लॉक डाउन के बाद हमारी दुनिया जेल में बदल गई है
समसामयिक विषय पर ‘द कोरस’ का सम्पादकीय
उत्तम कुमारदेश में सत्ता, सरकार, स्वयंसेवी संगठन, मीडिया और राजनीतिक पार्टियां खत्म हो गई है। स्वयंसेवी संगठन को सरकार द्वारा पिछले साल खत्म करने से बहुत सारे स्वयंसेवी संगठन इस वक्त काम करने से कतरा रहे हैं क्योंकि उनके पास फंड नहीं है। सत्ता तथा सरकार ने महामारी के इस दौर में अपने हाथ खड़े कर लिये हैं। लॉक डाउन के साथ जिन लोगों का काम बंद हो गया है सरकार ने उनके रहन सहन, खान पान और राशन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की है। साथ ही जो लोग बेरोजगार हैं उन्हें हर माह भत्ता की व्यवस्था नहीं की है। लॉक डाउन में प्रत्येक व्यक्ति को एक के हिसाब से दिन का पर्याप्त भत्ता मुहैया किया जाये। टीका को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति है कई लोग टीका लगाने के बाद अस्पताल पहुंच चुके हैं और उनकी मौत भी हुई है। टीका निरापद हो और लोग इसे स्वेच्छा से लगाये ऐसा स्वच्छ माहौल का निर्माण करना जरूरी है। टीका लगने के बाद जीवन की गारंटी सुनिश्चित होनी चाहिए। डीआरडीओ ने दवाई बनाई है वह कितना कारगर है इस बात होनी चाहिए। सरकार को अब आने वाले समय में तय करना होगा कि जितने दिन का लॉक डाउन हो सभी के लिये मुफ्त में राशन, इलाज और शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित हो।

10 मार्च के बाद हम सभी देश में दूसरी बार लॉक डाउन का सामना कर रहे हैं। सरकारी तर्क यह है कि लॉक डाउन इसलिए लगाया जा रहा है कि कोरोना वायरस (कोविड 19) पॉजिटिव प्रकरणों की संख्या में लगातार वृद्धि होने के कारण परिस्थितियां भयावह है। अर्थात इस बिमारी से प्रदेश में लगभग हर दिन 200 से ऊपर लोगों की मौत हो रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज स्वस्थ नहीं हो रहे हैं। स्वस्थ हो रहे हैं लेकिन अगर हम सामुदायिक अथवा सोसायटी व्यवस्था को अमल में ला पाते तो हो रही मौतों पर लगाम कसा जा सकता था।
और अब पूरे प्रदेश में 31 मई तक लॉक डाउन रहेगा। इस तरह समस्त जिलों की सीमाएं पूर्णत: सील रहेगी। सभी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन स्थल आम जनता के लिए पूर्णत: बंद रहेंगे। बैंकों में समस्त प्रकार की लेन-देन कहने के लिये दोपहर 3 बजे तक सम्पादित कर सकेंगे। लेकिन जरूरत मंद लोगों को पैसा निकालने नहीं दिया जा रहा है। मीडियाकर्मी यथासंभव वर्क फ्राम होम द्वारा कार्य सम्पादित करेंगे।
अत्यावश्यक स्थिति में कार्य हेतु बाहर निकलने पर अपना आई कार्ड साथ रखेंगे तथा फिजिकल डिस्टेंसिंग एवं मास्क संबंधी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करेंगे। अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठानें/दुकान सप्ताह में सोमवार, बुधवार एवं शुक्रवार को प्रात: 6 बजे से 3 बजे तक खुली रख सकेगी, जिसमें कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए व्यवसाय करना आवश्यक होगा।
इस दौरान देखा यह गया है कि मौत की संख्या बढऩे लगी है। गंभीर स्थिति में पहुंच रहे मरीजों के इलाज में कोई भी दवा काम करता नहीं दिख रहा है। घरों में पॉजिटिव मरीजों के कारण अन्य लोगों को भी दिक्कतें आ रही है। पाॉजिटिव मरीजों के कारण खासकर किराये में रह रहे लोगों को इस दौरान किराया देना पड़ रहा है। और कईयों को बीमारी का सामना भी। इस दौरान कई खास लोगों की असमय मौत हो गई है।
मरने वालों में जवान लोगों की संख्या भी बहुत है। जो लोग यह कहते थे कि कारोना जैसी कोई बीमारी नहीं है उन्हें भी इस बार बीमारी का सामना करना पड़ा है। बीमारी के साथ देखा यह गया है कि इस बार एक और बीमारी ब्लैक फंगस का प्रकोप भी नजर आया है। रसायन वैज्ञानिक शाम परवेज का कहना है कि ब्लैक फंगस का प्रकोप पालतू पशुओं के मल त्यागने से यह समस्या बढ़ रही है। अधिकांश लोगों ने लोगों के सहायतार्थ अपने सोशल मीडिया एकाउंट में बीमार लोगों की सेवा में दवा, बेड, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर और अन्य चीजों के लिये जानकारियां लगाई है।
नागरिकों की ओर से यह मांग उठ रही है कि कोरोना मरीजों का मानिटरिंग करने के लिये जीपीएस और सीसीटीवी के माध्यम से उनके परिवार उनका निगरानी कैसे करें इस व्यवस्था को लागू करने की व्यवस्था की जाये। शिकायत आ रही है कि ऑक्सीजन, ड्रीप और दवाईयों में हो रही लापरवाही से बचने के लिये अत्याधुनिक व्यवस्था कर घर बैठे मरीज के परिजन अपने मरीजों का देखरेख कर सकें। श्मशान घाट पहली बार दिन रात धधकता नजर आ रहा है। उत्तरप्रदेश और बिहार में गंगा नदी के किनारे दफनाये और बहा दिये गये लाशों का गवाह बनकर समाचार देश के साथ विदेशों में कोहराम मचाया है।
इस दौरान सामाजिक संगठन और सरकार की भूमिका शून्य बनी हुई है। जिसके पास राशन कार्ड है वह को-ओपरेटिव सोसायटी से चावल ला लेते हैं लेकिन नमक, तेल, मिर्ची और हरे साग सब्जियों के लिये उनके पास पैसा ही नहीं है। जिनके पास राशन कार्ड नहीं है उनकी स्थिति और भी दयनीय है। रिक्शा, ठेला, हाथ गाड़ी, दुकानों, क्लिनिक में काम करने वालों, ठेला खोमचा वालों के पास काम ही नहीं है। ऐसे लोगों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। कई संस्थान अपने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है या फिर अपने कर्मचारियों को निकालने की लगातार धमकी दे रहे हैं।
गांव में पंच और शहर में पार्षद ने कभी अपने गांव और मोहल्ले में घूमकर उन लोगों की सूध नहीं ली है जिनके घर खाने के लिये कुछ भी नहीं है। इनके बच्चे दूध के लिये तरस रहे हैं। बेकार लोगों को बीमारी से मरने के लिये छोड़ दिया गया है ना ही इनके पास इलाज के लिये पैसे हैं और ना ही इनके पास पेट भरने के लिये भोजन की व्यवस्था है। ऊपर से भीषण गर्मी ने लोगों का घर में रहना दूभर बना दिया है।
औसतन सभी मुहल्लों और गांव में लोग मारे जा रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान शिक्षकों की भी काफी मौत दर्ज हुई है। शासकीय कर्मचारी अपने परिवार का पालन पोषण में सक्षम हैं लेकिन जिन्हें घर से बाहर निकलना होता है तथा दैनिक मजदूरी कर पेट पालना पड़ता है उनके लिये भोजन और राशन की व्यवस्था नहीं हुई है।
ऐसी स्थिति में उनके घर में किसी की तबियत खराब है तो पैसों के अभाव में इलाज तक नहीं करवा पा रहे हैं और असमय मौत को गले लगा रहे हैं। जमीन पर कार्य करने वाले मेहनती पत्रकार जो लोगों से सतत सम्पर्क कर और खबरों की तलाश में बाहर निकल कर जीविका चलाते थे उनकी रोजीरोटी बंद हो गई है। विशेषकर वेबसाइट पर निर्भर पत्रकारों की स्थिति बहुत ही दयनीय बना दी गई है। उनके लिये भत्ता की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए आखिरकार ये चाथे स्तम्भ जो ठहरे।
स्कूलों के नहीं खूलने से एक ओर जहां शिक्षकों को घरों में बैठाकर व अन्य कार्यों के माध्यम से तनख्वाह दी जा रही है वहीं बच्चों की व्यवहार और दिनचर्या को नपुंषक बना दिया गया है। बच्चों को मोबाईल का आदि बना दिया गया है। घरों में बच्चे चिरचिरे हो गये हैं। पढ़ाई से उनका कोई लेना देना नहीं है।
दिन को किसी तरह काटना और रात बिताने को लेकर वे चोरी और अन्य कामों की ओर अपना ध्यान लगा रहे हैं। अधिकांश परिवार की मानसिक स्थिति खराब हो रही है। लोग दिन रात कारोना बीमारी पर चिंतन करते करते भय के वातावरण में जीवन बीता रहे हैं। कई लोगों के परिवार से पालक का हाथ उठ चुका है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जिनके पास अब अनाथ आश्रम जाने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन क्या ऐसा कोई आश्रय स्थल प्रदेश तथा देश में हैं।
एक ओर सरकार अंग्रेजी स्कूल खोलने की बात कर रही हैं वहीं दूसरी ओर हिंदी स्कूलों की स्थिति काफी खराब है। जो निजी स्कूल है उनपर फीस लेने और स्कूल नहीं खोलने के आरोप लग रहे हैं। ऐसा नहीं लगता है कि कुछ दिनों में स्कूलें और कॉलेजस बंद हो जायेंगे और अनपढ़ों की नई टोली अराजसकता फैलाने के लिये तैयारे कर लिये जायेंगे।
देखा यह जा रहा है कि जो लोग एटीएम से पैसा निकाल लेते वे अपना गुजारा किसी तरह कर रहे हैं लेकिन एक बड़ा तबका आज भी एटीएम से पैसे नहीं निकाल पाता है और ना ही इंटरनेट बैकिंग से जुड़ पाया है उन लोगों के लिये घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। ऑनलाइन डिलीवरी मजाक के सिवाय कुछ भी नहीं है।
अधिकांश लोगों का कहना है कि लॉक डाउन से अच्छा यह कर दिया जाये कि हॉट बाजार और जरूरत के सामग्री के लिये बाजारों को 24 घंटे और पूरे सप्ताह खोल दिया जाये। इससे दुकानों में भीड़ नहीं लगेगी और लोग जरूरत के अनुसार अपने लिये सामान की व्यवस्था कर लेंगे। तर्क यह भी है कि जब अस्पताल और मेडिकल चौबिस घंटा खोल सकते हैं तो जरूरत के सामानों का दुकान और अन्य व्यवस्था को 24 घंटा खोलने में दिक्कत ही क्या है?
गांव में रोजगार का एकमात्र साधन मनरेगा को खत्म करने की साजिश हो रही है। मनरेगा के कामकाजों में जो लोग काम कर रहे हैं उन्हें समय पर पैसा नहीं मिल रहा है। गांवों में रोजगार का एकमात्र साधन इसे बचाये रखने की जरूरत है। हाल ही में यह भी खबर आया है कि मनरेगा के तहत आदिवासी और दलितों के खाते पैसा एफटीओ नहीं किये जा रहे हैं। बल्कि सामान्य लोगों के खातों में मजदूरी का भुगतान हो रहा है।
बातों ही बातों में यह भी बात हो रही है कि आंगनबाड़ी और मितानिनों की ड्यूटी घर घर जाकर लोगों की स्वास्थ्य की जानकारी इकट्ठे करने की होनी चाहिए। इससे समय पर बीमार मरीजों को दवा दिया जा सकेगा और ऐसे लोगों को चिन्हांकित किया जा सकेगा जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं। जरूरत यह भी है कि जिन दवाईयों की जरूरत कोरोना के इलाज के लिये नहीं हैं उन्हें इलाज के एसओपी से हटाया जाये।
जिस तरह हर दिन बिजली, पानी और शौचालय की जरूरत होती है ठीक उसी प्रकार पेट भरने के लिये अनाज जिसे इकत्र करने के लिये रोजगार, स्वस्थ्य रहने के लिये इलाज तथा दवा और मानसिक रूप से सुदृढ़ रहने के लिये खुराक के तौर पर शिक्षा की जरूरत काफी जरूरी है।
इन तीनों के बिना पूरा समाज अपाहिज हो सकता है। इसलिये लॉक डाउन में जिन जिन लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है सरकार को चाहिये कि ऐसे व्यक्तियों की सूची बनाकर उन्हें बेरोजगारी भत्ता प्रदान करें। इसके अलावा बेहतर चिकित्सा की जरूरत है उसके लिये व्यापक रूप से अस्पताल, डॉक्टर और दवाईयों की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही शिक्षा पर बल देते हुये ऐसी परिस्थितियों से कैसे निपटा जाये रास्ता निकालने की जरूरत है।
अंग्रेजी इलाज सबसे उन्नत चिकित्सा पद्धति है इसे बचाये रखना जरूरी है। जिस तरह प्रधानमंत्री से लेकर तहसीलदार और सडक़ों में पुलिस कोरोना का इलाज कर रहे हैं इसे तत्क्षण बंद कर देना चाहिए। डॉक्टरों को उनका कार्य करने देना चाहिए। हां यह जरूरी है कि उनका मानिटिरिंग किया जाये।
निजी चिकित्सालयों को सभी राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लेना चाहिये और एक चिकित्सा एक दवाई की नीति पर काम करते हुये मरीजों को इलाज और हो रहे शोध पर कारगर रूप से अमल में लाने की कोशिश होनी चाहिए। घरेलू तथा अन्य चिकित्सा पद्धितियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्हें भी काम करने की छूट मिलनी चाहिए लेकिन यह देखना भी जरूरी है की अन्य पैथी कितने मरीजों को कोरोना बीमारी से मुक्त कर पाये हैं।
देश में सत्ता, सरकार, स्वयंसेवी संगठन, मीडिया और राजनीतिक पार्टियां खत्म हो गई है। स्वयंसेवी संगठन को सरकार द्वारा पिछले साल खत्म करने से बहुत सारे स्वयंसेवी संगठन इस वक्त काम करने से कतरा रहे हैं क्योंकि उनके पास फंड नहीं है। सत्ता तथा सरकार ने महामारी के इस दौर में अपने हाथ खड़े कर लिये हैं। लॉक डाउन के साथ जिन लोगों का काम बंद हो गया है सरकार ने उनके रहन सहन, खान पान और राशन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की है। साथ ही जो लोग बेरोजगार हैं उन्हें हर माह भत्ता की व्यवस्था नहीं की है। लॉक डाउन में प्रत्येक व्यक्ति को एक के हिसाब से दिन का पर्याप्त भत्ता मुहैया किया जाये।
टीका को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति है कई लोग टीका लगाने के बाद अस्पताल पहुंच चुके हैं और उनकी मौत भी हुई है। टीका निरापद हो और लोग इसे स्वेच्छा से लगाये ऐसा स्वच्छ माहौल का निर्माण करना जरूरी है। टीका लगने के बाद जीवन की गारंटी सुनिश्चित होनी चाहिए। डीआरडीओ ने दवाई बनाई है वह कितना कारगर है इस बात होनी चाहिए। सरकार को अब आने वाले समय में तय करना होगा कि जितने दिन का लॉक डाउन हो सभी के लिये मुफ्त में राशन, इलाज और शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
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