अपने मीडिया हाऊस के लिये समय रहते उठ खड़े हो!
हमारे लिए विशेषकर बहुजनों अर्थात एससी, एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यक के लिए, हमें वास्तव में कभी भी नई शुरुआत करने का मौका ही नहीं मिला। हमें हमेशा मताधिकार से वंचित रखा गया, हमेशा दूसरों की दया पर रहने की सिख दी गई। इस समय जो चीज मुझे वास्तव में चिंतित करती है, वह प्रक्रिया है जिसमें अन्य समुदाय की तरह हमें अपने बातों को रखने के लिये कार्पोरेट और ब्राह्मणवादी मीडिया पर निर्भर कर दिया गया है, उसके बिना तसल्ली मिलती ही नहीं है।

मुझे यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं कि मेरी अपनी राजनीति क्या होनी चाहिए। मैं जिस भी राजनीति का पालन करता हूं, वह आज पूरी तरह से पस्त, पूरी तरह से पराजित है। सवाल यह है कि भाई उच्च जाति के हमले का सामना कौन कर सकता है? वास्तव में कोई नहीं।
निर्भया आंदोलन के दौरान, भ्रष्टाचार और आरक्षण विरोधी आंदोलन मंडल 2 के दौरान हमने दिल्ली को देखा है तब से ही मन में एक सोच हमेशा रहा है कि दलित कब बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर जंतर-मंतर, राम लीला मैदान पर कब्जा कर पाएंगे, दिल्ली को कई दिनों तक घेरकर हिला पायेंगे और एक ऐसा शक्तिशाली आंदोलन खड़ा कर सकें कि यह पूरे देश में गूंज उठे।
लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल दलित ही नहीं हैं जो ऐसा करने में असमर्थ हैं, यह उच्च जाति के हिंदुओं को छोडक़र अन्यों के लिये मुमकिन नहीं है। दशकों तक दलित उत्पीडऩे में मारे जाने के बावजूद, 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हजारों की संख्या में मारे गए मुसलमान भी न्याय की मांग करने के लिए कभी भी दिल्ली पर कब्जा नहीं कर सके, एक पल के लिए भी नहीं। 1984 के बाद के सिखों या ईसाइयों ने ग्राह्म स्टेन की हत्या के बाद आज भी कुचले जा रहे हैं।
आदिवासी अब हर दिन माओवादी के आरोप में जेलों में डाले जा रहे हैं और उनका कत्लेआम हो रहा है उनकी नजरिये से देखा जाये तो ऐसा लोकतांत्रिक लड़ाई हमने दिल्ली के सिने में देखी ही नहीं है। हां यह ऊंची जातियों और उनके समुदाय के लिये जरूर संभव हो सका है।
हमने देखा कि केवल उच्च जाति के हिंदू ही ऐसा कर सकते थे जब उन्हें किसी चीज के लिए लडऩे की जरूरत होती थी। सवाल यह है कि क्या हम दिल्ली के सीने में खड़े होकर लड़ाई नहीं लड़ सकते थे? बल्कि हमें इस कदर वंचित रख दिया गया है कि अब हमें अपने उत्पीडऩ, दलन और दर्द को बेहतर ढ़ंग से पटल पर रखने के लिये स्पष्ट रूप से एक उच्च जाति के वार्ताकार, समीक्षक, पत्रकार और सम्पादक की जरूरत होती है।
हमारे लिए विशेषकर बहुजनों अर्थात एससी, एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यक के लिए, हमें वास्तव में कभी भी नई शुरुआत करने का मौका ही नहीं मिला। हमें हमेशा मताधिकार से वंचित रखा गया, हमेशा दूसरों की दया पर रहने की सिख दी गई। इस समय जो चीज मुझे वास्तव में चिंतित करती है, वह प्रक्रिया है जिसमें अन्य समुदाय की तरह हमें अपने बातों को रखने के लिये कार्पोरेट और ब्राह्मणवादी मीडिया पर निर्भर कर दिया गया है उसके बिना तसल्ली मिलती ही नहीं है।
रवीश और अभिशार के बिना हमारी मुक्ति नहीं दिखती। शायद ऐसी ही प्रक्रियाओं ने हमें पददलित और अछूत बना दिया होगा, जो सबसे अधिक तिरस्कृत है - सैकड़ों साल पहले जैसा! और जब हम मीडिया हाऊस की बात करते हैं तो हमारे लोगों की चेहरों की आड़ में उच्च जाति के लोग खिलखिलाकर हंसते नजर आते हैं।
गिरजाघरों पर फासीवादी हमलों, घर वापसी कार्यक्रमों, इस सभी धार्मिक कट्टरवाद का किसी एक धर्म को दूसरों की कीमत पर मजबूत बनाने या भारत को एक हिंदू देश में बदलने के हमने कोई नई कीमत नहीं चुकाई है बल्कि यह पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र बनने की जद्दोजहद है। इसके बारे में कोई गलफहमी में ना रहें।
आज जो हमारे ऊपर, जीएसटी, नोटबंदी, एनआरसी और अब कोरोना के बहाने हमले हो रहे हैं उनका परिणाम वास्तव में कुछ अधिक निंदनीय नहीं है अगर उचित अभिव्यक्ति के लिये उचित माध्यम का इंतजाम नहीं किया गया तो सबकुछ मूकनायक के और सौ साल पीछे धकेल दिये जायंगे। यह बाजार हमारी समुदाय को स्थायी ग्राहकों में बदल ही नहीं रहे हैं बल्कि हमारी अब तक मिली एक वोट का अधिकार, एक समान नागरिकता को भी छिन ले जाएगी।
अंतत: हमें उस ‘कम्युनल राइट’ के खिलाफ ले जाकर यह उच्च जाति राष्ट्र हमें उनके संरक्षण में जीवित रहने मजबूर कर रही है और यह सिर्फ मीडिया में ही नहीं है बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साथ तमाम मौलिक और बुनियादी सुविधाओं के हनन के रूप में हम देख रहे हैं।
क्या हमारा समुदाय देश की सत्ता और उसके संसाधनों को साझा करने का सपना नहीं देख सकता है, लेकिन अपने बच्चों को इस प्रायोजित हमलों का सामना करने से बचाने के लिए कड़ी मेहनत करने में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए बल्कि बंदियों की तरह धार्मिक स्थान को जलाए जाने और अपनी संस्कृति को नेस्तनाबूत होते तथा अपमानित होते हुवे चुनाव में एक निरंकुश शासक की हार से खुश रहने से भी ज्यादा आगे की सोचने की जरूरत है।
लेकिन इस उच्चवर्गीय समाज व्यवस्था में कुछ और भी भयानक घट रहा है। वे किसी भी सार्वभौमिक दमित समाज के आजादी, लोकतंत्र और आपकी सम्प्रभूता को छिनती ही नहीं है इससे भी अधिक आपके लिए बोलने की आपकी क्षमता और बनाये गये माध्यम को भी छिन लेना चाहती है। अब तक का इतिहास सिर्फ यही बताता है कि ज्यादा से ज्यादा आप अपने समुदाय और उसकी पीड़ा के प्रवक्ता हो सकते हैं। और कुछ नहीं।
तो सावधान रहिये जागरूक रहिये अपनी मीडिया हाऊस के लिये आपको निडरता और ईमानदारी के साथ खड़े होने की जरूरत है। ऐसे विकृत समाज में आप कभी भी एक ईमानदार आदमी नहीं पैदा कर सकते, ईमानदार से तात्पर्य यह कि आप, आम आदमी के लिए बोल ना सके। यहां समझिये आप दलित, आदिवासी, ओबीसी, मुस्लिम, ईसाई कभी नहीं हो सकते। ध्यान रहे उसे हमेशा ऊंची जाति का हिंदू चाहिए और कुछ नहीं।
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