बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह की संघर्षपूर्ण कहानी
पत्रकारिता की लड़ाई में अपने भाई जैसे दोस्त मुकेश चंद्राकर को खो दिया
आउटलुक में अंग्रेजी में प्रकाशितउनकी सबसे चर्चित रिपोर्ट "झूठे हैं पुलिस के बयानः मोदेनार" अप्रैल 2015 में आई, जिसके लिए उन्होंने बस्तर के तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साहस दिखाते हुए कठिन सवाल पूछे। जहां ज्यादातर स्थानीय पत्रकार चुप रहते थे या सिर्फ हैंडआउट लेते थे, वहां प्रभात ने सवाल किए कि पुलिस की कार्रवाइयों में कितनी पारदर्शिता है। इस रिपोर्ट के बाद वे पुलिस प्रशासन के निशाने पर आ गए।
प्रभात सिंह दंतेवाड़ा (बस्तर क्षेत्र, छत्तीसगढ़) के एक युवा, निर्भर और साहसी पत्रकारों में शामिल हैं। 2015-2016 के आसपास वे पत्रिका अखबार और ई टीवी मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के लिए काम करते थे प्रभात सिंह बस्तर के आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद, पुलिस कार्रवाई, मानवाधिकार उल्लंघन और भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर रिपोर्टिंग करते थे।
उनकी सबसे चर्चित रिपोर्ट "झूठे हैं पुलिस के बयानः मोदेनार" अप्रैल 2015 में आई, जिसके लिए उन्होंने बस्तर के तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साहस दिखाते हुए कठिन सवाल पूछे। जहां ज्यादातर स्थानीय पत्रकार चुप रहते थे या सिर्फ हैंडआउट लेते थे, वहां प्रभात ने सवाल किए कि पुलिस की कार्रवाइयों में कितनी पारदर्शिता है। इस रिपोर्ट के बाद वे पुलिस प्रशासन के निशाने पर आ गए।
धमकियां और दबाव का दौर
आईजी कल्लूरी ने कथित तौर पर उनसे कहा था- "मैं तुम्हें देख लूंगा"। उन्हें बार-बार धमकियां मिलीं। कई फर्जी और छोटे-मोटे मामले उन पर पहले से दर्ज कर दिए गए थे (जैसे जालसाजी, धोखाधड़ी आदि), जिन पर सालों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।
वे पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून की मांग कर रहे थे और व्हाट्सएप ग्रुप "बस्तर न्यूज़' पर सक्रिय थे। कल्लूरी के आईजी रहते उन पर आरोप थे कि वे पत्रकारों के फोन टेप कराते एवं नक्सलियों के कोर इलाके में पत्रकारों की आईडी देकर मुखबिर भेजते थे जिसके कारण पत्रकारों को दोनों ओर (पुलिस और नक्सली) से जान का खतरा लगातार बना रहता था।
जेल की घटना मार्च 2016
21 मार्च 2016 की शाम को सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने प्रभात सिंह को उनके कार्यालय के बाहर अपनी गाड़ी पार्क करते समय सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने बिना किसी वारंट के उठा लिया। इसे उन्होंने खुद "अपहरण" जैसा बताया। जिसे कई पत्रकार और मानवाधिकार संगठनों ने अवैध गिरफ्तारी बताया।
उन पर आरोप लगा कि उन्होंने व्हाट्सएप पर एक आपत्तिजनक/अश्लील मैसेज शेयर किया था, जिसमें उन्होंने कुछ पत्रकारों को "मामा के गोद में बैठे" कहा था (जो पुलिस के पक्ष में थे और पत्रकार सुरक्षा कानून का विरोध कर रहे थे)।
इस मैसेज के आधार पर उन पर लगाए गए मुख्य आरोप
आईटी एक्ट की धारा 67 और 67A (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री प्रसारित करना) आईपीसी की धारा 292 पुलिस ने उन पर पहले से लंबित 3-4 पुराने मामले भी एक साथ जोड़ दिए। उन्हें रातभर दंतेवाड़ा से 80 किलोमीटर दूर दुसरे जिले के परपा थाने (जगदलपुर) में रखा गया।
कोर्ट में पेश करने के बाद जमानत खारिज कर दी गई। वे लगभग 3 महीने (96 दिन) तक जगदलपुर जेल में बंद रहे। जेल में उन्हें कथित तौर पर नक्सली-रेपिस्ट जैसे कैदियों के साथ रखा गया और अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा।
रिहाई और उसके बाद
जून-जुलाई 2016 में काफी कानूनी संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों (एमनेस्टी इंटरनेशनल, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स, CPJ आदि) के दबाव के बाद उन्हें जमानत मिली। उनका केस उच्च न्यायालय बिलासपुर में जाने-माने वकील किशोर नारायण और रजनी सोरेन एवं जिला एवं सत्र न्यायालय दंतेवाड़ा में एडवोकेट क्षितज दुबे ने पैरवी की थी।
रिहाई के बाद
जेल से रिहाई के बाद उनकी नौकरी चली गई (ETV और Patrika दोनों से संबंध टूट गए)। वे बेरोजगार हो गए। लगातार कानूनी केसों का सामना करना पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई। बस्तर में पत्रकारिता का माहौल इतना दबावपूर्ण हो गया कि कई पत्रकार या तो भाग गए, चुप हो गए या जेल गए।
उन्हें "राष्ट्र-विरोधी" कहकर कुछ स्थानीय पत्रकारों और पुलिस समर्थकों ने निशाना बनाया। प्रभात सिंह के संघर्ष ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बस्तर में पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस छेड़ी। आज भी बस्तर में कई पत्रकार या तो चुप रहने को मजबूर हैं या डर के साए में जी रहे हैं।
प्रभात सिंह जैसे कुछ लोग ही उस अंधेरे में रोशनी की किरण बने रहे। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है सच की कीमत कभी-कभी जेल, कभी-कभी सम्मान की हानि, और कभी-कभी जीवन तक हो सकती है, लेकिन जो साहसी होते हैं, वे चुप नहीं बैठते।
प्रभात सिंह ने भी आगे खुलकर रिपोर्टिंग जारी रखने की कोशिश की, लेकिन वे काफी हद तक हाशिए पर आ गए। उनकी कहानी बस्तर में पत्रकारिता पर दबाव और आदिवासी इलाकों में अभिव्यक्ति की आजादी के संघर्ष का प्रतीक बन गई। मौजूदा दौर में पत्रकारिता के गिरते नैतिक मूल्यों के बाद निराश होकर उन्होंने छोटा मोटा व्यवसाय करने का मन बनाया और उन्होंने अपना कंप्यूटर का एक दूकान दंतेवाड़ा में खोल लिया और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं।
बस्तर में पत्रकारिता कितना कठिन
प्रभात सिंह की यह कहानी बताती है कि बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सच्चाई लिखना कितना महंगा पड़ सकता है। एक तरफ नक्सली, दूसरी तरफ राज्य की शक्तिशाली पुलिस व्यवस्था बीच में फंसे पत्रकारों का संघर्ष आज भी जारी है। उनके जैसे कई पत्रकारों ने बस्तर की सच्चाई दुनिया तक पहुंचाने के लिए बहुत कीमत चुकाई है। बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह की कहानी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दर्दनाक अध्याय है।
यह कहानी साहस, दमन, जेल की कड़वी सच्चाई और फिर भी हार न मानने की भावना की है। प्रभात सिंह की यह लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि बस्तर में आजादी से बोलने की आजादी की लड़ाई थी। उनकी कहानी बताती है कि कैसे संवेदनशील इलाकों में सच लिखने वाले पत्रकारों को झूठे मामलों, धमकियों और जेल से दबाने की कोशिश की जाती है।
प्रभात सिंह ने पत्रकारिता की लड़ाई में अपने भाई जैसे दोस्त मुकेश चंद्राकर को भी खो दिया। जिनकी हत्या एक सड़क निर्माण से जुड़े स्थानीय ठेकेदार ने अपने भाइयों के साथ मिलकर कर दी थी बाद में बीजापुर में उनका शव ठेकेदार के अहाते में स्थित सैप्टिक टैंक में मिला था।

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