आदिवासियों की हत्या, गिरफ्तारी और उन पर अघोषित अत्याचार
सिलगेर के नाम सम्पादकीय
उत्तम कुमारजहां तक बस्तर की बात है जब जब वहां गोली चली है तमाम राजनैतिक पार्टियां और सामाजिक संगठन चुप्पी साध लेते हैं। यहां हत्याओं का एक लंबा इतिहास है। कुछ हत्याओं को आप सभी जानते होंगे। जैसे झलियामेली, साडक़ेगुड़ा, नुलकातोंग इत्यादि इत्यादि। कई यह भी जस्टीफाई करते रहते हैं कि सुरक्षाबलों और आदिवासियों में से किसे शहीद का दर्जा दिया जाये।

आप सभी जानते हैं कि हाल ही में सुकमा-बीजापुर जिले के सिलगेर गांव मे 18 मई को 3 आदिवासियों को पुलिस के गोली मारकर हत्या करने की बात खबरों में रहा है। पहली बार मृत आदिवासियों को शहीद भी कहा गया है। सवाल यह नहीं है कि किसे शहीद कहा जाये। सवाल यह कि जो सरकारी साजिश के तहत मारे जा रहे हैं सभी को शहीद का दर्जा मिलना चाहिए?
लगभग पिछले चार दशकों से बस्तर में आदिवासियों के ऊपर न केवल माओवादियों के द्वारा बल्कि सेना के द्वारा तथा राज्य की पुलिस सुरक्षा बलों के द्वारा लगातार हथियारबद्ध होकर अन्याय अत्याचार हो रहा है तथा वर्तमान में भी यह थमने का नाम नहीं ले रहा है और अभी तक इसका कोई भी सामाजिक अथवा राजनीतिक समाधान नहीं खोजा जा सका है।
राज्य के सुकमा और बीजापुर जिले के सीमा पर स्थित सिलगेर गांव मे सुरक्षा बलो के द्वारा एक हफ्ता पूर्व से केंप लगाया जा रहा है जिसका विरोध गांव के लोग करने के लिए लगातार जा रहे थे। कैम्प का विराध गोलीचालन में बदल गया। इस संबंध मे गांव वालों का स्पष्ट मत है कि नक्सलवादी आदिवासियों के जल जंगल और जमीन बचाने के लिए आंदोलन के बहाने आदिवासियों पर अत्याचार करते हैं। क्योंकि हथियार दोनों के पास मौजूद हैं।
सरकार का तर्क रहता है कि सडक़ें नहीं बनेगी तो रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य गांव तक कैसे पहुंचेगा। प्राय: देखा गया है कि आदिवासी क्षेत्रों का विकास कम बल्कि बहुमूल्य खनिज, जल और वन्य सम्पदा को पूंजीपतियों के कम्पनियों के पहुंच मार्ग के रूप में आदिवासी क्षेत्र प्रयोग में लाये जा रहे हैं।
गांव में कैंप का यह पहला विरोध नहीं है सुरक्षा बलों के कैम्प का विरोध करते हुये हमने पोटाली पर कवर स्टोरी किया है जहां ग्रामीणों का साफ कहना था कि वह गांव में कैम्प के पक्षधर नहीं है। इससे उनके दिनचर्या, अनाज का संग्रहण और जंगल पर प्रभाव पड़ता है। दशकों से नक्सलवादियों को सुरक्षा बलों के द्वारा देशद्रोही बताकर उन्हे समाप्त करने का कार्य अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। उल्टे सुरक्षा बलों के केंप बस्तर के गावों के आसपास लगाकर आदिवासियों की रक्षा करने की जगह आदिवासियों पर ही अन्याय और अत्याचार निरंकुशता के साथ बढ़ रहे हैं।
बहरहाल परिस्थिति यह है कि सरकार के द्वारा बनाई गई नीतियों का कारगर ढंग से जमीन पर ना उतरने से तथा नक्सलियों के द्वारा खुद की बनाई गयी नीतियों को जिस तरह से अमल में लाया जाता है इन दोनों के द्वारा की गयी कार्यवाही से केवल और केवल आदिवासी का कत्लेआम हो रहा है। फलत: इनकी गिरफ्तारी से लेकर इनपर अनाचार के खबरें लगातार आ रहे हैं और अब हत्या की खबर आ रही है संवैधानिक और गैरसंवैधानिक पाटों में पिसते हुवे आदिवासी अपनी जान गवां रहे हैं।
सलवा जुडूम के समय हमने पाया है कि सरकार की गलत नीतियों के चलते आदिवासियों को आदिवासियों के द्वारा ही मरवाने जैसी नीतियों के कारण सुप्रीम कोर्ट को भी कई बार तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी है। जिसपर जगदलपुर, नारायणपुर, बस्तर, औंधी, राजनांदगांव जैसे कस्बे शहर का रूप लेता जा रहा है आदिवासी अपनी संस्कृति, जमीन और वजूद से दूर होता जा रहा है।
सरकार और नक्सलवादियों द्वारा खड़े किये गये युद्ध में आदिवासी सीधा अपनी बहन बेटियों के बलात्कार और एक अघोषित युद्ध में खुद की जान गवांकर तथा अपनी निर्मम हत्या करवाकर समस्या को उलझा ही रहे हैं। सरकार ने कभी भी इस समस्या के समाधान के लिये सकारात्मक प्रयास नहीं किये हैं। इमानदारी से कहा जाये तो शांति स्थापना, बातचीत और सुरक्षाबलों को बैरकों में भेजने की तैयारी सरकार के नियत में कभी नहीं दिखी है बल्कि खनिज, वन और जल संसाधनों को बाजार मुहैया कराना ही इनका उद्देश्य नजर आता है।
बस्तर में जो कुछ भी चल रहा है उसका समाधान है। ज्यादा दूर नहीं संविधान को उठाकर देखने की जरूरत है। यदि अधिसूचित क्षेत्र में संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची लागू कर दिये जाये तो नब्बे प्रतिशत समस्या का समाधान हो जाता है। यही कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विषमता के राह खुल जाते हैं।
इसमे कोई दो मत नहीं है कि मूलनिवासी आदिवासी जिन अनुसूचित क्षेत्रों में रहते है उन्हीं क्षेत्रों में जमीन के नीचे मूल्यवान धातुएं पायी जाती है जिसपर पूंजीपतियों की गिद्ध दृष्टि है और इसके लिए वो किसी भी हद तक जाकर चाहे सरकार के नुमाइन्दों के द्वारा अथवा नक्सलियों से साँठ गांठ कर उसे प्राप्त करके अपनी पूंजी बढ़ाना चाहते है जिस कारण मूलनिवासी आदिवासी हमेशा हाशिये पर रहता है और लगातार अपनी जान गवांकर इसकी कीमत चुका रहा है।
जबकि उत्खनन और बेदखल के लिये सही नीति नियम जरूरी है। कम्पनियां लगने पर नौकरी और प्रबंधन शेयर होल्डर बनाया जाना चाहिए और सबकुछ ग्राम सभा के प्रस्ताव पर छोड़ दिया जाना चाहिए।
18 मई 2021 को सुरक्षा बलों के द्वारा सुकमा और बीजापुर जिला के सीमा पर स्थित सिलगेर गाव मे आदिवासियों के द्वारा सुरक्षा बलों के केंप लगाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे, उन पर अंधाधुंध फाइरिंग की गयी जिसमें लगभग 3 निर्दोष आदिवासी मारे गए हैं उनमें से 18 घायल और 9 गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इत्तेफाक देखिये सम्पदाकीय लिखे जाने तक सिलगेर गांव से फोन आया। वे कह रहे थे कि आ रहे हैं ना? उन लोगों ने बताया कि 4 लोगों की गोली से मौत हुई है और 18 लोग घायल हुवे हैं।
सुरक्षा बलो के द्वारा सिलगेर गांव के पास बनाए जा रहे केंप का विरोध करने के लिए आसपास के दर्जनो गावों से आदिवासी लगभग पांच हजार से भी ज्यादा संख्या में उपस्थित थे ऐसे मे आई. जी. सुंदरराज पी. का ये बयान की आदिवासियों को नक्सलियों के द्वारा उकसाने पर वे कैंप का विरोध करने पहुंच गए थे हास्यास्पद प्रतीत होता है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नही है।
ये हत्यायें सुरक्षा बलों के द्वारा की गयी है और आने वाले समय में इसकी उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के ऊपर समुचित कार्यवाही कर आदिवासियों के लिये न्याय और आंदोलन के बीच रास्ता निकालना होगा। इस तरह हजारों आदिवासी जेलों में कैद है कोरोना महामारी में उन्हें नि:शर्त रिहा करने की जरूरत है।
एक बात तो साफ है आदिवासीमाओवादी और नक्सलवादियों का और उनकी विचारधारा का समर्थन नहीं करते है और ना ही सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों पर भी आश्रित रहना चाहते हैं। इस प्रकृति को समझने के लिये आदिवासी इतिहास, मानवशास्त्र और विज्ञान को समझना जरूरी है। उसे कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ जंगल चाहिये जो उनका वासस्थान है। आदिवासियों के हित में कैंप का समर्थन कोई सभ्य समाज नहीं करेगा।
सरकार को चाहिए कि राज्यपाल के निर्देश पर घटना की निष्पक्ष जांच करने के आदेश पारित करें तथा दोषियों को उनके इस जघन्य कृत्य के लिए कानून के अंतर्गत सजा देकर राष्ट्रपति को इसकी जानकारी प्रेषित करें।
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