बेला भाटिया और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को डिटेन कर रोकने की कोशिश
सोनी सोरी को 2 दिन से आंदोलन के क्षेत्र में जाने नहीं दिया जा रहा है
द कोरस टीमसामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया और अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को बीजापुर प्रशासन ने कल रात से सर्किट हाउस में डिटेन कर रोकने की कोशिश कर रही है। बेला भाटिया ज्यां द्रेज के साथ सिलेगर का दौरा करने जा रही थी, जो हाल ही में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी ग्रामीणों पर उनकी जमीन पर पुलिस शिविर की स्थापना के विरोध में गोलीबारी की घटना का स्थल है।

4 दिन पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में आदिवासी किसान पुलिस कैंप गांव में ना लगाने का आंदोलन कर रहे थे। पुलिस ने आदिवासियों पर फायरिंग कर दी जिसमें 3 आदिवासी किसान मारे गए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार लिखते हैं कि पुलिस के आईजी का बयान है कि मारे गए लोग माओवादी हैै। मतलब हमारी पुलिस इतनी तेज निशानेबाज है कि 5000 लोगों की भीड़ में अगर तीन माओवादी हो तो वह सिर्फ उन्हीं को मार सकती है। गांव वालों का कहना है कि मारे गए लोग घर परिवार वाले हैं और उनका माओवाद से कोई लेना देना नहीं है।
छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा इस तरह की बहुत सारी घटनाएं पहले भी करी गई है। गौरतलब है कि सर्व आदिवासी समाज के एक अन्य समूह को भी इलाके में जाने से रोक दिया गया हैै। छत्तीसगढ़ पीयूसीएल ने कहा है कि वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के रूप में उन्हें गांवों का दौरा करने और पुलिस की गोलीबारी और प्रभावित व्यक्तियों और परिवारों से मिलने का पूरा अधिकार हैै।
पुलिस बेला भाटिया और ज्यां द्रेज को सर्किट हाउस से छोडऩे की अनुमति दी गई थी लेकिन अब उन्हें चेरपाल सीआरपीएफ कैंप के पास रोक दिया गया है। आप सभी जानते हैं कि बेला भाटिया पिछले कई सालों से बस्तर में सामाजिक कार्यकर्ता तथा वकील के रूप में कार्य कर रही है। वहीं ज्या द्रेज देश के जाने माने अर्थशास्त्री के रूप में प्रसिद्ध हैं और अमर्त्य सेन के साथ कई आर्थिक मामलों के पुस्तको के सहलेखक भी हैं।
पिछले साल हिमांशु कुमार ने जाकर थाने में आदिवासियों के साथ एक एफआईआर कराने के लिये उपवास भी किया था। उस मामले में सीआरपीएफ ने सारकेगुड़ा में 17 निर्दोष आदिवासियों को गोली से भून दिया था जिसमें 9 छोटे बच्चे थे उस मामले में भी पुलिस ने कहा था कि मारे गए लोग माओवादी हैं।
लेकिन जब जांच आयोग की रिपोर्ट आई तो उसने घोषित किया कि मारे गए लोग निर्दोष आदिवासी थे। जांच आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी आज तक किसी के खिलाफ कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई है। आपने अभी दिल्ली की सीमा पर किसानों का आंदोलन देखा।
क्या आप जानते हैं किसान किस कारण डरे हुए हैं और आंदोलन करने के लिए विवश हुए हैं। किसानों को डर है उनकी जमीन छीन ली जाएगी। किसानों का डर बिल्कुल सच्चा है। बड़े-बड़े पूंजीपतियों की नजर जमीनों पर ही है।
दिल्ली से बरसों पहले आदिवासी इलाकों में सीआरपीएफ की मदद से जमीन छीनी जा रही हैं। देश के बाकी हिस्सों में सरकार की मदद से कानून बनाकर जालसाजी से जमीनें हड़पने का इरादा है।
आदिवासी इलाकों में आदिवासी किसान को सीआरपीएफ और पुलिस गोली से उड़ा कर जमीन पर कब्जा कर रही है। कुछ सालों के बाद हरियाणा पंजाब उत्तर प्रदेश राजस्थान में भी गांव गांव में सीआरपीएफ तैनात कर दी जाएगी।
आज जिस तरह आदिवासियों को गोली से उड़ा कर पूंजीपतियों के लिए जमीनों पर कब्जा किया जा रहा है आपके यहां भी वही खून की होली खेली जाएगी बहुत से लोग सवाल उठाएंगे कि छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस है अब हालत क्यों नहीं बदल रही। सवाल पार्टी का नहीं है सवाल अर्थनीति का है। भारत की सभी पार्टियों ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया हुआ है।
इसलिए सभी पार्टियां इन पूंजीपतियों के सामने एक जैसी हरकत करती हैं। अदालतें इन पूंजीपतियों के सामने बिछी हुई है पुलिस दुम हिला रही है राजनेता बिक चुके हैं जनता को मारा जा रहा है।
हममें से कइयों ने इसे लंबे समय से देख रहे हैं अपने ऊपर भोगा है, सच बोलने की कीमत चुकाई है। हजारों आदिवासी जेलों में पड़े हैं और इस पर बोलेंगे और लिखेंगे उनका नंबर लगा हुआ है। हिमांशु कुमार कहते हैं कि हम सब धीरे-धीरे करके बर्बाद किए जाएंगे आदिवासी दलित मुसलमान गरीब मजदूर।
सोनी सोरी 2 दिन से आदिवासियों से मिलने जाना चाहती है लेकिन पुलिस जाने नहीं दे रही। पीयूसीएल कहता है कि इलाके में लोगों का प्रवेश रोककर पुलिस और प्रशासन को क्या छिपाना है। कुछ अन्य ग्रामीण (एचआरडी) जो आगामी पुलिस शिविर का विरोध कर रहे थे, और जो सिलेगर जा रहे थे, उन्हें कल रात जगरगुंडा थाने में हिरासत में लिया गया।
पीयूसीएल ने अपने स्टेटमेंट में कहा है कि कृपया बीजापुर के एसपी और कलेक्टर और बस्तर के आईजी को बुलाएं। साथ ही छत्तीसगढ़ के सीएम से सिलेगर की घटना और लगातार हो रहे इंसाफ का संज्ञान लेने के लिए कहने की जरूरत है।
हमारे देश का लोकतंत्र एक दिन इस अवस्था में पहुंच जाएगा हम ने कल्पना भी नहीं करी थी कि हमारी जनता को घेरकर गोलियों से भून दिया जाएगा और हम अपनी जनता से मिल भी नहीं पाएंगे उसके आंसू भी नहीं पोंछ पाएंगे। हमने आदिवासियों के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा है ना अदालत उनके लिए है न सरकार उनके लिए है ना पुलिस उनकी है ना मीडिया उनकी है आखिर आदिवासी खुद का जीवन कैसे बचाएं।
सुकमा जिले में शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासी ग्रामीणों पर पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध फायरिंग की घटना का पीयूसीएल निंदा करता है और मांग करता है कि सुप्रीम कोर्ट ने में पीयूसीएल विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य के मामले में सन 2014 में यह निर्णय दिया है कि मुठभेड़ों के मामलों में पीडि़तों की ओर से भी एक काउन्टर एफ. आई. आर. पुलिस अर्धसैनिक बलों और दोषियों अधिकारियों के खिलाफ अनिवार्य रूप से दर्ज होनी चाहिए।
सुकमा के सिलगर में पुलिस कैंप का विरोध कर रहे ग्रामीणों के ऊपर की गई गोलीबारी में 3 लोगों की मौत और 18 आदिवासियों के घायल होने और 9 के लापता होने की खबर है। आस पास के कई गांवों के आदिवासी सिलगिर में पुलिस कैंप की स्थापना का विरोध करने हजारों की संख्या में जुटे थे जहां इन पर पुलिस द्वारा दिन के उजाले में फायरिंग की गई है। अब पुलिस और प्रशासन इस घटना को सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ बता रहा है। जबकि मृतकों और घायल होने वालों में सब निहत्थे ग्रामीण है।
राज्य सरकार को इस बर्बर घटना पर तुरंत संज्ञान लेते हुए एक स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच की घोषणा करनी चाहिए और इस घटना के जिम्मेदार पुलिस और प्रशासन पर तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित किया जाना चाहिए। घायलों को अस्पताल में सुरक्षित और सही स्वास्थ्य सेवाएं दी जाए, जो ग्रामीण लापता है, अंदेशा है कि वो सभी पुलिस के हिरासत में है उन्हे वापिस उनके गांव में छोड़ा दिया जाए।
छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान तथा सचिव शालिनी गेरा ने कहा है कि यह गोलीकांड बस्तर में लगातार मानवाधिकारों और ग्रामीणों पर सुरक्षा बलों द्वारा हिंसा की वारदातों की कड़ी का एक हिस्सा है जिस पर तुरंत राजनैतिक समाधान ढूंढऩे की जरूरत है, जहां राज्य सरकार के शह पर इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं को पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा सिलगर के जनसंहार की घटना स्थल में जाने पीडि़तों से मिलने रोका जा रहा है, घटना में अस्पताल में भर्ती घायलों से बात करने नहीं दी जा रही है। पुलिस द्वारा सामाजिक कार्यकर्ताओं का जासूसी और पीछा किया जा रहा है, यह इस बात का संकेत है कि छत्तीसगढ़ की वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार आदिवासियों के मानवाधिकारों को कुचलने किस तरह से आमादा है।
बस्तर में पिछले छह महीनों में इस तरह की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। बीजापुर में कैंप का विरोध करते हुए ग्रामीणों पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया और कई आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया जो अब भी जेल में बंद है। 9 मार्च को महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में हो रहे महिला दिवस के कार्यक्रम से पुलिस प्रशासन ने आदिवासी महिला अधिकार कार्यकर्ता को सबके सामने नक्सली होने के झूठे केसेमें अवैध रूप से गिरफ्तार किया।
पीयूसीएल का मानना है कि इन सभी घटनाओं में लोकतांत्रिक रूप से हो रहे आंदोलनों और विरोध को दबाने की कोशिश है। बस्तर में नक्सली उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों के विरोध को कुचला जा रहा है। पुलिस फायरिंग, फर्जी मुठभेड़, अवैध गिरिफ्तारियों की वारदातों को रोकने राज्य सरकार को पुख्ता कदम उठाने की मांग करता है।
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