क्या बौद्ध कल्याण समिति का कोई अध्यक्ष नहीं?

क्या कार्यालय में ताला लगा देना चाहिए?

डीपी नोन्हारे

 

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि कोई भी समाज या समिति यदि नियमों के बिना चले, तो वह कभी आगे नहीं बढ़ सकती। नियम इसलिए होते हैं ताकि व्यक्ति नहीं, व्यवस्था मजबूत हो। जहां नियम टूटते हैं, वहीं मनमानी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था जन्म लेती है।

बौद्ध कल्याण समिति का बायलॉज स्पष्ट रूप से कहता है कि समिति की सर्वोच्च शक्ति आमसभा/सामान्य सभा है और अध्यक्ष सहित पूरी कार्यकारिणी वैधानिक चुनाव द्वारा ही बनती है। किसी व्यक्ति की इच्छा, दबाव या जिद से न तो अध्यक्ष बनता है और न ही समिति चलती है।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि पंजीयक के पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि कांति फुले वर्तमान में समिति के वैधानिक अध्यक्ष नहीं हैं। जब पंजीयक स्वयं किसी व्यक्ति को अध्यक्ष नहीं मान रहा, तो समाज को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि अगर कोई अध्यक्ष ही नहीं है, तो वह किस नियम के तहत डॉ. आंबेडकर भवन की चाबी रख सकता है? 

किस अधिकार से आमसभा या बैठक बुला सकता है?

और किस वैधानिक आधार पर समिति के नाम से निर्णय ले सकता है?
पंजीयक का आदेश क्यों आया? समिति के पूर्व चुनाव और कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें पंजीयक कार्यालय में पहुंचीं।

जांच के बाद पंजीयक ने यह पाया कि-
चुनाव बायलॉज के अनुसार नहीं हुए, कार्यकारिणी वैधानिक रूप से सही नहीं थी.
इसी कारण पंजीयक ने जनवरी माह में समिति को निर्देश दिया (ना की अध्यक्ष को) निर्देश दिया कि—

नियमों के अनुसार नई कार्यकारिणी का गठन कर चुनाव कराए जाएं

इसके लिए जब आजीवन सदस्यों द्वारा गठित अस्थायी Interim) केंद्रीय कार्यकारिणी ने समिति की संपत्ति की सुरक्षा हेतु भवन में ताला लगाया, तो वह कार्य नियमसंगत और जिम्मेदारीपूर्ण है। जब तक वैधानिक अध्यक्ष और कार्यकारिणी का गठन नहीं हो जाता, तब तक समिति की संपत्ति की सुरक्षा करना अपराध नहीं, बल्कि कर्तव्य है।

सबसे बड़ा सवाल - जनवरी से दिसंबर तक चुनाव क्यों नहीं हुए?
यह समाज को स्वयं से पूछना चाहिए कि—
जब पंजीयक का आदेश जनवरी में आ चुका था। तो पूरे वर्ष चुनाव क्यों नहीं कराए गए? यदि समय रहते चुनाव हो जाते, तो आज न विवाद होता, न भ्रम।

न Interim समिति बनाने की आवश्यकता पड़ती। और आरोप शिकायत कार्यकर्ताओं पर लगाया जाता है. कोई भी शिकायत तब करता है जब कार्य नियमवृद्ध हो. अब एक और गंभीर प्रश्न जिस पर समाज को सोचना चाहिए—

समाज के द्वारा संचालित एम्बुलेंस का हिसाब किताब कहां हैं? जब समिति का स्वयं का बैंक खाता मौजूद है, तो समाज का चंदा व्यक्तिगत खातों में जाना किस नियम के तहत सही ठहराया जा सकता है?

यदि 7 वर्षों से समाज को स्पष्ट और सत्यापित हिसाब-किताब नहीं मिला है

तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि अपराध है. यह हमारे सामने गंभीर नैतिक और वैधानिक प्रश्न है। उपस्थित सदस्यों में से किसी ने यह सवाल नहीं पूछा की समिति को दान में मिली 325 कुर्सियां कहां गई अब यह नई कुर्सियां कौन दिया है. भवन से बहुत सारा सामान गायब दिखता है वह सब कहा गया. झंडे कहा गए. किताबें कहां गए यह किसी ने नहीं पूछा।

किसी ने उनसे हिसाब नहीं मांगा बस ताला लगा दिए ताला लगा दिए कहकर वर्तमान समिति को बदनाम कर दिए और पुलिस स्टेशन चले गए. सीनियर सिटीजन को बदनाम करने का मौका मिल गया.

समाज का पैसा सबसे पवित्र अमानत होता है। जो लोग इस अमानत का हिसाब देने से बचते हैं और जो लोग ऐसे व्यक्तियों का आज समर्थन कर रहे हैं, वे भी कहीं न कहीं इस पूरे मामले में मौन सहमति या सहभागिता में खड़े दिखाई देते हैं। हिसाब-किताब के मामलों में फँसे लोगों का समर्थन करना, स्वयं पर भी सवाल खड़े करता है।

समाज द्वारा दिए गए चंदे और सहयोग राशि का स्पष्ट, लिखित और सत्यापित हिसाब आज तक समाज के सामने नहीं रखा गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना वैधानिक पद के, बिना हिसाब दिए, कोई व्यक्ति समिति का संचालन कैसे कर सकता है?

एक और दुखद विषय यह है कि समाज की बात समाज में होने के बजाय थानों तक ले जाई जा रही है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और छोटी मानसिकता लगती है। छोटे मन और कमजोर तर्क वाले लोग ही समाज के अंदर के विषयों को पुलिस तक ले जाते हैं। 
यदि किसी को वास्तव में नियमों से आपत्ति थी, तो सबसे पहले उन्हें पंजीयक कार्यालय जाना चाहिए था, न कि समाज को बदनाम करने के लिए थाना राजनीति करनी चाहिए थी।

Interim (अस्थायी) केंद्रीय कार्यकारिणी क्यों बनी?

जब यह स्पष्ट हो गया कि—तत्कालीन अध्यक्ष कांति फुले जी द्वारा चुनाव नहीं कराए गए। पंजीयक का आदेश लंबित पड़ा रहा। संस्था वैधानिक संकट में फँस गई।

तो आजीवन सदस्यों ने मजबूरी में एक अस्थायी (Interim) केंद्रीय कार्यकारिणी बनाई। यह समिति—स्थायी नहीं है, चुनाव लडऩे नहीं आई है, सत्ता पर कब्जा करने नहीं आई है। इसका एकमात्र उद्देश्य है:

पंजीयक के आदेश का पालन कराना, आमसभा बुलाना, निष्पक्ष और वैधानिक चुनाव कराना। कानून में इसे Doctrine of Necessity (आवश्यकता का सिद्धांत) कहा जाता है।

इसीलिए, जब पंजीयक के आदेश के बावजूद समय पर चुनाव नहीं कराए गए और समिति वैधानिक संकट में फँस गई, तब मजबूरी में Interim केंद्रीय कार्यकारिणी बनाई गई। यह समिति न सत्ता की भूखी है, न स्थायी रहने आई है। इसका एकमात्र

उद्देश्य है—
नियमों के अनुसार आमसभा बुलाना,
चुनाव कराना।

और समिति को लोकतांत्रिक एवं पारदर्शी व्यवस्था में वापस लाना। समाज को यह समझना होगा कि Interim  समिति स्थायी कार्यकारिणी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुन: स्थापित करने का एक माध्यम है। यह व्यवस्था आवश्यकता के सिद्धांत के तहत बनी है, न कि किसी व्यक्ति या समूह के स्वार्थ के लिए।

समाज से विनम्र अपील है कि भावनाओं, व्यक्तिगत निष्ठा और भ्रम से ऊपर उठकर नियम, जवाबदेही और पारदर्शिता के साथ खड़ा हो। क्योंकि पद व्यक्ति से बड़ा नहीं होता, और समाज किसी एक व्यक्ति से नहीं, नियमों से चलता है।

अंतिम निर्णय आमसभा और वैधानिक चुनाव से ही होगा न कि दबाव, डर या अवैधानिक दावों से यही संविधान की बात है। यही बाबा साहब का रास्ता है।

Interim (अस्थायी) समिति क्या होती हैं:

Interim समिति कोई स्थायी कार्यकारिणी नहीं होती। यह तब बनाई जाती है, जब कोई संस्था वैधानिक संकट में फँस जाती है — जैसे चुनाव न होना, अध्यक्ष वैध न रहना या पंजीयक के आदेश का पालन न होना।

बहरहाल समिति के पूर्व चुनाव और कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें पंजीयक कार्यालय में पहुंचीं। जांच के बाद पंजीयक ने यह पाया कि चुनाव बायलॉज के अनुसार नहीं हुए तथा कार्यकारिणी वैधानिक रूप से सही नहीं थी। यदि स्थिति यही रही तो इस तरह सामाजिक संगठनों में अराजकता पसर जाएगी।

लेखक बौद्ध कल्याण समिति के आजीवन सदस्य हैं।

 


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