हज़ारों लोगों के भीतर बहुत बहुत बचे हुए हैं और बरसों बरस तक बचे रहेंगे
संकलन मंजीत कौर बलपिता का जाना कैसा होता है यह मैंने महसूस किया है। पर एक बेटी जिस तरह पिता का जाना देखती और समझती है वह अपने आपमें अलग होता है। वह एक शून्य सा होता है। निर्वात। लाखों दुनियावी तर्क और हज़ारों सांत्वनाएं उस शून्य को नहीं पाट सकतीं। उस निर्वात को कोई नहीं भर सकता।

Vinod Verma जी की यह व्यक्तिगत संदेश सबसे साझा कर रही।क्योंकि इन पंक्तियों ने न केवल मुझे हारकर फिर जीतने की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है और पापा के बनाए हुए विशाल वृक्ष के छाया की ओर ध्यान दिलाया है जो कल से फोन के माध्यम से उनके बनाए संसार से मिलवा रहे, वरन संदेश की एक एक पंक्ति उन बेटियों के लिए संबल हैं जिन्होंने इस Corona काल में अपने पिता को खोया है और मेरी तरह पिता और बेटी का बेहतरीन रिश्ता जिया है...
संदेश
"कुमार गंधर्व की मृत्यु पर अशोक वाजपेयी ने बहुत से विदा गीत लिखे हैं। उनमें से एक में उन्होंने लिखा है-
"जो जाता है
वह थोड़ा थोड़ा हमें भी
साथ लेकर चला जाता है
इसलिए वह पूरी तरह कभी नहीं जाता"
लेकिन मुझे लगता है कि इसे थोड़े संशोधन के साथ पढ़ने पर इसकी सार्थकता बढ़ जाती है-
"जो जाता है
वह थोड़ा थोड़ा
हम सबमें रह जाता है
इसलिए वह पूरी तरह कभी नहीं जाता"
बल सर को जितना मैंने लोगों की बातों से जाना और आपके व्यक्तित्व से पहचाना मुझे लगता है कि हज़ारों लोगों के भीतर बहुत बहुत बचे हुए हैं और बरसों बरस तक बचे रहेंगे। उनका यह बचा रहना उनकी कमी को पूरी तरह से दूर तो नहीं कर सकता पर एक तरह का संबल ज़रूर देता है। उनका हम सबमें बच जाना उनके होने की सार्थकता को बार बार रेखांकित करता रहेगा और एक तरह का संतोष मन में व्याप्त रहेगा।
जो दूसरों में बचे रहेंगे वो बल सर एक हैं। वह सार्वजनिक, पेशेगत और सामाजिक जीवन में उनकी व्याप्ति का हिस्सा हैं। पर एक दूसरे बल सर भी थे। बहुत निजी और बहुत एकांतिक। वो जो दूसरे बल सर थे वे आपके पिता थे। वे जिस तरह आपके भीतर बचे रहेंगे उस तरह वे किसी और के मन में बचे रहें यह संभव ही नहीं है।
आपके मन में छोटी छोटी असंख्य स्मृतियां बार बार उभरेंगीं और बार बार रुलाएंगीं। वो कभी कभी इतना भावुक कर देंगी कि लगने लगेगा कि आप कितनी अकेली रह गईं हैं। और कभी वो आपको इतने आत्मगौरव से भर देंगीं कि लगेगा वे गए ही कहां हैं।
बचपन में उनकी उंगली पकड़कर टहलते हुए, हाथ पकड़कर वर्णमाला के अक्षर सीखते हुए आप कब उनसे जीवन की भाषा सीखने लगीं थीं यह तो आपको याद भी न होगा। पर जीवन के जटिल व्याकरण को आपके लिए उन्होंने इतना आसान कर दिया है कि वह किसी नेमत की तरह ही लगता है। जो कुछ वे आपको दे गए वो इतना मूल्यवान है कि आप से बहुत से लोगों को रश्क़ हो सकता है।
लड़ना सीखना कठिन होता है। हारना सीखना उससे भी कठिन और हारने के बाद जीतने के लिए दोबारा खड़ा होना सबसे कठिन काम होता है। उन्होंने आपको सबसे कठिन काम में महारत दे दी है। मैं समझता हूं कि हमारे जैसे दकियानूसी समाज में ऐसा पिता कम ही बेटियों को मिलता होगा। आपको उन पर बार बार नाज़ होता होगा और बदले में वे आप पर नाज़ करते रहे।
यही परस्पर गर्व आपकी धरोहर है। वे अंतिम घड़ी तक आपके साथ ही रहे और मुझे विश्वास है कि वे बहुत आत्मसंतोष और आत्मगौरव के साथ ही गए होंगे कि आप उनकी बेटी हैं।
आपको उन्होंने रिश्ते बनाना सिखाया है और उसे निभाना सिखाया है। यह एक और दुर्लभ गुण है जो आपको उनकी कमी को दूर करने में सहायता देता रहेगा। जो रिश्ते उन्होंने बनाए वे सब भी मिलकर एक विशाल छायादार पेड़ बनाते हैं। उसकी छाया आपके लिए ताउम्र उपलब्ध रहेगी।
पिता का जाना कैसा होता है यह मैंने महसूस किया है। पर एक बेटी जिस तरह पिता का जाना देखती और समझती है वह अपने आपमें अलग होता है। वह एक शून्य सा होता है। निर्वात। लाखों दुनियावी तर्क और हज़ारों सांत्वनाएं उस शून्य को नहीं पाट सकतीं। उस निर्वात को कोई नहीं भर सकता।
लेकिन दुनिया की यही गति है। अंतिम सत्य मृत्यु ही है। और एक एक करके सबका विछोह जन्म के साथ तय प्रारब्ध है। हम उसे जितनी जल्दी स्वीकार कर लें, हमारे आसपास के लोगों को उतनी ही आसानी होती है कि उनका जीवन पटरी पर लौटे।
आपके एकांत का दुख तो पूरे जीवन नहीं मिटेगा। पर सार्वजनिक जीवन में उस दुख को ढांपकर जल्दी निकलना जीवन को आसान बनाएगा।
मैं नहीं मान सकता कि अपने जीते जी बल सर ने आपको यह बात नहीं सिखाई होगी।
पिता की उंगली छूट गई है, उनका कंधा अब आंसुओं से भिगोने के लिए उपलब्ध नहीं है और न घर पर उनकी इंतज़ार करतीं नज़रें हैं।
पर जीवन है।
और बहुत से लोग हैं जिन्होंने अब आपकी उंगली पकड़ ली है और वे आपके कंधे को अपना अधिकार मानते हैं।
शेष सब उनका है।
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