‘बरदईहा’: लोकजीवन की मिट्टी से निकली कहानी, मंच पर दिखा संवेदना और रंगमंच का खूबसूरत मेल

लोकगीत, संगीत और सशक्त अभिनय का संगम - खैरागढ़ में मंचित हुआ नाटक ‘बरदईहा’

प्रशांत सहारे

 

राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कैंपस - 2 स्थित प्रेक्षागृह में बीती शाम एक ऐसा नाटक खेला गया, जिसने पूरे प्रेक्षागृह को भावुक कर दिया। नाट्य विभाग के विद्यार्थियों ने नाटक ‘बरदईहा - एक प्रेम कहानी’ का मंचन किया, जिसे देखने दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी। नाटक शुरू हुआ, तो मंच की सादगी ने ही दर्शकों को गांव की उस दुनिया में पहुंचा दिया, जहां झोपड़ी, पेड़, पशु, लोकगीत और सामुदायिक जीवन रोजमर्रा का हिस्सा हैं।

नाटक के लेखक दीपक कुमार साहू ने कहानी को केवल प्रेमकथा तक सीमित नहीं रखा। ग्रामीण व्यवस्था और लोक परंपराओं के बीच प्रेम को रखकर उन्होंने ऐसे सवाल खड़े किए, जिनका असर नाटक खत्म होने के बाद भी दर्शकों के मन में बना रहता है। कहानी में लोकजीवन की बारीकियों का समावेश इसे जमीन से जुड़ा हुआ बनाता है।

वहीं निर्देशक डॉ. शिशु कुमार सिंह की सबसे बड़ी खूबी नाटक की गति और दृश्यों को लेकर दिखाई दी। कहानी कहीं बोझिल नहीं हुई। एक दृश्य से दूसरे दृश्य तक सहज संक्रमण, कलाकारों की मूवमेंट और भावनात्मक दृश्यों का संतुलन प्रस्तुति को बांधे रखता है। निर्देशक ने कहानी के भाव को समझते हुए मंच पर उसे अनावश्यक तामझाम से दूर रखा और इसी सादगी को नाटक की ताकत बनाया।

कलाकारों ने किरदारों में भरी जान

कलाकारों की टीम ने प्रस्तुति को मजबूती दी। मुख्य भूमिकाओं में मंगलु के रूप में खगेश पैकरा, सुखिया के रूप में आकाशी मेश्राम, खोरबहरा के रूप में काव्य त्रिमले और गुरु की भूमिका में रूपेश तेंडुलकर नजर आए। प्रेम, टकराव और विरह से जुड़े दृश्यों में कलाकारों की भाव-भंगिमा ने कहानी को दर्शकों तक पहुंचाया।

सहायक कलाकारों में पिता जी की भूमिका देव सिंह, माता जी की भूमिका वंदिता शुक्ला, गौटिया कैलास की भूमिका समीर चंद्र साहू और गौटनिन की भूमिका सिजी सिरमौर ने निभाई। वहीं कोरस में दीपक साहू, हर्षित डेहरिया, आनंद वैष्णल, ओमेंद्र कावडे, चिकू, आकाश चंद्रवंशी, दीपाली और दीक्षा बघेल शामिल रहे। सामूहिक दृश्यों में कोरस की मौजूदगी ने गांव के सामाजिक परिवेश को और प्रभावी बनाया।

लोक संगीत बना कहानी का हिस्सा

नाटक की एक खास उपलब्धि इसका लोक पक्ष रहा। मातर, गौरी-गौरा और लोकधुनों के साथ प्रेम और विरह के गीतों का इस्तेमाल कहानी से अलग कोई प्रदर्शन नहीं लगा, बल्कि कथा का हिस्सा बनकर सामने आया। संगीत हर्ष चंद्राकर ने संभाला, जबकि गायन में हर्ष चंद्राकर, साक्षी और खुशी गजेंद्र ने योगदान दिया।

कम संसाधनों में रचा गया ग्रामीण परिवेश

मंच की दृश्यात्मकता भी उल्लेखनीय रही। हर्ष चंद्राकर और पुनेश ध्रुव की मंच सजावट ने कम संसाधनों में ग्रामीण परिवेश को विश्वसनीय रूप दिया। झोपड़ी, पेड़ और पशु के साथ प्रकाश का संयोजन दर्शकों को कहानी के स्थान और माहौल से जोड़ता रहा। लाईट डिजाइन सागर गुप्ता ने किया, जिनका प्रकाश संयोजन दृश्यों के भाव के अनुरूप वातावरण बनाने में सहायक रहा।

प्रस्तुति में सौरभ, करन कुंजाम, कपील मिरी और स्वास्तिक का सहयोग भी रहा।

अंत ने छोड़ी गहरी टीस

नाटक का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका अंत रहा, जहां व्यक्तिगत प्रेम की त्रासदी सामाजिक व्यवस्था और उसके कठोर सवालों से जुड़ जाती है। बरदईहा की हत्या और उसके बाद सरपंच की बेटी का यह कहना कि उसके गर्भ में पल रहे पांच महीने के बच्चे की भी हत्या हुई है, पूरे नाटक को एक गहरे भावनात्मक मोड़ पर ले जाता है।
यही ‘बरदईहा’ की खासियत है—यह दर्शकों को सिर्फ कहानी सुनाकर विदा नहीं करता, बल्कि कुछ सवाल उनके साथ छोड़ देता है।

कुल मिलाकर लेखक की संवेदनशील कहानी, निर्देशक की सधी हुई दृष्टि, कलाकारों का अभिनय, लोक संगीत, मंच सज्जा और प्रकाश संयोजन मिलकर ‘बरदईहा’ को ऐसी प्रस्तुति बनाते हैं, जिसमें खैरागढ़ की लोकमाटी और रंगमंचीय प्रशिक्षण दोनों दिखाई देते हैं। विद्यार्थियों की प्रस्तुति में मेहनत के साथ अपनी मिट्टी और लोक संस्कृति से जुड़ने की कोशिश भी दिखाई दी।

तालियों की गड़गड़ाहट इस बात का प्रमाण रही कि मंच पर कही गई कहानी दर्शकों तक सिर्फ पहुंची नहीं, बल्कि उनके भीतर कहीं ठहर भी गई।

नाटक के मार्मिक अंत में जब सुखिया अपने भाई खोरबहरा को बताती है कि उसने मंगलु के साथ अपने अजन्मे बच्चे को भी खोया है, तो पूरा प्रेक्षागृह भावुक हो उठा। इस मौके पर कुलपति डॉ. लवली शर्मा, प्रोफेसर राजन यादव, डॉ. मानस साहू और डॉ. दीपशिखा पटेल ने विद्यार्थियों की प्रस्तुति की सराहना की।

ताकत रहा इसका संगीत पक्ष

नाटक की कहानी एक ऐसे गांव पर आधारित है, जहां गौटिया की मौजूदगी में मजदूरी के बदले खड़ी धान तय होती है और सामाजिक पदानुक्रम हर रिश्ते को नियंत्रित करता है। इसी व्यवस्था के बीच गौटिया की पढ़ी-लिखी बेटी सुखिया (आकाशी मेश्राम) और अनपढ़ बरदईहा मंगलु (खगेश पैकरा) के बीच पनपा प्रेम, सामाजिक असमानता के खिलाफ एक चुपचाप विद्रोह बन जाता है।

नाटक की सबसे बड़ी ताकत रहा इसका संगीत पक्ष। संगीत निर्देशक हर्ष चंद्राकर की अगुवाई में साक्षी और खुशी गजेंद्र की गायकी, वेद प्रकाश रावटे की तबला-गुदुम संगत, करन तारम की हारमोनियम-मोहरी, उजित निषाद की बैंजो, सौरभ की बांसुरी और कामेश साहू की दफड़ा वादन ने मातर, गौरी-गौरा जैसे लोकगीतों को मंच पर जीवंत कर दिया। मंच सजावट हर्ष चंद्राकर और पुनेश ध्रुव ने संभाली, जबकि सौरभ, करन कुंजाम, कपील मिरी और स्वास्तिक का सहयोग भी सराहनीय रहा।

कोरस टीम में दीपक साहू, हर्षित डेहरिया, आनंद वैष्णल, ओमेंद्र कावडे, चिकू, आकाश चंद्रवंशी, दीपाली और दीक्षा बघेल  ने सामूहिक दृश्यों में मंच पर ऊर्जा भर दी।

 


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment