रेडियो का जादू आज भी सिर चढ़ कर बोलता हैं
रेडियो का श्रोता सतीश श्रोता के साथ एक जनपक्षधर लेखक भी...
सतीश कुमार चौहानसत्तर के दशक से रेडिओ से श्रोता के रूप में जुड़े खुर्सीपार भिलाई के सतीश चौहान आज भी आकाशवाणी रायपुर, विविधभारती, रेडिओ सिलोन, ऑल इंडिया रेडिओ और अफ ऍम बैंड में हिस्सा लेते रहते हैं, भारत में पहला संगठित रेडियो प्रसारण 23 जुलाई 1927 को 'इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी' (IBC) के तहत बंबई (मुंबई) स्टेशन से शुरू हुआ था। इसका ध्येय वाक्य: बहुजन हिताय बहुजन सुखाय।
20 अगस्त को छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय रेडिओ श्रोता सम्मेलन बाबा साहेब अम्बेडकर भवन सेक्टर 6 भिलाई में सम्पन्न हुआ। जिसका समापन कला मंदिर सिविक सेंटर में हुआ। जिसमें देश के करीब सेकड़ो श्रोता शामिल हुए।
सत्तर के दशक से रेडिओ से श्रोता के रूप में जुड़े खुर्सीपार भिलाई के सतीश चौहान आज भी आकाशवाणी रायपुर, विविधभारती, रेडिओ सिलोन, ऑल इंडिया रेडिओ और अफ ऍम बैंड में हिस्सा लेते रहते हैं, भारत में पहला संगठित रेडियो प्रसारण 23 जुलाई 1927 को 'इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी' (IBC) के तहत बंबई (मुंबई) स्टेशन से शुरू हुआ था। इसका ध्येय वाक्य: बहुजन हिताय बहुजन सुखाय। इससे पहले जून 1923 में 'रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे' ने देश में पहली बार प्रायोगिक तौर पर कार्यक्रम प्रसारित किया था।
इसकी शुरुआत बम्बई (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई) केंद्रों से हुई थी। रेडिओ सिलोन (Radio Ceylon) श्रीलंका (पुराना नाम सीलोन) में स्थित एशिया का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन है, जिसकी शुरुआत सन 1923 में हुई थी। 1950 और 1960 के दशक में यह दक्षिण एशिया में हिंदी फिल्मों के संगीत और लोकप्रिय कार्यक्रमों (जैसे 'बिनाका गीतमाला') का सबसे बड़ा केंद्र था.
चौहान बताते हैं की आकाशवाणी रायपुर के सुरसिंगार कार्यक्रम ने छत्तीसगढ़ी गीतों ने पुरे देश में मीठी जुबान बना दिए थे, आपके मीत ये गीत और युववाणी युवाओं में काफी लोकप्रिय था, शाम सात बजे चौपाल कार्यक्रम बरसाती भैया की सरल भाषा में मनोरंजन के साथ खेती की उन्नत तकनीक बताना काफी लाभप्रद रही. कार्यक्रम युववाणी और आज मेरी बारी हैं में युवाओं की भागीदारी बढ़ी किसन गंगेल, मिर्ज़ा मसूद, कल्पना यादव प्रभा डामोर, लाल राम कुमार सिंह जैसे उद्घोषको के नाम आज भी लोग याद करते हैं, विविध भारती की छायागीत हवा महल और जवानों के लिये जयमाला आज भी लोकप्रिय हैं.
1947 के बटवारे के तुरंत बाद दोनों देशों के भाईचारे की बेबसी और घुटन पर आधारित ऑल इंडिया की उर्दू सर्विस द्वारा प्रसारित साप्ताहिक कार्यक्रम आवाज दे कहाँ हैं सुनकर लोग बघा बार्डर की ओर दौड़ पड़ते थे. तब फ़ोन की सुविधा आम लोगों तक नहीं पहुंची थी. लोग अचानक गुम हो गये. भाईचारे और रिश्ते बिन जल मछली जैसे छटपटाने लगे थे...
ऐसे में रेडिओ के इस कार्यक्रम में उद्घोषक द्वारा बड़े संवेदना सादगी से बिछडो के खतो का बड़े विस्तार से जिक्र किया जाता जाता था जिसे सुन कर लोग रोने लगते थे कुछ तो हिंदुस्तान पाकिस्तान के बॉर्डर की तरफ दौड़ पड़ते थे... उत्तर भारत पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में इस इस कार्यक्रम के लिये रेडिओ के आस पास भीड़ लग जाती थी बिछड़ने के दर्द की दास्तां सुन लोग सिसकने लगते थे..ऑल इंडिया की उर्दू सर्विस के इस प्रयास व्यापक सफलता भी मिली इसने कई बिछड़े परिवारों व मित्रों को मिलवाया... आवाज दे कहाँ हैँ...
1947 के बटवारे के तुरंत बाद दोनों देशों के भाईचारे की बेबसी और घुटन पर ऑल इंडिया की उर्दू सर्विस द्वारा प्रसारित साप्ताहिक कार्यक्रम आवाज दे कहाँ हैं सुनकर लोग बघा बार्डर की ओर दौड़ पड़ते थे कई बिछड़े परिवारों व मित्रों को मिलवाया... सत्तर अस्सी के दौर में श्री लंका ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन यानि रेडिओ सिलोन के बारे में तो जितना कहा जाये कम हैं सुबह 6 बजे से वंदना के बाद शुरू सभा पुराने गीत, फिर आप ही के गीत जैसे कार्यक्रम एक बेहतर गुडमॉर्निंग होते थे.
अमीन सयानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीत माला की लोकप्रियता का ये आलम था कि मुंबई फिल्म उद्योग से निर्माता निर्देशक, गीतकार,गायक व संगीतकार अपने गीतों को सरताज गीत बनाने के लिये देश भर के रेडिओ श्रोताओं को ज्यादा से ज्यादा फार्मिंश भेजने के लिये निवेदन करने लगे थे, रेडिओ सिलोन को शाम का प्राइम टाइम संडे सुबह की सभा पुरे समय श्रोताओं को बांधे रखती थे, वाक्यों के शब्दों पर आधारित वाक्य गीतांजलि कार्यक्रम में एक हजार वाक्यों के चयन पर भिलाई के ही एक श्रोता प्रदीप शाह लिम्का बुक ऑफ़ वर्ड रिकॉर्ड में स्थान मिला था.
सप्ताहिक कार्यक्रम हफ्ते के श्रोता पत्र मित्रता का बेमिसाल कार्यक्रम इसी तरह बदलते साथी, भावना प्रधान भावगीत कार्यक्रम, जब आप गा उठे, आपकी बधाईया, जोहार के जवाब, मराठा दरबार की फ़िल्मी अंतनक्षरी , तबस्सुम के ठहाके, मतलब स्वस्थ मनोरंजन की मिसाल. शशि परेरा, विजय लक्ष्मी, दलवीर सिंह परमार जैसे कई उद्घोषक की आवाजे हवा में मिश्री घोलती थी , बी बी सी लन्दन के समाचार तो आज भी स्टोन मार्क माने जाते हैं.
एक दौर ऐसा भी था की पुरे देश में रेडिओ श्रोता संघो का गठन होने लगा था , रेडिओ क्लब बन गये. कार्यक्रमो में श्रोताओं की भागीदारी होने लगी, जाने लगी महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में तो श्रोताओं की बड़ी तादात आज भी रेडिओ में जुड़ी हैं.झुमरीतलैया, भाटापारा, सीतामढ़ी, भिलाई, अकोला, बुलढाणा,डोंगरगढ़, रिंगनी, धमतरी ऐसे कुछेक शहर के नाम हर समय कहीं ना कहीं रेडिओ के नाम से गुंजते रहते हैं
भिलाई में आयोजित इस कार्यक्रम में देश भर के उम्मीद से कहीं ज्यादा श्रोताओं और उद्घोषको का एकत्रित होना इस शौक को आज भी जीवंत होने का परिणाम हैं..तमाम सेटेलाइट आधारित मनोरंजक और सूचना के बाजार में आज भी रेडिओ की मांग बनी हुई अफ ऍम बैंड और रेडिओ जॉकी अब भी अपनी विश्वनीयता के साथ बाजार में जमे हुये हैं..
लेखक विगत 40 वर्षो से रेडिओ श्रोता हैं और नियमित रूप से रेडिओ से जुडा हैं

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