सिरपुर नगर नालंदा विश्वविद्यालय से भी अधिक प्राचीन?
उत्तम कुमारश्रीपुर अर्थात सिरपुर महासमुंद जिले में स्थित महानदी के किनारे बसा एक गांव है। बताया जाता है कि पांचवी छठवीं शताब्दी के मध्य सिरपुर दक्षिण कोसल का राजधानी हुआ करता था। पुरातात्विक नगरी सिरपुर में वैसे तो बड़े विश्वविद्यालय अनेक तालाबों, बाजारों, बंदरगाह, प्राचीन अस्तपताल तथा विहारों का निर्माण हुआ जिनमें से लक्ष्मण विहार प्रमुख है। रविकिरण बसंतराव सदानशिव, अमरावती अपने शोध प्रबंध प्राचीन विश्वविद्यालयों की शिक्षा पद्धति में 8वीं से 12वीं शताब्दी तक भारत में 14 बड़े विश्वविद्यालय का उल्लेख करते हैं जिसमें सिरपुर विश्वविद्यालय का नाम इतिहास में दर्ज है।
सिरपुर में एक साजिश के तहत बौद्ध धम्म, कला-स्थापत्य, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, समाज एवं इतिहास को मटियामेट करने की कोशिश हो रही है। ब्राह्मणवादी पोषित राजनीतिक शक्ति की राजाश्रय होने से लगातार बौद्धकालीन विरासतों को जमींदोष करने की कोशिश उत्खनन से प्राप्त शिलालेख, सिक्कों, मूर्तियों, ईंट, पत्थर और महंगी सामग्रियों को साजिश के तहत गायक करने के कार्य को अंजाम दिया जा रहा है और इस कार्य को पूरा करने में वर्तमान सरकार भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

दीक्षित ने आनंद प्रभुकुटी विहार का उत्खनन कार्य किया
1953-54 में सागर विश्वविद्यालय एवं 1954-55 व 1955-56 में मध्य प्रदेश शासन पुरात्त्व विभाग की ओर से एमजी दीक्षित ने सिरपुर में आनंद प्रभुकुटी विहार स्वास्तिक विहार, एक अन्य विहार तथा लघुदुर्ग का उत्खनन कार्य किया था। उन्होंने 43 लोगों के रहने के कमरों को खोदकर भूमि से बाहर निकाला था। उनके अनुसार इस नगर स्थल के उत्खनन में उन्हें तीन समय-कालों की बस्ती के चिह्न मिले थे। प्राचीनतम काल पांचवी शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश का काल था, क्योंकि इस स्तर पर उन्हें शरभपुरीय राजा प्रशन्नजीत का एक भग्न स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुआ। द्वितीय काल का समय सातवीं शताब्दी का है।

इस काल में भवन निर्माण की प्रक्रिया तीव्र गति पर थी, क्योंकि इस स्तर पर उन्हें कई ईंट व प्रस्तर निर्मित भवन प्राप्त हुए। यह उल्लेखनीय है कि अभिलेखीय सामग्री इस इस तथ्य का पूर्ण समर्थन करते हैं। 7वीं शताब्दी का समय महाशिवगुप्त बालार्जुन का समय था। अभिलेखों के अनुसार सिरपुर के अधिकांश मंदिरों एवं भवनों का निर्माण उसी के काल में हुआ। तृतीय काल रतनपुर में राज्य करने वाले कल्चुरी नरेश रत्नदेव के 106 तांबे के सिक्के प्राप्त हुवे हैं। इस युग के भवन पूर्व युगीन भवनों की सामग्री से बने हुए प्राप्त हुए हैं, इस युग के 43 कमरे प्रकाश में लाये गये एवं बहुरंगी कांच की चूडि़ंयां भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई। दीक्षित का अनुमान था कि संभवत: सिरपुर में उनका स्थानीय निर्माण होता था।
अरूण कुमार शर्मा 2002-2003 ने उत्खनन का कार्य किया
दक्षिण कोसल में अरूण कुमार शर्मा ने साल 2002-2003 के उत्खनन के दौरान अब तक के सबसे बड़े विहार के रूप में तीवरदेव बौद्ध विहार का उत्खनन कार्य पूरा किया था। यह बौद्ध विहार कसडोल जाने वाले मार्ग पर दाहिने ओर लक्ष्मण मंदिर से लगभव 1 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित है। यह विहार 902 वर्ग मीटर परिक्षेत्र में निर्मित है, जिसे लगभग दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम विहार के मध्य में 16 अलंकृत प्रस्तर स्तंभों वाला मण्डप हैं, जिसका आकार 8.6 मीटर लंबा 7.6 मीटर चौड़ा है। इन स्तंभों पर ध्यानमय बुद्ध, सिंह, मोर, चक्र आदि का सुंदर शिल्पांकन है। इस विहार की योजना भी सामान्य विहारों के अनुरूप हैं। चारों ओर भिक्षुओं की कोठरियां एवं मध्य के आंगन हैं।

गर्भगृह में पश्चिम में निर्मित गर्भगृह (2.4 मीटर लंबा और 1.4 मीटर चौड़ा) में भगवान बुद्ध की एकात्म, भूमि स्पर्श मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है। बुद्ध के अतिरिक्त गर्भगृह के सामने वाले मण्डप के चारों ओर लगभग 2.25 मीटर चौड़ा गलियारा है। इस विहार में जल निकासी के लिए प्रस्तर निर्मित भूमिगत नाली के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इस विहार के कक्षों को कालांतर में लघु गर्भगृहों में परिवर्तन पश्चात विहार के दक्षिण दिशा की ओर विस्तार किया गया तथा अनेक नवीन कक्षों का निर्माण किया गया तथा पूर्व की अपेक्षा एक अन्य बड़े मण्डप का (12.5 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा) भी निर्माण किया गया तथा चारों ओर 36 मीटर लम्बा एवं 1.5 मीटर चौड़ा गलियारा है। यह मण्डप 10 स्तंभों पर आधारित था। उत्खनन कर्ता द्वारा इसके दो मंजिला होने का अनुमान किया गया है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पंकज कुमार वेला अपने शोध प्रबंध ‘पुरातात्विक आर्थिक एवं पर्यटन की दृष्टि से सिरपुर’ में लिखते हैं कि सिरपुर नगर नालंदा विश्वविद्यालय से भी अधिक प्राचीन है। वे कहते हैं कि पर्यटन क्षेत्र देश की आर्थिक संमृद्धि और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। पर्यटन पर्यावरण की गुणवत्ता बढ़ाने में तथा अधिक रोजगार सृजन करने के लिए प्रोत्साहन देता है। पर्यटन विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्र है। जो वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में 11 प्रतिशत योगदान देता है। भारत में यह अभी भी 6.7 प्रतिशत ही है। वे कहते हैं कि घरेलू पर्यटन की दर एवं मात्रा विगत दो दशकों में अत्यधिक तेजी से बढ़ी है।

‘सिरपुर का इतिहास एवं पुरातात्विक महत्व’ नामक शोध में डॉ. रानू अग्रवाल एवं डॉ. अवधेश्वरी भगत लिखती हैं कि सिरपुर में मौर्य काल से ही बौद्ध भिक्षुओं को शरण मिली हुई थी यहां उत्खनन में प्राचीन मठ भी प्राप्त हुवे हैं। यहां अधिकांशत: प्रसिद्ध नागर शैली में लाल ईंटों से बना हुआ स्थापत्य अवशेष मिलता है। कला के शाश्वत नैतिक मूल्यों एवं मौलिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ धार्मिक सौहाद्र्र तथा आध्यत्मिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से आलोकित सिरपुर भारतीय कला के इतिहास में विशिष्ट कला तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। सिरपुर की पुरातात्विक विशेषताओं को देखते हुए पिछले कई वर्षों से इसे विश्व धरोहर घोषित करने की मांग की जा रही है। यहां की प्राचीन सांस्कृतिक, पुरातात्विक धरोहर विश्विविख्यात है इसके बावजूद भी सिरपुर नगरी के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है...
आश्चर्य की बात यह कि डॉ. अरूण शर्मा के अनुसार सिरपुर में मार्च 2017 में एलियन जैसे दिखने वाले पुतले मिले थे। जिससे देश विदेश के लोगों में आश्चर्य की तहर फैल गई थी। पुतले आज से 2600 वर्ष पुराने बताए जा रहे हैं। जिनका निर्माण सिरपुर के कलाकारों के द्वारा किया जाना ही बताया जा रहा है। बौद्ध विरासत के जानकार इसे पुरातात्विक विज्ञान के पटाक्षेप के रूप में देखते हैं।

ह्वेनसांग हर्षवर्धन के काल में पहुंचे थे
ह्वेनसांग हर्षवर्धन के काल में लगभग 639 ईश्वी में भारत आया था और इन्होंने लगभग 20 वर्ष भारत में गुजारे थे। उनकी पुस्तक मेरी भारत यात्रा सिरपुर के पुरातात्विक इतिहास पर ठोस मत रखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सिरपुर में नालंदा के बौद्ध विद्वान नागार्जुन भी पहुंचे थे, ऐसा प्रमाण मिले हैं। यहां 10 बौद्ध विहार प्राप्त हुए है तथा 10 हजार बौद्ध भिक्षुक यहां प्रशिक्षित किए जा चुके थे।
6वीं शताब्दी में सिरपुर एक अति विकसित राजधानी हुआ करता था जहां से बंदरगाह के द्वारा देश-विदेश में व्यापार किए जाने के प्रमाण मौजूद हैं। बंदरगाह के मुख्य द्वारा पर बुद्ध की मूर्तिया और कई प्रतिमायें हैं। उसके ऊपरी क्षेत्र में विशाल बाजार के भगनाश्य मौजूद हैं। यहां वर्तमान में स्थित कब्रिस्तान में जिन मुर्दों को दफन किया गया है उसके ऊपर चारों ओर स्तूप लगा कर बौद्ध स्तूपों का दुरूपयोग किया गया है। जिसे कालांतर में शिवलिंग का रूप देकर नंदी को बिठाया जा रहा है ताकी बताया जा सके कि यह शिवालय है।

अर्हत के साधना विहार को गुफा का नाम दे दिया गया है और इस तरह इसे लाल पत्थरों में संजोकर गंधेश्वर मंदिर का रूप दिया जा रहा है। सिरपुर में धातु गलाने के उपकरण, सोने के गहने बनाने की डाई, भूमिगत अन्नागार मिलने के साथ दो हजार पांच सौ लोगों के लिए एक साथ खाना बना सकने वाले 100 कढ़ाई मिले हैं। इसके साथ बाजार में धान में संरक्षित रखने के कुंड, शराब बनाने के संयंत्र और विहार प्राप्त हुवे हैं। पाठशाला, स्नान कुंड प्राप्त हुवे हैं। कई मूर्तियों यहां तथा इसके बाद घासीदास संग्रहालय से गायब बताये जा रहे हैं।
सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा
बताया जाता है कि सिरपुर में ही देश का प्रमुख चौराहा था। इस चौराहे से गुजरे बिना कोई भी दूसरी दिशा में जा ही न हीं सकता था। जहां किसी को दक्षिण की ओर जाना होता था तो उसको इलाहाबाद, सतना, अमरकंटक के बाद सिरपुर होकर ही दक्षिण की ओर जाना पड़ता था।
साल 2006 से सिरपुर महोत्सव की शुरूआत हुई है। इसी समय पुरातात्विक स्थलों का दू्रतगति से उत्खनन का कार्य किया गया है। जिसमें बौद्ध स्तूप और राज प्रसाद भी उत्खनन में मिले हैं।

दक्षिण कोसल और चीन के मध्य प्रगाढ़ संबंध
स्कॉलर डॉ. संगीता वर्मा के अनुसार दक्षिण कोसल और चीन के बीच प्रगाढ़ संबंध रहे हैं। इस तथ्य को इस बात से समझा जा सकता है कि दक्षिण कोसल से चीन तक पैदल मार्ग था जिसके माध्यम से चीन व अन्य देशों से अनेक बौद्ध भिक्खु, बौद्ध धम्म अनुयायी व उसकी दीक्षा लेने व धर्म का प्रचार-प्रसर करने आते रहे हैं।
इसे दफन कर देने के पीछे क्या कारण व कौन सी ताकत थी?
छुपे हुवे इतिहास और साहित्य को सिरपुर बार-बार उजागर करता है। यह दक्षिण कोसल की राजधानी के साथ सम्राट अशोक से जुड़ी प्रसिद्ध बौद्ध केन्द्र भी रहा है। खुदाई व अनुसंधान में प्राप्त स्त्रोत फिर चाहे वे टूटे-फूटे स्तूप, विहार, भवन व खंडित मूर्तियां आदि हो, वे इसके महत्वूपर्ण व प्रसिद्ध बौध स्थल होने का प्रामाणिक सबूत देते हैं। जिन्हें जाने-अनजाने सत्ता व संरक्षण के नाम पर कभी पोषित व पल्लवित किया गया गया तो कभी उनके तथ्यों व साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ व हेराफेरी की गई। आखिर सिरपुर की सत्यता के सामने आ जाने का खौफ किसे है? और उसे दफन कर देने के पीछे क्या कारण व कौन सी ताकत थी? इस पर भी गंभीरता पूर्वक विचार किए जाने की जरूरत है।

बड़ी मात्रा में सिरपुर से मिले ऐतिहासिक साक्ष्य पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्व के नजर आते हैं, विशेषकर बड़ी संख्या में बुद्ध की प्रतिमाएं व बौद्ध विहार, जिसमें हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्खुओं के निवास के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। यहां तक कि सिरपुर के बारे में ह्वेनसांग अपनी पुस्तक ‘मेरी भारत यात्रा’ में लिखते हैं- भूमि उत्तम, उपजाऊ और अच्छी फसल पैदा करने वाली है। नगर और ग्राम परस्पर मिले-जुले हैं और आबादी घनी है। मनुष्य ऊंचे डील-डोल और काले रंग के होते हैं। वे कठोर स्वभाव के दुराचारी, वीर और क्रोधी हैं। विधर्मी और बौद्ध दोनों यहां पर हैं, जो उच्च कोटि के बुद्धिमान और विद्या अध्ययन से परिश्रमी हैं। राजा जाति का क्षत्रिय और बौद्ध धर्म को बड़ा मान देता है।
उसके गुण और प्रेम की बड़ी प्रशंसा है। कोई 100 संघाराम और 10 हजार से कुछ ही कम भिक्खु हैं जो सबके सब महायान बौद्ध धम्म का अनुशीलन करते हैं। इससे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है यह बौद्ध संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।

दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के शोधार्थी महेश किष्टय्या दुर्गम लिखते हैं कि दक्षिण कोसल की वैभव नगरी सिरपुर एक प्राचीन एवं ऐतिहासक गांव है। यह वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 83 किमी दूर उत्तर पूर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग नं. 6 पर महासमुंद जिले के अंतर्गत महानदी के दाहिने तट पर स्थित है। सोमवंशीय शासकों के शासन काल (6-8वीं शताब्दी) में यह सम्पूर्ण दक्षिण कोसल की राजधानी के रूप में विख्यात था। यहां उत्खनन कार्य में बुद्ध एवं बोधिसत्व की अनेक प्रतिमा तथा तीनस्थानों पर बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। वर्तमान में इन्हें आनंद प्रभुकुटी विहार, स्वास्तिक विहार तथा नवउत्खनिक बौद्धविहार के नामसे जाना जाता है। यहां की कला कृतियों में हमें तत्कालीन धर्म, समाज एवं संस्कृति का अनुपम सुन्दर चित्रण दिखाई देता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि यहां की स्थापत्य कलाशैली बहुत उत्कृष्ट रही होगी।

बुद्ध विश्व के महानतम व्यक्तियों में से एक
इंदिरा कला संगीत विवि खैरागढ़ के शोधार्थी मोहन कुमार साहू ‘सिरपुर की बौद्ध प्रतिमाएं एक अध्ययन’ में लिखते हैं कि बुद्ध प्रतिमा निर्माण बौद्ध धर्म के इतिहास की कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। धर्म का निरंतर विश्वास एवं इस दिशा में प्रयास के सदियों बाद बुद्ध प्रतिमा का निर्माण सम्भव हुआ। बौद्ध धर्म के आरंभिक स्वरूप में बुद्ध अन्य अर्हतों से श्रेष्ठ समझे गये। इसमें सन्देह नहीं कि उनका जन्म, लक्षण और मृत्यु भी अद्भुत है। बुद्ध ने स्वयं कहा कि निर्वाण के लिए प्रत्येक को प्रयास करना होगा, अपना दीपक स्वयं बनना होगा।
ईसा पूर्व छठी शताब्दी के नास्तिक सम्प्रदाय के आचार्यों में महात्मा गौतम बुद्ध का नाम सर्वप्रथम है। उन्होंने जिस धर्म का प्रवर्तन किया वह कालान्तर में एक अंतरराष्ट्रीय धर्म बन गया। यदि विश्व के ऊपर उनके मरणोत्तर प्रभावों के आधार पर भी उनका मूल्यांकन किया जाये तो वे भारत में जन्म लेने वाले महानतम व्यक्ति थे।

भवन निर्माण में हमारे कारीगर अव्वल थे
सिरपुर के महत्व पर नरेन्द्र प्रताप लिखते हैं कि सिरपुर के भगनावशेष बताते हैं कि हमारे देश कि वास्तुकला आज से लगभग दो हजार वर्षों पूर्व पूर्णत: को प्राप्त कर चुकी थी जबकि बिना किसी आधुनिक औजार के हमारे शिल्पी भवन निर्माण में सिद्धहस्त हो चुके थे। उन्हें त्रिभुज चतुर्भुज गोले और आयत जैसी ज्यामिति का अच्छा ज्ञान था। वर्गाकार और आयताकार ििर्मत एक दूसरे से जुड़े हुए कमरों और दीवालों में निर्मित आयातों त्रिभुजों और वर्गों से इस बात की पुष्टि होती है। उन्हें इस बात का पूरा ज्ञान था कि नींव और दीवाल का अनुपात क्या होना चाहिए? लगभग पांच फुट मोटी दीवारों पर निर्मित छत कितनी मोटी रही होगी। इसमें निर्मित सीढिय़ों को देखकर ऐसा स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि यह भव दो मंजिला रहा होगा। बाहर की सीढ़ी की लम्बाई इस ओर इंगित कराती है कि यह कोई सार्वजनिक भवन रहा होगा।

लक्ष्मण मंदिर नहीं बौद्ध विहार
सिरपुर पर जिस किसी ने जैसे अपने दावे पेश किया उसी रूप में उसका हो गया, ईंटों का मंदिर जिसे लक्ष्मण मंदिर कहा जाता है, जिसके द्वार पर लेटे हुए बुद्ध की प्रतिमा है, कई ईंटो पर बौद्ध विहारों पर बने चिन्ह हैं, यह बौद्ध स्थलाकृति है। सिरपुर के खंडहरों में बहुत सी ऐसी मूर्तियां और कलाकृतियां पाई गई, जिस पर बहुत ही बारीक नक्काशी की गयी है। इंसानों की हर भाव भंगिमा को हूबहु उकेर दिया गया है, इंसानों की तो छोडिय़े जानवरों को भी वैसे ही बिलकुल छाप दिया गया है।

असूर जाति और लोहे का प्राचीन उपयोग
हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी बहुत सी ऐसी कूर्तियां है जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये जैसे अभी बोल पड़ेंगी। हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी इनके चेहरे की मुस्कान अभी बनी हुयी है। हमारे कलाकारों की कला का उत्कृष्ट नमूना जिन्होंने बेजान पत्थरों में हंसी उकेर दी है। ये बोलनेवाली मर्तियां कुछ कहती है बस जरूरत है इन्हें सुनने की। सिरपुर में मौर्य सम्राट अशोक के वंशज तीवर के बौद्ध विहार के मुख्य द्वार पर बेहतरीन नक्काशी है जिसने मक्खी जैसे सूक्ष्म जीवन को हुबहू उकेर दिया है। इमारत की सीढिय़ां इस भवन के दो मंजिला होने की ओर इशारा कराती है। दो पत्थरों को आपस में जोडऩे के लिए कब्जा का प्रयोग किया गया है।
आज से हजारों साल पहले लोहा बनाने की तकनीकी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी, असूर नामक जनजाति जंग रोधी लोहा की कला में माहिर थे जो आज की आधुनिक लौह तकनीकी से कहीं से भी कमतर नहीं है इसका एक उदाहरण ‘महरौली के लौह स्तम्भ’ को देखकर भी अंदाजा लगाया जा सकता है जो सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी में दबे रहने और खुले में पड़े रहने के बाद भी जस का तस खड़ा है। असुरों की इस कला को लिपिबद्ध कर लिया गया होता अथवा उन्हें प्रश्रय दिया गया होता तो कुछ और बात होती आज हम दुनिया के उत्कृष्ट लोहे के उत्पादकों मे से एक होते।

शोधाथी राज कुमार वर्मा अपने शोध प्रबंध ‘छत्तीसगढ़ राज्य के सिरपुर पुरातात्विक स्थल का ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक विश्लेषण’ में लिखते हैं कि सिरपुर पुरातात्कि स्थल 10 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है इस क्षेत्र का विस्तार इस वजह से भी हुआ है क्योंकि सिरपुर महानदी के किनारे होने के कारण फसल, पानी, यातायात एवं बाहरी आक्रमण से बचाव के लिए विभिन्न शासकों (जैसे पांडुवंशीय, शरभपूरी वंश, गुप्त वंश इत्यादि) ने अपने राज्य की राजधानी की स्थापना किया।
इसके साथ ही बाहरी आक्रमण का प्रभाव भी इस क्षेत्र में देखने को मिला है। विभिन्न विद्वानों के मतानुसार इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म, शैव धर्म, जैन धर्म, वैष्णव धर्म से संबंधित धार्मिक स्थल की प्राप्ति पुरातात्विक उत्खनन के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है जो इस क्षेत्र के विभिन्न धर्मावलंबियों के निवासरत होने के साक्ष्य को प्रस्तुत करते हैं इसके साथ इनके द्वारा बनाये गए स्मारकों एवं कलाकृतियों का बेजोड़ उदाहरण देखने को मिलता है।

बौद्ध विश्वविद्यालय की मांग उठी
सिरपुर की सांस्कृति एवं पुरातात्विक विशेषताओं को देखते हुए कई वर्षों से इसे विश्व धरोहर घोषित करने की मांग की जा रही है। अब तो यहां विश्वविद्यालय की स्थापना की बात भी उठ रही है। यहां की प्राचीन सांस्कृतिक, पुरातात्विक धरोहर विश्विविख्यात है इसके बावजूद भी सिरपुर नगर के लिऐ अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पुरातात्विक महत्व से जुड़े होने के कारण इसके आस पास के तमाम व्यापारिक प्रतिष्ठानों और आवास को दूरस्थ जगह पर विस्थापित करने की पहली जरूरत है। दुबारा से अंतरराष्ट्रीय पुरात्ववेत्ताओं के निगरानी, नक्शा निर्माण और इसकी उत्खनन की जरूरत है साथ ही जिस ढंग से विभिन्न धर्मों का अतिक्रमण, घालमेल और बदमाशी यहां के शिल्प कलाओं और अन्य अवशेषों के साथ छेडख़ानी में की गई है उस पर रोक लगाते हुये कठोर कानून बनाने की जरूरत है।

सिरपुर बुद्धिष्टों की विरासत
वाराणसी से पहुंचे हिन्दी के विद्वान और वरिष्ठ दलित साहित्यकार चौथीराम यादव ने कहा कि जब-जब देश में सामाजिक क्रांति हुई है उसके खिलाफ प्रतिक्रांति भी हुई है। चाहे वह बुद्ध का युग हो या मध्यकालीन संतों का युग रहा हो। सिरपुर निवासी और दक्षिण कोसल स्थापत्य और पुरातात्विक मामलों के जानकार कृष्णा नंदेश्वर कहते हैं कि सिरपुर महारों विशेषकर बौद्धिष्टों की विरासत है। इसे बचाने की जरूरत है। हिन्दु धर्मावलंबी इसे जमींदोष करने में लगी हुई है। वर्तमान में कथित बुद्धिष्ट भी प्रतिक्रांतिकारियों के हाथों इसे सौंपने में तुले हुवे हैं। पुरातत्ववेत्ता अरूण शर्मा से लेकर सत्ता के सभी अंग इस गौरवशाली बौद्ध विरासत को चालाकी के साथ अपने धर्मावडम्बर के खोल भरने लगे हैं।

कब्रिस्तान में बौद्ध स्तूपों को लगाकर पुरातात्विक अपराध को अंजाम दे रहे हैं। अर्हद के ध्यान साधना गृह को गुफा बना दिया गया है। आनंद कुटीर के पूर्व दिशा में स्थित अर्हद स्तूफ के पास कई और विहार मौजूद हैं जिसका उत्खनन करना अभी बाकी है। गंधेश्वर मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और पुरातन बंदरगाह पुरातात्विक के प्राचीन हिस्सों में जाकर साजिशन तोडफ़ोड़ किया जा रहा है। प्रत्येक उत्खनन से प्राप्त प्रत्येक स्थान को हिन्दु देवी देवताओं के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।
अगर बौद्ध समाज इसकी सही निगरानी और उच्च स्तरीय जांच तथा रख रखाव के लिये सही ढंग से पुन: उत्खनन के कार्य को पूरा कर इतिहास के लाने में सफल नहीं हुआ तो सिरपुर का हश्र साकेत नगरी, पुरी और तिरूपति की तरह बौद्धकालीन इतिहास को मिटाने में ही होगा। जरूरत है बौद्ध विचार के आड़ में ब्राह्मण, ब्राह्मणी व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के चंगुल से अपने आप को समय रहते बचा लाने की जो हमारे इर्दगिर्द जयचंदों की भूमिका अदा कर हमारी गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और पुरातात्विक धरोहर को सत्यानाश करने में तुले हुवे हैं।

70 शोध प्रबंध पढ़े गये
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेष बघेल ने अंतरराष्ट्रीय सिरपुर महोत्सव में अपने भाषण में मूल मुद्दों के इतर 2 करोड़ 11 लाख के कार्यों की घोषणा की है। इनमें 25 लाख रुपए से गेट का निर्माण, 73 लाख रुपए से सिरपुर मार्ग पर 4 तालाबों का सौंदर्यीकरण, 50 लाख रुपए की सिरपुर मार्ग पर 6 उपवन निर्माण, कोडार पर्यटन 38.052 रुपए से और सिरपुर के रायकेरा तालाब के लिए 25 लाख रुपए की घोषणा की है।

सिरपुर को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने की मांग पर मुख्यमंत्री बघेल ने आश्वासन देते हुए कहा कि इसके लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा गया है। सभा में जामिया मिलिया की प्रोफेसर हेमलता माहेश्वर, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल तथा पत्रकार दिलीप मंडल ने सिरपुर की धरती पर अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालय की शुरूआत की अपनी मांग प्रमुखता से रखस। मुख्यमंत्री ने बौद्ध विश्वविद्यालय के प्रस्ताव पर गंभीरतापूर्वक कुछ भी कहने से साफ-साफ बचने की कोशिश की। महोत्सव में आयोजित शोध सगोष्ठी में 70 से अधिक शोधार्थियों ने अपना-अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत किया।

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