संवेदना और शिल्प का कवि नासिर अहमद सिकंदर

जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में

अंजन कुमार

 

नासिर अहमद सिकंदर हिंदी के एक महत्वपूर्ण जनवादी कवि थे। जिनकी रचनाएं सामाजिक न्याय, प्रगतिशीलता और आम आदमी के जीवन से गहरे रुप में संपृक्त है। उनका जन्म 15 जनवरी 1961 को हुआ। बीएससी (गणित) करने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी करते हुए सेवानिवृत्त हुए। 29 दिसंबर 2025 को अचानक हृदयघात से उनका निधन हो गया।

इसके साथ ही उन्होंने 'कुछ साक्षात्कार' (प्रसिद्ध लेखकों के), 'बचपन का बाइस्कोप', 'प्रगतिशीलता की पैरवी' आदि आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी एवं केदारनाथ अग्रवाल तथा चन्द्रकांत देवताले पर केन्द्रित 'समकालीन हस्ताक्षर' पत्रिका के दो अंकों का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण आलेख, समीक्षाएं, रिपोर्ताज, फीचर आदि देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही।

दैनिक नवभारत में छत्तीसगढ़ के युवा कवियों की कविताओं पर आधारित स्तंभ 'अभी बिल्कुल अभी' एवं साक्षात्कारों पर केन्द्रित श्रृंखला 'आमने सामने' का संपादन कर छत्तीसगढ़ के कई नए कवियों को पहचान दिलाने के साथ ही हिंदी कविता की जमीन को निरन्तर समृद्ध करने का उल्लेखनीय कार्य किया। जो वे अपने अंतिम समय तक कवि संतोष चतुर्वेदी के ब्लाग 'पहली बार' के माध्यम से युवा कवियों की कविताओं पर नियमित टिप्पणी एवं प्रस्तुति के रूप जारी रखे हुए थे। उन्हें उनके रचनाकर्म के लिए प्रथम केदारनाथ अग्रवाल सम्मान एवं सूत्र सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

नासिर अहमद सिकंदर सामान्य जीवन की साधारण घटनाओं को आसाधारण दृष्टिकोण से देखने वाले बहुत ही संवेदनशील, बेचैन और प्रतिबध्द कवि थे। उनकी कविताएँ दैनिक जीवन की वस्तुओं, रिश्तों और घटनाओं से प्रेरित होती हैं। उनकी कविता में एक प्रकार की सादगी है जो पाठक को सहजता से जोड़ लेती है, लेकिन उस सादगी के पीछे गहन सामाजिक टिप्पणियाँ और मानवीय संवेदनाएँ छिपी होती हैं। वे कविता को जीवन का हिस्सा मानते थे।

इसलिए उनकी कविताओं में मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन, क्रियाओं, वस्तुओं, दृश्यों और घटनाओं में मानवता और इंसानियत की खोज, सामाजिक असमानता का विरोध, सांप्रदायिक सद्भाव, प्रकृति तथा दैनिक जीवन का अनुभव संसार विभिन्न रूपों में देखने को मिलता है। उनकी कविताएँ यह संदेश देती हैं कि मनुष्य प्रकृति का हिस्सा बनकर ही मानवता का निर्वाह कर सकता है।

उनकी कविताओं में वैश्विक राजनीति और घटनाएं एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभरती हैं। जो वैश्वीकरण, पूंजीवाद, नव साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सूक्ष्मता से चित्रित करती हैं, जहां स्थानीय अनुभव वैश्विक संदर्भों से जुड़ते हैं। जो वैश्विक आर्थिक दबाव से उत्पन्न सामाजिक संकट, विकृतियों और विसंगतियों की पड़ताल करती है। नव पूंजीवाद के बदलते हुए चरित्र को उजागर करते हुए वैश्विक आर्थिक गुलामी का प्रतिरोध करती है। उनकी कविताएँ वैश्विक दृष्टिकोण को समृद्ध करती है, जो आज के वैश्विक संकटों के संदर्भ में प्रासंगिक है। उनकी कविता हमें याद दिलाती है कि कविता मात्र सौंदर्य नहीं, बल्कि वैश्विक परिवर्तन का हथियार भी है।

उनकी कविता में उन सामाजिक आदतों की आलोचना है, जो अन्याय को सामान्य बनाती हैं। स्त्री उत्पीड़न, जातिवाद और दलित मुद्दों को छूती हैं। उनकी कविताएं सामाजिक समस्याओं की जीवंत अभिव्यक्ति हैं, जो पूंजीवाद, सांप्रदायिकता, गरीबी और अन्याय पर केंद्रित हैं। यह रचनाएं अपने समय-समाज की न केवल आलोचना करती हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की अपील भी करती हैं। सरल भाषा और प्रतीकों के माध्यम से वे आम आदमी की पीड़ा को आवाज देते हैं, जो हिंदी साहित्य में प्रगतिशील धारा को मजबूत करती हैं।

स्त्री जीवन की समस्याओं पर उन्होंने कई कविताएं लिखी हैं। जो स्त्री विमर्श की परंपरा से जुड़ती हैं। यह कविताएं न केवल स्त्री की पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती देती है, बल्कि लिंगगत भेदभाव, भ्रूण हत्या, घरेलू बंधनों और आर्थिक संघर्षों जैसी गंभीर समस्याओं को उजागर करती है। उनकी कविताएं स्त्री को घरेलू सीमाओं में बंधी हुई दिखाती हैं, जहां उनका श्रम अदृश्य रह जाता है, लेकिन उसके बिना जीवन ठहर जाता है।

जिसे वे बड़ी सूक्ष्मता से उकेरते हैं। उनकी रचनाओं में स्त्री का आर्थिक संघर्ष और पारिवारिक जिम्मेदारियां एक महत्वपूर्ण विषय हैं, जो परंपरा और प्रगति के बीच की खाई को दिखाती हैं। अनुकंपा में सर्विस करती परवीन बानो कविता इस समस्या को जीवंत रूप से प्रस्तुत करती है। वे स्त्री को पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि समाज की धुरी के रूप में दिखाते हैं, जो प्रगतिशील बदलाव की मांग करता है। उनकी रचनाएं स्त्री विमर्श को समृद्ध करती हैं, जहां स्त्री की अस्मिता को सामाजिक संदर्भ में रखा गया है।

जहां आर्थिक सशक्तिकरण अक्सर पारिवारिक संकटों से जुड़ा होता है और स्त्री की पहचान मां, बहन, पत्नी तक सिमट जाती है। उनकी प्रेम कविताएँ भी गहन प्रेम की कोमल अनुभूतियों के साथ स्त्री जीवन की समस्याओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

नासिर अहमद सिकंदर की कविताओं की भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यह सरल, बोलचाल की हिंदी है, जिसमें उर्दू के शब्दों का सहज मिश्रण है। वे दैनिक जीवन की भाषा को काव्य का माध्यम बनाते हैं। जिसके माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को जीवंत करते हैं। उनकी भाषा इतनी सहज है कि यह गद्य जैसी लगती है। जिसमें एक खास व्यंग्य का पुट भी है, जो सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करता है। वे भाषा के बर्ताव और प्रयोग के प्रति बहुत ही सजग कवि थे । बहुत कम शब्दों में व्यापक यथार्थ को पकड़ने की कला उनके काव्य शिल्प की किफायत और खासियत को दर्शाता है।

यह संरचना उन्हें छोटी-छोटी कविताओं में गहन अर्थ समाहित करने की स्वतंत्रता और कथा-तत्व भी प्रदान करती है। उनकी कविता एक घटना या विचार पर केंद्रित रहती हैं, और अंत में एक ऐसा ट्विस्ट या खुलासा करती है जो सामाजिक सत्य से टकराते हुए पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। उनकी कविता शब्दों से विचार तक पहुँचने की यात्रा है जिसमें पाठ का विशेष महत्व है।

दैनिक जीवन के बिम्ब कविता को जीवंत बनाते हैं। वे रंग, वस्तु और प्रकृति के बिंबों का उपयोग कर भावनाओं को व्यक्त करते हैं। उनके बिंब सरल हैं, लेकिन बहु-आयामी जो सामाजिक असमानता, स्त्री-संघर्ष और मानवीय संबंधों को उजागर करते हैं। उनकी कविताओं का शिल्प सरल भाषा, मुक्त संरचना, प्रभावशाली बिंब और सामाजिक संवेदना का मिश्रण।

वे दैनिक जीवन की साधारणता को काव्य की ऊंचाई देते हैं । जिसमें उनकी वर्गीय चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट रुप से दिखाई है। नासिर अहमद सिकंदर की कविताएँ हिंदी साहित्य को एक नई दिशा देती हैं, जहाँ कविता आम जन की जिंदगी से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है।

उनकी रचनाएँ सामाजिक न्याय, मानवता और सादगी की पैरवी करती हैं, जो आज के विभाजित समाज में और भी अधिक प्रासंगिक हैं। उनकी कविताएँ हमेशा जीवित रहेंगी, हमें याद दिलाती रहेंगी कि जीवन की सच्ची कविता साधारण में छिपी है। हिंदी कविता के इतिहास में वे एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं, जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी। उनके निधन ने एक महत्वपूर्ण जनवादी कवि खो दिया है । हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है ।

लेखक निजी कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर हैं और भिलाईनगर में निवासरत हैं।

 


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