सभी टेस्ट और सावधानी बता रहे हैं बावजूद इलाज नदारत

कोविड पर उत्तम कुमार की नई रिपोर्ट

उत्तम कुमार

 

हर दिन देश के कोने - कोने से कोरोना पॉजिटिव मरीज इलाज कराने के लिये अस्पताल की ओर जा रहे हैं। अन्य बिमारियों की अपेक्षा इसकी मृत्यु दर लोगों को चौंका रहा है। लोग आज भी डर और दहशत में अपना जीवन जी रहे हैं। इस बीमारी ने कई महत्वपूर्ण डॉक्टरों, फिल्मी हस्तियों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, राजनेताओं के साथ आम आदमी को अपना शिकार बनाया है। 

दुनिया का सबसे बेहतरीन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस बीमारी के लक्षण, इलाज और वैक्सीन को लेकर सवालों के कटघरे में है। भारत की सरकार पूरी तरह से इस बीमारी पर काबू पाने में विफल रही है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार एक वर्ष से लागू भारत में विश्व का सबसे कठोर लॉकडाउन ने भारत को तबाह कर दिया है। लगभग 1 करोड़ लोग इस दौरान बेरोजगार हुवे हैं तथा 300 से अधिक लोगों की जानें चली गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नेशनल डिसास्टर मैनेजमेंट और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बीमारी पर काबू नहीं पा सके उल्टे तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को निजीकरण कर विश्व स्तर पर भारत गरीबी और भूखमरी के कगार में धंस गई है और यहां की राजनीतिक व्यवस्था फासीवादी चंगुलों में कराह रही है।

सूचना का अधिकार बताते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय, सेबी, आरबीआई जैसे जिम्मेदार विभागों को देश में लगे लॉकडाउन के संबंध में कोई जानकारी नहीं है। देश में गरीबी दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ी है।  सकल घरेलु उत्पाद में 24 प्रतिशत से भी अधिक गिरावट दर्ज की गई है। मुद्रास्फिति की दर तो गिनती से बाहर हो गया है। नौकरियां खत्म कर दी गई है। आरक्षण को खत्म कर पिछले दरवाजे से उच्च पदों में सवर्णों को आरक्षण दिया जा रहा है। निट जैसे परीक्षाओं को खत्म कर दिया गया है। सभी राज्यों में शिक्षा संस्थानों को बंद कर दिया गया है और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। और शासकीय शिक्षकों को घरों में बैठाकर तनख्वाह का दिया जाना किसी अशुभ घटना को सूचित करता है। इस बीच रीयल स्टेट के बिजनेस में बूम नजर आता है। 

लॉकडाउन के साथ जातिवाद, गरीबी, भूखमरी, भ्रष्टाचार, तानाशाही, पुलिस की ज्यादती, पूंजीवादी व्यवस्था में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मामूली सर्दी जुकाम तथा बुखार में लोग अस्पतालों में आज भी इलाज करवाने नहीं जा रहे हैं जो भी कोविड इलाज से लौटे हैं अधिकांश लोगों में पोस्ट कोविड लक्षण मिल रहे हैं। एक और लाइन पोस्ट कोविड के ओपीडी और उसके इलाज के लिये बनाया गया है। इलाज के बाद लोगों ने नाम ना छापने की शर्त में बताया है कि अस्पतालों की स्थिति बहुत ही भयावह है। सभी मरीजों को अलग थलग रखा जा रहा है।

बीमारी की अछूतपन के कारण नर्श वार्डबॉय ही मरीजों का इलाज कर रहे हैं। अस्पतालों के साथ उन पर भी हाइपोक्लोराइड का छिडक़ाव कर दिया जाता है। उनका इलाज मुख्य डॉक्टरों के द्वारा नहीं किया जा रहा है। कई स्थानों से समाचार है कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कोविड मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। कई मरीज सही देखभाल और बेहतर इलाज के अभाव में जान गवां बैठे हैं। मीडिया और अन्य दबाव में आकर कुछ मरीजों का इलाज डॉक्टरों ने संज्ञान लेकर किया है और कुछ को डॉक्टरों ने बचा नहीं पाया है। 

आज भी चुनौती यह है कि बेहतर इलाज के नाम पर छत्तीसगढ़ एम्स में भी कोविड के मरीज मारे जा रहे हैं। कई परिवारों ने बताया की मृज परिजनों को उनके मृत मरीज का शव नहीं दिया गया है। 

अगर किसी मरीज को भर्ती के दौरान परेशानी या तकलीफ हो रही है तो वहां तक डॉक्टर नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह सब राज्य सरकार और उनके प्रशासन की कड़ी व्यवस्था में झोल के कारण भी है कि क्षेत्रों में मरीजों के मिलने से उस क्षेत्र को लॉकडाउन कर दिया जाता है और मरीज को अकेले इलाज के लिये अस्पताल के सूनसान जगहों में कुछ दिनों के लिये गिने चुने इंटर्न, नर्श और वार्डब्वाय के भरोसे छोड़ दिया जाता है। मरीजों को भोजन, पानी से लेकर दवा और इलाज के लिये तड़पते देखा गया है। ये दृश्य लोगों को उनके सोशल मीडिया में ऑडियो और वीडियो के माध्यम से देखा जा सकता है। 

कुछ महीनों से लोग वैक्सीन लगा रहे हैं बावजूद इसके कई लोगों को कोविड पॉजिटिव आ रहा है। और कइयों की जाने चली गई है। अब लोगों ने कोविड या फिर जिंदगी के बीच पेंडुलम की तरह अपनी जीवन किसी दैव्य शक्ति पर छोड़ रखा है। बावजूद छत्तीसढ़ में तीज त्योहार, मेला, आयोजन, खेल प्रतियोगिता को संचालित किया जा रहा है। सब कुछ भाग्य और अदृश्य ताकत पर छोड़ देने से लोगों में अंधविश्वास, छुआछूत और भेदभाव की बीमारी ने जगह ले ली है।

बंद का शराब के विक्रय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि इस पीड़ाजनक समय पर लोग अधिक से अधिक शराब का सेवन कर रहे हैं। लॉकडाउन तथा बीमारी से मृत लोगों के परिवार को मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है। कलेक्टर के आदेश के बाद पूरा का पूरा मोहल्ला लॉकडाउन में धारा 144 के चपेट में आ जाता है। काम धंधा सब चौपट हो गया है। लोगों को काम नहीं मिल रहे हैं इससे आम जनजीवन में मानसिक बीमारी और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस बीमारी की वजह से सामान्य ओपीडी में भी अन्य बीमारियों के इलाज से पहले कोविड का टेस्ट किया जा रहा है।

लेकिन सभी टेस्ट और सावधानी के बावजूद जानकारी यह है कि अबतक इलाज नदारत है। अत्याधुनिक मेडिकल साइंस के असफल होने के बाद आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक,  यूनानी और अन्य विधा के चिकित्सक हायतौबा मचा रहे हैं। हाल में मिक्सोपैथ के नाम से भी बहुत हो हल्ला मचा था। लेकिन बहरहाल किसी के पास इस बिमारी को पहचानने और उसके इलाज का पुख्ता हल नहीं है। 
 
कोई भी वैक्सीन कम्पनी यह नहीं कह रही है कि हमारी वैक्सीन लगवाने के बाद कोरोना नहीं होगा। इस सच्चाई को आप जितना जल्दी समझ ले उतना अच्छा है।
छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले के कलेक्टर यशवंत कुमार द्वारा वेक्सीन की दोनों डोज लगवाने के बाद कोरोना पॉजिटिव आ गये हैं क्या इसे हम अनोखी खबर माने एक और ऐसा केस आया है हिमाचल प्रदेश के सोलन में क्षेत्रीय अस्पताल की एक महिला चिकित्सक कोविड वैक्सीन की दोनों डोज लगाने के बाद कोरोना पॉजिटिव पाई गई हैं बताया जा रहा कि कोविड वैक्सीन की दूसरी डोज लेने के तीन दिन बाद चिकित्सक की तबीयत खराब चल रही थी।

जब हालत नाजुक होने लगी, तब डॉक्टर ने अस्पताल में कोरोना टेस्ट करवाया। इसमें चिकित्सक संक्रमित पाई गईं,  चिकित्सक का इस तरह कोरोना संक्रमित आना चिंताजनक है।

भारत में कोरोना वेक्सीनेशन को शुरू हुए दो महीने होने को आए हैं बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना की दूसरी डोज लग चुकी है भारत में अभी तक अधिकतर ‘कोविशील्ड’ का ही इस्तेमाल हुआ है। अब बड़े पैमाने पर यह खबरे सामने आ रही है कि कोरोना वेक्सीन की दूसरी डोज लगवाने के बाद भी व्यक्ति कोरोना पॉजिटव पाया जा रहा है, भारत में 28 दिन के अंतराल पर टीके की दूसरी डोज दी जा रही है उसके कुछ दिनों बाद ऐंटीबॉडी बनती है लेकिन वास्तविकता कुछ और है।जिला अस्पताल अल्मोड़ा में तैनात सुरक्षा गार्ड को 25 जनवरी को कोरोना टीके की पहली डोज लगाई गई थी। वहीं बीते 27 फरवरी को सुरक्षा कर्मी को कोरोना टीके की दूसरी डोज लगी।

उसके बाद भी वह कुछ दिनों पूर्व कोरोना पॉजिटव पाए गए हैं, ऐसा ही एक धार जिला चिकित्सालय की एक महिला स्वास्थ्यकर्मी का भी किस्सा है, कई डॉक्टर्स के साथ भी ऐसा ही हुआ है। दूसरी डोज लगवाने वाले  डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी बड़ी संख्या में पॉजिटव पाए जा रहे हैं इसलिए वैक्सीन की सफलता पर सवाल खड़ा हो गया है, इसलिए एक नया शगूफा उछाला जा रहा है कि कोरोना वेक्सीन कोविशील्ड की दूसरी डोज में चार हफ्ते नहीं बल्कि 12 हफ्ते का अंतर होना चाहिए। 

अब कहा जा रहा है कि दुनिया में अलग-अलग जगहों पर हुए स्टडी में यह पाया गया है कि दो डोज के बीच का अंतराल बढ़ाने पर वैक्सीन का प्रभाव 20 से 30 फीसद तक बढ़ जाता है। एक महीने पहले तक सभी हेल्थ एक्सपर्ट इस बात पर सहमत थे कि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के लिए दो खुराकों के बीच 28 दिनों का अंतराल होना चाहिए। लेकिन अब डब्ल्यूएचओ भी कह रहा है कि वेक्सीन के दूसरे डोज में 6 से 8 हफ्तों का गैप रखना चाहिए। जबकि दो महीने पहले यही डब्ल्यूएचओ चार हफ्ते बाद ही दूसरा डोज दे देना चाहिए। जब इतना कन्फ्यूजन था तो ऐसी कौन सी जल्दी पड़ी थी आपको इमरजेंसी अप्रूवल देने की?

लोग बार बार बोल रहे थे कि बिना प्रॉपर रिसर्च के जल्दबाजी में इमरजेंसी अप्रूवल दिया जा रहा है, अब इससे हो यह रहा है कि इससे लोगों में वेक्सीन के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। शिवानी बागी कहती है कि ये कोई इश्यू नहीं है। कोई भी वैक्सीन 100 फीसद प्रभावकारी नहीं होती। मुद्दा ये है कि तमाम सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में अधिकारी दबाव क्यों बना रहे हैं। वैक्सीनेशन के लिए जबकि वैक्सीनेशन ऐच्छिक है।

कुम्भ जैसे मेगा इवेंट में आएंगे तो कोरोना नहीं फैलेगा लेकिन शादी में शासन द्वारा तय किये गए मेहमानों से ज्यादा आ जाएंगे तो कोरोना फैल जाएगा। किसान आंदोलनों में कोरोना नहीं फैल रहा है। है न कमाल...

अब तो यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कोरोना एक राजनीतिक महामारी है, जिस नेता का जो मन होता है वह उसे वैसे इस्तेमाल करता है। उत्तराखंड के नव नियुक्त मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत राज्य में चल रहे कुम्भ पर कहते हैं कि - ‘किसी मेगा-उत्सव में जाने के लिए आरटी-पीसीआर रिपोर्ट या तीर्थयात्रियों के पंजीकरण की कोई आवश्यकता नहीं होगी।’  मुख्यमंत्री ने कहा - ‘कुंभ मेले को लेकर बहुत नकारात्मक सा माहौल बन गया था, जिसे हमने साफ़ कर दिया है ताकि लोग बेफिक्र होकर मेले में आ सकें। अधिकारियों को निर्देश दिये गए हैं कि आगंतुकों को कुंभ मेला परिसर में आने से बेवजह ना रोका जाये।

और आज देश में 24 घंटों में कोरोना वायरस के 68 हजार मामले सबसे अधिक।छत्तीसगढ़ में अब तक 3 लाख 37 हजार 940 केसेस हैं जिसमें 4 हजार 61 लोगों की मौत हो गई हैं। भारत में 11 करोड़ 9 लाख 51 हजार 624 केसेस प्रकाश में आये हैं जिसमें 1 लाख 61 हजार 552 लोगों की मौत हो गई है। विश्व में 12 करोड़ 68 लाख 61 हजार 340 केसेस निकले हैं जिसमें 27 लाख 79 हजार 532 लोगों की मौत हो गई हैं। उधर मुख्यमंत्री अपने राज्य में चल रहे कुम्भ में लोगों को बिना जांच के आने को प्रोत्साहित कर रहे हैं और कहने को वह केंद्र सरकार द्वारा जारी किये गए दिशा-निर्देशों का पालन करने की बात करते हैं। 

कुल 14 देशों ने अब तक कोविशील्ड वेक्सीन के अपने यहां इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। नीदरलैंड्स और आयरलैंड में भी ब्लड क्लॉटिंग को लेकर एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन पर रोक लगा दी है इसे मिलाकर डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, इटली, बुल्गारिया, रोमानिया, एस्टोनिया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, लातविया और गैर-यूरोपीय संघ (EU) के देश नॉर्वे और आइसलैंड ने भी ब्लड क्लॉटिंग की रिपोर्टों के बाद एहतियातन वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। एशियन देश थाईलैंड ने भी इसी कारण से अपने यहां इसके इस्तेमाल को रोक लगा दिया है। इंडोनेशिया ने भी जो आबादी के हिसाब से पाकिस्तान से भी बड़ा है उसने भी अपने यहां कोविशील्ड वैक्सीन के इस्तेमाल को टालने का फैसला किया है।

कुछ दिन पहले कुछ अधिक जानकार लोग चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे कि हमारी बनाई वैक्सीन सारी दुनिया इस्तेमाल कर रही है। अब जब यूरोप के 15 देशों समेत थाईलैंड और इंडोनेशिया ने ब्लड क्लॉट की समस्या को लेकर इनकी वेक्सीन पर रोक लगा दी है तो यह भक्त बोल रहे हैं कि वो हमारी वैक्सीन नहीं है। अब बता रहे हैं कि जिन देशों में रोक लगाई गई है वहां सीरम इंस्टीट्यूट ने कोई सप्लाई नहीं की है हालांकि वैक्सीन बनाने का फार्मूला एक ही है। इसका भी अब यह कह कर बचाव किया जा रहा है कि जरूर दूसरी फैक्टरी वालों ने कोई मामूली चूक कर दी होगी इसलिए ऐसा हो रहा है।

हालांकि यूरोप में वैक्सीन बनने के बाद ब्लड क्लॉट बनने से महज दो ही मौते रिपोर्ट हुई है। जबकि भारत में कोविशील्ड की वैक्सीन इस्तेमाल करने के बाद पचास से भी अधिक मौते दर्ज की जा चुकी है लेकिन मौत के तुरन्त बाद बिना कोई जांच किए सरकार ने वैक्सीन कम्पनी को क्लीन चिट जारी कर दी। यूरोप जैसी फेयर जांच यहां पर कभी हो भी नहीं पाएगी?
 
17 मार्च को अचानक देश को पता चला है कि कोरोना वैक्सीन बर्बाद हो रही है। ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने बताया है उन्होंने मुख्यमंत्रियों से हुई बैठक में कहा है कि ‘वैक्सीन की एक्सपायरी ड़ेट का ध्यान रखना जरूरी है। यानी जो वैक्सीन पहले आई है उसे पहले इस्तेमाल में लाया जाए और जो बाद में आई है, उसे बाद में इस्तेमाल में लाया जाए। इससे वैक्सीन की बर्बादी से बचा जा सकता है।

बड़ी संख्या में लोग वेक्सीन की दूसरी डोज लगवाने के बावजूद भी कोरोना पॉजिटव हो रहे है अब नया शगूफा उछाल रहे हैं कि दूसरी डोज लगने के 45 दिन बाद ऐंटीबॉडी बनती है जबकि कुछ दिनों पहले तक यही विशेषज्ञ कह रहे हैं कि दूसरी डोज लगने के 15 दिन बाद ऐंटीबॉडी बन जाती है। खैर नई नई वैज्ञानिक खोजों के बाद सच सामने आती है एक दिन यह भी आ जाएगी कि हमने वैक्सीन फालतू में लगाया। 

18 मार्च तक कोरोना केसेस बढऩे की असली वजह सामने आ गयी। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने मोदी जी से अपील की है कि कोरोना वैक्सीन को सभी के लिए ओपन कर दिया जाए। कोरोना वेक्सीन लगाने के लिए वेक्सीन केंडिडेट की 45 साल से अधिक आयु वाली शर्त हटा कर जो भी 18 साल से अधिक आयु का हो उसे वेक्सीन ठोक दी जाए। 

19 मार्च को खबर आई कि ऐसा क्यों नही हो सकता कि राजनीतिक रैली, रोड शो में शामिल होने के पहले कोरोना टेस्ट को अनिवार्य घोषित किया जाए! जब बीएमसी, मुंबई यह निर्णय ले सकती है तो मोदी सरकार राज्य सरकारों पर दबाव डालकर यह निर्णय क्यों नहीं ले सकती।

पिछले साल कोरोना की शुरुआत में कुछ जानकार कह रहे थे कि कोरोना महज एक आम सीजनल फ्लू है तो उन्हें तथाकथित विज्ञान विशेषज्ञ ओर बड़े बड़े डॉक्टर फटकार रहे थे उन्हें झूठा औरर भ्रम फैलाने वाला बताया जा रहा था, उस वक्त बेहिसाब खुदी हुई कब्रो औरर पीपीई सूट वालों द्वारा लाशों को फेंकते हुए वीडियो दिखा दिखा कर भयानक रूप से डर का एक माहौल बनाया जा रहा था, एक बार फिर से वही सब करने की कोशिश की जा रही है।

कोरोना को लेकर संयुक्त राष्ट्र की मेट्रोलॉजिकल टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें 16 सदस्यीय टीम का कहना है कि अगर कोरोना वायरस अगले कुछ वर्षों तक चलता है, तो ये एक मौसमी बीमारी हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा बनाई गई रिसर्च टीम ने बताया कि सांस संबंधी संक्रमण अक्सर मौसमी होते हैं। कोरोना वायरस भी मौसम और तापमान के मुताबिक अपना असर दिखाएगा। एक साल में हमें भी समझ आ ही गया है कि यह वाकई एक सीजनल फ्लू से ज्यादा नहीं है लेकिन उसके बावजूद हमें दूसरी लहर, तीसरी लहर के नाम से हमारे बीच डर और दहशत का माहौल बनाया जा रहा है।

हर देश का प्रधानमंत्री अपने देश की कम्पनी की बनाई वेक्सीन इसलिए लगवाता है ताकि किसी को बोलने का मौका न मिले। यूरोप में कोविशील्ड पर सवाल खड़े हो रहे थे तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने आक्सफोर्ड - एस्ट्राजेन्का की वेक्सीन लगवाई जो मूल रूप से ब्रिटिश- स्वीडिश कम्पनी है। इसी वेक्सीन को भारत में कोविशील्ड के नाम से जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत बायोटेक की बनाई हुई कोवेक्सीन की टीका लगवाई थी ताकि उस पर उठ रहे सवालों को दबाया जा सके। रुस के राष्ट्रपति बहुत पहले ही रूस में बनाई गयी स्पूतनिक - V ली थी, उस वक्त कितना हल्ला मचा था आपको याद होगा अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन ने भी फाइजर कंपनी की बनी हुई वेक्सीन ली थी, फाइजर पर भी बहुत से सवाल उठ रहे थे। भारत में तो बहुत से लोग आज भी यही समझते हैं कि कोविशील्ड भारत के वैज्ञानिकों ने बनाई है।

कोरोना की आमद पर पिछले साल 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का इवेंट मनाया गया था और उसके बाद देश भर में 21 दिन का लॉक डाउन कर दिया गया उस वक्त लोग और न्यूज चैनल बता रहे थे कि वायरस की साइकिल 21 दिन की होती है इसलिए 21 दिन का लॉक डाउन किया गया है, पहले कनिका कपूर पर  न्यूज चैनलों का फोकस रहा और फिर सोची समझी रणनीति के तहत अचानक से न्यूज चैनल के दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज से लाइव प्रसारण करने लगे, एक ही झटके में देश के मुसलमानों को कोरोना फैलाने वाला घोषित कर दिया गया। मुस्लिम इलाकों से कोरोना वारियर्स के साथ हुई कुछ घटनाओं को बहुत बड़ा चढ़ाकर दिखाया जाने लगा अगले एक महीने तक यही दौर चला बाद में जब कोरोना दूसरे समुदाय में भी फैला ओर वहां भी ऐसी ही घटनाए हुई अन्य धर्मस्थल जैसे गुरद्वारे आदि से भी बड़ी मात्रा में कोरोना पॉजिटव लोगों के निकलने की सूचना आने लगी तब जाकर न्यूज चैनल ठंडे पड़े और नरसंहार रचने की पूरी भूमिका से बाज आये। 

इस बार भी मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन इस बार और पिछली बार में मुसलमानों को दोषी बताए जाने के अलावा फर्क नजर आ रहा है जैसे टीवी चैनलों पर पीपीई किट वाले कहीं दिख नहीं रहे, उस वक्त डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ पूरी तरह से पीपीई किट पहने दिखता था लेकिन जैसे जैसे मरीज बढ़ते गये अस्पताल कर्मचारियों ने पीपीई किट पहनना बिलकुल कम कर दिया। अब बमुश्किल कोई पूरा पीपीई किट पहने हुए दिखता है पता नहीं कोरोना को क्या हो गया? बड़े पैमाने पर अस्पताल कर्मचारी आज भी कोरोना से बचे हुए हैं? 

अखबारों में शुरुआत में कब्रिस्तान में पहुंचने वाली कोरोना की डेड बॉडी की बहुत सी खबरें छपी बाद में जब श्मशान में बॉडी पहुंचने लगी तो अखबारों ने खबरे छापना ही बन्द कर दी और तो और जनसम्पर्क विभाग का आंकड़ा गिनना भी बंद हो गया। वह तो गनीमत है कि जब हमारे समाज का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति इस बीमारी से गुजर जाता है तो लोग चौंक जरूर जाते हैं। 

हर्ड इम्युनिटी की भी बीच में बहुत बात की गई कि यदि बड़ी संख्या में कोरोनापॉजिटिव लोग बढ़ जाएंगे तो कोरोना कम हो जाएगा लेकिन जैसे जैसे वेक्सीन सामने आई वैसे वैसे हर्ड इम्यूनिटी का कॉन्सेप्ट ही गायब कर दिया गया, बताया गया कि असली हार्ड इम्युनिटी तो वेक्सीन से ही आ सकती हैं। लोगों ने मास्क लगाना, विटामिन सी, जिंग लेना और सेनेटाइज करना तक बंद कर दिये हैं। 

पिछले साल इस वक्त स्टेज 3 और कम्युनिटी ट्रांसमिशन भी बहुत चर्चा में था। पता नहीं भारत स्टेज 3 में पहुंचा की नहीं? अब स्काईप की बात बहुत हो रही है और देश में कम्युनिटी ट्रांसमिशन शुरू हुआ भी कि नहीं? जब सितम्बर में 90 हजार केस रोज निकलने शुरू हुए तो चैनलों ने कोरोना को बिल्कुल गायब कर दिया। वेक्सीनेशन चालू करने के समय फिर से माहौल बनाया गया और आज जब वेक्सीनेशन को ओपन फॉर आल किया जाना है तो फिर से कोरोना पीक पर आ गया है। देखा यह गया कि जिन लोगों ने ज्यादा सुरक्षा बरती वही सब अस्पताल पहुंच गये।

22 मार्च तक टेक्निकल टीम ने नई जानकारी ले आई है वह यह कि डिसाइड किया कि कोविशील्ड की 4 हफ्ते यानी 28 दिन बाद दूसरी डोज लगनी चाहिए तो अब समय बढ़ाकर 6 से 8 हफ्ते कर दिया है इस बात का क्या भरोसा है कि कल को यह नहीं कहा जाएगा कि दूसरी डोज तीन महीने बाद लेनी होगी? 

23 मार्च को नई समाचार चलकर आई है सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लॉकडाउन में EMI किस्त में राहत लेने वालों का ब्याज माफ नहीं होगा। कोरोनकाल में जिन लोगों ने किस्त या बिल विलंब में पटाया है उन पर ब्याज लगाया गया है और प्राईवेट कंपनियों ने किस्त और अन्य ब्याज और उधार के मामलों में चांदी काटी है। चलिये अब सुप्रीम कोर्ट ने भी आम जनमानस का पक्ष लेना छोड़ दिया है। 

सरकार किस तरह की दोहरी नीति अपनाती है यह इन दो निर्णयों को देखकर ही साफ हो जाता है उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने आदेश दिया है कि  8वीं तक के स्कूल 24 से 31 मार्च तक बंद  रहेंगे। साफ है कारण कोरोना ही है। भीड़ भाड़ से बचने के लिए ही यह कदम उठाया गया है, हिमाचल प्रदेश में भी तमाम छोटे बड़ेे मेले प्रतिबंधित कर दिए गए हैं लेकिन दोनों प्रदेशों से लगे हुए उत्तराखंड के हरिद्वार में दुनिया का सबसे बड़ा मेला लग रहा है जहां मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कोरोना की निगेटिव रिपोर्ट लाने की बाध्यता को भी हटा लिया है।

कुम्भ मेले पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण कह रहे हैं कि उत्तराखंड दौरे पर गई उच्च स्तरीय केंद्रीय टीम द्वारा कुंभ मेले के दौरान कोरोना संक्रमण फैलने को लेकर चिंता जाहिर की गई है। उन्होंने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा है। जिसमें  कुंभ मेले के दौरान कोरोना संक्रमण फैलने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता बताई है। 23 मार्च को उत्तरप्रदेश गोरखपुर के बांसगांव के भीमराव आंबेडकर पूर्व माध्यमिक विद्यालय के प्रबंधक दीपक कुमार कन्नौजिया ने एक वीडियो में कोरोना के मद्देनजर स्कूल बंद करने के चलते होने वाली परेशानियों का हवाला देते हुए सरकार के निर्णय पर सवाल उठाए थे। अब इसी वीडियो के चलते उनके स्कूल की मान्यता रद्द की जा रही है और शिक्षक की धड़पकड़ की तैयारी है। 

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने इस रिपोर्ट में  यह भी कहा है कि केंद्रीय टीम की रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार में हर दिन 10-20 तीर्थयात्री और 10-20 स्थानीय लोग कोरोना पॉजिटिव बताए जा रहे हैं। राज्य को सूचित किया गया है कि हरिद्वार में प्रतिदिन की जाने वाली कोराना जांच पर्याप्त नहीं हैं। अब बीमारी का आरओ रेट क्या हैं ये किसी को याद नहीं दिलाया जाएगा। अब मीडिया दिखाएगा कि जनता तीरथ सिंह की भी वाह वाह कर रही है क्योंकि उन्होंने कुंभ मेला लगने दिया जो हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है। 

23 मार्च सूरत सिविल वार्ड हॉस्पिटल में बड़ी लापरवाही सामने आई है। यहां एक महिला प्यासी तड़पते रही, सांस फूल रहा थी, लेकिन सूध लेने वाला कोई नहीं था। देवर को वीडियो कॉल करके मदद की गुहार लगाई। इसके बाद परिवार वालों ने हॉस्पिटल में डॉक्टर से लेकर वार्ड के कर्मचारियों तक को फोन किये, लेकिन किसी ने भी फोन नहीं उठाया। अगले दिन सुबह 20 मार्च को महिला को मृत घोषित कर दिया गया। 

कोविड 19 पर अपनी नजर रख रहे गिरीश मालवीय लिखते हैं कि 24 मार्च की खबर यह मिला कि दो दिन पहले एबीपी न्यूज पर एक रिपोर्ट दिखाई गयी जिसमें मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर मास्क न पहनने को लेकर उनकी खूब लानत मलामत की गयी अब एबीपी न्यूज या किसी भी नेशनल न्यूज चैनल वाले की यह हिम्मत नहीं होगी कि वह पूछ ले कि अमित शाह ने रोड शो के दौरान मास्क क्यों नहीं पहना है। चौंकानेवाली बात यह है कि जो केरल पिछले साल कोरोना को नियंत्रण करने में सफल था उस राज्य केरल का रिकार्ड कुछ इस तरह है।

केरल उन छह राज्यों में शामिल है जहां सबसे तेजी से कोरोना मामले बढ़ रहे है केरल में 23 मार्च को कोरोना वायरस के 1985 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढक़र 11,07,801 हो गई। वहीं 10 और मरीजों की मौत के बाद मृतकों की संख्या बढक़र 4,517 हो गई। केरल में कोरोना संक्रमितों का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है और ऐसे देश के गृह मंत्री अमित शाह ने  केरल के त्रिप्पुनिथुरा में रोड शो कर रहे हैं, सोशल डिस्टेंसिंग की बात करने वाले खुद राजनितिक रैलियों में जनता का जमावड़ा इकठ्ठा कर रहे  हैं।

12 से 14 अप्रैल महाकाल कुंभ पर्चे का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें बताया गया है कि जैसा ऑफर इस पर्चे में दिया गया है ऐसी ही एक बस गुजरात से चली और उत्तराखंड में उनका कोविड टेस्ट हुआ और बस में बैठे 22 लोग पॉजिटव आए सबने गलत नम्बर लिखवाए थे अब वे लोग कहां है कोई नहीं जानता? जानकारों  का कहना है कि यदि ऐसी बस तबलीग जमात की होती तो अब मुख्यधारा के न्यूज चैनल पूरे देश को हिला दिए होते। वैसे उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नए मुख्यमंत्री के निर्णय को पलटते हुए यह निर्देश दिया कि कुंभ मेले में उन्ही लोगों को एंट्री दी जाएगी जिनके पास पिछले 72 घण्टे की निगेटिव कोरोना रिपोर्ट होगी। लेकिन इसके पहले पता नही कितनी ही बसे ऐसे यात्रियों को लेकर चल पड़ी होगी।

इस बीच महादानी बिल गेट्स ने कहा है कि कोविड अभी दो साल और चलेगा ये चक्कर कुछ समझ नहीं आता है। इससे पहले कुछ नहीं हो सकता। तब तक बहुत से विकासशील देश कटोरा पकडक़र विकसित देश के सामने अपने देश के बहुमूल्य संसाधनों को औने पौने दामो में बेचने में विवश हो जायेंगे। 

चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के लिये एक दंतकथा है कि मध्यप्रदेश के उज्जैन में एक स्वास्थ्यकर्मी ने वेक्सीन के दोनों डोज लगवाए कहते है कि  दूसरी डोज लगने के 14 दिन बाद शरीर में एंडीबॉडी पैदा होती है वो दिन भी कम्प्लीट हो गए उसके बाद भी उसकी मृत्यु कोरोना से हो गयी। मामला उज्जैन का है मृतक रामाराव जिले के मलेरिया विभाग में बतौर फील्ड स्वास्थ्यकर्मी के पद पर तैनात थे और उन्होंने कोरोना के टीके के दोनों डोज लगवा रखे थे। इसके बाद भी वह कोरोना संक्रमित हो गए और उनकी मौत हो गई।

बताया जा रहा है कि रामाराव ने पहली डोज 9 फरवरी को ली थी और दूसरी डोज 8 मार्च को लगवाई थी। इसके दस दिन बाद ही उन्हें बुखार आया और सांस लेने में तकलीफ हुई तो उनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद उन्हें इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत बिगडऩे के बाद उन्हें दूसरे अस्पताल में शिफ्ट कर वेंटीलेटर सपोर्ट दिया गया, लेकिन आखिर में वह कोरोना से जंग में हार गए उनकी मौत हो गयी। प्रशासन कह रहा है हमें तो कुछ पता ही नहीं है। सब भगवान के माया पर छोड़ दीजिये।

घटना 27 मार्च की है राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 3 मार्च को कोराना वैक्सीन का पहला डोज लगवाया। राष्ट्रपति को 26 मार्च को सीने में दर्द उठा। हॉस्पिटल ले जाया गया। राष्ट्रपति की 30 मार्च की सुबह बायपास सर्जरी होगी। गनीमत की नर्श और वार्डबॉय और हमारे राज्य के झोलाछाप डॉक्टरों के चक्कर में राष्ट्रपति नहीं आये। 

27 मार्च को केन्द्र ने राज्यों से कहा कि टेस्टिंग और ट्रेसिंग बढाय़े, ऐसा ना करने पर एक मरीज 30 दिन में 406 लोगों को संक्रमित कर सकता है। यदि ऐसे पचीस हजार मरीज कुम्भ मेले में स्नान करने चले गए और वहां वे 10 दिनों तक घूमे फिरे तो कितने लोगो को संक्रमित करेंगे? कोविड के हमारे देश में आने के बाद ऐसे ही कई सभा समारोह और चुनाव का महाकुंभ हुआ है अब आगे देखना है यह तेजी से कितने लोगों में फैलती है। 

दलित साहित्यकार चौथीराम लिखते हैं कि कोविड की दूसरी लहर छत्तीसगढ़ में भी बड़ी तेजी से फैल रही है। इसी के साथ ही बुरी खबरें भी आ रही हैं। पता चला है कि सिरपुर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महोत्सव में बहुत सक्रिय भूमिका निभाने वाले रामकृष्ण जांगड़े कोरोना के शिकार हो गए। 

सुरजीत कुमार सिंह  26 मार्च के दैनिक भास्कर का हवाला देते हुवे लिखते हैं कि खबर है कि देश में कोरोनावायरस के डबल म्यूटेशन के 771 प्रकार के संस्करण 18 राज्यों में मिले हैं। यह नए प्रकार का कोरोना संस्करण लोगों की इम्युनिटी पर भी काम नहीं करता है अर्थात आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता, इस डबल वैरीअंट वायरस के सामने किसी काम नहीं आएगी। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि सबसे अधिक मौतें महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश आदि में ही हैं। लग रहा है कि जैसे चुनाव सम्पन्न बिहार और चुनावरत पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पांडिचेरी में अभी यह डबल म्यूटेशन कोरोनावायरस जाने वाला नहीं है।

कोरोना के कारण असमय मेरे परिचित दो लोगों का निधन हुआ है। एक हैं रायपुर शहर के रहने वाले आदरणीय रामकृष्ण जांगड़े और दूसरे हमारे विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मी सुरेश रामटेके भाऊ। इन दोनों लोगों को दूसरी लहर के कोरोनावायरस ने संभलने का मौका ही नहीं दिया। और जब इन लोगों को अस्पतालों में एडमिट किया गया था, तो जैसा कि आप जानते हैं कि कोरोनावायरस पॉजिटिव व्यक्ति से मिलने के लिए परिवार के कोई लोग नहीं रखे जाते हैं, बल्कि अस्पताल का ही पूरा स्टाफ व डॉक्टर होते हैं।

लेकिन वहां की एक सबसे बड़ी दिक्कत यह है जो कि मैं अपने बहुत सारे परिचित चिकित्सकों से जान पाया हूं, वह यह कि कोरोनावायरस के पेशेंट को जब वेंटीलेटर पर रखा जाता है और उसको कृत्रिम ऑक्सीजन दी जाती है, तो जो नाक में लगाया जाने वाला ऑक्सीजन पाइप है, आप देखेंगे कि वह कभी भी बदला नहीं जाता, बल्कि वह बिना सैनिटाइज किए और बिना बदले, बिना साफ-सफाई के हर पेशेंट को लगा दिया जाता है। 

ऐसा इसलिए भी हो पाता है क्योंकि जब कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव है, तो उसकी देखभाल के लिए परिवार के किसी व्यक्ति को अंदर रखा ही नहीं जाता है। तो पता ही नहीं चल पाता कि कैसा इलाज चल रहा है। मैं जहां तक समझ पा रहा हूं कि कोरोना ग्रसित जब कोई व्यक्ति भर्ती हो जा रहा है तो फिर उसको तबियत बिगडऩे पर अस्पताल वाले जबरन आईसीयू में और वेंटीलेटर पर रख रहे हैं और फिर वहां से जिंदा लौट कम रहा है। बल्कि लगाई गई ऑक्सीजन पाईप, जो वायरस से भरी हुई है, उसके कारण ही वह व्यक्ति मर रहा है।  

उस ऑक्सीजन नली में इतना संक्रमण है कि कोई स्वस्थ व्यक्ति भी अगर वह पाईप लगा ले तो मरकर ही छूटेगा। आपके भी परिचय में यदि कोई डॉक्टर और अन्य चिकित्सा कर्मी हो तो आप उनसे पता कर सकते हैं कि क्या कोरोना पेशेंट को दी जाने वाली ऑक्सीजन, जिस पाइप के सहारे दी जा रही है, क्या वह पाइप हर पेशेंट के साथ बदला जा रहा है। मैं तो कई महीनों के गहरे निष्कर्ष के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं। 

सिंह कहते हैं कि कोरोनावायरस वापस आ रहा है और आप स्वस्थ रहिए, बचकर रहिए, भीड़ से बचकर रहें, अनावश्यक घरों से बाहर मत निकलिए। जिन लोगों को किसी भी तरीके की शारीरिक बीमारियां हैं, उनके लिए तो कोरोनावायरस मौत का ही इंतजाम है। इसलिए बेहतरीन प्रोटीन युक्त भोजन कीजिए, गर्म पानी पीजिए, काढ़ा बनाकर पीजिए और हमेशा साफ सफाई से रहिए, मास्क लगाइए और हाथ हमेशा सैनिटाइज करते रहिए। 


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