फोटो फ्रेम में सत्ता, फुटनोट में जनता

यानि सरकारी फाइल से कॉरपोरेट फोल्डर तक की यात्रा

सत्यप्रकाश पांडेय

 

यहां सत्ता और ताक़तवर लोग केंद्र में हैं। दूल्हा है —अमन सिंह (रिटायर्ड आईआरएस ) का बेटा । अमन सिंह, छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह की सरकार में सर्वशक्तिमान मुख्य सचिव रहे। राज्य की राजनीति जिनकी भौंहों की हरकत से दिशा तय करती थी और नौकरशाही जिनसे नज़र मिलाने से पहले कैलेंडर देखती थी। रिटायर हुए तो देश के सबसे ताकतवर पूंजीपतियों में शुमार अडानी समूह से जुड़ गये। यानि सरकारी फाइल से कॉरपोरेट फोल्डर तक की यात्रा, बिना किसी ब्रेकडाउन के।

इतने प्रभावशाली व्यक्ति के बेटे की शादी हो और सरकार बहादुर न पहुँचे — ऐसा सोचना लोकतंत्र के विरुद्ध है। दिल्ली दरबार से लेकर अलग-अलग सूबों के सियासतदान, चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में। सब बारात में शरीक हुये। इस महफ़िल में वे पत्रकार भी मौजूद थे जो सत्ता और पूंजी के बीच पुल नहीं — फ्लाईओवर की भूमिका में हैं। ख़ुशनुमा माहौल में कैमरे क्लिक होते रहे, इतिहास सुरक्षित होता रहा और इन सबके बीच सैकड़ों सवाल कहीं बाहर छूट जाते हैं।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई यह शाही शादी आज के संदर्भ में इसलिए खास है क्योंकि तस्वीर में जो हँसी है वह छत्तीसगढ़ की हालिया सूरत से सीधा टकराती है। तस्वीर के केंद्र में — गौतम अडानी है। उनके इर्द-गिर्द — छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, दिल्ली दरबार के बड़े नेता राजीव प्रताप रूड़ी, संगठन की कमान से सियासी अखाड़े में तीरंदाजी करने वाले सौदान सिंह, पूर्व सांसद और भाजपा की प्रभावशाली नेत्री सरोज पांडेय के अलावा सत्ता की निरंतरता के अन्य गवाह बैठे हैं।

यह पारिवारिक फोटो नहीं है। यह उस गठजोड़ का सामूहिक चित्र है जो चुनावों से नहीं बदलता। कहावत यूँ ही नहीं बनी — सियासत और पूंजीपतियों का हनीमून कभी खत्म नहीं होता। यह रिश्ता सात फेरों से नहीं, नीतियों, परियोजनाओं और एमओयू से बंधा होता है। यहाँ जनता की भूमिका साफ़ है, वह सिर्फ फोटोग्राफ़र है। वो तस्वीर खींचती है, जो हमेशा फ्रेम से बाहर रहती है। सरकारें बदलती हैं, घोषणापत्र बदलते हैं, नारे बदलते हैं लेकिन निवेशक वही रहते हैं। बस कुर्सी के सामने बैठने वाला चेहरा बदल जाता है।

शादी समारोह में भोजन की मेज पर जमी सत्ता और पूंजी की यह महफ़िल आगे और कितने गुल खिलाएगी यह भविष्य नहीं, बस्तर तय करेगा। फिलहाल तो राज्य के जंगल, खासकर हसदेव इस तस्वीर को देखकर सिहर रहा हैं। छत्तीसगढ़ के जंगल इन दिनों किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि तथाकथित विकास पुरुषों की दृष्टि से सबसे अधिक संकट में हैं। फर्क बस इतना है कि इस आपदा को सरकारी फाइलों में “परियोजना”, कॉरपोरेट प्रस्तुतियों में “निवेश” और मीडिया की सुर्खियों में “रोज़गार सृजन” कहा जा रहा है। इनके लिये जंगल अब पेड़ों का समूह नहीं “अवरोध” बन चुके हैं। नदियाँ जीवनदायिनी नहीं बल्कि “अनुपयोगी संसाधन” हैं। आदिवासी समाज संस्कृति नहीं, बल्कि “पुनर्वास की समस्या” है और वन्यजीव ? वे तो विकास के रास्ते में आने वाले आंकड़े भर हैं।

जिस देश में संविधान ने आदिवासियों को जंगलों का संरक्षक माना, उसी देश में उन्हें अपने ही घर में अवैध घोषित किया जा रहा है। ग्राम सभा की सहमति अब एक औपचारिक मुहर भर है, जिसे परियोजना की गति के अनुसार लगाया या हटाया जा सकता है। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सदियों तक जंगल बचाया, वे आज “वन भूमि पर अतिक्रमणकारी” कहलाते हैं, और जिनका जंगल से रिश्ता सिर्फ मुनाफ़े का है, वे विकास दूत बन गये हैं।

जब तस्वीरों में सब बहुत सुरक्षित, बहुत खुश और बहुत संतुष्ट दिखें तो समझ लीजिए कहीं न कहीं कोई जंगल कट चुका है, कोई नदी दम तोड़ चुकी है और कोई आदिवासी पुनर्वास के वादे में गायब हो चुका है। यह मुलाक़ात शिष्टाचार की मिसाल भी हो सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों, नदियों और ज़मीनों को विकास की रफ्तार में समय से भी तेज़ चलते देखकर मुझे तो डर लगता है। आपका पता नहीं...

 


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