कोरोना महामारी से निपटने में पूरी तरह विफल मोदी सरकार

तुहिन देब

 

जब वर्ष 2020 की शुरुआत में कोरोना महामारी ने पांव पसारना शुरू किया था, उस समय ही मोदी की नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) जैसे कारपोरेट फासीवादी हमलों की वजह से आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र अद्वितीय रूप से छिन्न-भिन्न होने के कगार पर पहुंच चुका था, जबकि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं मोदी शासन की दुम बनकर रह गई थीं।

उसके छह साल के शासन काल के मूल्याकंन के आधार पर, सभी मान्य आर्थिक व सामाजिक संकेतकों के अनुसार, नव-उदारवादी केन्द्रों ने भी वर्ष 2020 की शुरुआत में ही भारत को दुनिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला देश घोषित कर दिया था।

कोविड 19 को एक "महामारी" के रूप में घोषित करने से पहले ही, वर्ष 2020 की शुरुआत में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सभी देशों से अपने अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों पर समुचित प्रतिबंध लगाने के लिए कहा था। किन्तु मोदी ने फरवरी 2020 में "नमस्ते ट्रम्प" कार्यक्रम आयोजित किया।

जब कोरोना मरीजों की संख्या करीब 500 और कोविड मृतकों की संख्या करीब 10 थी, उस समय विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल और विशेषज्ञों के सलाह की पूरी तरह अवहेलना करते हुए 24 मार्च 2020 को एकदम अचानक से मोदी ने 138 करोड़ आबादी पर दुनिया का सबसे कठोर, निष्ठुर, पीड़ादायक और लम्बा लाकडाउन थोप दिया था और साथ में कोरोना भगाने के लिए रूढ़िवादी भगवा तमाशा करवाया गया था।

सार्वजनिक नियंत्रण में देश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए किसी प्रकार की योजना बनाएं बिना ही, उसने 25 मार्च को ऐलान कर दिया कि भारत कोरोना को 21 दिन में  हरा देगा, लेकिन लाकडाउन को बार-बार आगे बढ़ाया जाता रहा। इस दौरान कोविड नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किए बिना, लाकडाउन से प्रभावित करोड़ों लोगों, विशेष रूप से प्रवासी मजदूरों को कोई सहायता नहीं दी गई।

निर्मम लाकडाउन तीन महीने तक जारी रहा, जिसका करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इसके बाद, अपने कारपोरेट परस्त चरित्र के अनुरूप, किन्तु रूढ़िवादी, फासीवादी मोदी ने सभी आर्थिक व सामाजिक क्षेत्रों में कारपोरेट पूंजी के घोड़े को बेलगाम छोड़ने के लिए महामारी का इस्तेमाल एक अवसर के रूप में किया। इस दौरान चार श्रम संहिता के जरिए मजदूरों के अधिकारों की कटौती कर दी गई, नई शिक्षा नीति (एनसीपी 2020) लाई गई, कृषि के कारपोरेटीकरण के लिए तीन कृषि कानून बनाए गए, जोड़तोड़ कर बाबरी मस्जिद की जमीन को वहां भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए आरएसएस को सौंप दिया गया और इसके साथ ही जय श्री राम को भाजपा का केन्द्रीय राजनैतिक नारा बना दिया गया!

इन कारपोरेट परस्त नीतियों का सीधा परिणाम यह हुआ है कि समाज के ऊपरी एक प्रतिशत महाअमीरों ने अपनी सम्पत्ति को 35 प्रतिशत बढ़ाया, जबकि वर्ष 2020 में ही और भी 75 लाख लोगों को गरीबी में धकेल दिया गया।

उत्क्रमित कोरोनावायरस की दूसरी लहर के बारे में पहले से वैश्विक चेतावनी थी और इस संदर्भ में यूरोप के कई देशों की सरकारें वर्ष 2020 के अंत से ही सावधानी बरतने लगे थे, किन्तु भारत में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की संसदीय समिति और कोविड प्रबंधन की विशेषज्ञ कमेटी (जिसमें मोदी के 'यस मैन', जी-हजूरी करने वाले, भरे गए हैं) दोनों के द्वारा महामारी के प्राणघातक दूसरी लहर के आसन्न खतरे की भविष्यवाणी करने और  स्वास्थ्य सेवाओं तथा आक्सीजन आपूर्ति में गंभीर व्यवधान सहित अस्पतालों में सुविधाओं में भारी कमी की चेतावनी दिए जाने के बावजूद, मोदी और उसके जन संपर्क अधिकारियों ने न केवल घोर लापरवाही बरती और इसकी आपराधिक अनदेखी की, बल्कि वे कारपोरेट मीडिया के पूर्ण समर्थन से कोरोनावायरस पर 'विजय' का जश्न भी मनाने लगे थे!

उसने फरवरी 2021 में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में यहां तक घोषित कर दिया गया था कि भारत ने कोरोनावायरस को खत्म कर दिया है और अब दुनिया को बचाने में लगा हुआ है! यहां तक कि जब कोविड'9 के मामलों की दूसरी लहर के लक्षण साफ तौर पर नजर आने लगे थे, तब भी मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन 8 मार्च को कह रहे थे कि "हम कोरोना का खेल खत्म करने के कगार पर हैं", वहीं मोदी-शाह देश भर में चुनावी रैलियां करने, कुम्भ मेला आयोजित करने, अपनी छवि बनाने के लिए 20000 करोड़ रुपए की सेन्ट्रल विस्टा परियोजना को प्राथमिकता देते हुए निर्माण करने आदि की योजना बना रहे थे!

आज भारत कोरोना मामलों का केन्द्र बिन्दु बन गया है जहां रोजाना करीब चार लाख नए मरीज आ रहे हैं और करीब चार हजार लोगों की मौत हो रही है, जो दुनिया के सभी कोवीड 19 के मामलों और मौतों का एक-तिहाई है। वास्तविक संख्या इससे पांच गुना अधिक हो सकती है। श्मशान अपनी क्षमता से अधिक काम कर रहे हैं, लाशें सड़कों और पार्क में पड़ी हैं, घरों में सड़ रही हैं नदियों और जलाशयों में तैर रही हैं। मौत के सौदागर, मोदी की अगुवाई में भारत कोविड नर्क बन गया है।

हालांकि भारत टीका का दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक है, किन्तु अब तक दो प्रतिशत से भी कम भारतीयों को टीके की पहली डोज दी गई है, जबकि सारे पश्चिमी देशों ने लगभग पूर्ण टीका सुरक्षा प्राप्त कर ली है। कारपोरेट घरानों को टीका के उत्पादन, खरीद और वितरण पर पूरा नियंत्रण सौंप देने से, मोदी राज में, भारत के नागरिकों को दुनिया में टीके की सबसे अधिक कीमत देने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है, जबकि यह लम्बे समय से सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जनता के लिए मुफ्त टीका और सस्ती दवा की पैरवी करता रहा है।

मौजूदा त्रासदी केवल व्यवस्थागत नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर कारपोरेट, भगवा फासीवादी मोदी राज और उसके घमंड और अयोग्यता का परिणाम है। यह मोदी-निर्मित विपदा है, या जैसा कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रीका, लांसेट ने कहा है, वे "स्व-आरोपित राष्ट्रीय महाविपत्ति" की अगुवाई कर रहे हैं। देश की विनाशकारी परिस्थिति के लिए अपनी जवाबदेही स्वीकार करने के बजाय, वे अपने खिलाफ सोशल मीडिया में भी हो रही सभी आलोचनाओं का दमन कर रहे हैं, जबकि सांस लेने के लिए तड़प रहे मरीज सोशल मीडिया में आक्सीजन के लिए गुहार लगा रहे हैं।

जो पत्रकार और मीडिया के लोग देश की भयावह परिस्थिति की खबर दे रहे हैं, उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया जा रहा है! जब लाखों किसान खेती को कारपोरेटीकरण से बचाने के लिए ऐतिहासिक संघर्ष कर रहे हैं, उन पर निष्ठुर दमन किया जा रहा है। इसलिए, महामारी के मद्देनजर मोदी से उसकी आपराधिक अनदेखी के लिए जवाब मांगा जाना चाहिए। इस संदर्भ में,यह दिलचस्प है कि कोरोना से निपटने में असफल रहने पर इक़वेडोर, पेरू, अर्जेंटीना, इराक सहित 8 देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है।

मगर भारत के स्वास्थ्य मंत्री  व प्रधानमंत्री अपनी तमाम आपराधिक उपेक्षा व चरम असंवेदनशीलता के बावजूद अपने पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार नहीं हैं। लाखों लाख युवाओं समेत जनता के एक बड़े हिस्से ने सोशल मीडिया पर और सड़कों पर  मांग की है की मोदी तत्काल इस्तीफा दे।लेकिन क्रूर मोदी सरकार, बेशर्मी से इस्तीफा देना तो दूर  जनता के विरोध को कुचलने के लिए सोशल मीडिया  प्लेटफॉर्म पर ही प्रतिबंध लगाने के जुगाड़ में है। चूंकि मोदी, भारत के सबसे बड़े आतंकवादी संगठन आरएसएस के अनुयायी हैं इसीलिए फॉसिस्टों की तर्ज़ पर 'मन की बात' में अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए अपनी उपलब्धियों का बखान किया।

उनकी उपलब्धियाँ ये है कि उन्होंने कॉरपोरेट घरानों को देश को बेरोकटोक लूटने दिया और आम जनता को गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और तबाही के अंधेरे में धकेल दिया।  देश के देशभक्त,जनवादी, क्रांतिकारी वामपंथी और संघर्षशील ताकतों ने घोर जनविरोधी मोदी के इस्तीफे के इस अभियान में  सभी को एक साथ आने की अपील की है। उन्होंने  मोदी के तत्काल इस्तीफे की मांग को जनता के आह्वान में बदलने का प्रयास करने की अपील की है।


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