अपनी विनाशकाय इकत्र सम्पत्ति से हमें कुछ तो अंशदान कर ही सकते हैं?
सुशान्त कुमारबिना नाम छापे मैं अपने उन सभी साहित्यकारों, पत्रकारों, सम्पादकों, पाठकों, शुभचिंतकों, मददगारों का शुक्रिया अदा करूंगा जो मेरे साथ खड़े हैं और मेरे रिपोर्टिंग करने के अधिकार के लिए लगातार तन, मन और धन से सहयोग किया है। ईमानदारी से रिपोर्टिंग करने की इस वक्त हमारे देश में बहुत जरूरत है। गलत खबरों की सही दवा एक वैकल्पिक स्वतंत्र मीडिया हाउस से है। पत्रकारिता कोई ग्लैमर और गुलामी का महिमामंडन नहीं है, खासकर ऐसे समय में, जब सरकार लोगों से कुछ छिपाना चाह रही हो, तब पत्रकारिता करना मुश्किल हो जाता है। सत्ता को सच का पता होता है, इस कार्य से पहले वह नक्सली, आतंकी, माओवादी की लेबल के साथ यूएपीए और जेल का डर दिखाकर हमें खत्म करना चाहती है। पर वास्तव में सच क्या है? इस कर्तव्य को पूरा करना चाहिए।

पत्रकारिता डर, जेल अथवा ग्लैमर का शिलालेख नहीं है। ये बड़ा मुश्किल काम है और इस मुश्किल काम को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में बड़ी ईमानदारी से किया जा रहा है। मैं कई सालों से रिपोर्टिंग कर रहा हूं और जिस तरह से सत्तापक्ष की गोद में बैठा मीडिया देश और इसके लोकतंत्र को बदनाम करने में तुला है, इसके ठीक उलट सच के साथ खड़े होने का फर्ज पूरा करना है।
छत्तीसगढ़, स्वदेश, भास्कर भूमि, दक्षिण कोसल से हिम्मत टूटा नहीं है इन बैनरों ने जनपक्षधर पत्रकारिता जारी रखने के लिये ऊर्जा दिया है। भारतीय संविधान में निहित अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार के प्रति साहस और समर्पण मूल्यों के साथ मैं आपके बीच उपस्थित हूं। भविष्य में भी स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के साथ खबर की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता पर तीखी बहस और प्रतिक्रियाओं का खुले दिल से स्वागत है। मैं आलोचना का पक्षधर हूं लेकिन आलोचना तथ्यों और सही दिशा में हो उसका ख्याल रखना होगा। मैं आशा करता हूं कि भविष्य में भी अधिनायकवाद, फासीवाद और भूमंडलीकरण की ताकतों द्वारा पैदा खतरों और चुनौतियों का सामना रचनात्मक और आलोचनात्मक तौर-तरीकों से करते हुए प्रेस की आजादी के परचम को ऊंचा फहराते रहेंगे।
मैं प्रमाणिक तथा दबाव से मुक्त पत्रकारिता पर विश्वास करता हूं और वह अपने सारे सूत्रों को सुरक्षित भी रखना जानता है। इस दौरान मैंने कम से कम हजार बार इस सवाल को जरूर झेला है कि किस विचारधारा और समझ के साथ मैं पत्रकारिता करता हूं और उसके प्रकाशन के स्त्रोत क्या हैं?
मेरे लिए दरअसल यह हमारे बीच बिखड़ी पड़ी पत्रिकाओं की भीड़ में बुद्ध, अम्बेडकरवादी, गांधीवादी, मार्क्सवादी, लोहिया, जयप्रकाश, नियोगी, घासीदास, कबीर, गुरूनानक, ईसा, भगतसिंह, चार्वाक, पारी कुपार लिंगो, शम्भू शेख जैसे अलग-अलग विभिन्न विचारधारा से जुड़े पाठकों तक पहुंचने के लिए, उनसे जुडऩे का एक जरिया है। और उनकी समझ को प्रकाश में लाने की बात है और इसमें मुझे बहुत मदद मिली। दूसरी बात यह कि पत्रकारिता के क्षेत्र में हासिए में खड़े लोगों (आदिवासी, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक) के लिए प्रतिनिधित्व की दस्तक होगी कि आदिवासी, दलित और अन्य शब्दों को लेकर वैचारिक विभिन्नताओं के बीच ऐसे शब्दों और व्यवहार को लेकर अपने समाज के प्राकृतिक अस्तित्व को मजबूती दे सके।
कई मौकों पर मैंने यह महसूस किया है कि दलित/बहुजन मीडिया भले ही दलितों/बहुजनों के मुद्दों को लगातार उठाती रहे, इस समाज के प्रबुद्ध वर्ग को शायद तभी संतुष्टि मिलती है जब उनकी अपनी मोनोपॉली और मालिकाना चलते रहे। हवा में लटक कर पत्रकारिता संभव नहीं है। बहुजन मीडिया पर उठाए गए मुद्दों को तो ज्यादातर बहुजन ही नहीं अपनाते हैं। जबकि कथित मुख्यधारा की मीडिया में चार लाइन की खबर छप जाए तो उन्हें लगता है कि बाजी मार ली। और हमारे कार्यों और पत्रकारिता को सवालों के घेरे में लेकर उसे जस्टिफाई करने की कोशिश होती है।
वैकल्पिक पत्रकारिता की यह मुहिम लोकतंत्र की मजबूती के रूप में उभरी और दिन-प्रतिदिन समाज में अपनी जिम्मेदारियों और चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने आपको स्थापित करने की कोशिश करते रहेगी। सूचना तकनीक की क्रांति ने एक ओर जहां सूचना पर वर्चस्व स्थापित किया है वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया के अनन्त अवसरों को हमारे सामने रखा है। सूचना का इस्तेमाल किस हद तक समाज तथा आम इंसान के चेतना को बनाने में किया जा रहा है इसकी मिसाल हम वर्तमान दुनिया में रंगभेद, जातिवाद, नस्लभेद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, ब्राह्मणवाद, अधिनायकत्ववाद महिला उत्पीडऩ बच्चों के साथ अत्याचार, बेरोजगारी, गरीबी, भूखमरी, भय, आतंक, आदिवासियों की दिन प्रतिदिन हत्या, अव्यवस्था के रूप में मंदी, भूमि अधिग्रहण बिल, एट्रोसिटी कानून में संशोधन, भीमा कोरेगांव को लेकर झूठे बवाल, असहिष्णुता, दुर्भिक्षता, भीड़ की हिंसा, आर्थिक चोट पहुंचाने के लिए महंगाई को बढ़ाते नोटबंदी जीएसटी, बैंकों में हमारी पूंजी को लूटने और कृषि पर हमले जैसी खबरों में देख चुके हैं। सूचना व समाचार पित पत्रकारिता का रूप लेता जा रहा है। हमारे यहां तो विज्ञापन की दुनिया ने अखबारों को अपना दास बना लिया है।
ऐसे समय में अपने विचारों को और राय को सही बनाए रखने के लिए पहल हमें खुद करनी होगी और तैयार करने होंगे ऐसे पत्रकारिता मंच कि जहां से हम आम आदमी की जिंदगी और उसकी समस्याओं से जुड़ी खबरों को प्रमुखता के साथ आप तक स्वतंत्र, निष्पक्ष और निडरता के साथ तेजी के साथ पहुंचा सकें, अतएव यह हमारी कोशिश रहेगी की कार्पोरेट जगत, सरकार के दबाव, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों तथा महत्वाकांक्षा से मुक्त बिना सीमा के पत्रकारिता के उसूलों में खड़े उतरे। आपको सच और आलोचना कड़वा लग सकता लेकिन सत्य है कि आप भविष्य में पत्रिका खरीद कर पढ़ेंगे और वेबसाइट को हरसंभव मदद करेंगे।
आज जब वर्तमान में देश के महत्वपूर्ण संस्थानों पर फासिस्टों का कब्जा, भारत के आदिवासियों पर हमले, विदेश नीतियों के साथ देश में विदेशी पूंजी के निवेश पर प्रभाव, बस्तर में नुलकातोंग तथा खलको फर्जी एनकाउंटर के आलोक में भारत में फैले माओवाद की समस्याओं का समाधान, उत्तरप्रदेश के सोनभद्र में आदिवासियों के कत्लेआम और आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी महिलाओं के खिलाफ बलात्कार देख रहे हैं। भाजपा के जीत के बाद तेजी के साथ देश में हिन्दुत्व के एजेंडा को लागू करने में आ रही बदलावों पर आपकी प्रतिक्रया, देश में बढ़ते दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर हमले देश में पांचवी और छठवीं अनुसूची लागू न होने से विसंगतियां, राम मंदिर का निर्माण, राम वन गमन पथ आधारित वर्तमान चुनावी व्यवस्था को कितना कारगर समझते है क्या उसे बदल देना चाहिए, अगर बदले तो कौन सी व्यवस्था होनी चाहिए, सूचना का अधिकार में बदलाव पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?
गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा, बीमारी, बेरोजगारी की समस्या, खुशहाल भारत के लिए आपकी क्या धारणा है?, क्या आने वाले समय में देश में संविधान और मनुस्मृति में से किस मातृ कानून पर देश चलेगा?, राजनैतिक अस्थितरता और मजबूत विपक्ष पर आपकी समझ क्या है?, सरकारी नौकरियों में बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी क्या है। क्या उन्हें सच कहना चाहिए या फिर अपनी रोजीरोटी के लिए झूठ के साथ हो लेना चाहिए, एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून में बड़ी जीत, देश में बढ़ते मोब लिंचिंग की घटनाओं से क्या निष्कर्ष निकालते हैं? क्या भविष्य में वोट का अधिकार, बैंक और चुनाव सुरक्षित रहेंगे? जैसे कई सवालों से जूझ रहा था और कई शख्सियत इसका जवाब नहीं दे रहे थे, सवाल उठाना चाहता हूं तब हमारी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
हमारी जिम्मेदारी है कि दीर्घ अवधि की धार्मिक असहिष्णुता के कारण भारत के अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति बढ़ती हिंसा जो मुस्लिमों और दलितों की भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या की बढ़ती घटनाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं, जो एक हद तक अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति घृणा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और हिन्दुत्व विचारधारा की शिक्षाओं का नतीजा है, कब सवाल उठायेंगे? मैं निडर, स्वतंत्र और सिद्धांतों वाली मीडिया के सामाजिक मूल्य को इससे बेहतर शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। स्वतंत्र मीडिया, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक विकास और ताकतवर लोकतंत्रों के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। यह एक ऐसा अधिकार है जो मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 19 में उल्लेखित है और सभी सरकारों ने इसके प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
जहां तक धर्म और मीडिया का सवाल है मैं कहना चाहता हूं कि खुशी और बेबाकी से आज के भारत में विचार, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता पर दिखाई पडऩेवाली मुख्य अड़चनों पर अपनी बात लगातार रखी है। इसे हास्यास्पद ही कहा जाना चाहिए कि खुल कर और सच्चाई से मीडिया की स्वतंत्रता पर बात रखने के कारण मेरी पत्रकारिता प्रतिबद्धता को अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। हमारी खबरों को किस तरह देखा जाता है और कैसा व्यवहार किया जाता है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मैं इस बात को प्रकाश में ला सकूं कि जनपक्षधर पत्रकारिता के उसूलों पर आगे बढऩे की चुनौती को अमल में कैसे लाऊं? भारत कमजोर हो रहे ऐसे लोकतंत्रों में से एक है जो यह बात मानने को तैयार नहीं है। हम समझते हैं कि इसलिए भारत की सच्ची कहानी बताना पहले से अधिक जरूरी है। पिछले कुछ सालों में मैंने जिस तरह की पत्रकारिता की है इसके बरक्स मुख्यधारा के मीडिया धार्मिक अल्पसंख्यकों और उत्पीडि़त जातियों पर हमला करने वालों की वैचारिकी और सांगठनिक शक्ति पर बहुत कम पड़ताल की है या गंभीरता से काम नहीं किया है। भारतीय न्यूज रूम में इन समूहों का प्रतिनिधित्व बेहद कम होने के चलते ऐसे हालात हैं। 15 फीसदी अगड़ी जातियों के लोग भारतीय मीडिया के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं और बाकी की जनता को केवल 15 प्रतिशत स्थान प्राप्त है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतंत्र है। जिस किसी ने भी उत्पीडऩ करने वाली सरकारों का अध्ययन किया है वे सरकार की कार्रवाइयों के उद्देश्यों को साफ समझ सकते हैं। लक्षित करना और जनता के शत्रु की तरह प्रयोजित करना, विरोधी समूह को सताने या उन पर संभावित हिंसा को जायज ठहराने को वैचारिक जामा पहनाता है और साथ ही अपने समूह के सदस्यों को संकेत देता है कि किन लोगों को जायज तौर पर हमले के लिए लक्षित किया जा सकता है। अक्सर व्यक्तियों को लक्षित करना संपूर्ण धर्म, राजनीति और जातीय समूहों को बदनाम करने की शुरुआत भर होता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हालांकि यह भी सत्य है कि भारत दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा देश है जिसमें एक बड़ी जनसंख्या लोकतंत्रिक व्यवस्था के द्वारा प्रशासित है। लेकिन इस संख्या से इतर देश में लोकतंत्र की स्थिति चिंताजनक है। आंकड़े देखिए, भारत विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 140वें पायदान पर फिसल गया है। थॉमस रॉयटर्स न्यास ने भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश बताया है- इस सूची में भारत युद्ध से जर्जर सीरिया और अफगानिस्तान से भी पीछे है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्था के विश्व हंगर (भूख) सूचकांक में भारत 103वें स्थान पर है। विश्व बैंक की मानव पूंजी सूचकांक में भारत का स्कोर दक्षिण एशिया के औसत स्कोर से कम है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का स्थान 81वां है और वैश्विक लैंगिक अंतररिपोर्ट में वह 149 देशों में 142वां है। 180 देशों के वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत 141वें स्थान से खिसक कर 177 पर आ गया है। कुछ महीने पहले अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धर्म स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट में भारत धार्मिक अल्पसंख्यकों और उत्पीडि़त जातीयों की सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। भारत सरकार ने इस मूल्यांकन को यह कह कर खारिज कर दिया कि किसी भी विदेशी संस्था को ऐसा फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है।
भारत कमजोर हो रहे ऐसे लोकतंत्रों में से एक है जो यह बात मानने को तैयार नहीं है। इसलिए भारत की सच्ची कहानी बताना पहले से अधिक जरूरी है और मैं इस भूमिका के लिए अडिग हूं। आज का भारत बहुधर्मी, बहुजाति और बहुभाषी समाज है जहां सभी संभावित प्रकार की विविधता है। इसे ऐसा बनाए रखने के लिए और 130 करोड़ की आबादी वाले देश में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा में प्राप्त अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अभिव्यक्ति, विचार और धर्म की स्वतंत्रता पर होने वाले हमलों से सभी लोगों का बचाव जरूरी है। हम सभी को बढ़ते हमलों को साथ मिलकर रोकना चाहिए। अपना काम करने के लिए किसी भी पत्रकार को अपने जीवन पर खतरे का भय नहीं होना चाहिए और ना ही मुझे है।
लेकिन दुख की बात है कि भारत में आज बहुत से लोगों को यह डर सता रहा है। गौरी लंकेश कन्नड भाषा के अखबार की संपादक थीं जो निडर होकर सामाजिक अन्याय और हिंदू राष्ट्रवादियों की अति के बारे में समाचार प्रकाशित करती थीं। 2017 में गौरी लंकेश की हत्या उनके घर के बाहर कर दी गई थी। गौरी लंकेश के हत्यारे उस संगठन के सदस्य थे जिस पर हिंदुत्व विरोधी बुद्धिजीवियों की हत्या करने का शक है। इन हत्यारों ने पूछताछ करने वालों को बताया था कि उनकी बंदूक एक ऐसा जंतर है जो हिंदुत्व विरोधी ताकतों को मिटा देने में मददगार है। इन लोगों ने इसे हिंदू भगवान का अस्त्र बताया था। हालांकि मैं ऐसा सोचना नहीं चाहता लेकिन मुझे डर है कि अन्य पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का हश्र भी गौरी लंकेश की तरह हो सकता है जिसमें हमारे लोग मुहरा बन सकते हैं, अनायस ही मुहरा बन सकते हैं।
जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने संरचनात्मक समायोजन या स्ट्रक्चरल एड्जस्टमेंट्स के लिए दबाव बनाया और सरकारों से स्वास्थ्य, शिक्षा, शिशु पालन और विकास के लिए सरकारी खर्च जबरदस्ती कम करवाया, तो एनजीओ सामने आये। सबकुछ के निजीकरण का मतलब सबकुछ का एनजीओकरण भी है। जिस तरह नौकरियां और आजीविकाएं गायब कर दी गई हैं, एनजीओ रोजगार का प्रमुख स्रोत बन गए हैं, उन लोगों के लिए भी जो उनकी सच्चाई से वाकिफ हैं। जरूरी नहीं कि सारे एनजीओ खराब हों। लाखों एनजीओ में से कुछ उत्कृष्ट और प्रगतिशील रहे हैं और सभी एनजीओ को एक ही तराजू से तौलना हास्यास्पद होगा। परन्तु कॉर्पोरेट या फाउंडेशनों से अनुदान प्राप्त एनजीओ वैश्विक वित्त की खातिर प्रतिरोध आंदोलनों को खरीदने का तरीका बन गए हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे शेयरहोल्डर कंपनियों के शेयर खरीदते हैं और फिर उन्हें अंदर से नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। वे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र अथवा सेंट्रल नर्वस सिस्टम के बिंदुओं की तरह विराजमान हैं, उन रास्तों की तरह जिन पर वैश्विक वित्त प्रवाहित होता है।
शरारती ढंग से जब सरकार या कॉर्पोरेट प्रेस नर्मदा बचाओ आंदोलन, कुडनकुलम आणविक संयंत्र के विरोध, नागरिकता कानून तथा वर्तमान में कृषि कानून के विरोध में जैसे असली जनांदोलनों की बदनामी का अभियान चलाना चाहते हैं, तो वे आरोप लगाते हैं कि ये जनांदोलन - विदेशी वित्तपोषित प्राप्त एनजीओ हैं। उन्हें भली-भांति पता है कि अधिकतर एनजीओ को, खासकर जिन्हें अच्छी राशि मिलती है, को कॉर्पोरेट वैश्वीकरण को बढ़ावा देने का आदेश मिला हुआ है न कि उसमें रोड़े अटकाने का है।
अपने अरबों डॉलर के साथ इन एनजीओ ने दुनिया में अपनी राह बनाई है, भावी क्रांतिकारियों को वेतनभोगी एक्टिविस्टों में बदलकर, कलाकारों, बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों को अनुदान देकर, उन्हें हौले से फुसलाकर उग्र मुठभेड़ से परे ले जाकर, बहुसंस्कृतिवाद, जेंडर, सामुदायिक विकास की दिशा में प्रवेश कराकर- ऐसा विमर्श जो पहचान की राजनीति और मानव अधिकारों की भाषा में बयां किया जाता है। महत्व की बात यह कि न्याय की संकल्पना का मानव अधिकारों के उद्योग में परिवर्तन एक ऐसा वैचारिक तख्तापलट रहा है जिसमें एनजीओ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मानव अधिकारों का संकीर्ण दृष्टि से बात करना एक अत्याचार-आधारित विश्लेषण की राह बनाता है जिसमें असली सूरत छुपाई जा सकती है और संघर्षरत दोनों पक्षों को- मसलन, माओवादी और भारत सरकार, या इजराइली सेना और हमास- दोनों को मानव अधिकारों के उल्लंघन के नाम पर डांट पिलाई जा सकती है। खनिज कॉर्पोरेशनों द्वारा जमीन कब्जाना या इजरायली राज्य द्वारा फिलिस्तीनी भूमि को कब्जे में करना, ऐसी बातें फुटनोट्स बन जाती हैं जिनका विमर्श से बहुत थोड़ा संबंध होता है। कहने का मतलब यह नहीं कि मानव अधिकारों की कोई अहमियत नहीं। अहमियत है, पर वे उतना अच्छा प्रिज्म नहीं हैं जिसमें से हमारी दुनिया की भयानक नाइंसाफियों को देखा जाए या किंचित भी समझा जाए। आशा है सारे विमर्श को इन महत्वपूर्ण तथ्यों के द्वारा समझने की कोशिश करेंगे।गौरतलब है कि मीडिया स्वतंत्रता और उसके मूल्यों के अनुसार मुझे आशा है आप सभी प्रबुद्ध पाठक सभी उपयुक्त मंचों पर इन मुद्दों को उठाएंगे और सरकार को अवगत कराएंगे कि आपकी नजर सरकार पर है ना कि आपसी नुराकुश्ती में। भारत में दुनिया की 1/6 आबादी रहती है और एक दशक से भी कम समय में यह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाए रखने के लिए सभी प्रकार के प्रयास करना भारत की जनता का हक है। जिसमें मेरी भूमिका जनपक्षधर पत्रकार की है।
दोस्तों, कई लोगों का कहना है कि मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि इस तरह के मासमज्जा को जिलाये रखने के लिये उसे मदद कौन करेगा? कई लोग यह भी सवाल करते हैं कि हमें खुद के बूते कुछ करना चाहिए? मेरा उन तमाम लोगों से सवाल है कि खुद का उद्देश्य सामाजिक जनपक्षरता से परे व्यक्तिगत निष्पक्षता तो नहीं है। मैं लगातार एक स्वतंत्र मीडिया के निर्माण के लिये कार्य करते आ रहा हूं और हमें जल्द इस पर विचार करनी चाहिए। अपने तमाम मतभेदों के बाद भी मैं चाहता हूं कि आप वैकल्पिक मीडिया के आर्थिक हालातों के संबंध में जाने। यदि आप वास्तव में स्वतंत्र पत्रकारिता से सहमत हैं और भविष्य में प्रकाशन को सुचारू रूप से जारी रखना चाहते हैं, तो शुल्क के अलावा अतिरिक्त आर्थिक सहयोग करें। महंगी कर दी गई प्रिंटिंग लागत और सर्कुलेशन के साथ दिन पर दिन घाटे से मुक्त समाचारों के प्रसारण में आप सहयोगी रहेंगे। आप सभी जानते है कि मुफ्त में अखबार और वेबसाइट का प्रकाशन नहीं होता है और ना ही उसके संचालन भूखे प्यासे किया जा सकता है। समाचार संकलन, डिजाइन से लेकर प्रिंटिंग उसके बाद ट्रांसपोर्टिंग और वितरण में भी पैसा लगता है। जहां तक मार्केटिंग की बात है इतना पैसा और व्यवस्था मेरे पास नहीं है कि मैं घूम घूम कर मार्केटिंग और प्रतिनिधियों और विषम परिस्थितियों में स्वतंत्र बैनर और टाइटिल के निर्माण की कार्यवाही कर सकूं। अगर इस कार्य को आप सभी अपने कंधों पर नहीं लेते हैं तो मार्केटिंग की बात निरर्थक होगी। मैंने वैकल्पिक मीडिया के तौर पर सिटीजन जर्नलिज्म अभियान की शुरुआत भर की है यह नहीं जानता था कि पाठकों, प्रतिनिधियों, शुभचिंतकों की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलेगा? मेरी असमय बढ़ती समस्याओं के साथ सूचना और उसके प्रसारण को बनाये रखने के लिए आप सभी संगठित पहल नहीं करेंगे तो आम आदमी की जिंदगी और उसकी समस्याओं से जुड़ी खबरों को प्रमुखता के साथ सच, दृढ़ और जनपक्षीय पत्रकारिता के साथ आप तक तेजी के साथ पहुंचा पाना मेरे लिए कठिन हो जाएगा।
दोबारा यह कि अब तक के सहयोग पर गहरे दिल से कृतज्ञता के भाव के साथ कारपोरेट जगत, सरकार के दबाव, विभिन्न राजनैतिक पाटियों और विभिन्न विचारधाराओं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के जकडऩ से मुक्त बिना सीमा के पत्रकारिता के उसूलों में खड़े उतरने के लिए जरूरी है कि दिन रात जागकर मेहनत करूं लेकिन किसी के जेब में डाका डालना और वसूली मेरे लिए संभव नहीं है। संसाधन के जुड़ाव में जरूरी है कि आप भविष्य में भी दो तीन स्टाफ के लिए दाल रोटी की व्यवस्था की बीड़ा भी उठायेंगे। आशा है कि आप जिस तन मन और धन से मेरा सहयोग किया है भविष्य में भी इसके निर्माण में अपना बहुमूल्य सहयोग और सुझाव हमें देकर अनुग्रहित करेंगे।
ट्वीटर, व्हाट्सएप, इंस्टा, टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया में कहानियां, लेखों और खबरों को पहुंचने से रोकने-खरीदने से लेकर गायब करने की खबरें पढऩे के बाद मैंने सोचा फटेहाल और बेघर रहकर पत्रकारिता में चुनौतियों को स्वीकार किया जाये। वैसे भी मेरे जैसे बेघर और तकलीफ में जीने वाला पत्रकार और लेखक को छपने से रोकने के लिए कई स्तर पर प्रयास किए जाते हैं। हिन्दी के बड़े अख़बारों ने मेरे सामाग्रियों को छापना बंद कर दिया है। लिखने के लिए काफी धन, वक्त और मेहनत लगती है। वहां से मेरे लेख लेकर कई वेबसाइट छाप लेते हैं मगर कभी एक पैसा तक नहीं देते। क्या यह जरूरी नहीं है कि एक लेखक और एक पत्रकार की मेहनत का मेहनाता मिले। इसका संबंध इस कार्य को करने के लिये अपने अस्तिव बचाये रखने के साथ पाठक और लेखक के बीच सम्मान से भी है। मैं कुछ लेख के लिए काफी मेहनत करता हूं। कई दिन तक किताबें पढ़ता हूं। रिसर्च करता हूं। पुस्तकों और जानकारियों को इकट्ठे करने के लिये मशक्कत करता हूं। वैसे लेखों को अब मैं यहां डालूंगा। जिस लोकतंत्र में हासिये में खड़े लोगों के लिये लिखता हूं उनसे अपेक्षित सहयोग की मांग करता हूं। मैं चाहता हूं कि आपने जो कुछ धन सम्पत्ति जोड़ा है उसका कुछ अंश मरे मीडिया हाऊस को भी दीजिये। मैं इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं हूं। मुझे यकीन है कि दुनिया भी रहेगी और मुझसे रिपोर्ट, आलेख, खोज, सूचना हासिल करने वाले पाठक और दर्शक भी रहेंगे। मेरे जैसे बदहाल, पत्रकार भी रहेंगे। सब कुछ मुख्यधारा के चैनल या अखबार नहीं तय करेंगे। या सम्पन्न लोग तय नहीं करेंगे कि अधिक सहयोग के साथ उनके पक्ष में झूक जाऊं। जो सरकार के सामने अपना स्वाभिमान नैतिकता और अपनी महत्वाकांक्षा नहीं बचा पाए वो दूसरे की संभावनाओं को क्या ही खत्म कर पाएंगे।
यहां पर जो सामग्री होगा वह मुफ्त का नहीं होगा। इन सारे सामाग्रियों के लिये आपको आर्थिक मदद करनी होगी। मैं उम्मीद करता हूं कि सच जानने वाले पाठक मदद करेंगे। आपके विश्वास पर बड़े अख़बारों, बड़े वेबसाइट, सरकार, कार्पोरेट, राजनीतिक पार्टियों और अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोगों को जवाब भी देना है जो किसी किसी पत्रकार-सम्पादक के कार्य को रोकने के लिये किसी भी स्तर में उतर आते हैं और मेहनताना देने के लिये मिमयाते रहने के लिये मजबूर करते हैं। मैं कहता हूं आप आर्थिक सहयोग के साथ सामाजिक सुरक्षा के लिये साथ हो ले यह एक नई व्यवस्था है। जो पाठक और लेखक के सीधे संबंधों के आधार पर विकसित होगी। लिखने-पढऩे वालों की दुनिया में स्वतंत्रता और जमीर की जगह बची रहे। यह तभी सफ़ल होगा, जब लिखने वाला भी बदले और पाठक भी। आशा है कि मेरी इस कोशिश के पीछे की भावना को आप समझेंगे और कुछ नहीं तो कुछ प्रति माह आर्थिक मदद करेंगे।
Add Comment