अनार्य शिव (पशुपति) का कैसे आर्यीकरण-ब्राह्मणीकरण किया गया

शिव संपत्तिहीन और संसाधनहीन हैं

सिद्धार्थ रामू

 

अनार्य समाज और संस्कृति पर आर्यों ने दो तरह से कब्जा जमाया। आक्रामक हथियारबंद हमला बोलकर और उनकी हत्याएं करके। बाल्मीकि रामायण, महाभारत और रामचरित मानस में इन असंख्य अनार्य बस्तियों को जलाने उनकी हत्या करने और उन्हें युद्ध में छल-बल और धोखे से पराजित करने की सैकड़ों कहानियां भरी बड़ी हैं। कई पुराण इन्हीं हमलों और कब्जों की कहानियों के इर्द-गिर्द लिखे गए हैं।

क्या प्रमाण हैं कि शिव ( पशुपति) अनार्य-द्रविड़ थे-

पुशपति ( शिव) का वर्ण-जाति,कुल-वंश और माता-पिता का पता नहीं है-

1- शिव किस वंश, कुल, वर्ण-जाति में पैदा हुए थे, यह ज्ञात नहीं है। जबकि आर्यों-ब्राह्मणों के सबसे बड़े अराध्य (ईश्वर) दशरथ पुत्र राम और दूसरे नबंर के कृष्ण का वर्ण-जाति, कुल, वंश बकायदा स्थापित किया गया है। आर्य-ब्राह्मण संस्कृति में वर्ण-जाति की पहचान सबसे बड़ी पहचान है। राम ईक्ष्वाकु वंश के हैं, क्षत्रिय वर्ण में पैदा हुए हैं, दशरथ और कौशल्या के पुत्र हैं।

राम और कृष्ण के विपरीत शिव आदिम हैं। उनका कोई कुल, वंश, वर्ण-जाति और निश्चित-माता पिता नहीं हैं। आर्य-ब्राह्मण परंपरा का यह सबसे बड़ा मूल आधार शिव में अनुपस्थित है। अनार्यों में वर्ण-जाति आधारित श्रेष्ठता और निकृष्टता की कोई व्यवस्था ही नहीं थी।

शिव किसी राजवंश में जन्म नहीं लिए-

2- आर्यों-ब्राह्मणों-हिंदुओं के सबसे बड़े आराध्य (ईश्वर) राम ईक्ष्वाकु राजवंश में ( राजा) के यहां पैदा लेते हैं। कृष्ण यदुकुल में जन्म लेते हैं। उनका भी एक राज्य और राजवंश है। ये दोनों खुद एक राजवंश के वारिस भी हैं और राजा भी बनते हैं। इसके विपरीत शिव किसी राजवंश में पैदा नहीं होते हैं। राजवंश कौन कहे, किसी अभिजात्य या कुलीन परिवार में भी जन्म नहीं लिए हैं। उनमें इस तरह की विशिष्टता का कोई तत्व नहीं है। कभी राजा या राजकुमार नहीं रहे।

शिव संपत्तिहीन और संसाधनहीन हैं-

3- राम और कृष्ण दोनों एक बड़े राजकाज और संपत्ति और साधन के मालिक हैं। दोनों का एक क्षेत्र पर राज्य है, दोनों बाद में राजा बनते हैं। विलासी जीवन जीने के सारे साधन मौजूद हैं और वे वैसा जीवन जीते भी हैं। शिव संपत्ति और साधनहीन हैं। उनके पास कोई निजी संपत्ति नहीं है। अधिकांश शिव मंदिर या शिव लिंग पर जो चढ़ाव चढ़ता है, वह चावल, धूतरा, बेल का पत्ता, कुछ फूल और पानी आदि होता है। हां शिव के कुछ एक मंदिर ही ऐसे हैं,जहां उनका ब्राह्मणीकरण करके उन्हें संपत्तिशील बनाय गया।

शिव के कपड़े-लत्ते और वाहन-

4- राम और कृष्ण को देखिए,दोनों हमेशा सजे-धजे रहते हैं। चमकादार, भव्य और उत्कृष्ट वस्त्र धारण किए रहते हैं। उनके मंदिर भी सजे-धजे होते हैं। कई मंदिरों में तो ये सोने के मुकुट पहने रहते हैं, यहां तक सोने के वस्त्र भी। इसके विपरीत शिव नहीं के बराबर वस्त्र पहनते हैं, सिर्फ इतने जिससे काम चल जाए। उनके सिर पर शायद ही कोई मुकुट हो। भव्य, उत्कृष्ट , चमकादार और सोने-चांदी के वस्त्रों के लिए उनके यहां कोई जगह नहीं है।

शिव और राम-कृष्ण का वाहन-

5- राम जन्म ही राज महल में लेते हैं। हमेशा रथ पर सवार हैं,यहां तक कि पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते हैं। कृष्ण रथी और महारथी हैं। इसके विपरीत शिव का वाहन बैल है।

शिव के संगी-साथी-

6- राम के संगी साथी सुग्रीव, विभिषण, जामवंत आदि हैं। जो किसी ने किसी राजवंश के हैं या उसके दावेदार हैं। वाद में राजा बनते हैं। शिव के संगी-साथी बहुत ही सामान्य किस्म के आदिम लोग हैं।

शिव-पार्वती संबंध (पति-पत्नी का संबंध)-

7- राम राजा जनक की बेटी से शादी करते हैं,उन्हें प्रतियोगिता में हासिल करते हैं। वह पूरी तरह उनकी अनुगामिनी हैं, उनकी सेविका हैं। वह उनके इशारों के आधार पर जीवन जीती हैं। कृष्ण इस मामले में थोड़े भिन्न हैं, लेकिन उनकी भी घोषित पत्नी रूक्मिणी राजकुमारी और महारानी हैं। राम और सीता का संबंध पूरी तरह पितृसत्तात्मक है।

इसके विपरीत शिव और पार्वती का विवाह प्रेम विवाह है। पार्वती अपने पिता की इच्छा के विपरीत शिव को चुनती हैं। दोनों जीवन के सभी क्षेत्रों में समान हैं। दोनों एक साथ यात्रा करते हैं। दर्शन-ज्ञान विज्ञान पर समान स्तर पर बात करते हैं। न्याय-अन्याय पर बहस करते हैं, एक दूसरे से सहमत होते हैं, तो पार्वती बहुत सारे मामलों में अपनी असहमति दर्ज कराती हैं।

दोनों एक साथ मग्न होकर नाचते-गाते हैं। दोनों स्त्री-पुरूष के शारीरिक संबंधों ( सेक्स संबंधों) पर खुल बात करते हैं। दोनों एक दूसरे के इस कदर जुड़े हैं, एक दूसरे इस कदर अभिन्न हैं कि शिव अर्धनारीश्वर हैं। दोनों एक दूसरे में समान रूप से समाएं हैं। पार्वती कभी शिव के चरणों में नहीं दिखती हैं। वह क्षीर सागर के विष्णु ( राम आदि) का हमेंशा पांव दबाती हुई,सेविका ( लक्ष्मी) नहीं हैं।

शिव के पारिवारिक मूल्य-

8- राम सामंती-ब्राह्मणवादी मूल्यों के सबसे बड़े पैरोकार हैं। इसमें पिता की आज्ञा या इच्छा सर्वोपरि होती है। राम पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए 14 वर्ष के बन चले जाते हैं। राम के भाई उनके सेवक हैं, उनकी आज्ञा बिना किसी तर्क-वितर्क के सर्वोपरी है। राम लक्ष्मण से कहते हैं कि सीता को धोखे से जंगल में छोड़ आयो वे छोड़ आते, इतनी कितनी सारी बातें। राम का चरित्र सामंती मूल्यों को जीवन में उतारने का चरित्र है।

इस सब के विपरीत शिव के जीवन में कोई सामंती-पारिवारिक मूल्य है ही नहीं। उनका कोई ऐसा पिता या भाई नहीं। उनका अपनी पत्नी से संबंध दोस्ती का है, बराबरी का है। उनके बेटे से उनका रिश्ता बहस-मुहाबिसे का है। उसमें कोई सामंती-ब्राह्मणवादी मूल्य नहीं है। उनके संगी-साथी उनके जैसे ही हैं।

शिव और उनको चाहनों वालों के बीच कोई पंडा-पुरोहित नहीं है-

9- राम-कृष्ण विशेषकर राम तक आप बिना ब्राह्मण पुरोहित के पहुंच नहीं बना सकते हैं। राम का पहला शिक्षक ब्राह्मण है। खुद उनका जन्म ब्राह्मण ऋृषि के आर्शीवाद से होता है। वह सुबह उठकर पहला काम ब्राह्मणों का पैर छूने का करते हैं। उनकी अनुमति-आदेश से सबकुछ करते हैं। उनके लिए जंगल में रहने वाले लोगों ( आदिवासियों) की हत्या करते हैं। राम के मंदिरों में पुरोहित-ब्राह्मण भरे पड़े हैं।

इस सब के विपरीत शिव या शिव लिंग हर गांव में हैं। शिव मंदिरों में आमतौर ब्राह्मण परोहितों की कोई जगह नहीं है। वहां धन-संपत्ति और माल-पुवा का कोई चढ़ावा नहीं है। जहां माल नहीं, व्यंजन नहीं, वहां ब्राह्मण कहां से होगा। शिव को को आमतौर जो चढ़ाया जाता है, वह प्रकृति में सहज उपलब्ध भाग, धतूरा, बेल-पत्ता आदि है।

शिव का कोई गुरु या पुरोहित कोई नहीं है। उन्हें किसी ब्राह्मण गुरू या पुरोहित की कोई आवश्यकता नहीं हैं।

शिव घुमंतु हैं- किसी राज्य में बसने वाले राजा नहीं-

राम का अयोध्या में राज है। वे वहां के स्थायी निवासी हैं। शिव भ्रमण करते रहते हैं, वह राजा-महाराजाओं के यहां नहीं, जंगलो में, बनों में, आदिम बस्तियों में।

शिव आमतौर पर लिंग के रूप में मौजूद। लिंग उर्बरा शक्ति ( पीढ़ियों को आगे बढ़ाने) का प्रतीक रहा है, स्त्री योनि और पुरूष के लिंग से ही इंसानी विरासत आगे बढती है, बच्चे का जन्म होता है। लिंग-योनि की पूजा के आदिम रूपों से एक हैं। राम सामंती युग में ही पैदा हो सकते थे।

ऐसी बहुत सारी अन्य चीजें। शिव या पशुपति करीब-करीब पूरे देश में किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं। राम के मंदिर ज्यादात्तर बहुत बाद में बनें हैं। उनको धीरे-धीरे स्थापित किया गया है।

शिव के आर्यीकरण-ब्राह्मणीकरण और हिंदुकरण के लिए बहुत कुछ ब्राह्मणों ने लिखा, कई पुराण लिखे, रामचरित मानस में उन्हें रामभक्त ठराया गया। पुराणों में तीनों को एक कहने करने की कोशिश की गई, इसमें काफी सफलता भी मिली।

लेकिन शिव की अनार्य-द्रविड़ जड़े और विरासत इतनी गहरी है कि आज तक उनका पूरी तरह ब्राह्मणीकरण नहीं किया जा सका।

शिव राम या कृष्ण की तरह विष्णु के अवतार भी नहीं घोषित किए गए। उन्हें पूरी तरह ब्राह्मण धर्म का रक्षक भी नहीं बनाया जा सका।

पहले आर्यों ने आक्रामण, विध्वंस और आग लगाकर अनार्य को पराजित करने और भगाने की कोशिश की, लेकिन इतनी पुरानी संस्कृति और सभ्यता को खत्म करना संभव नहीं था। फिर उनका आर्यीकरण-ब्राह्मणीकरण और हिंदूकरण करके उन्हें आत्मसात कर लिया। यह सारी कोशिश अनार्यों को अपने भीतर समाहित करने और उन पर वर्चस्व कायम करने के लिए की गई। जिसमें काफी सफलता भी उन्हें मिली।

शिव का आर्यीकरण-ब्राह्मणीकरण और हिंदूकरण करने का एक लंबा इतिहास है। यह अनार्यों-द्रविड़ों-नागों के ब्राह्मणीकरण-आर्यीकरण और हिंदूकरण के इतिहास जुड़ा हुआ है।

शिव के सारे रूपों को देखकर साफ-साफ लगता है कि यह एक आर्यों के आगमन के पूर्व के अनार्यों के अराध्य थे। जिनकी अनार्यों के बीच पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक स्वीकृति थी। आर्यों-ब्राह्मणों ने अनार्यों-द्रविड़ों-नागों-असुरों पर अपनी हेजोमोनी कायम करने के लिए शिव को उनकी जड़ों से काटने की पूरी कोशिश की गई। तरह-तरह के कथाएं लिखकर उनका ब्राह्मणीकरण करने की कोशिश हुई।

अकारण नहीं है कि आरएसएस-भाजपा ने अपने आदर्श नायक के रूप में शिव या कृष्ण को नहीं चुना। क्योंकि कृष्ण और शिव (पशुपति), विशेषकर शिव का जीवन आर्यों-ब्राह्मणों-हिंदुओं के सामाजिक मूल्य (वर्ण-जाति), पारिवारिक मूल्य, पितृसत्तात्मक दांपत्य संबंध, कुल (श्रेष्ठ कुल), वंश (महान वंश), वर्ग (संपत्तिशाली, राजा-महाराजा), अनार्यों-असुरों-नागों और द्रविड़ों के खिलाफ युद्ध और उनका विध्वंस, अपने व्यक्तिगत मूल्यों (रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा) आदि के आधार पर रामराज्य (वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता आदि) पर खरे नहीं उतरते हैं। इन सब चीजों पर पूरी तरह राम खरे उतरते हैं,कृष्ण भी पूरी तरह खरे नहीं उतरते।

शिव के ब्राह्मणीकरण की कहानी, इस देश के बहुसंख्यक बहुजनों के ब्राह्मणीकरण से जुड़ी हुई है। शिव का ब्राह्मणों ने बहुजनों के ब्राह्मणीकरण के लिए इस्तेमाल किया। अनार्य पशुपति (शिव) को ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक-धार्मिक हेजेमोनी का उपकरण बनाया गया।

 


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