करीब 26 हजार सदस्य शामिल हुए थे। 

जतरा उरांव का जन्म वर्तमान गुमला जिला के बिशुनपुर प्रखंड के चिंगारी गांव में 1888 में हुआ था। जतरा उरांव ने 1914 में आदिवासी समाज में पशु- बलि, मांस भक्षण, जीव हत्या, शराब सेवन आदि दुर्गुणों को छोड़ कर सात्विक जीवन यापन करने का अभियान छेड़ा। उन्होंने भूत-प्रेत जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ सात्विक एवं निडर जीवन की नयी शैली का सूत्रपात किया।

उसने शोषण और अन्याय के खिलाफ लड़ने की नयी दृष्टि आदिवासी समाज में विकसित की। इस आंदोलन का एक राजनीतिक लक्ष्य साफ दिखने लगा था। सात्विक जीवन के लिए इस नये पंथ पर चलने वाले हजारों आदिवासी सामंतों, साहुकारों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संगठित हो 'अहिंसक सेना' के सदस्य बन गये।

जतरा भगत के नेतृत्व में ऐलान हुआ कि माल गुजारी नहीं देंगे, बेगारी नहीं करेंगे और टैक्स नहीं देंगे। उसके साथ ही जतरा भगत का विद्रोह 'टाना भगत आंदोलन' के रूप में सुर्खियों में आ गया। आंदोलन के मूल चरित्र और नीति को समझने में असमर्थ अंग्रेजी सरकार ने घबराकर जतरा उरांव को 1914 में गिरफ्तार कर लिया। उन्हें डेढ़ साल की सजा दी गयी। जेल से छूटने के बाद जतरा उरांव का अचानक मौत हो गयी। लेकिन टाना भगत आंदोलन अपनी अहिंसक नीति के कारण निरंतर विकसित होते हुए महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गया।

यह तो कांग्रेस के इतिहास में भी दर्ज है कि 1922 में कांग्रेस के गया सम्मेलन और 1923 के नागपुर सत्याग्रह में बड़ी संख्या में टाना भगत शामिल हुए थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने महात्मा गांधी को 400 रुपये की थैली दी थी। कालांतर में रीति-रिवाजों में भिन्नता के कारण टाना भगतों की कई शाखाएं पनप गयीं। उनकी प्रमुख शाखा को सादा भगत कहा जाता है। इसके अलावे बाछीदान भगत, करमा भगत, लोदरी भगत, नवा भगत, नारायण भगत, गौरक्षणी भगत आदि कई शाखाएं हैं।

1948 में देश की आजाद सरकार ने 'टाना भगत रैयत एग्रिकल्चरल लैंड रेस्टोरेशन एक्ट' पारित किया। यह अधिनियम अपने आप में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ टाना भगतों के आंदोलन की व्यापकता और उनकी कुर्बानी का आईना है। इस अधिनियम में 1913 से 1942 तक की अवधि में अंग्रेज सरकार द्वारा टाना भगतों की नीलाम की गयी जमीन को वापस दिलाने का प्रावधान किया गया है।

 1920 के बाद भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में टाना भगतों का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। कहना ना होगा कि टाना भगत आन्दोलन गाँधी से भी कहीं अधिक गांधीवादी था। वह मूलत: जनजातियों की देशज संस्कृति उपज थी। टाना भगत आन्दोलन छोटानागपुर की भूमि पर मौलिक अहिंसात्मक असहयोगात्मक आन्दोलन था, जो अहिंसक होने के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी।  

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिरसा का उल्लगुलान मतलब सशस्त्र आंदोलन और टाना भगत का अहिंसक आंदोलन पर महादेव टोप्पो कहते हैं कि टाना भगत का आंदोलन अहिंसक था, जो ब्राह्मणवाद के करीब तो दिखता है लेकिन उसे हम ब्राह्मणवादी इसलिए नहीं मान सकते कि क्योंकि वह अपने कर्मकांडों में ब्राह्मण को प्रवेश नहीं होने देता है। लेकिन उनका जो कर्मकांड है उसमें ब्राह्मणवादी समानता है। जैसे मांस—मछली नहीं खाना, दूसरे का पानी नहीं पीना, दूसरे के घर का खाना नहीं खाना आदि, यह एक तरह से आदिवासीयत से कटकर रहना हुआ। आदिवासीयत में सामुहिकता का बोध है जो टाना भगत पंथ में नहीं है। 

वे आगे कहते हैं कि बिरसा मुंडा का बिरसाईत धर्म में भी कुछ इसी प्रकार की वृति है। जिसे इतिहासकारों ने गौण कर केवल उनका उल्लगुलानी पक्ष को ही हाईलाईट किया है। दरअसल टाना भगत के लोग कांग्रेस के साथ चले गए इसलिए वे चर्चे में ज्यादा आए। कांग्रेस के इतिहास में भी दर्ज है कि 1922 में कांग्रेस के गया सम्मेलन और 1923 के नागपुर सत्याग्रह में बड़ी संख्या में टाना भगत शामिल हुए थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने महात्मा गांधी को 400 रु. की थैली दी थी। टोप्पो कहते हैं कि बिरसाईत लोगों ने ऐसा नहीं किया, वे लोग किसी राजनीतिक मंच पर नहीं गए। इसलिए उन्हें ज्यादा महत्व नहीं मिला। वे लोग आज भी सादा कपड़ा पहनते हैं और सादा जीवन व्यतीत करते हैं। वे लोग आज भी दो—चार गांवों तक सिमट कर रह गए हैं।

बिरसा मुंडा के नाम के पर झारखंड में क्या क्या है? 

रांची के वर्तमान सर्कुलर रोड या कचहरी रोड में ब्रिटिश काल में रांची सेंट्रल जेल हुआ करता था, बिरसा मुंडा को इसी जेल में रखा गया था। इसी जेल में उन्हें धीमा जहर देकर मार दिया गया था। जिसे झारखंड अलग राज्य बनने के 8 साल बाद होटवार में बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारा बनाकर स्थानांतरित कर दिया गया और रांची सेंट्रल जेल को तोड़कर उसे भगवान बिरसा मुंडा म्यूजियम का निर्माण किया जा रहा है। इस म्यूजियम में भगवान बिरसा मुंडा की जीवनी को दर्शाया जाएगा। संग्रहालय में एक तरफ भगवान बिरसा मुंडा से जुड़ी स्मृतियां संजो कर रखी जाएंगी, तो दूसरी तरफ देश के स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड के वीर सपूतों की बलिदान से लोगों को रूबरू कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को संरक्षित किया जाएगा।

पुराने जेल परिसर में भगवान बिरसा मुंडा की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी, जो इस संग्रहालय में पहुंचने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनेगा। वहीं, परिसर में लाइट एंड साउंड शो का भी प्रावधान किया जाएगा। शाम ढलते ही लेजर लाइटिंग से भगवान बिरसा मुंडा की जीवनी प्रदर्शित की जाएगी। पूरे कैंपस में जहां-जहां खुली जगह है, उसे खूबसूरत गार्डन के तौर पर विकसित किया जा रहा है। जिसे आम भाषा में पार्क समझा जा रहा है।   

झारखंड की प्रमुख जेलों में से रांची के बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारा होटवार है। यह रांची सेंट्रल जेल को होटवार में स्थानांतरण के बाद बिरसा मुंडा के नाम पर बनाया गया है। इसी जेल में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला मामले बंद थे, जिन्हें हाल ही में रिहा किया गया।

रांची के कोकर क्षेत्र में कोकर और लालपुर के बीच अवस्थित नाला डिस्लरी पुल के पास बिरसा मुंडा का समाधि स्थल है। कहा जाता है कि बिरसा मुंडा की मौत के बाद यहां ही अंग्रेजों उन्हें जलाया था। क्योंकि यहां एक बड़ा सा हिस्सा आज भी खाली है, जिसमें हमेंशा पानी भरा रहता है, जिसका पानी पूरब- उत्तर की दिशा से आता है। उस तरफ खेत बना हुआ है, जबकि वह कभी बड़ा सा तालाब रहा होगा।

जिस पर अब लगभग बिल्डिंग बन गए हैं। बिरसा का स्मारक दक्षिण-पश्चिम की ओर है। पिछले साल किसी शरारती तत्व ने बिरसा की मूर्ति को क्षति ग्रस्त कर दिया था। अब काफी सुरक्षित कर दिया गया है।

पहली बार रांची के हीनू में स्थित चौक पर एकीकृत बिहार में बिरसा मुंडा की प्रतिमा लगी। मूर्तिकार ने बिरसा की मूर्ति को जंजीर से बंधा हुआ दिखाया था। 80 के दशक में जब उपन्यासकार महाश्वेता देवी रांची आई थीं। उन्होंने बिरसा की प्रतिमा को देख कहा था कि बिरसा को जंजीर में जकड़ा हुआ दिखाना उनका अपमान होगा। फिर वहां नई प्रतिमा लगाई गई, जो आज भी मौजूद है। वह चौक हवाई अड्डा की ओर भी जाता है। 

बिरसा मुंडा के नाम पर रांची में ही बिरसा कृषि विश्वविद्यालय है। जिसके तहत कृषि संकाय (रांची कृषि महाविद्यालय), वेटनरी संकाय (रांची वेटनरी महाविद्यालय), वानिकी संकाय जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, मत्स्य विज्ञान कॉलेज गुमला, सेंटर फॉर एग्री बिजनेस मैनेजमेंट, रबीन्द्रनाथ टैगोर कृषि महाविद्यालय देवघर, कृषि महाविद्यालय गढ़वा, तिलक मांझी कृषि महाविद्यालय गोड्डा, कॉलेज ऑफ हार्टीकल्चर (बागवानी), कृषि अभियंत्रण महाविद्यालय रांची, फूलो झाँनौ मुर्मू डेयरी प्रौद्योगिकी महाविद्यालय दुमका है। इस विश्वविद्यालय के प्रांगण में बिरसा मुंडा का एक बड़ा स्टेचू है।

बिरसा मुंडा के नाम पर रांची के हिनू मोहल्ले के समीप बिरसा मुंडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। इसका प्रबंधन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण करती है। यह मुख्य शहर से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर है। यह भारत का पच्चीसवां सबसे व्यस्त विमानक्षेत्र है। 

वर्तमान में एक ही टर्मिनल है, इसे 24 मार्च 2013 को खोला गया था। इस टर्मिनल में यात्रा डेस्क, लाउंज आदि कि सुविधाएं हैं। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने 3 और विमान पार्किंग स्टैंड बनाने का फैसला किया है, जिससे यह भारत का पहला टीयर-2 विमान क्षेत्र बन जाएगा। जिसमें 8 विमान पार्किंग स्टैंड होंगे। यहाँ पर रात में लैंडिंग भी मुफ्त है, ताकि सुबह में महानगरों के लिए और उड़ान हो सके।

इसके अलावा खूंटी जिले में स्थित टुम्बारी बुरू पहाड़ी पर बिरसा मुंडा के नाम पर एक 100 फीट का मीनार है, जिसे राम दयाल सिंह मुंडा और मेघनाथ के सहयोग से बनाया गया है। दुम्बारी बुरु का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है कि इसी पहाड़ी से बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी हुई थी। इसके अलावा झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में बिरसा के नाम पर चौक चौराहे हैं।  
 


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