एक गीत को लेकर संसद में दस घंटे की बहस हो रही है...
'वन्दे मातरम' राष्ट्रीय आंदोलन का नारा बन गया
प्रेमकुमार मणिउन्नीसवीं सदी के एक गीत को लेकर संसद में दस घंटे की बहस हो रही है. गीत है वन्दे मातरम, जिसे बंकिमचंद्र ने 1875 में लिखा और सात वर्ष बाद लिखे अपने उपन्यास ' आनंदमठ ' में पिरोया. बाद में यह गीत, खास कर इसकी पहली पंक्ति ' वन्दे मातरम ' राष्ट्रीय आंदोलन का नारा बन गया. वन्दे मातरम का उद्घोष करते हुए जाने कितने लोग जेल गए, फांसी के फन्दों पर झूल गए. यह सच्चाई का एक पहलू है.
अब पूरी पृष्ठभूमि पर एक विहंगम दृष्टि डालें. भारत में ब्रिटिशराज सबसे पहले बंगाल में आया. 1757 में हुए पलाश वन के युद्ध में सिराजुदौला की फौज ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी-सी फौजी टुकड़ी से पराजित हो गई. इसके साथ ही कंपनी राज का सिलसिला यहाँ शुरू होता है. इसके ठीक इकसठ साल बाद भीमा-कोरेगांव की लड़ाई (1818 ) में पेशवा सेना को पराजित कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस इलाके में अपना झंडा फहराया था.
पलासी युद्ध में हारने वाले मुसलमान और अन्य बहादुर लोग थे, भीमा कोरेगांव में हारने वाले मराठा और अन्य तथाकथित बहादुर नस्ल के लोग. प्रतीक के तौर पर एक जगह मुस्लिम पराक्रम, तो दूसरी जगह ब्राह्मण-मराठा पराक्रम पराजित हुआ था. दोनों जगह जीतने वाले अंग्रेज थे.
लेकिन उपरोक्त कथन अर्ध सत्य है. पलासी और भीमा- कोरेगांव में अंग्रेजों का नेतृत्व था लेकिन लड़ाके मुख्यतः दलित जाति के लोग थे. पलासी में दुसाध और भीमा कोरेगांव में महार जाति के लोग. पलासी युद्ध के बारे में मुझे पहली दफा नंदकिशोर तिवारी के सम्पादन में चाँद पत्रिका के अछूत अंक से जानकारी मिली कि पलासी में ईस्ट इंडिया कंपनी सेना में मुख्यतः दुसाध लोग थे.
भीमा-कोरेगांव का इतिहास पहली बार भीमराव आंबेडकर ने रेखांकित किया. वहाँ अंग्रेजों द्वारा स्थापित विजय स्तम्भ को बाबा साहेब ने दलित शौर्य का स्तम्भ बताया. भारत में आम तौर पर माना जाता था कि कुछ मार्शल रेस होते हैं. केवल वही लोग असली लड़ाके होते हैं. उपरोक्त दोनों लड़ाइयों के नतीजों ने इस मिथ को ध्वस्त कर दिया था. यह इतिहास को देखने की अपनी-अपनी समझ है.
पलासी युद्ध को हमारे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने ऐसे देखा है मानो सिराजुदौला महान था और उसकी पराजय भारतीयता की पराजय थी. यह भी कि उसे छल और धोखे से पराजित किया गया. यह इतिहास उन लोगों ने ही तैयार किया है जो मार्शल रेस की अवधारणा के प्रवक्ता रहे हैं. गलती यहीं से आरम्भ होती है.
बंकिम, जोतिबा फुले और आम्बेडकर भारत में अंग्रेजों के आने को तनिक पृथक अंदाज में देखते हैं. कार्ल मार्क्स ने भी लगभग इसी तरह भारतीय इतिहास को देखा था. मार्क्स के अनुसार भारत में ब्रिटिश राज, इतिहास का अवचेतन साधन था.
जो स्थितियां भारत में अंग्रेजों के आने के पूर्व थीं उसके लिए जिम्मेदार कौन थे ? यहाँ के तत्कालीन शासक ही तो. ये शासक कौन थे ? मुसलमानों और हिन्दुओं का कुलीन तबका. असरफ मुसलमान और द्विज हिन्दू. सच्चाई यही है कि पलासी और कोरेगांव में इन्हीं असरफ मुसलमानों और द्विज हिन्दुओं की पराजय हुई थी. जीत दबे हुए भारतियों की हुई थी.
बंकिम अपनी बात नहीं कर रहे थे. वह बंगाल के बहुसंख्यक हिन्दुओं की बात कर रहे थे- जो मुस्लिम राज से तबाह और अपमानित थे. बंगाल में इसके प्रति एक दबा-दबा विद्रोह था. अंग्रेजों ने जब मुस्लिम शासकों को पराजित किया तो वहाँ की बहुसंख्यक हिन्दू जनता को संतोष का अनुभव हुआ. ऐसा ही संतोष पेशवा राज के पतन के बाद जोतिबा फुले और आंबेडकर को हुआ था. फुले ने ब्रिटिश राज में शूद्रों की और बंकिम ने ब्रिटिश राज में हिन्दुओं की मुक्ति देखी थी.
बंकिम वही सांस्कृतिक उद्घोष बंगाल में कर रहे थे, जो जोतिबा महाराष्ट्र में कर रहे थे. मुझे बंकिम और फुले में एक साम्य दीखता है. इन्हें समझना चाहिए. मोदी जी इस की कुछ व्याख्या कर सकें तो अच्छी बात होगी.
वन्दे मातरम गीत आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा है. उपन्यास उस सन्यासी विद्रोह को लेकर है जो बंगाल के मुस्लिम राज के विरुद्ध था. उपन्यास है तो कुछ प्रतीकों में भी बात होनी स्वाभाविक है. उपन्यास के आखिर में एक दिव्य-पुरुष प्रकट होता है. मुस्लिम राज का अंत हो गया है, लेकिन अंग्रेज राज शुरू हो गया है. विद्रोह का मुखिया दिव्य-पुरुष से कहता है- क्या अब अंग्रेजों से संघर्ष किया जाए?' दिव्य पुरुष कहता है- " नहीं, अंग्रेज मित्र राजा हैं. "
बंगाल के बंकिम अंग्रेजों को मित्र राजा कहते हैं और महाराष्ट्र के तिलक हर हाल में जल्दी से जल्दी अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर करना चाहते हैं. यह अंतर्विरोध क्यों है ? क्या यही अंतर्विरोध बीसवीं सदी के आरम्भ में उभरे भारतीय राष्ट्रवाद की पहली अंगड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मॉडरेट और रेडिकल गुटों में नहीं दिख रहा था ? बंगाल के राष्ट्रवादी और महाराष्ट्र के सामाजिक सुधारवादी शक्तियां यदि कांग्रेस में मॉडरेट मंच पर एकजुट थीं, तो इसके कारण थे.
ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद और इस्लामी साम्राज्यवाद की एकजुटता तीव्र ब्रिटिश विरोध में एकजुट होती दिखती है. 1857 के विद्रोह को अंग्रेजों ने मुसलमान शासकों और पेशवाओं का मिला-जुला विद्रोह माना था. मुसलमानों और पेशवाओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाने के बाद एक बार फिर उनका राज बहाल हो जाएगा. सावरकर ने इस पर अपनी किताब यूँ ही नहीं लिखी थी. हर चीज के पीछे कुछ अवचेतन शक्तियां काम करती हैं.
बंकिम का उपन्यास आनंदमठ मुझे महत्वपूर्ण लगता है. इस पर अन्यत्र लिखा है अतएव विस्तार से यहाँ नहीं लिखूंगा, किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि यह बंगदेशीय राष्ट्रवाद का प्रथम उच्छ्वास था. बंकिम इस उपन्यास में हिन्दू समाज के जातिवाद का विरोध और अंतर्जातीय विवाहों का समर्थन करते दीखते हैं.
वह इस्लामी सांस्कृतिक संकट से रू ब रू होते हुए कुछ वैसा ही विमर्श खड़ा करने की कोशिश करते हैं जैसा ईरान के फिरदौसी ने अरबी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी कृति शाहनामा में किया है. मुझे अनुभव होता है बंकिम यदि बंगभंग आंदोलन से गुजरे होते तो उनकी भी दृष्टि रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास गोरा की तरह होती. रवीन्द्रनाथ का गोरा मुझे आनंदमठ के विकास के रूप में दीखता है.
गाँधी और नेहरू को भारतीय राष्ट्रवाद को आधुनिक बनाने केलिए बहुत संघर्ष करना पड़ा. इस में बहुत बाद में फुले, आम्बेडकर की समझ को शामिल किया गया. आम्बेडकर ने यदि ब्राह्मणवादी हिन्दू सामाजिक दृष्टिकोण को आधुनिक समझ केलिए खतरनाक माना है तो दकियानूसी इस्लामी सोच को भी.
लेकिन कुछ लोग इस्लामी मिथ्याचार का विरोध और ब्राह्मणवादी मिथ्याचार पर चुप्पी साधते हैं, या इसके विपरीत दिनरात ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले लोग इस्लामी पाखण्ड पर चुप रहते हैं, तो उनका पाखंड दीखता है.
वन्दे मातरम को आज संसद में बहस का विषय बनाने का निहितार्थ क्या है ? इसे प्रधानमंत्री मोदी को बताना चाहिए. इसे संविधान सभा ने राष्ट्र गीत के तौर पर स्वीकार किया हुआ है. यदि कोई इसका विरोध करता है तो वह संविधान का विरोध करता है और उसकी यदि कुछ सजा है तो उसे मिलनी चाहिए. और यदि विमर्श होना है तो वह खुले में हो. संसद की तंग जगह में नहीं.
इस पर इतिहास के मान्य विद्वानों के विचार आमंत्रित होने चाहिए. इससे हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ अनछुए आयाम हमारे समक्ष उद्घाटित हो सकेंगे. इससे हमारे राष्ट्रीय जीवन को ताकत भी मिलेगी. लेकिन उद्देश्य समाज को बनाना होना चाहिए, उसे परिमार्जित करना है, तोड़ना नहीं है, विखंडित नहीं करना है.
प्रधानमंत्री मोदी जब 2014 के चुनावों के पूर्व बिहार दौरे पर आए थे तब उन्होंने कहा था क्या हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ेंगे या दोनों मिल कर गरीबी और बेबसी से लड़ेंगे. इस पर जोरदार तालियों द्वारा उन्हें जनसमर्थन मिला था. मोदी जी को उस परिदृश्य का ख़याल करना चाहिए. तमाम भारतवासियों के बीच समानता, भाईचारा और आज़ादी के भाव अधिक से अधिक विकसित हों इसकी कोशिश हमें करनी है. कोई नया वितंडा करना गलत बात है.

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