आज लोकतंत्र का पतन बैलेट बॉक्स से शुरू होता है

उन्होंने रूस के सब से अमीर इक्कीस उद्योगपतियों को क्रेमलिन में न्योता दिया

प्रेम कुमार मणि

 

Steven Levitsky और Daniel Ziblatt हार्वर्ड युनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं. लेवित्स्की संयुक्त राज्य अमेरिका और लैटिन अमेरिकी देशों की राजनीतिक घटनाओं के विशेषज्ञ हैं तो ज़िब्लाट यूरोपीय देशों के. दोनों की संयुक्त तौर पर लिखी गई एक किताब है How Democracies Die . इस किताब का हिन्दी अनुवाद किया है अभिषेक श्रीवास्तव ने, नाम दिया है ' लोकतंत्र की चौकीदारी .'

राजकमल ने इसे बस इसी वर्ष प्रकाशित किया है. थोड़ी अस्वस्थता के बावजूद कल और आज की भोर इसी किताब के साथ रहा. इससे गुजरना बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की राजनीतिक घटनाओं के बीच से गुजरने का एहसास देता रहा, इसलिए तनिक वैचारिक उत्तेजना का भी अनुभव होता रहा.

किताब के शीर्षक का सीधा-सीधा अनुवाद बनता था ' लोकतंत्र कैसे मर रहा है'. मैं समझता हूँ यह शीर्षक हिन्दी केलिए भी अधिक उपयुक्त था. लेकिन बात यह भी होगी कि नाम में क्या रखा है. बात कंटेंट की होनी चाहिए.

यह किताब हमें समकाल की उन चुनौतियों की तरफ ले जाने की कोशिश करती है, जिन से हम जान कर भी अनजान हैं. पिछली शताब्दियों में हम सब ने जिस लोकतंत्र और उस से सम्बद्ध मूल्यों को स्थापित किया था, देखा जा रहा है वे एक- एक कर बिखर रहे हैं. हम लम्बे समय तक इटली के मुसोलिनी और जर्मनी के हिटलर की फासिस्ट और नाज़ी राजनीति का उदाहरण देते रहे हैं.

लेकिन 1973 में चिली में साल्वाडोर अलेंदे, जो चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति थे, को जब अमेरिकी सह पर उसके ही जनरल ऑगस्टो पिनोशे ने घेर कर मार डाला था, तब उससे भी बड़ी दुर्घटना हुई थी, जो फासिस्ट और नाज़ी हुक्मरानों ने की थी. आज हम चिली की उस घटना को भूल गए हैं. यह अकारण नहीं है.

वस्तुतः हमें कुछ भी ऐसा पढ़ना या जानना नहीं है, जो आज के हुक्मरानों के प्रतिकूल हो. मुसोलिनी या हिटलर की कथाओं से आज के हुक्मरान उतने परेशान नहीं होते जितने अपने समकाल की राजनीति और उससे जुडी घटनाओं के विश्लेषण से होते हैं.

यह किताब हमें सन्युक्त राज्य अमेरिका, लैटिन अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों की राजनीतिक घटनाओं का एक त्वरित विश्लेषण प्रस्तुत करती है. हमें बताती है कि आपके इर्द-गिर्द लोकतंत्र के बैनर लगा कर किस तरह तानाशाही चल रही है. अमेरिका जैसे देश में जहाँ आज़ादी और लोकतंत्र को लेकर अठारहवीं सदी में उतना बड़ा संघर्ष हुआ और संविधान के तहत एक व्यवस्थित लोकतंत्र स्थापित किया गया, आज ट्रम्प क्या और कैसे कर रहे हैं.

रूस में पुतिन क्या कर रहे हैं. वेनेजुएला में चावेज़ और तुर्किये में एर्दोगान के किस्से कैसे हैं, हम शायद नहीं जानना चाहते. इन सभी मुल्कों में लोकतंत्र के मरने की कहानी का एक सिलसिला है. तानाशाहों ने लिबास बदल ली है. उन्हें फासिज़्म या नाज़िज्म के आवरण की जरूरत नहीं होती. लोकतंत्र और पारम्परिक संविधानों के साये में ही इन सब की तानाशाही चलती है.

लीजिए पुस्तक का एक टुकड़ा आपके सामने रखता हूँ : -

" आजकल लोकतंत्र इसी तरह से मरते हैं. नंगी तानाशाही अब तक़रीबन पूरी दुनिया से गायब हो रही है, चाहे वह फासीवाद के रूप में हो, साम्यवाद के रूप में हो, साम्यवाद के रूप में या फौजी राज के रूप में. अब सैन्य तख्तापलट और सत्ता कब्जाने के अन्य हिंसक तरीके भी कम ही देखने में आते हैं. ज्यादातर देशों में नियम से चुनाव होते हैं. लोकतंत्र आज अलग तरीके से मरते हैं.

शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से ज्यादातर लोकतान्त्रिक सरकारों का पतन जनरलों या फौजियों के हाथों नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकारों के हाथों हुआ है. वेनेजुएला, में चावेज़ की तरह ही जार्जिया, हंगरी, निकारागुआ,पेरू, फिलीपींस, पोलैंड, रूस, श्रीलंका, तुर्की और यूक्रेन में वहाँ के निर्वाचित नेताओं ने लोकतान्त्रिक संस्थाओं को नष्ट किया है. आज लोकतंत्र का पतन बैलेट बॉक्स से शुरू होता है. ' (पृष्ठ 13)

एक समय था जब हिटलर ने राइश्टैग में आग लगने की घटना को एक बहाना बना कर अपने सारे विरोधियों को हमेशा केलिए ख़त्म कर दिया था. किन्तु आज किसी भी आर्थिक संकट, प्राकृतिक विपदा, आतंकवादी हमलों या और कुछ नहीं तो छोटी-मोटी बगावत को ध्यान में रख कर लोकतंत्र का गला घोंटना आम बात हो गई है. भ्रष्टाचार को रोकने वाली सरकारी संस्थाओं के द्वारा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना जैसी घटनाएं हर देश में आम हो रही हैं. रूस में पुतिन ने अपने फासीवाद का नया व्याकरण तय किया है. देखिए पुस्तक का एक अंश -

" जुलाई 2000 में, पुतिन को राष्ट्रपति बने तीन महीने भी नहीं हुए थे कि उन्होंने रूस के सब से अमीर इक्कीस उद्योगपतियों को क्रेमलिन में न्योता दिया. पुतिन ने इन सब को बताया कि वे उनकी नाक के नीचे चाहे जितना पैसा बनाने को आज़ाद हैं, लेकिन तभी यदि वे राजनीति से दूर रहेंगे. ज्यादातर कुलीन रईसों ने तो उनकी बात मान ली, लेकिन ओआरटी टी वी के अरबपति मालिक बोरिस बेरेजोव्स्की ने नाफरमानी कर दी.

जान ओआरटी की कवरेज में पुतिन की आलोचना होने लगी, तब सरकार ने उसके खिलाफ एक बहुत पुराना फर्जीवाड़े का मुकदमा दुबारा खोल दिया और बोरिस की गिरफ्तारी का आदेश निकाल दिया. बेरेजोव्स्की अपना मीडिया अपने एक कनिष्ठ सहयोगी के भरोसे छोड़ कर निर्वासन में चले गए. उस सहयोगी ने ससम्मान सब कुछ पुतिन के क़दमों में ला कर रख दिया. एक और रईस ने पुतिन की नाफरमानी की थी.

वे विशालकाय तेल कम्पनी युकोस के मालिक मिखाइल खोदोरकोव्स्की थे. फ़ोर्ब्स की पत्रिका की अरबपतियों की सूची में 15 अरब डालर की परिसम्पत्ति के साथ खोदोरकोव्स्की रूस के सब से धनी व्यक्ति थे. माना जाता था कि उन्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता, लेकिन उन्होंने एक गलती कर दी थी. लिबरल होने के नाते वह पुतिन को पसंद नहीं करते थे, तो उन्होंने विपक्षी दलों को उदारता के साथ चंदा देना शुरू कर दिया था.

एक समय ऐसा आया जब रूस की संसद डूमा के सौ सदस्यों ने खोदोरकोव्स्की पर दांव लगा दिया और अफवाह फ़ैल गई कि वह राष्ट्रपति पद की दौड़ में खड़े होने वाले हैं. खतरे को सूंघते हुए 2003 में पुतिन ने कर चोरी, धोखाधड़ी और गबन के आरोप में खोदोरकोव्स्की को गिरफ्तार करवा दिया.

करीब एक दशक तक उन्हें गिरफ्तार रखा गया. रूस के अमीरों को इस गिरफ्तारी से स्पष्ट सन्देश जा चुका था राजनीति से दूर रहना है. फिर किसी ने ऐसी हिमाकत नहीं की. नतीजा हुआ संसाधनों के अभाव में विपक्षी दल कमजोर होते चले गए, कुछ तो खत्म ही हो गए. " (पृष्ठ 104)

हमारे देश भारत में क्या यह सब, या इससे मिलती-जुलती घटनाएं हो रही हैं ? मैं नहीं जानता. मेरे बहुत सारे मित्र कहते हैं कि यह सब केवल विदेशों में होता है. हमारे देश में सब कुछ पवित्रता के साथ होता है. चुनाव से लेकर प्रशासनिक कार्यों तक में पूरी पारदर्शिता होती है. हमारे प्रधानमंत्री ने अभी कुछ ही समय पूर्व तो रामराज की ध्वजा फहराई है, ठीक उसी भावुक अंदाज में जैसे कभी जवाहरलाल जी ने तिरंगा को लाल किले पर 15 अगस्त 1947 को फहराया था.

गांधीजी ने जिस रामराज का स्वप्न देखा था, उसे मोदी जी ने पूरा किया है. हमारे पत्रकार-लेखक-कवि ' मूँदहु आँख कतहुँ कछु नाहीं ' की मनोदशा वाले हैं. इन्हें उतना ही दीखता है, जितना रामजी चाहते हैं. लेकिन लेवित्स्की और ज़िबलाट ने देखा है कि सांस्कृतिक शख्सियतों के साथ वहाँ क्या होता है. देखिए उनके ही उद्धृत अंश :

" चुने हुए तानाशाह सब से अंत में सांस्कृतिक शख्सियतों का मुँह बंद कराते हैं. इनमें ऐसे कलाकार, बुद्धिजीवी, पॉप सितारे, या खिलाड़ी हो सकते हैं जो बहुत लोकप्रिय हों या फिर जिनकी विश्वसनीयता ऐसी हो कि सरकार केलिए वे खतरा बन जाएँ.

अर्जेंटीना के साहित्यकार होर्हे लुइस बोर्गेस जब पेरोन के आलोचक बन कर उभरे तब सरकार ने तबादला कर डाला. पहले वह म्युनिसिपल लाइब्रेरी में कार्यरत थे. लेकिन जहाँ उन्हें भेजा गया, बोर्गेस के शब्दों में वह ' कुक्कुट और खरगोशों की इंस्पेक्टरी ' थी. बोर्गेस ने इस्तीफा दे दिया. महीनों तक उन्हें नौकरी नहीं मिली. " ( पृष्ठ 105 )

शायद मैं भावावेग में उद्धरणों की भरमार लगाता जा रहा हूँ. निःसंदेह यह खराब बात है. लेकिन मैं चाहूँगा मेरे देश के अधिक से अधिक लोग इस किताब को पढें और देखें कि क्या हमारे यहाँ भी लोकतंत्र धीरे-धीरे मर तो नहीं रहा है? न केवल सत्ता अपितु विपक्ष की राजनीति और राजनेता भी गैर-उत्तरदायी और बेलगाम हो गए हैं. अनेक राजनेताओं ने राजनीति को धन्धा बना लिया है.

राजनेताओं की विलासितापूर्ण जीवनशैली के किस्से आम तौर पर सुने जा सकते हैं. उनके महलों, उनकी नामी-बेनामी सम्पत्तियों के किस्से कहीं भी सुने जा सकते हैं. ऐसे राजनेता लोकतंत्र की कितनी पहरेदारी कर सकेंगे! इनके बीच से कोई तानाशाह बहुत आराम से उभर सकेगा.

 


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