अरुंधति राय : कथा, विचार और स्मृति के दरम्यान
मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर
कामेश्वर पाण्डेयअरुंधति राय को पढ़ते हुए मुझे बार-बार लगता है कि उनका आत्मकथ्य 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' से ही आरंभ हो जाता है, भले वह किसी संस्मरण की तरह क्रमबद्ध न हो। उनके बचपन, पारिवारिक रिश्तों और केरल की दुनिया की जो भावात्मक भूमि उस उपन्यास में दिखाई देती है, वही आगे उनके समूचे लेखन की आधारभूमि बनती है।
मेरे लिए 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भावनात्मक सघनता है। वहाँ निजी अनुभव इतने कलात्मक ढंग से रूपांतरित हो जाते हैं कि वे लेखक के जीवन से निकलकर सार्वभौमिक मानवीय अनुभव बन जाते हैं।
'द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' पढ़ते समय मेरा अनुभव कुछ अलग रहा। चरित्रों की विविधता और कल्पना का विस्तार प्रभावित करता है, लेकिन कई जगह समकालीन इतिहास और राजनीति इतने प्रत्यक्ष रूप से कथा में उपस्थित हो जाते हैं कि पात्रों के निजी जीवन की आंतरिक यात्रा कुछ पीछे छूटती हुई महसूस होती है। यह उपन्यास निश्चय ही बड़े कैनवास पर लिखा गया है, पर मेरे लिए उसकी भावनात्मक गूँज पहले उपन्यास जितनी गहरी नहीं बन सकी।
इसी कारण उनके संस्मरण 'मेरी माँ, मेरी गैंगस्टर' के प्रति उत्सुकता और बढ़ गई है। किसी लेखक को समझने के लिए उसके संस्मरण कई बार उसकी रचनाओं जितने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। वे उसके व्यक्तित्व, उसके पारिवारिक संसार और उसकी रचनात्मक संवेदना की जड़ों तक पहुँचने का अवसर देते हैं।
हिंदी संस्करण के आवरण पर अरुंधति राय का सिगरेट पीता चेहरा है। संभवतः यह उनकी चुनी हुई सार्वजनिक छवि का हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में भी वे इसी रूप में हमारे सामने आती रही हैं—एक ऐसी लेखिका, जिसकी भाषा उम्र के साथ और अधिक पैनी हुई है; जो हर प्रकार की सत्ता से बेखौफ टकराती है; जो असहमति को केवल दर्ज ही नहीं करती, बल्कि उसे चुनौती की मुद्रा में व्यक्त भी करती है। यही तेवर उन्हें हमारे समय की सबसे विशिष्ट सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में शामिल करता है।
हाल में उनके संस्मरण के विमोचन के दौरान उनसे एक प्रसंग पूछा गया। बचपन में उनके भाई को इसलिए कठोर दंड मिला कि वह "औसत छात्र" था, जबकि अरुंधति ने अच्छे अंक प्राप्त किए थे और उन्हें माँ का स्नेह मिला। इस पर उन्होंने कहा कि आज भी जब उन्हें कोई सम्मान मिलता है—यहाँ तक कि बुकर पुरस्कार भी—तो उन्हें लगता है कि "बगल के कमरे में कोई पिट रहा है"; फिर उन्होंने उस अनुभूति का विस्तार कश्मीर, फ़िलस्तीन और बस्तर जैसे संघर्ष-क्षेत्रों तक किया।
यह उत्तर मुझे लंबे समय तक सोचने के लिए विवश करता रहा। एक ओर इसमें निजी अनुभव से जन्मी नैतिक बेचैनी है; दूसरी ओर वही अनुभव तत्काल व्यापक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। यहीं मेरे मन में एक साहित्यिक प्रश्न उठता है—क्या हर गहरे निजी अनुभव को व्यापक राजनीतिक रूपक में बदल देने से उसकी आत्मीयता का स्वर कुछ बदल जाता है? या फिर यही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक लेखक निजी पीड़ा को सार्वभौमिक मानवीय अनुभव में रूपांतरित करता है?
शायद इसी प्रश्न के आलोक में मैं 'द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' को भी फिर से याद करता हूँ। वहाँ भी कई जगह लगा कि कथा और विचार एक-दूसरे के साथ निरंतर संवाद करते हैं। कभी यह संवाद रचना को असाधारण ऊँचाई देता है, तो कभी पाठक के मन में यह प्रश्न छोड़ जाता है कि क्या पात्रों का निजी जीवन अपने पूरे विस्तार में सामने आ पाया है।
यह कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक पाठकीय अनुभव है। संभव है, दूसरा पाठक इन्हीं बातों को उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति माने। बड़े लेखकों की यही विशेषता होती है कि वे सहमति से अधिक विचार और बहस पैदा करते हैं।
मेरे लिए अरुंधति राय का महत्त्व केवल उनके विचारों में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि वे हमें लगातार यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि साहित्य, स्मृति और राजनीति का रिश्ता आखिर कहाँ बनता है और कहाँ बदलने लगता है।
शायद उनकी यही बेचैनी उन्हें हमारे समय की सबसे चर्चित और सबसे विवादास्पद लेखिकाओं में एक साथ खड़ा करती है। और शायद इसी कारण उनकी हर नई पुस्तक पढ़ना अब भी एक साहित्यिक घटना लगता है।

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