नेपाल की त्रासदी: क्या यह जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम है?

साइंटिस्ट फॉर सोयायटी

साइंटिस्ट फॉर सोयायटी

 

सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि लगभग 5,200 मीटर की ऊँचाई पर ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूट गया और क़रीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। ग्लेशियर के टूटकर गिरने से इतनी ज़ोरदार टक्कर हुई कि उस क्षेत्र में करीब 5.2 रिक्टर स्केल का भूकम्प रिकॉर्ड किया गया था। ग्लेशियर के गिरने की अत्यधिक गति और घर्षण से बर्फ़ का कुछ हिस्सा पिघल गया तथा पिघला हुआ पानी, बर्फ और विशाल चट्टानें घाटी तक आ पहुँची।

यह भारी जलराशि, चट्टानों तथा मलबे के साथ भोटेकोशी तथा त्रिशूली नदी की धाराओं में जा मिली। यह मात्रा इतनी ज़्यादा थी कि त्रिशूली नदी का जलस्तर केवल 30 मिनट में लगभग 9 मीटर बढ़ गया। इस घटना की भयावहता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इस बाढ़ के कारण क़रीब त्रिशूली नदी के आसपास का 72 किलोमीटर का क्षेत्रफल प्रभावित हुआ है। इस भयावह आपदा ने नेपाल के करीब 7 जिलों को प्रभावित किया है। नेपाल में आयी बाढ़ के कारण भारत के बिहार राज्य में भी कई नदियों का जल स्तर बढ़ा है। बिहार के कई ज़िलों में भी बाढ़ का ख़तरा मंडराने लगा है। 

मीडिया में आयी खबरों के मुताबिक नेपाल में अबतक करीब 734 लोगों की मौत के मौत की पुष्टि हुई है और 2498 लोग अभी भी लापता है। वहीं नेपाल की सीमा से लगे तिब्बती क्षेत्र में 16 लोगों की जाने गयी है और करीब 546 लोग लापता है। चूँकि बाढ़ का पानी अभी भी उतरा नहीं है तथा पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण राहत और बचाव कार्य में भी मुश्किलें आ रही है। 

वैज्ञानिकों के अनुसार, लांगटांग लिरुंग चोटी के आसपास के क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने का एक कारण जलवायु परिवर्तन हो सकता है। पिछले कुछ सालों से हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने को लेकर वैज्ञानिकों ने लगातार चिंता जतायी है। संयुक्त राष्ट्र ने 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिछले तीन दशकों में नेपाल के बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर से लगभग एक-तिहाई बर्फ़ पिघल चुकी है।

नेपाल के ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में 65% अधिक तेज़ी से पिघले हैं। ग्लेशियरों का इतना तेज़ी से पिघलना चिंता का विषय है और इसके कारण पर्वतीय क्षेत्रों में अस्थिरता बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ़, पवर्तीय क्षेत्रों में  लगातार हुए निर्माण कार्य ने पहाड़ी ढलानों को पहले के मुक़ाबले अस्थिर किया है। 

चाहे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में इस वर्ष चली हीटवेव हो जिसने सूखे की स्थिति पैदा कर दी थी या भारत समेत दक्षिण एशिया के देशों में पड़ी भीषण गर्मी हो, जिसने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणाम झेल रही है। बाढ़, हीटवेव और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आने की आवृत्ति में पिछले आधी सदी के दौरान वृद्धि आयी है तथा इनकी विभीषिका भी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ी है। 

साइंटिस्ट्स फॉर सोसाइटी द्वारा इस तथ्य को पहले भी इंगित किया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के लिए यह पूँजीवादी व्यवस्था ज़िम्मेदार है। ऑक्सफ़ेम की 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोग जितना वैश्विक कार्बन उत्सर्जन करते हैं, लगभग उतना ही उत्सर्जन दुनिया की नीचे की 66 प्रतिशत आबादी अर्थात 5 अरब लोगों द्वारा किया जाता  है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में दुनिया के सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों का कार्बन उत्सर्जन, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 16 प्रतिशत था।

आज जब वैज्ञानिक तथ्य इस बात की गवाही देते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का असर कम करने के लिए जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लाने की ज़रूरत है, लेकिन इसके विपरीत, दुनिया भर में जीवाश्म ईंधनों की खपत बढ़ी है। चूँकि, अगर जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर लगाम लगायी गयी तो इन बड़ी पेट्रोल कम्पनियों और कोयला कम्पनियों के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचेगा। आँकड़े भी बातते हैं कि, सिर्फ़ वर्ष 2017 से 2024 के बीच वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन की खपत में 7% की वृद्धि हुई है। 

आज जब जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणाम हमारे सामने आ रहें हैं तब भी विश्व के नेताओं द्वारा इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बने अन्तरराष्ट्रीय मंच केवल कोरी कवायद बनकर रह गये हैं। पिछले साल ब्राज़ील के बेलिम में आयोजित COP30 सम्मेलन में जलवायु संकट से निपटने को लेकर किसी तरह की ठोस योजना नहीं ली गयी। जीवाश्म ईंधन के उपयोग को चरणबद्ध प्रक्रिया में फेज़ आउट करने के ऊपर देशों के बीच बाध्यकारी सहमति नहीं बनी। 

आज नेपाल जिस त्रासदी से गुज़र रहा है, वह अकल्पनीय है। ऐसे समय में हमारी संवेदनाएं नेपाल की जनता के साथ है। आज हम सबको भारत सरकार से अपील करनी होगी कि इस विकट स्थिति में बाढ़ से प्रभावित नेपाल की जनता को हर सम्भव मदद पहुँचायी जाये।

 


Add Comment

Enter your full name
We'll never share your number with anyone else.
We'll never share your email with anyone else.
Write your comment

Your Comment