चमारों के एक और विभाजन का षड्यंत्र
चमार मेघवाल विवाद पर फेसबुक पर मेघवंश का इतिहास
कैलाश दहियाडॉ. सतनाम सिंह, जिन्होंने अपनी पी-एचडी 'चमार रेजीमेंट' पर की है, उन्होंने बताया-"सर, हरि द्वार या हर द्वार में हर की पौड़ी पर चमार अपने पूर्वजों की अस्थियां बहाने जाते हैं। वहां बाबू जगजीवन राम जी द्वारा बनाया गया रैदास या रविदास मंदिर है। मंदिर के पुजारी, जो चमार हैं, उन्होंने बताया कि उत्तर भारत के राज्यों से जो दलित यहां अपने पूर्वजों की अस्थियां बहाने आते हैं उनका रिकॉर्ड इस मंदिर की पोथियों में सुरक्षित है।
इतिहास साक्षी है कि चमारों को लगातार विभाजित और खंडित किया गया है। आज से लगभग अस्सी-नब्बे साल पहले भी चमारों में से कुछ लोगों ने जाटव कह कर खुद को चमार पहचान से अलग कर लिया। ऐसे ही चमारों से अलग हुई ढेरों जातियां हैं जिनके नाम गिनाए जा सकते हैं। ऐसे ही विभिन्न राज्यों में चमार अपने आप को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। यह भी चमार जाति के एकीकरण में बाधा ही बनती है।
पता लगता है, हरियाणा के रेवाड़ी जिले के बावल में 23 अगस्त, 2026 को एक कार्यक्रम में कथित 'मेघवाल उत्थान समिति', हरियाणा ने हरियाणा के मुख्यमंत्री माननीय नायब सिंह सैनी जी को माँगपत्र दिया कि चमारों को जारी किए जाने वाले अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्रों में चमार न लिखकर मेघवाल लिखा जाए। अपने सम्बोधन में माननीय मुख्यमंत्री ने कहा," जैसा कि आपने मांग की है, चमार समुदाय के सदस्य' मेघवाल' शब्द को अपनाना चाहते हैं, ताकि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति' चमार' के स्थान पर' मेघवाल' शब्द का प्रयोग कर सके।
ऐसे (मेघवाल) जाति प्रमाण पत्र जारी करने में सुविधा प्रदान करने के लिए, मैं केंद्र सरकार को एक सिफारिश भेजूंगा।" ' समाचार में आगे बताया गया है,' समिति के सचिव भूपेंद्र मेघवाल ने दावा किया कि राज्य सरकार ने पहले ही लगभग 60000 जाति प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं। इन पर मेघवाल लिखा हुआ है। उन्होंने कहा," हम चाहते हैं कि चमार समुदाय के अन्य सदस्यों को भी अपने प्रमाण पत्रों पर मेघवाल जाति का नाम लिखवाने की अनुमति दी जाए।" इस घोषणा के बाद हरियाणा में तूफान खड़ा हो गया। हरियाणा के चमारों ने इसका जबरदस्त विरोध किया। इसके बाद हरियाणा सरकार के मंत्री ने ऐसी किसी मांग को स्वीकार करने से इंकार के बाद चमारों का विरोध थमा। चमारों के साहस की प्रशंसा की जानी चाहिए कि वे अपनी मूल पहचान को प्रक्षिप्त होने से बचाने में सफल रहे।
ऐसे लगता है, अपने आप को मेघवाल कहने वाले ये लोग चमारों के ठेकेदार बनना चाहते हैं! पूछा जाए, इन्हें किस चमार ने कहा है कि उसे मेघवाल कहा जाए? तब इन तथाकथित मेघवालों ने किस के इशारे पर अपना माँगपत्र हरियाणा सरकार को सौंपा? यह चमारों में एक और विभाजन का षड्यंत्र है। ऐसे लगता है, इस षड्यंत्र के पीछे ब्राह्मण का ही हाथ हो सकता है। उसने ही खुद को मेघवाल कहने वाले गिनती भर लोगों को उकसाया होगा। आजादी से पहले अमीचंद शर्मा नाम के ब्राह्मण ने भंगियों को ऐसे ही उकसा कर उन्हें वाल्मीकि बता उन्हें 'आदिहिंदू या आदिधर्मी' आंदोलन से अलग करने की तिकड़म रची थी।
यह आंदोलन 'चमार-भंगियों का संयुक्त आंदोलन था। ब्राह्मण अपने षड्यंत्र में सफल रहा और इन दोनों जातियों में यह विभाजन बढ़ता ही गया। आज जिसके दुष्परिणाम सामने हैं। महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने तभी तो कहा है, 'भेद बुद्धि यहां तक विकृत कर दी जाती है कि दलितों की महान ऐतिहासिक क्रांति की सारी लड़ाई पाला खींचकर चमार और भंगी के बीच की तथा दलित नारी और दलित पुरुष के बीच की लड़ाई बता दी जाती है।' असल में यह अछूतों अर्थात दलितों की दो सब से बड़ी जातियों में फूट डालने का षड्यंत्र था। इस पर रामनारायण एस. रावत लिखते हैं, 'आर्य समाज जैसे हिंदू संगठन दलितों को हिंदू समुदाय का अंग बनाने के लिए उनका हिन्दूकरण करना चाहते थे। हिंदूकरण का अर्थ ही है दलित जातियों में फूट पैदा करना और अपना वर्चस्व बनाए रखना। जिसमें ब्राह्मण सफल हुआ है। इस बार इस ने चमार जाति के अंदर ही फूट डालने का षड्यंत्र रच डाला है।
बताया जा सकता है, यह षड्यंत्र उसी कड़ी का एक हिस्सा है जिसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद को अछूत या महार न कहकर बौद्ध कहलवाना चाहा। लेकिन, चमारों की तरफ से ऐसी कभी भी कोई मांग नहीं की गई कि उन्हें चमार न कहकर कुछ और कहा जाए। दूसरे लोग चमारों के ठेकेदार कैसे बन गए? यह अलग बात है कि खुद को मेघवाल कहने वाले दलितों की पहचान अभी भी चमार के रूप में ही की जाती है। लेकिन इनकी बुद्धि इस रूप में विकृत कर दी गई है कि यह अपने आप को चमार मानने से इंकार कर रहे हैं। इतना ही नहीं यह बाकी के चमारों को मेघवाल के रूप में परिवर्तित करवाना चाहते हैं। यह भेद बुद्धि इन्होंने कहां से पाई है? यही भेद बुद्धि अब दलितों की सब से बड़ी जाति चमार में विभाजन करने के षड्यंत्र में जुट गई है। इसके लिए इसने चमारों से ही अलग हुए मेघवालों को आगे कर दिया है।
बताया जा सकता है, किसी भी जाति का नाम परिवर्तन करना किसी भी सरकार के हाथ में नहीं है। असल में, यह ना राज्य का विषय है ना केंद्र का, यूं यह किसी भी सरकार का विषय नहीं है। कल को ब्राह्मण एक ज्ञापन देकर कह देंगे कि उन्हें चमार घोषित कर दिया जाए, तब क्या कोई सरकार ऐसा कर पाएगी? नहीं, बिल्कुल नहीं। तब कुछ हीनता से भरे चमार जो अपने आप को मेघवाल कहने में लगे हुए हैं, वे कह रहे हैं कि सभी चमारों को मेघवाल घोषित कर दो। गजब का हिम्मत है! ये अपनी हीनता सभी चमारों पर थोपना चाहते हैं। दरअसल, हीनता-ग्रंथि का यह मामला ऐसे ही है जैसे आज कुछ क्षेत्रों में चमारों ने खुद को जाटव या जटिया कहना शुरू कर रखा है।
जबकि सारी दुनिया जानती है कि जाटव चमार ही हैं। लेकिन इससे चमारों में विभाजन तो हो ही गया है। यहां बताना यह भी है, जैसे कोई चमार ब्राह्मण नहीं बन सकता, ऐसे ही कोई ब्राह्मण चमार नहीं बन सकता। हां, मेघवाल जरूर ब्राह्मण बनने की दिशा में अग्रसर हैं। यही सच भी है, 'मेघवंश का सिंहावलोकन' नाम से किताब लिखने वाले आर.पी. सिंह ने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखा है-'मेघऋषि की हत्या करने के कारण इंद्र को पांच पाप लगे थे, जिनमें एक 'ब्रह्म-हत्या' का भी था। मेघऋषि को उसकी विद्वता और महान धार्मिकता के कारण ब्राह्मण कहा गया है और आर्योंने उसकी हत्या को 'ब्रह्म-हत्या' के समान माना है।' यहां बताना यह है कि मेघवाल खुद को इस ब्राह्मण ऋषि का वंशज ही मानते हैं। यह इन मेघवालों का ब्राह्मण बनने की लालसा में उठाया कदम है। ऐसी ही कहानियाँ गढ़ कर चमारों में विभाजन किया जाता रहा है, लेकिन ब्राह्मण तो इनकी सारी हकीकत जानता है। वह कभी भी ऐसे जाति बदलने वालों की इज्जत उतार सकता है। पूछना यह है क्या ब्राह्मण ने कभी डॉ. अंबेडकर को अपना दामाद स्वीकार किया है? पीठ पीछे यह दलितों को चमार-भंगी के ही कहता है।
इधर, एक बातचीत में डॉ. सतनाम सिंह, जिन्होंने अपनी पी-एचडी 'चमार रेजीमेंट' पर की है, उन्होंने बताया-"सर, हरि द्वार या हर द्वार में हर की पौड़ी पर चमार अपने पूर्वजों की अस्थियां बहाने जाते हैं। वहां बाबू जगजीवन राम जी द्वारा बनाया गया रैदास या रविदास मंदिर है। मंदिर के पुजारी, जो चमार हैं, उन्होंने बताया कि उत्तर भारत के राज्यों से जो दलित यहां अपने पूर्वजों की अस्थियां बहाने आते हैं उनका रिकॉर्ड इस मंदिर की पोथियों में सुरक्षित है। सतनाम जी द्वारा पूछने पर पुजारी ने बताया की अभी पीछे साठ-सत्तर साल पहले तक राजस्थान से जो दलित अस्थियां लेकर आते थे वे खुद को चमार ही लिखवाते थे। जिन में बैरवा, बलाई और मेघवाल भी शामिल हैं। ये सभी मृतक को चमार बता कर ही अपने रिकॉर्ड दर्ज करवाया करते थे।" क्या इसके बाद भी बताने को कुछ नहीं रह जाता है?
इसका मतलब यह है कि चमार शब्द को लेकर जो साहित्य और समाज में हीनता फैलाई गई है, उसी से कुंठित होकर चमारों में से कुछ लोग अपनी अलग पहचान दर्ज करवा रहे हैं। बस इतनी सी कहानी है अपने आप को मेघवाल बताने वालों की। चमार मेघवाल विवाद पर फेसबुक पर 'मेघवंश का इतिहास' नाम से लिखने वाले ने 28 अगस्त, 2026 की अपनी पोस्ट में जो लिखा है उस से इस षड्यंत्र का कुछ खुलासा होता है। इन्होंने लिखा है- "चमार शब्द को मेघवाल जाति नाम में बदलने की मंशा रखने वालों की वैचारिक पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा कारण यह था कि राजस्थान में एकल जाति के रूप में मेघवाल जाति सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली जाति थी और दूसरा कारण था राजनीति में भी इस जाति के विधायक बनते रहे हैं, तीसरा कारण था सामाजिक रूप से यह जाति राजस्थान ने स्तरीकरण में अनुसूचित जातियों में उच्च स्तर पर मानी जाती थी।
चौथा कारण था, इस जाति की शैक्षिक स्थिति बाकी जातियों से कमजोर थी और नौकरियों में भी अपनी जनसंख्या से बहुत कम संख्या में थी, अतः भविष्य में अगर आरक्षण में छेड़छाड़ हो तो वे लोग बच सके। इसके अलावा और भी बहुत से कारण थे, उनमें राजनीतिक कारण प्रमुख था जिसका उद्देश्य यह था कि वे एक बड़ा ग्रुप बनकर राजनीति को अपने हाथ में ले सकेंगे। इसी राजनैतिक उद्देश्य से उन्होंने राजस्थान सरकार से आदेश निकलवाए कि किसी की वास्तविक जाति अगर मेघवाल है और गलती से चमार लिख दिया गया है तो वह उचित प्रमाण देकर अपनी जाति ठीक करवा सकता है। इसमें मेघवाल शब्द और चमार शब्द उदाहरण के लिए प्रयोग किए गए थे। इस आदेश की आड़ में बहुत से चमार जाति के लोग मेघवाल बनने लगे या बन गए। उन्होंने इस आदेश का यह अर्थ निकाला कि चमार को मेघवाल लिखने का सरकार ने आदेश दिया है, जबकि मूल आदेश में ऐसा नहीं था और न ही उसका ऐसा अर्थ था।
इस प्रकार से सैकड़ों हजारों चमार जाति के लोग रातों रात मेघवाल बन गए। किसी ने विरोध नहीं किया। इनकी शिकायत होने पर ऐसे प्रमाण पत्र निरस्त हो सकते है। इसी षडयंत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने मध्यप्रदेश में ऐसे ही आदेश निकलवाए और अब ऐसे ही आदेश के लिए उन्होंने हरियाणा में निकालने की मुहिम शुरू की। यहां अड़चन पैदा हो गई, क्योंकि यह षडयंत्र सार्वजनिक हो गया। राजस्थान और मध्यप्रदेश में वह गुपचुप रूप से था, इसलिए इसका कोई ठोस विरोध नहीं हुआ।"
इस बात में कितनी सच्चाई है यह अनुसंधान का विषय हो सकता है। लेकिन इससे एक ध्वनि जरूर निकलती है कि मेघवाल भी चमार जाति से टूटकर बनी जाति है। तभी पूर्व में इनके चमार जाति के सर्टिफिकेट बने हैं। अब अगर इनमें किसी तरह की हीनता पनप रही है तो इस समस्या का फिलहाल कोई समाधान नहीं है। तो यह पक्का है कि यह षड्यंत्र का ही मामला है।
इस षड्यंत्र का पता आर. पी. सिंह की पुस्तक की भूमिका से अच्छे से पता चल रहा है, जिसमें इन्होंने लिखा है, 'समाज के भिन्न-भिन्न नामों की जगह एक सम्मानजनक नाम देकर समाज को सुदृढ़ बनाने तथा इन मानसिक दायरों को तोड़ने की एक सोच उभरी तो इसके क्रियान्वयन के लिए अनेक शुभचिंतकों व गुरुओं ने समाज को केवल एक 'मेघवाल' नाम देकर संगठित करने का प्रयास किया, जिसके सार्थक परिणाम सामने आए हैं। तीन दशक पहले राजस्थान के हाड़ोती और झालावाड़ जिले में समाज के लोगों ने अपने को केवल 'मेघवाल' घोषित कर दिया और अपने भू-राजस्व रिकॉर्ड ठीक करा लिए। 12 सितंबर, 2004 को झुंझुनू में एक सम्मेलन में शेखावटी, खेतड़ी, झुंझुनू, फतेहपुर आदि के स्वजातीय भाइयों ने घोषणा कर दी कि 'गर्व से कहो हम मेघवाल हैं'।
यहां भी 'मेघवाल' जाति के प्रमाण-पत्र बनवाकर भू राजस्व रिकॉर्ड ठीक कर लिए। इसी के साथ अलवर जिले में भी मुहिम चली तथा वहां भी समाज बंधुओ ने मेघवाल नाम से जाति-प्रमाण पत्र बनवा लिए तथा भू-राजस्व रिकॉर्ड ठीक करा लिए। हरियाणा की 'चमार महासभा' की नारनौल इकाई ने भी अपने को 'मेघवाल' घोषित कर दिया है। कुरुक्षेत्र, रेवाड़ी व दिल्ली में भी 'मेघवाल' घोषित कर दिया है।' यह भू-राजस्व रिकॉर्ड ठीक कर लिए से तात्पर्य है अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र में चमार के स्थान पर मेघवाल लिखवाना। तो, यही षड्यंत्र का मूल बीज है। यहीं से चमार जाति में विभाजन का षड्यंत्र रचा गया है। यह हीनता की पराकाष्ठा है। कहना यह भी है, चमारों को मेघवाल बताना ऐसे ही है जैसे पिछले दिनों दिल्ली के तुगलकाबाद स्थित सद्गुरु रविदास या रैदास मंदिर को तोड़ा गया था। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि जिन शक्तियों ने रैदास का मंदिर तोड़ा या तुड़वाया था वही शक्तियां अब मेघवालों को हथियार बना कर चमार जाति में विभाजन का षड्यंत्र रच रही हैं।
जहां तक मेघवाल की बात है तो आर. पी. सिंह महोदय ने ब्राह्मण की पुराण परंपरा में अपनी किताब 'मेघवंश का सिंहावलोकन' की भूमिका में लिखा है,' 1920 ई. में जी. डब्ल्यू ब्रिग्स द्वारा लिखित 'दि चमार्स' नामक पुस्तक में मेघवंशीय 1156 जातियों के'चमार' होने का उल्लेख किया गया था। लेकिन शीघ्र ही इस नाम से घोर नफरत की जाने लगी थी। सुधारवादी आंदोलन में यह निर्णय लिया गया कि 'चमार' शब्द से समाज को पग-पग पर अपमान झेलना पड़ता है, इसलिए 'चमार' जैसे अपमानजनक जाति सूचक शब्द से छुटकारा दिलाया जाए तथा उन लोगों से भी यह काम छुड़वाया जावे जो दलितों की आबादी के पांच प्रतिशत से भी कम हैं।'
सर्वप्रथम तो बताया जा सकता है कि आर.पी. सिंह सरासर झूठ बोल रहे हैं। यह चमार और चमारों की 1156 जातियों को मेघवंशी बता रहे हैं। ऐसा ब्रिग्स महोदय ने कहीं नहीं लिखा। ब्रिग्स लिखते हैं, 'चमारों की उपजातियां भी काफी ज्यादा हैं। 1891 में ये 1156 थीं। इस संख्या में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।' देखा जा सकता है, यहां मेघवाल नाम का जिक्र तक नहीं है। दूसरे, ये किन सुधारवादी आंदोलन की बात कर रहे हैं? स्वामी अछूतानंद का' आदिहिंदू' और बाबू मंगूराम का' आदिधर्मी' आंदोलन कहीं भी अपने चमार होने से इंकार नहीं कर रहे, बल्कि ये तो गर्व से अपना चमार होना बता रहे हैं। हां, कायस्थ लेखक मुंशी प्रेमचंद ने जरूर अपने साहित्य में चमारों के प्रति अपनी दुर्भावना को व्यक्त किया है। जिसे आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने अपनी किताबों 'प्रेमचंदः सामंत का मुंशी' और 'प्रेमचंद की नीली आंखें के माध्यम से नेस्तानाबूद कर दिया है। तीसरे, ये चमारों से चमड़े का काम छुड़वाने की बात कर रहे हैं। जो सही नहीं कहा जा सकता। चमारों को चमड़े के काम का आधुनिकीकरण और व्यवसायिकरण करना चाहिए ना कि छोड़ना चाहिए।
जहां तक दलितों में चमारों की आबादी की बात है, तो बताया जा सकता है, '1881 की जनगणना के अनुसार चमार जाति उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी जनसंख्या वाली हिंदू जाति थी, जो संपूर्ण हिंदू आबादी का 14.09 प्रतिशत थी। फिर, आर. पी. सिंह महोदय जिस तथाकथित मेघवाल पहचान की बात कर रहे हैं, तो इन्हें बताया जा सकता है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर बौद्ध धर्मांतरण के बाद आज भी महार के रूप में ही पहचाने जाते हैं। असली बात है अपनी पहचान को ताकत देना। शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। कल तक यहूदियों के गुलाम आज ईसाई के रूप में सारी दुनिया में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ऐसे ही मुसलमान भी। आर.पी. सिंह महोदय का चमार पहचान से बचना इनकी हीनता को ही दर्शाता है।
आगे यह बताना है कि जिन्हें दलित या चमार कहा जा रहा है वह इस देश के मूल निवासी हैं जो यहीं की नदी घाटियों में विकसित हुए हैं। नदी घाटी की सभ्यता के रीति-रिवाज और परंपराएं पानी से अनन्य रूप से जुड़ी हुई है। अब इन्हें करना क्या है? इन्हें करना यह है कि जहां भी चमार अपने पूर्वजों की अस्थियों को प्रवाहित करते हैं, जिस भी नदी या समुद्र के पास, वहां ये गोसालधाम, रैदासधाम या कबीरधाम बनाएं और वहां अपने पूर्वजों के रिकॉर्ड संरक्षित रखें। किसी ब्राह्मण के पास अपने नाम दर्ज करवाने की जरूरत नहीं है। इसके बाद देखिए कैसे चीजें सही होती चली जाती हैं। ध्यान रहे, इस देश में तीन अलग-अलग संस्कृतियों के लोग हैं। एक वे जो बर्फ से भरी चोटियों से कंपकंपाते हुए यहां आए हैं दूसरे वे जो तपते रेगिस्तानों से आए हैं। इन दोनों का नदी घाटी की सभ्यता से कुछ लेना-देना नहीं। तो, इस देश के मूल निवासी अर्थात सदा से निवास करने वाले दलितों का इन दोनों की सोच, रीति रिवाज और परंपरा से किसी भी तरह का संबंध नहीं है।
यहां एक सवाल और पूछा जा सकता है, कल को इस आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाता है, तब ये चमार से मेघवाल बने अपने आप को क्या कहलवाएंगे? दूसरा महत्वपूर्ण सवाल है, मेघवाल और चमार दो अलग पहचान बनने से दोनों के बीच विवाह के संबंध खत्म होते चले जाएंगे। यही चमारों को मेघवाल बताने वालों की मंशा और षड्यंत्र लगता है। आरपी सिंह के इस कथन में यही बू आती है, ये लिखते हैं,' मेघवालों में आपस में यदि कोई समाजबंधु विभेद पूछना भी चाहे तो कह सकते हैं, मैं 'जाटव मेघवाल' हूं, मैं 'बैरवा मेघवाल' हूं, मैं 'बुनकर मेघवाल' हूं, मैं 'बलाई मेघवाल' हूं, इत्यादि। 'मेघवाल' शब्द से एक बार शुरुआत तो हो। इसके बाद साल-छः महीनों में यह विभेद भी समाप्त हो जाएगा। आपसी भेदभाव भुलाकर रोटी-बेटी का व्यवहार शुरू करें।' कोई इन से पूछे, इन्हें खुद को 'चमार मेघवाल' कहने में शर्म क्यों आती है? ऐसे षड्यंत्रकारी दिमाग से पूछा जा सकता है, जाटव चमार, बैरवा चमार, बुनकर चमार, बलाई चमार और मेघवाल चमार क्यों नहीं हो सकता? जबकि चमार हमारी जातीय अस्मिता से जुड़ा हजारों वर्ष पुराना पहचान का मामला है। जो अब 'आजीवक धर्म' में परिवर्तित हो चुका है।
जहां तक 'रोटी-बेटी' के संबंध की बात है, तो चमार अपने बेटे और बेटी की शादी चमारों में ही करेगा, वह मेघवालों में नहीं करने जा रहा। दरअसल, ये इतिहास से डरे हुए लोग हैं, जो अपनी पहचान छुपाने को अभिशप्त हैं। राजस्थान में रैगर, बलाई, बैरवा, खटीक और बहुत सी जातियां मूल चमार से ही छिटक कर अलग हुई जातियां हैं। ऐसे ही धानुक जाति भी चमारों से विभाजित हो कर बनी है। असल में, यह दलित सोच का प्रारंभिक चरण था। जब दलित जातियां कुंठित हो कर अपने नाम बदल रही थीं। दलितों का बौद्ध धर्मांतरण इस हीनता-ग्रंथि की पराकाष्ठा कही जा सकती है। आज भी नवबौद्धों को सभी दलित ही कहते हैं। कोई उन्हें बौद्ध नहीं मानता। बात यह है कि हर शताब्दी में चमारों में कुंठित लोगों ने चमार की पहचान से बचने के लिए खुद के नए नाम रखे हैं। पिछली सदी में ऐसे चमार खुद को जटिया और जाटव कहकर चमारों से अलग हुए। मेघवाल इस लिस्ट में नया नाम है।
बताया जा सकता है, चमार इस देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक जाति है। चमार जाति से छिटक कर अलग हुए-हीनता से भरे मेघवाल अब पूरी चमार जाति को अपने नाम से कहलवाना चाहते हैं। जो बेहद निंदनीय है। बताइए, दाल में कंकड़ बराबर मेघवाल पूरी दाल को ही कंकड़ में परिवर्तित करना चाहते हैं। वैसे, कथित मेघवालों को किन चमारों ने कहा है कि उन्हें भी मेघवाल की लिस्ट में शामिल करवाया जाए? या इन्हें खुद ही सपना आ गया कि चमारों को मेघवाल बनवा देते हैं! गजब के तिकड़मी लोग हैं। अच्छा; इन की मान भी ली जाए और सारे भारत के लोग अपने आप को मेघवाल लिखना शुरू कर दें, तो क्या वर्णवादी अर्थात जातिवादी या छुआछूतवादी इस से अपना व्यवहार बदल लेंगे? तब तो चमारों की सभी उपजातियां खुद को चमार लिखें तो क्या वह ज्यादा बेहतर नहीं है।
बताया जा सकता है, मेघवालों को अभी भी सभी चमार ही कहते हैं। चमारों से छिटक कर अलग हुए लोग जो विभिन्न जातियों के नाम से पुकारे जाते हैं, उन से ब्राह्मण अभी भी वैसी ही छूआछूत बरतता है। तब फिर अपनी मूल पहचान 'चमार' पर आने में क्या बुराई है? तो, जो मेघवालों के लेखक बने हुए हैं उन्हें तिकड़मी गल्प साहित्य लिखने की बजाय इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि चमार अपने मूल में क्या है। प्रसंगवशः बताया जा सकता है, जहां तक ब्राह्मण द्वारा छुआछूत बरतने की बात है, तो यह इसके धर्म का अभिन्न अंग है। यह मुसलमान, ईसाइयों और अन्य किसी भी धर्म के लोगों से भी इसी तरह की छुआछूत बरतता है। क्या इस से वे अपना धर्म बदल लेंगे? बताना यह भी है कि' चमार' भी स्वतंत्र धर्म ही है। साथ ही, यह भी बताना है कि छुआछूत दुधारी तलवार है। जो छुआछूत बरतने वालों पर भी वैसे ही चलती है। असल में, जाति क्या है, यह मूल सवाल है।
चमार के लिए तो यह जीवन-मरण की बात है। इसे महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर के शब्दों में यूं समझा जा सकता है- "भारत में जाति ऐसी चीज से जुड़ चुकी है जो अमिट है। जाति में अपने मां-बाप का नाम सम्मिलित रहता है जिसे कभी नहीं भुला जा सकता। अपने मां बाप का नाम लेने में कोई बुराई नहीं है- बुराई दूसरी बात में है। बुराई इस बात में है कि एक व्यक्ति को अपने मां-बाप का नाम बताने में गर्व महसूस होता है तथा दूसरे व्यक्ति को अपने मां-बाप का नाम बताने में हीनता का बोध होता है।" तो, जो बात इतनी गहरे तक जुड़ी हुई है, उसमें मां-बाप से जुड़ी अपनी जाति का नाम बताने में कैसी हीनता! जिन्हें अपने मां-बाप का नाम बताने में हीनता का बोध होता होगा वही अपनी जाति छोड़कर नई जाति बनाते हैं।
ऐसे ही लोग पराए धर्मों में धर्मांतरित भी हो जाते हैं। फिर वे इतिहास के पन्नों से निकलकर कहीं गुम हो जाते हैं। आगे डॉ. धर्मवीर जाति छोड़कर भागे या नाम परिवर्तित करके कोई नई जाति बनाने वाले मेघवाल जैसे लोगों से ही तो सवाल करते हैं, 'वह दलित व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी से क्या लड़ेगा जो मात्र 'चमार' और 'भंगी' के शब्दों से डर गया है? दूसरे, वह आदमी समाज में किसी मतलब का नहीं है जो अपने बाप का और अपनी मां का नाम गर्व से नहीं ले सकता। संसार का कोई बच्चा अपने मां-बाप का नाम लेना नहीं छोड़ता है।' अब मेघवाल जाने की यह क्या करेंगे। चमार तो गर्व से अपनी जाति बताता है। अपने माता-पिता की पहचान बताता है और अपने महान दादा-पड़दादाओं सद्गुरु कबीर, रैदास और गोसाल के चरणों में अपने सिर झुकाता है। ये हमारे महापुरुष ऐतिहासिक हैं ना कि कोई पौराणिक पात्र।
जाना जाए, खुद को मेघवाल कहने वाले चमारों के साथ दिक्कत क्या हो गई है? दिक्कत यह हो गई है कि समाज इन्हें अभी भी चमार ही कह कर पुकारता है। इससे इनमें दिन प्रतिदिन हीनता की भावना घर करती चली जाती है। इसका इन्होंने यही इलाज निकला है कि बहुसंख्यक चमार जाति को मेघवाल ही घोषित करवा दिया जाए। लेकिन' खलास चमार' जानता है कि चमार क्या होता है और मेघवाल किस चिड़िया का नाम है। अच्छा होगा कि मेघवाल अपनी हीनता को दूर करते हुए खुद को पुनः चमार घोषित करें और इस मेघवाल नाम के व्यर्थ के झंझट से मुक्ति पाएं। क्योंकि, मेघवाल होना वैसे भी कुछ नहीं होता। यह अर्थहीन शब्द है। बताना यह भी है कि इस देश में जितनी भी पेशे से जुड़ी जातियां हैं अपने मूल में वे सभी चमार हैं।
लेकिन वर्णवादी जातिवादियों ने इसकी एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिए इन्हें अलग-अलग जातियों के खांचे में बांट दिया। चमार जाति का विभाजन कर उसे अकेला खड़ा करने की कोशिश की गई। लेकिन इसकी तिकड़म चल नहीं पा रही है। एक समय था जब चमड़ा सभ्यता थी जो चाक सभ्यता, लौह सभ्यता, तांबा सभ्यता से होती हुई यहां तक पहुंची है। सभ्यता का जब चाक युग चल था उस समय चमार कुम्हार के पेशे में ही लगे हुए थे। महान मक्खलि गोसाल चमार थे और उनके बहुत सारे शिष्य कुम्हार थे। उनकी प्रेमिका-पत्नी हालाहला भी कुम्हार के पेशे से संबंधित थीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे चमार नहीं थीं। वे विशुद्ध चमार थीं।
दरअसल, सभी ऐतिहासिक सभ्यताएं चमड़ा सभ्यता के बाद ही पैदा हुई है और इधर चमार सीधे चमड़ा सभ्यता से जुड़े हुए हैं। तो चमारों के साथ-साथ मेघवालों को भी बताना यही है कि ये इतिहास के पन्ने पलटें। पता नहीं, यह किसके दिमाग की उपज है कि चमारों को मेघवाल लिखने के लिए ज्ञापन दिया गया है? निश्चित ही है किसी तिकड़मी दिमाग की ही उपज है। राजस्थान के एक छोटे से भूभाग में निवास करने वाली जाति मेघवाल इस देश की सबसे बड़ी जाति चमार को मेघवाल कहलवाना चाहती है, क्यों? इस बारे में जी. डब्ल्यूब्रिग्स ने लिखा है, 'चमार, जिन में मोची भी शामिल हैं, समस्त आर्य-द्रविड़ क्षेत्र में फैले हुए हैं और चमड़े का कार्य करने वाले लोग कहीं एक नाम से और कहीं दूसरे नाम से देश में लगभग प्रत्येक भाग में पाए जाते हैं।'
ब्रिग्स ने अपने अध्ययन में चमार और इसकी उप जातियों के पचासियों नाम गिनाए हैं। जिनमें कुछ नाम इस प्रकार हैं, जटिया, जैसवार, कुरील, कोरी, कोली, अहरवार, धुसिया, चमकेटिया, दुसाध, जुलाहा, रंगिया, रैदासी, सतनामी, अलखगिरी, सकरवार, करोल, घरामी, धानुक, खटीक, बागड़ी, पासी, कनौजिया, भदौरिया, बलाही आदि। यहां इनकी बात ना करके खासम-खास राजस्थान में चमार और इसकी उपजातियों के नाम बताए जा सकते हैं। ब्रिग्स महोदय लिखते हैं, 'राजपूताना.. क्षेत्र में चमड़े का काम करने वाली अन्य जातियां बानुभी, बोला, मेघवाल, रैगर, जटिया, चन्दोर, सुखाड़िया, मोवांपुरिया, कौसोटिया और दमड़िया हैं। बीकानेर में बलाई जाति के लोग चमड़े का काम करते हैं।' ब्रिग्स के कथन से क्या समझा जाए? उनके इस कथन से पता लगता है कि मेघवाल राजस्थान में चमारों की महज एक उपजाति है।
हास्यास्पद बात यह है कि इस छोटी सी जाति के लोग चमारों को मेघवाल कहलाना चाहते हैं! मेघवाल का चमार जाति से मुंह छुपाना ऐसे है जैसे कोई अपनी मां को मां मानने से इंकार करे। प्रसंगवशः यहां ऊपर आए 'करोल' जाति के नाम से बताया जा सकता है कि दिल्ली का सुप्रसिद्ध करोल बाग चमारों की जमीन पर ही बसा है। यहीं रैगरपुरा भी है। दोनों ही तो चमार या चमार की उपजातियां हैं। और हां, करोल का स्त्रीलिंग 'करोली' ही होता है। जहां तक ब्रिग्स महोदय के 'आर्य-द्रविड़ लिखने की बात है तो यह ब्राह्मणी शब्दावली है। जो ऐतिहासिक और अकादमिक रूप से सही नहीं है। यह शोध का विषय है कि इस देश का मूल नाम क्या है।
यहां एक बात और बताई जा सकती है, चमार किसी मेघवाल को अपना नेतृत्व नहीं देने वाले। चमारों का नेता तो कोई खलास चमार ही हो सकता है। मेघवाल के नाम पर किसी दलित को दलितों का नेतृत्व नहीं मिलने वाला। तो मेघवाल को अपनी मूल चमार पहचान के साथ खड़ा होना पड़ेगा। तभी उसकी खुद की हीनता भी खत्म हो पाएगी और वह चमारों का नेतृत्व भी कर पाएगा। फिलहाल तो इतना बताया जा सकता है कि जिस प्रकार अपने सैकड़ों सरनेम के साथ ब्राह्मण ब्राह्मण होता है, उसी प्रकार चमारों की उपजातियां को आप सरनेम मान सकते हैं। जो सभी चमार हैं। इस रूप में मेघवाल एक सरनेम हो सकता है कोई जाति नहीं। जैसे ब्राह्मण ब्राह्मण होता है ही चमार चमार होता है। जैसे ब्राह्मण जन्मजात पैदा होता है वैसे ही चमार भी जन्मजात पैदा होता है। दोनों की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। ब्राह्मण द्विज जारकर्म की परंपरा को अभिशप्त है। जबकि चमार अपनी मोरलिटी की आजीवक परंपरा के साथ जगमगा रहा है।
एक अन्य बात जो बताई जा सकती है, कोई भी दलित बुद्धिजीवी जब भी कभी स्वयं को अर्थात अपनी जाति को ऊंची सिद्ध करने की कोशिश करता है तब वह उसे क्षत्रिय बता कर चुप्पी साध लेता है। वह कभी स्वयं को ब्राह्मण नहीं बता पाता। इस तरह वर्ण व्यवस्था में वह स्वयं को और अपनी जाति को दूसरे पायदान पर ला कर संतुष्ट हो जाता है। डॉ. अंबेडकर से पहले चमारों की बहुत सारी उप-जातियों ने स्वयं को क्षत्रिय ठहराने की बहुत कोशिश की। पता लगता है, 'बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में उत्तर प्रदेश में चमार इतिहासों के लेखन और प्रकाशन की एक लंबी शृंखला है।.. ये हैं- यू.बी. एस रघुवंशी कृत 'श्री चंवर पुराण', जिसका प्रकाशन-काल 1910 से 1916 के बीच का है; जैसवार महासभा कृत 'सूर्यवंश क्षत्रिय जैसवार सभा' (1926); पंडित सुंदरलाल सगर कृत 'यादव जीवन' (1929); और रामनारायण यादवेन्दु कृत 'यदुवंश का इतिहास' (1942)। सगर और यादवेन्दु जटिया थे, जिन्होंने अपने वंश का संबंध भगवान कृष्ण से जोड़कर 'जाटव-क्षत्रिय' होने का दावा किया था।
जटिया चमार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी थे, जिनकी बड़ी आबादी मेरठ, आगरा मुरादाबाद और बदायूं जिलों में थी। जैसवार चमारों की प्रमुख आबादी पूर्वी उत्तर प्रदेश में है, जो 'चंवर राजवंश' से अपना संबंध जोड़कर क्षत्रिय वंशी होने का दावा कर रहे थे।' देखा जा सकता है, चमारों का खुद को क्षत्रिय ठहराने का दावा डॉ. अंबेडकर से लगभग तीन दशक पहले का है।
पिछली शताब्दी यानि आधुनिक काल में चमारों के चिंतन का प्रारंभिक प्रयास था। जिसमें वे ब्राह्मणों द्वारा लिखे गए पौराणिक उपन्यासों में खुद को तलाश कर रहे थे। जबकि पुराणों का इतिहास से कुछ भी लेना-देना नहीं है। आगे चलकर डॉ. धर्मवीर ने दलितों के वास्तविक इतिहास को ढूंढ निकाला और 'आजीवक' के रूप में अछूतों के अपने प्राचीन धर्म को सामने ला दिया। तब भी कोई किसी पौराणिक पात्र के नाम पर चमारों को मेघवाल बताने की कोशिश करता है तो वह अपराधी की श्रेणी में ही आना है। अब पूछना यह है, चमार जातियों के ये बुद्धिजीवी खुद के ब्राह्मण होने का दावा क्यों नहीं पेश कर पाए? दुनिया की कोई भी ताकत दलितों अर्थात अछूतों को ब्राह्मण सिद्ध नहीं कर सकती। क्योंकि, ब्राह्मण होना नस्लगत मामला है और दलित जो मूलतः चमार हैं, यह भी नस्लगत मामला है।
अछूत या दलित बुद्धिजीवी पिछली शताब्दी में भी दलितों को क्षत्रिय ही सिद्ध करते रह गए। क्षत्रिय बताने मतलब होता है कि हम फलां राजा थे-हम ढिमकां राजा थे। इस संबंध में रामनारायण एस. रावत लिखते हैं, 'चमारों ने भी अपने अतीत के बारे में औपनिवेशिक और हिंदुओं (अर्थात ब्राह्मण) की गलत धारणाओं का खंडन करने के लिए, अंग्रेजी सरकार को अपनी क्षत्रिय स्थिति के बारे में आश्वस्त करने के तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य के साथ, वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए पौराणिक वृतांतों का ही उपयोग किया।' तो बताना यही है कि मेघवाल जाति का इतिहास लिखने वाले बुद्धिजीवियों की बुद्धिजीविता भी इस क्षत्रिय होने के दावे से आगे नहीं बढ़ सकी है। फिर, क्षत्रिय होने का दावा दलितों के जिस भी बुद्धिजीवी ने किया है वह उसकी सीमा रही है। एक तरह से इसे भ्रमित और सीमित सोच ही कहा जा सकता है। यह दलितों को वर्ण-व्यवस्था में दूसरे पायदान पर लाकर संतुष्ट हो जाना है।
इससे दलितों की स्थिति में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हो सकता। क्योंकि पुराण लिखने वाला ब्राह्मण अच्छे से जानता है कि दलित कौन हैं। वह कल को एक और पुराण लिखकर क्षत्रिय को अछूत सिद्ध कर देगा। तब दलितों को क्षत्रिय बताने वाले दलित बुद्धिजीवी क्या कर लेंगें? तो समस्या का समाधान क्या है? बताना यह है, समस्या का समाधान इस वर्ण व्यवस्था से अलग होकर देखने में निहित है। सवाल यह है, क्या चमारों की तरफ से तथाकथित मेघवाल नाम परिवर्तन करने की कोई मांग की गई? उत्तर है, नहीं, बिल्कुल नहीं। तब पूछना यह है कि यह धूल क्यों उड़ाई जा रही है? इस धूल के पीछे कहीं कोई अमीचंद शर्मा नाम का ब्राह्मण तो नहीं छुपा। चमारों को अपनी आंखें और दिमाग खोलकर इस तरह के कुत्सित प्रयासों का मुंह तोड़ जवाब देना चाहिए। पता यह भी लगता है कि हरियाणा में कुल अनुसूचित जाति में पचास प्रतिशत से अधिक केवल चमार जाति के लोग हैं।
जिनकी आबादी राज्य में लगभग पैंतीस लाख है। जबकि हरियाणा में मेघवाल जाति के करीब चालीस-पचास हजार लोग हैं। पूछा जा सकता है, ये कुछ हजार लोग पैंतीस लाख लोगों को अपनी जाति के नाम से क्यों संबोधित करवाना चाहते हैं? यह भी पूछा जा सकता है, मेघवाल उत्थान समिति किस अधिकार से यह मांग कर रही थी? असल में, यह इस देश की सबसे बड़ी जाति की पहचान खत्म करने का षड्यंत्र है। इस षड्यंत्र में ब्राह्मण ने इस बार गैर दलित को आगे कर दिया है। अब शूद्रों सहित गैर दलितों को क्या पता कि 'अवण्णवाद' क्या होता है। ये खुद वर्णवादियों से मिले हुए हैं। असल में, चमार जातीय पहचान का मामला है। इसे रामनारायण एस. रावत के शब्दों में कुछ इस तरह समझा जा सकता है, 'बीसवीं शताब्दी के शुरुआती काल में लिखे गए दलित इतिहासों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दलित लेखक मुख्य रूप से आर्थिक समानता, भूमि-वितरण, आर्थिक अन्याय, या उपनिवेश विरोधी आंदोलन के सवालों से चिंतित नहीं थे।
इसके बजाय, उनकी चिंता अपनी उत्पत्ति के ब्राह्मणवादी सिद्धांतों पर सवाल उठाकर अपने समुदाय के लिए गरिमा प्राप्त करने की थी।' तो, चमार को मेघवाल बताना ब्राह्मणवादी सिद्धांत ही है। मेघवाल खुद अपनी उत्पत्ति किसी कल्पित पौराणिक मेघ ऋषि से बताते हैं। जबकि, दलित अर्थात चमार अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और चिंतन में अपने मूल धर्म आजीवक तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में इन्हें किसी काल्पनिक पात्र से जोड़ना हास्यास्पद ही कहा जा सकता है। यह भी पता लगता है, मेघवाल खुद को प्रकृति पूजक कहते हैं। पूछना यह है, यह प्रकृति क्या है? ये सूरज, चांद, तारे, पृथ्वी और पूरा ब्रह्मांड? बादल या मेघ भी इसी प्रकृति का हिस्सा है। जिससे मेघवाल बनता है।
इस देश में जैसे कुछ लोग ना-समझी में खुद को सूर्यवंशी और चंद्रवंशी बताते हैं, ऐसे ही ये मेघवाल खुद को मेघवंशी बताते घूमते हैं। ऐसे तथाकथित वंशियों पर केवल माथा ही पीटा जा सकता है। ऐसे प्रकृतिवादियों के लिए कबीर साहेब कहते हैं: "चंदो मरिहैं, सुरजो मरिहैं, मरि हैं धरनी अकासा। चौदह भुवन के चौधरी मरिहैं, इनहूं की क्या आसा? नौ भी मरगए, दस भी मर गए, मर गए सहस अठासी। तैंतिस कोटि देवता मर गए, पड़ी काल की फांसी।।" इधर, दलितों की एक पार्टी भी बार-बार प्रकृति की बात करती रहती है। जो बेहद हास्यास्पद हो जाता है। वैसे, पूछना यह भी है, कौन है जो प्रकृति की पूजा नहीं करता? दुनिया की हर जाति किसी न किसी रूप में प्रकृति को पूजती ही है। पेड़, पौधे, जीव-जंतु, नदी, पहाड़, धरती यहां तक की स्वयं मनुष्य भी प्रकृति की ही देन है। तथाकथित वैदिक लोग तो खुद को सबसे बड़ा प्रकृतिवादी कहते फिरते हैं। मेघवाल और बहुजनवादी अब क्या करेंगे?
पूछना यह भी है, यह मेघवाल नाम की कथित जाति किस तरह के काम करती है? चमड़े से जुड़े काम तो यह निश्चित तौर पर छोड़ चुकी होगी, क्योंकि यह हीनता से भरे लोगों का समूह इकट्ठा हो गया है। यह कुछ करती भी है नहीं? इस बारे में एक सच्ची बात बताई जा सकती है,' नदी किनारे एक गांव था। जिसमें विभिन्न जातियों के लोग रहते। चमार भी उनमें से एक था। चमार का बेटा नदी के पानी के साथ खेलने में निपुण था। पानी के साथ उसकी दोस्ती बढ़ती गई। सभी उसे मछुआरा और निषादराज कहने लगे। बाद में उसकी पहचान ही निषाद बन गई। ऐसे चमार से निषाद जाति बनती चली गई। आज भी जो चमार नदियों के पास रहते हैं वह तैरने में या पानी के साथ खेलने में बेहद निपुण होते हैं। लेकिन, जिन गांवों के सैंकड़ों किलोमीटर दूर तक नदी नहीं है, वे चमार कैसे तैरना जान सकते हैं? अब कोई निषाद को चमार कह दे तो देखिए क्या होता है। कुछ ऐसा ही मामला इन मेघवालों का है। आपने यह भी देखा होगा कि राजमिस्त्री के कामों में हर गांव-शहर में विभिन्न जातियों के लोग लगे होते हैं। चमार भी राजमिस्त्री का बहुत शानदार काम करते हैं। क्या वे उससे चमार नहीं रह जाते?
तो, इन मेघवालों वालों समेत तमाम दलित जातियों को, जो चमार से छिटक कर अलग हुई है, इन्हें अपनी मूल पहचान चमार और मूलपुरुष पर ध्यान लगाना होगा। तभी आगे का रास्ता निकल पाएगा। यहां मेघवाल बुद्धिजीवियों से एक बात पूछी जा सकती है, ये बताएं कि क्या ये वर्ण को मानते हैं? अगर ये वर्ण को मानते हैं तो इन्होंने चमारों से अलग होकर अच्छा ही किया है। क्योंकि चमार तो किसी वर्ण और वर्णवाद को नहीं मानते। इसीलिए इन्हें' अवण्णवादी' कहा गया है। अवण्णवाद सीधे आजीवक धर्म में परिवर्तित होता है। अगर मेघवाल वर्ण को नहीं मानते तो इन्हें आजीवक धर्म के पुनर्संस्थापक डॉ. धर्मवीर को पढ़ना चाहिए। तभी आगे बात संभव है। अन्यथा, चमार और मेघवाल का रास्ता बिल्कुल विपरीत दिशा में जाता है
एक टीवी कार्यक्रम में' मेघवाल उत्थान समिति' के अध्यक्ष वेदप्रकाश मेघवाल ने खुद को चमार बताया और कहा," इस चमार के प्रति मेरे मन में भी' जहर' है।" यह बयान इनके चमार होने पर शक पैदा कर रहा है। यूँ जारसत्ता का सिद्धांत हमारे पास है। इस सिद्धांत की कसौटी पर हम दुनिया के किसी भी व्यक्ति को परख सकते हैं। इसे 'कबीर कसौटी' भी कहते हैं। जैसे शरण कुमार लिंबाले खुद को दलित कहते हैं लेकिन अंततः सिद्ध कर दिया गया है कि वे दलित नहीं हैं। कुछ ऐसा ही मामला इन महोदय का भी हो सकता है। बताना यह भी है कि कबीर कसौटी का ही आधुनिक नाम 'धर्मवीर कसौटी' है। इस कसौटी पर हर चमार अर्थात दलित को खरा उतरना होता है। बताया जा सकता है, कुछ चमार चमारी की कोख से पैदा जरूर होते हैं, लेकिन वे' अक्करमाशी' होते हैं।
ऐसे ही चमार कह उठते हैं, मुझे चमार 'जहर' लगता है। सही है, चमार जहर भी होता है, लेकिन जार के लिए । चमार को देखते ही जार की शक्ल पीली पड़ जाती है। ऐसे लगता है जैसे उसे किंग कोबरा ने डस लिया हो। तो, चमार को देख कर जार भागने लगता है। ऐसे में अगर कोई कहता है कि चमार उसे जहर लगता है, तब उसके' अक्करमाशी' या' जार' होने की पक्की निशानी के तौर पर देखा जाना चाहिए। वैसे, यह भी बताया जा सकता है कि जातिवादी द्विज सनातनियों को चमार शब्द जहर जैसा ही लगता है। तो, ये अपने बारे में ठीक से पता कर लें। कहना यह भी है, चमार को जहर कहने वाले को चमारों की सभा में खड़ा भी नहीं होने दिया जाता। चमार को लेकर हीनता से भरे और चमार को जहर कहने वालों को चमार को परिभाषित करना चाहिए। इन्हें बताना चाहिए कि चमार में क्या बुराई और खराबी है। बताया जा सकता है कि चमार उसी स्तर का शब्द है जैसे मुसलमान और ईसाई। इन्हें चमार कहो या आजीवक, एक ही बात है। दोनों की पीठ और पेट जुड़े हुए हैं। तो, चमार शब्द को लेकर जो लोग हीनता-ग्रंथि के शिकार हैं उन्हें चमार का ठीक से अध्ययन कर लेना चाहिए।
निश्चित ही यह अध्ययन के विषय हो सकता है, दलितों में यह हीनता कहाँ से और कैसे आई है? कहीं यह इनके विरोधियों ने तो इनके अंदर यह हीनता नहीं भरी? बावजूद इसके हीनता से भरा दलित जो यह कहता है कि उसे चमार शब्द जहर जैसा लगता है, तब उसकी गुलामी पर तरस ही आता है। वैसे तो कोई भी जाति दुनिया में श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ नहीं होती। सभी मनुष्य समान होते हैं। लेकिन जिन जातियों ने खुद को स्थापित कर रखा है उस जाति में भी अगर ऐसे व्यक्ति पैदा हो जाए तो ये अपनी जाति को गुलाम बनवा कर ही छोड़ेंगे। इनका यह हाल तब है जब सद्गुरु रैदास "खलास चमार" की बात कर रहे हैं। अच्छा होगा कि यह खलास चमार का अध्ययन कर लें और अपने मन में भरी हुई हीनता को बाहर निकाल फेंके। यह भी सही है कि आपका विरोधी तो आप में हीनता ही भरेगा। आपको विरोधियों से लड़ना होता है ना कि उस हीनता को अपने भीतर लेना होता। असल में, यह महासंग्राम है और हीनता से भरे लोग इस में पीठ दिखाकर खड़े हो गए हैं। दरअसल, जिन चमारों को वर्णवादी-जनेऊधारी-जातिवादी विप्र तुलसीदास से लड़ना चाहिए, वे लड़ रहे हैं कबीर से!
बताया जा सकता है, इतिहास से कटे लोग इतिहास बनाना दूर इतिहास में केवल विद्रूप पात्र बनकर रह जाते हैं। फिर, जो व्यक्ति 'चमार' शब्द से ही डरा हुआ है और कथित मेघवाल के नाम पर चमारों की गुलामी खत्म करने की बात कर रहा है, ऐसा व्यक्ति क्या कर सकता है? इसे तो कोई चमार कह देगा तो यह तत्क्षण ही जमीन में गड़ जाएगा। ऐसे लोगों को चमार भला अपना नेतृत्व कैसे दे सकते हैं? इसे यूं भी समझ सकते हैं, पिछली शताब्दी से खुद को वाल्मीकि कहलवाने की जिद पर अड़े हमारे भंगी भाइयों की पहचान आज भी भंगी की ही बनी हुई है। जो बदलने वाली भी नहीं है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। इतना ही नहीं हजार-दस हजार साल और उसके आगे भी ये इसी रूप में पहचाने जाएंगे।
इस आलेख में अगर यह नहीं बताया जाएगा कि चमार कौन होता है तब तक यह अधूरा ही माना जाएगा।
सद्गुरु रैदास कहते हैं:
"सभी चमार जो चोला चाम के। नाम बिना नहीं कछु काम के।।" वे अपनी जाति के बारे में स्पष्ट शब्दों में कहते हैं:
"ऐसी मेरी जाति विख्यात चमारं।
रिदै राम रसायन गुन सारं ।।"
वे तो उन चमारों को भी समझाते हुए कहते हैं, जो हीनता-ग्रंथि के शिकार हो कर अपनी जाति कुछ और बताते हैं:
"चाम के घोड़ा चाम के हाथी।
सभी चमार कुटुंब के साथी।।" बताना यही है, रैदास के बालकों में हीनता आ ही नहीं सकती। जो हीनताग्रस्त दिखते हैं उनके रैदास की संतति में होने की कोई संभावना नहीं है।
बावजूद इस के, जिस किसी भी चमार में किसी भी वजह से किसी भी तरह की हीनता घर कर गई है तो वह उसे अपने दिलों-दिमाग से बाहर निकाल फेंके। वह सद्गुरु रैदास के इन शब्दों पर ध्यान लगाएः
"सब में एक राम जोति, एकहि सिरजनहार। रैदास राम सबन में, बाम्मण हुइ कि चमार।।"
इस मुद्दे पर दिनेश श्योराण ने बिल्कुल सही लिखा है, 'चमार कोई कल पैदा हुआ शब्द नहीं है। यह हमारी ऐतिहासिक सामाजिक पहचान है। यह पहचान संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की वाणी और परंपरा से जुड़ी हुई है। हमारे समाज का इतिहास हजारों वर्षों की सामाजिक यात्रा, संघर्ष और परंपराओं से जुड़ा है। दिनेश जी ने जो लिखा है यह बात अक्सर सभी चमार कहते देखे जा सकते हैं। इस पर यही कहना है कि चमारों को अपने हजारों वर्षों के इतिहास, सामाजिक यात्रा, संघर्ष और परंपरा पर ध्यान लगाना चाहिए। इन्हें सोचना चाहिए, सद्गुरु रैदास में यह परंपरा कहां से आती है? इस से चमारों के इतिहास को सामने लाने में मदद ही मिलेगी। यह अकाट्य सत्य है कि किसी जाति का इतिहास किसी एक व्यक्ति से शुरू नहीं होता। हां, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि सद्गुरु रैदास को एक सूत्र मान कर चमारों अर्थात दलितों का पूरा इतिहास खोजा जा सकता है।
यहाँ, एक अन्य बात जो पूछनी है, अगर कल को ये सनातनी जातिवादी अपने साहित्य में 'मेघवाल' शब्द को लेकर भी उसी तरह की लेखनी करना शुरू कर देंगे जैसी चमार शब्द के लिए की है, तब चमार से मेघवाल बने लोग क्या करेंगे? फिर यह कहां टिकेंगे? तो, बेहतर यही है कि ये अपनी मूल पहचान 'चमार' में स्थित रहें। चमार साहित्यकारों से भी अनुरोध है कि ये चमार शब्द को इतना ताकतवर बना दें कि किसी की चमारों को लेकर किसी तरह से कलम चलाने की हिम्मत ना रहे।
आखिर में, अपने आप को मेघवाल कहने वाले चमारों को इस कविता की हवाले छोड़ रहा हूं:
जैसे ही मैंने बताया
चमार हूं मैं
उतर गई शक्ल ही
उस की,
वह समझ रहा था
मैं अपने आप को बताऊंगा
बौद्ध, ईसाई या आर्य समाजी या
किसी ऊंची जात का हिंदू
तब याद दिलाएगा वह
मेरी जात पर मैंने तो खुद ही बताया था अपना चमार होना तब शक्ल तो उतरनी ही थी उस की।
1-2 - जनसत्ता-ई पेपर, 25 अगस्त, 2026, सुखबीर सिवाच की रिपोर्ट
3 - 12,13 दलित चिंतन का विकास: अभिशप्त चिंतन से इतिहास चिंतन की ओर, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली'10002, प्रथम संस्करण: 2008, पृष्ठ 21, 79-80,81-2,
4,10,16,17,18
उत्तर भारत में चमार और दलित आंदोलन का इतिहास, रामनारायण एस रावत, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. , जी - 17, जगतपुरी, दिल्ली'10051, प्रथम संस्करण: 2024, पृष्ठ 182, 59/269, 183, 190, 181
5,7,8,11
मेघवंश का सिंहावलोकन, आर. पी. सिंह, इंटरनेट पर उपलब्ध, भूमिका से
6 - फेसबुक पर 'मेघवंश का इतिहास' नाम से लिखने वाले की 28 अगस्त, 2026 की पोस्ट
9,14,15
चमार, जी. डब्ल्यू ब्रिग्स, अनुवादक: जयप्रकाश कर्दम, सम्यक प्रकाशन, 32/3, पश्चिम पुरी, नई दिल्ली'10063, पंचम संस्करण: 2023, पृष्ठ - 13,12,19
19,21,22, 23, 24
महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110002, प्रथम संस्करण: 2017, पृष्ठ-393,498,498,498, 498
20 - यू-ट्यूब चैनल'
दैनिक सवेरा'
पर एक डिबेट में वेदप्रकाश मेघवाल का बयान
25 - Chamar Regiment Memorial-Bir Farm, 09 अगस्त, 2026 की फेसबुक पोस्ट
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26/09/2026
Kailash Dahiya
राजेंद्र जी, पुराण पाथने का अर्थ है, जिस गाय को दस्त लगे हैं उस के गोबर से उपले पाथना।
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26/09/2026
Pankaj Chaudhary
कैलाश दहिया ने शानदार और आंखें खोलने वाला आलेख लिखा है। उन्होंने इतिहास को खंगाल दिया है। मेघवालों को कम से कम डॉ. आंबेडकर से सबक लेना चाहिए कि बौद्ध धर्म अपनाने के बावजूद बाबासाहेब की पहचान अभी भी महार के रूप में ही होती है। दहिया जी ने बिलकुल सही पड़ताल की है कि मूल तो जाति है और आपका मूल चमार है। भले ही आप अपने आपको चमार शब्द पर गर्व करने की बजाय हीनता बोध से ग्रसित होकर मेघवाल कह लें या कुछ और। मेरा खयाल है कि कैलाश दहिया जी का यह आलेख उन सभी दलित-बहुजन को पढ़ना चाहिए जो अपनी जाति को लेकर हीनता बोध से ग्रसित रहते हैं। इस सुचिंतित और लम्बे आलेख को पढ़कर अपने को समृद्ध महसूस कर रहा हूं। पंकज चौधरीनई दिल्ली
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18/09/2026
Rajender Singh
बहुत ही समसामयिक आलेख है। चमार जाति का नाम बदलना वर्तमान राजनीति की दुधारी चाल है। एक, चमार जाति में हीन भावना भरना और दूसरा इस जाति को हिंदू पौराणिक संदर्भों से जोड़कर उसकी स्वतंत्र पहचान को ख़त्म करना। यह उसी प्रकार का हथकंडा कहा जा सकता है जो भंगी को वाल्मीकि, माली समाज को सूरसैन या सैनी आदि से जोड़ देना है। यह किसी क़ौम के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ है कि दूसरे उसकी अस्मिता बताएँगे। चमार के स्वाभिमान का इतिहास भी बहुत लंबा है। प्रशासन, शासन, साहित्य और शारीरिक श्रम में उसका कोई सानी नहीं है। हरियाणा के मुख्यमंत्री माली जाति से आते हैं। वे माली से सैनी बन गए। सैनी बनकर ज्योतिराव की अपेक्षा पौराणिकता में वे अपना उद्धार चाहते होंगे। परंतु चमारों में सद्गुरु रैदास ने जो चेतना पैदा कर दी है, उसके आगे पाखंडी टिक नहीं सकते। कैलाश दहिया जी ने जिन संदर्भों का उल्लेख दिया है वे अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

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