लॉक डाउन के साथ सभी नागरिकों की हालात भी देख लें



दिसंबर 2019 से बीमारी से  बचाव और एक अदद छत की दौड़ शुरू ही हुआ था कि भयानक बीमारी और पेट के बीच दूरी पास पास हो गई है। अब बीमारी और पेट इन दोनों के बीच पत्रकारिता स्वांश ले रहा है। खुद को बचाना और जीविका दो धुरी बन गई है।

चीन की स्थिति के बाद दिसंबर 2019 से पूरे विश्व में मौत का आफत मंडराने लगा था। लगभग डेढ़ साल से जेल की जिंदगी जीने लोगों को मजबूर कर दिया गया है । 

देश समस्याओं से जूझ रहा है। कभी नागरिकता तो कभी किसान आंदोलन से देश झुलस रहा है। सरकार कुछ भी हल करने को तैयार नहीं है। बीमारी से मुक्ति का रास्ता अभी भी कोसों दूर हैं।

नागरिकता कानून के बाद मैं आभासी जेल की दीवार के पीछे हूँ। पिछले साल दिहाड़ी मजदूरों की बदहाली और मौत और इस साल घर, अस्पताल और श्मशान घाट तक मौत का तांडव के बीच असहाय सा बना दिया गया हूँ। 

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने अबतक कोई कारगर दवाई नहीं तलाश की है लेकिन इससे भी इंकार नहीं जा सकता कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं लोगों का जीवन बचाने में वे जूटे हुए हैं। खोज और शोध के बीच वे पुराने दवाइयों तथा जांच किट के बूते इस भनायक बीमारी का इलाज लगातार कर रहे हैं।

अब तक किसी ने पुरानी दवाइयों के बाद कोई नई दवाई नहीं तलाशी है। जान बचाने के लिए हर सख्श रेमदेसीविर, वेंटिलेटर और तो और स्वांश बचाने ऑक्सिजन सिलींडर की ही मांग कर रहे हैं ।

पूरा का पूरा व्यवस्था मौन बने खड़ा है। प्रधानमंत्री से लेकर एसडीएम, कलेक्टर सभी इस समय डॉक्टर हो गए हैं। पुलिस चौक चौराहे में खड़े होकर झोलाछाप डॉक्टर का अभिनव कर रहे हैं। हमारा देश डाक्टरों का देश है यहाँ सभी डॉक्टर हैं। किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए कुछ चीजें बाधा होती है, जिसमें धार्मिक अंधविश्वास और रूढ़िप्रथा किसी बीमारी को फैलने में मदद करता है।

धर्म और विज्ञान के बीच अजीब सा गड़मड़ है। नई बीमारी के साथ इलाज हमारे देश के लिए बड़ा कठिन काम होता जा रहा है। सभी घर में जहां डॉक्टर और वैद्य बैठे पड़े हैं वहीं कई सारी दवाइयां  देकर हमें ठीक करने का दावा कर रहे हैं जिसकी कोई गारंटी नहीं है।

लेकिन नई दवाइयों ने बीमारी के इलाज को जानलेवा बना दिया है। अगर ये दवाइयाँ हैं तो इस पर शोध करना बाकी है। इससे परे मैसेंजर, व्हाट्सएप और कॉमेंट बॉक्स में अँग्रेजी दवाइयों की मांग है पर बीमारी से बचा लेने की बात हमें स्तब्ध कर देती है। बीमारी से बचाव ने इलाज़ और लोगों के बीच दूरी को गहरा किया है।

जांच कीट, रेमडिसिविर, हाइड्रोक्लोक्वीन जैसे दवाइयों के उपयोग पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लोगो ने अपने वाल में सुविधाएं और दवाई और जरूरत के सामग्रियों का फेररहिस्त लगाने का अभियान खोल रखा हैं। यह कितना सही है बता पाना मुश्किल है। 

लोगों ने कोरोना से जुड़े समाचारों को देखना बंद कर दिया है कई लोगों को इस बीमारी ने इतना पेनीक बना दिया है कि इससे जुड़े खबरों और जानकारियों से दूरी बना लिया है। वहीं विश्व कि चर्चित टाइम्स  मैगजीन ने भारत में कोरोना पर कवर स्टोरी बनाया है। कई देशों ने भारत से अपने नागरिकों को बुलाना शुरू कर दिया है विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के साथ जीना सिखना होगा।

आनेवाला समय और भी भयावह होने के संकेत दे रहे हैं। लॉक डाउन ने जहां एक ओर मरीजों की संख्या में वृद्धि की है वहीं स्वास्थ सुविधाए नगण्य है। जांच के अभाव में लोग लक्षण को देखकर दवाइयां ले रहे हैं। पिछले डेढ़ सालों में तमाम आपात व्यवस्था को बनाने के बदले उसे खारिज करने का काम किया गया है।

अब मितानिन और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से प्रभावितों को दवाई पहुंचाने की जरूरत है। 10 तारीख से अधिकांश प्रदेशों और जिलों में लॉक डाउन ने लोगों के  ज़िंदगी को कठिन कर दिया है। सब्जी और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लाले पड़ गए हैं। दैनिक रोजी मजदूरी कर जीवन जीने वाला व्यक्ति का जीवन एक ओर बीमारी और दूसरी ओर पेट की भूख से तिलमिलाने लगा है।

पिछले साल की तरह इस बार कोई एनजीओ या फिर सामाजिक संगठन लोगों को सूखा अनाज या पका हुआ अनाज का वितरण नहीं कर रहा है जबकि इस ज़िम्मेदारी को सरकार को अपने हाथ लेनी चाहिए।

सरकार की भूमिका सिर्फ फरमान और घोषणाओं से टा पड़ा है। टीका लगवाने के सिवाय कोई काम नजर नहीं आ रहा है कभी कभी इन हालातों से लगने लगा है पूरी व्यवस्था को चलाने जिस सरकार का गठन हमने किया है उसका कोई अहमियत नहीं हैं।

बीमारी कि वजह से निजी हॉस्पिटल कि चाँदी हो चली है। सरकार को चाहिए कि वह इस समय जितने निजी चिकित्सालय है उसे टेक्कोवर कर लेते, जिससे उनकी सेवाएँ भी सरकार इस आपात समय में ले सकती थी।

डेढ़ साल से स्कूल के बंद होने से बच्चों को घर में बिना पढ़ाई के बैठना पड़ रहा है। और बदले में शिक्षकों को तनख्वाह देना पड़ रहा हैं। इनका कहीं उपयोग होना चाहिए। बच्चों को घर में पढ़ाई और शिक्षकों को पढ़ाने का रास्ता निकालना होगा।

घर - घर जाकर पार्षद और पंच को सबकी सुध लेने कि जरूरत है। ऐसे लोगों की सूची बननी चाहिए जिनकी आर्थिक हालत खराब हैं। बैंकों ने पैसा लेने का काम शुरू किया है लेकिन ग्राहकों को पैसा देने का काम बंद कर रखा हैं। पेट्रोल और डीजल मिलना बंद हो गया है। रोज़मर्रा कि ज़िंदगी और राजमर्रा के सामानों के ना मिले से लोग खासा परेशान है।

जिस तरह दवाइयों के लिए मेडिकल स्टोर खोला गया है उसी तरह गाइडलाइन बनाकर राशन और सब्जी देने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। अब तो 18 साल से ऊपर वालों को भी टीका लगेगा लेकिन अफरमेटिव के तहत टीका कि व्यवस्था के साथ सभी आवश्यक वस्तुओं कि व्यवस्था हो जाती तो अच्छा होता।

पिछले दिनों हमने कारोडों लोगों को खोया है  जिसमें कई लोग बहुत महत्व के थे। जैसे डॉक्टर, कला - साहित्यकार के साथ अधिवक्ता और कई नामी लोगों हमारे बीच नहीं हैं ऐसे सभी लोगों को बचाने कि कोशिश हुए होगी। और यह भी कोशिश होनी चाहिए कि हम सभी के जीवन को बचाए।

इलाज़ को और भी पारदर्शी बनाने की जरूरत है। बीमार व्यक्ति का इलाज़ से लेकर स्वस्थ होने या मृत्यु तक पूरी जानकारी उपलब्ध करवाए जाये। हमें मनुष्य के जीवन को पवित्र समझना चाहिए। हम ऐसे भविष्य में विश्वास रखते हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। 


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment