बहरहाल यह युद्ध थमने चाहिए...।
आदिवासी लोग पिछले छह हजार सालों से युद्ध कर रहे हैं
सुशान्त कुमारडिग्री प्रसाद चौहान ने कहा कि माओवादी आंदोलन और उसके हिंसा के इस्तेमाल पर सवाल उठाना सही है, लेकिन सरकार के तरीकों की भी जांच होनी चाहिए. उन्होंने कहा, ‘एक संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी हिड़मा और माओवादी आंदोलन से असहमत हो सकता है, लेकिन यहां सरकार की हिंसक ज्यादतियों पर सवाल उठाने की ज़रूरत है।’
हिड़मा की युद्ध में मौत के बाद उसे कैसे याद करें? कुख्यात नक्सली/आतंकी या आदिवासी नायक? शहीद और ढेर के बीच अंतरविरोध? युद्ध के बाद पूूरा घटनाक्रम अब बस्तर सहित पूरे देश में एक नया विवाद के मुहाने आ खड़ा हुआ है। सोशल मीडिया हिड़मा विवाद से पट सा गया है। बस्तर राज मोर्चा के मुखिया और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने दावा किया हैं कि हिड़मा की मौत किसी मुठभेड़ का परिणाम नहीं, बल्कि नक्सली संगठन के भीतर सत्ता संघर्ष का हिस्सा थी। साथ ही उन्होंने इस घटना को फर्जी मुठभेड़ भी बताया।
उनका कहना है कि हिड़मा आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने की तैयारी कर चुका था, लेकिन संगठन के शीर्ष नेताओं को यह बात स्वीकार नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया, हिड़मा का आत्मसमर्पण संगठन की शक्ति और नेटवर्क के लिए सबसे बड़ा झटका होता। इसी डर और वर्चस्व की लड़ाई में देवजी के इशारे पर भीतरखाने साजिश रची गई और उसे योजनाबद्ध तरीके से खत्म कर दिया गया।
गर यह सच्ची मुठभेड़ थी, तो अभी तक पारदर्शी सबूत और प्रत्यक्ष प्रमाण सामने क्यों नहीं आए? इस घटना की स्वतंत्र जांच कर वास्तविकता सार्वजनिक की जाने की बात उन्होंने की। कुंजाम ने जंगलों में सक्रिय माओवादियों के लिए सीधे संदेश जारी करते हुए कहा कि देवा बारसे, ऐरा और बाकी से मेरी अपील है कि हथियार छोड़ें और सुकमा में ही आत्मसमर्पण करें।
हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। उनका दावा है कि हिड़मा की मौत एक वास्तविक मुठभेड़ का परिणाम है और यह वर्षों के अभियान की बड़ी सफलता है।
छत्तीसगढ़ के मानवाधिकार कार्यकर्ता डिग्री प्रसाद चौहान ने कहा कि अगर सिक्योरिटी फोर्स चाहती तो वे हिड़मा, उनकी पत्नी और दूसरे माओवादियों को गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश कर सकते थे। उन्होंने कहा, ‘लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जिस तरह से हिड़मा को मारा गया, वैसे ही अक्सर कई बेगुनाह आदिवासी भी मारे जाते हैं।’
उन्होंने आगे कहा कि माओवादी आंदोलन और उसके हिंसा के इस्तेमाल पर सवाल उठाना सही है, लेकिन सरकार के तरीकों की भी जांच होनी चाहिए. उन्होंने कहा, ‘एक संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी हिड़मा और माओवादी आंदोलन से असहमत हो सकता है, लेकिन यहां सरकार की हिंसक ज्यादतियों पर सवाल उठाने की ज़रूरत है।’
आदिवासी नेत्री सोनी सोरी ने हिड़मा के एनकाउंटर को हत्या बताते हुए कोर्ट जाने की बात कही है। इतना ही नहीं उन्होंने हिड़मा को क्रांतिकारी तक कहा हैं। सोनी सोढ़ी के इस बयान पर सियासी गलियारों में बवाल मचा हुआ है ।
हिड़मा के होने की ऐतिहासिकता को नकारा नहीं जा सकता
आदिवासी लेखक अनुज लुगून कहते हैं कि लोग यह भूल जाते हैं कि नक्सलवाद के होने से सदियों पहले से आदिवासियों ने क्रांतिकारी संघर्ष किया है। आदिवासी समाज के अस्तित्व के खिलाफ जहाँ कहीं भी परिस्थितियाँ बनी हैं, वहाँ क्रांतिकारी संघर्ष का स्वरूप उभरा। उसी ऐतिहासिकता में बस्तर में महान गुंडाधुर हुए हैं और उसके पड़ोस में कोमुराम भीम हुए।
संविधान सम्मत भारत में आदिवासियों के लिए बनाये गए संवैधानिक हितों के दमन, आदिवासियों के प्रति खास वर्ग और सत्ता समूह के द्वारा बरती गयी, हिंसा, अत्याचार और अन्याय की उपज था हिड़मा। हिड़मा सलवा जुडुम के घनघोर अत्याचार और, जल, जंगल, जमीन से विस्थापन के बीच न्याय की उम्मीद की तरह खड़ा हुआ और उसने गरीब जनता के बीच अपनी मजबूत पैठ बनायी।
मार्च 22, 2018, फारवर्ड प्रेस में देख सकते हैं जिसमें-तीन शहीद: भगत सिंह की शहादत पर डॉ. आंबेडकर का संपादकीय लेख का हवाला देते हुए कहा गया है कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। डॉ.आंबेडकर ने अपने अखबार ‘जनता’ में 13 अप्रैल 1931 इन तीन युवाओं की शहादत पर ‘तीन शहीद’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख लिखा।
आम्बेडकर ने लिखा कि अगर सरकार को यह उम्मीद हो कि इस घटना से ‘अंग्रेजी सरकार बिल्कुल न्यायप्रिय है- न्यायपालिका के आदेश पर हुबहू अमल करती है’ ऐसी समझदारी लोगों के बीच मजबूत होगी और सरकार की इसी ‘न्यायप्रियता’ के चलते लोग उसका समर्थन करेंगे तो यह सरकार की नादानी समझी जा सकती है। क्योंकि यह बलिदान ब्रिटिश न्यायदेवता की शोहरत को अधिक धवल और पारदर्शी बनाने के इरादे से किया गया है, इस बात पर किसी को भी यकीन नहीं है। खुद सरकार भी इसी समझदारी के आधार पर अपने आप को सन्तुष्ट नहीं कर सकती है। फिर बाकियों को भी इसी न्यायप्रियता के आवरण में वह किस तरह सन्तुष्ट कर सकती है?
न्यायदेवता की भक्ति के तौर पर नहीं बल्कि विलायत के कान्जर्वेटिव/राजनीतिक रूढि़वादी/पार्टी और जनमत के डर से इस बलिदान को अंजाम दिया गया है, इस बात को सरकार के साथ साथ तमाम दुनिया भी जानती है।
यह संपादकीय आंबेडकर के संपादन में निकले वाले पाक्षिक अख़बार ‘जनता’ से लिया गया है। मालूम हो कि ‘जनता’ पाक्षिक का पहला अंक 24 नवम्बर 1930 को प्रकाशित हुआ था। लगातार बाईस अंकों के प्रकाशन के बाद 23 वां और 24 वां अंक ‘संयुक्तांक’ के तौर पर प्रकाशित हुआ। बाद में ‘जनता’ को साप्ताहिक में रूपांतरित किया गया। ‘मूकनायक,’ ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’ जैसे पत्र निकालने के बाद आंबेडकर ने यह ‘जनता’ नामक यह अखबार निकाला।)
वहीं दूसरी ओर भगत सिंह की फांसी के करीब 5 दिन बाद 29 मार्च 1931 को पेरियार ने अपने समाचार पत्र ‘कुदी-अरासु’ में इस विषय पर ‘भगत सिंह’ शीर्षक से सम्पादकीय लेख लिखा। पेरियार के लेख की मूल भाषा तमिल थी। पेरियार के संपादकीय की शुरुआत ही इस लाइन से थी कि ‘शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने भगत सिंह के फांसी दिए जाने पर दु:ख न प्रकट किया हो। और न ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसने उन्हें फांसी के तख्ते तक तक पहुंचाने के लिए सरकार की निंदा न की हो’।
पेरियार ने इस पूरे संदर्भ में भारतीय जनता की प्रतिक्रिया का जिक्र करते हुए बताया था कि कैसे देश की जनता भगत सिंह की फांसी के लिए गांधी को जिम्मेदार मानते हुए उनके खिलाफ नारे लगा रही थी।
पेरियार ने भगत सिंह को लेकर लिखा,’हम दावे के साथ कह सकते हैं कि वो एक ईमानदार शख्सियत थे. हम इस बात को पूरे समर्थन और विश्वास के साथ कहना चाहेंगे कि भारत को भगत सिंह के आदर्शों की ही आवश्यकता है। जहां तक हम जानते हैं, वे समधर्म (बहुआयामी समानता) और साम्यवाद के आदर्श में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।’
उन्होंने लिखा, भगत सिंह का आदर्श सबके लिए समता और साम्यवाद के आदर्श की स्थापना थी. भगत सिंह को कोट करते हुए उन्होंने लिखा, ‘हमारी लड़ाई उस समय तक जारी रहेगी, जब तक साम्यवादी दल सत्ता में नहीं आ जाते और लोगों के जीवन स्तर और समाज में जो असमानता है, वो पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती. यह लड़ाई हमारी मौत के साथ समाप्त होने वाली नहीं है। यह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से लगातार चलती रहेगी।’
धर्म, जाति, ईश्वर, असमानता और गरीबी पर भगत सिंह की चर्चा करते हुए पेरियार हमेशा उनके पक्षधर रहते थे। वो उनके द्वारा समता और साम्यवाद हासिल करने के तरीके से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी उनके आदर्शों की प्रशंसा करते थे.भगत सिंह के व्यक्तित्व का अपने शब्दों में चित्रण करते हुए पेरियार ने लिखा, ‘भगत सिंह ने उत्कृष्ट, असाधारण और गौरवशाली मौत अपने लिए चुनी थी, जिसे साधारण इंसान आसानी से प्राप्त नहीं कर सकता. इसलिए हम हाथ उठाकर, अपने सभी शब्द-सामथ्र्य के साथ और मन की गहराइयों से उनकी प्रशंसा करते हैं।’
यह संदर्भ ‘भगत सिंह को लेकर क्या सोचते थे पेरियार और अंबेडकर’ नाम से 14 सितम्बर 2024 भीमसेना डेस्क में उपलब्ध हैं।
क्या भारत आज भी उसी ऐतिहासिक काल में हैं जब अंग्रेजों के साथ भारत के लोग संघर्षरत थे। क्या हिड़मा और उनके माओवादी साथियों के साथ भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा संघर्ष में उपरोक्त बातें प्रासंगिक हैं?
छत्तीसगढ़ का बस्तर माओवादी हिंसा के साथ पत्रकारों के लिए समाचार जुटाने का युद्धक्षेत्र भी बन गया हैं। बस्तर के पत्रकारों को भारतीय सशस्त्र बल और माओवादियों के द्वारा लगातार युद्ध संबंधित जानकारियां जुटाने में सहयोद्धा के रूप में देख पा रहा हूं। और यूट्यूब ने इन पत्रकार योद्धाओं को माध्यम मुहैया किया है।
भारतीय सशस्त्रबल और माओवादियों के बीच चल रहे युद्ध में सुरक्षाबलों के जवान, माओवादी और जंगलों में बसे आदिवासी भी मारे जा रहे हैं। जनजागरण अभियान से लेकर सलवा जुडूम तक माओवादी मजबूत होते गए हैं और अब माओवादी सैन्य क्षमता पस्त होने के कगार पर हैं। दोनों ही सेनाओं को रक्तपात का अभ्यास हो चुका हैं। कुछ ऐसे स्थानीय आदिवासी भी थे जिन्हें नक्सली हर महीने दो महीने में पुलिस का मुखबिर बताकर मारते रहते थे।
वहीं सुरक्षा बल ने सारकेगुड़ा, एडसमेटा और नुलकातोंग में आदिवासियों को मौत के घाट उतारा है। जिसे साबित किया गया है। यही नहीं नक्सली पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारों की तरफदारी के आरोप में गिरफ्तारी और जेल यातना भुगतने वाले भी कम नहीं थे या हैं। यह बहुत आसान है कि जब कोई आपका ना सुने उसे नक्सली कह दीजिए...।
वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार लिखते हैं कि नक्सलियों के बिछाए हुए विस्फोटकों में जिंदगी या बदन का कोई अंग खोना इन इलाकों में अनहोनी नहीं थी। नक्सली कभी हर परिवार से एक किशोर किशोरी को अपने काडर के लिए मांगते थे तो कभी स्थानीय किसानों या कारोबारियों से लेवी वसूलते थे। दो दशक पहले डॉ. रमन सिंह की सरकार रहते हुए बस्तर के दिग्गज कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के साथ मिलकर सरकार ने सलवा जुडूम नाम का आंदोलन चलाया।
मासूम और अप्रशिक्षित आदिवासियों को खतरनाक हथियार देकर नक्सलियों के मुकाबले उतार दिया गया था। इस अराजक ताकत में पुलिस की अगुवाई में गांव के गांव जलाए थे, बेकसूरी को मारा था, महिलाओं से बलात्कार किए थे, लाखों लोगों को बस्तर छोडक़र पड़ोसी प्रदेशों में जाने के लिए मजबूर किया था।
वे कहते हैं कि 15 बरस की रमन सिंह सरकार के दौरान केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने सिर्फ केंद्रीय बल भेजने की जिम्मेदारी निभाई थी। मोदी सरकार आने पर शुरुआत में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की प्राथमिकता में शायद बस्तर की नक्सल हिंसा नहीं थी। भाजपा सरकार माक्र्स-माओवाद की वैचारिक विरोधी रही है। 23 महीने पहले भाजपा सरकार में पहली बार विष्णु देव साय मुख्यमंत्री बने।
उनकी अगुवाई में सुरक्षाबल उतने ही हैं। मारे गए नक्सलियों में सबसे बड़े नेता तक शामिल हैं। 23 महीनों में छत्तीसगढ़ में करीच पौने पांच सौ नक्सली सरकारी जुबान में न्यूट्रलाइज किए गए हैं। अधिकतर मौतों को नक्सल संगठनों ने अपने खुद के लोग होने की बात मानी है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की निगरानी में नक्सलियों से बातचीत की कोशिश शुरु हुई। बाद में बदली रणनीति के अंतर्गत उनके आत्मसमर्पण की पहल की गई। पिछले महीनों में नामी-गिरामी, इनामी नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। हथियार डालकर पुनर्वास की तरफ बढऩे का बार-बार न्यौता दिया गया। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा गृहमंत्री का प्रभार संभालते हैं। उन्होंने हर स्तर पर नक्सली संगठनों और नेताओं से बातचीत कायम की।
सेंट्रल कमेटी मेंबरों के साथ सैकड़ों हथियारबंद नक्सलियों ने थोक में हथियार डाले। करोड़ों के इनाम जिन पर थे उन्होंने खुद हथियार डालने के बाद वीडियो बयान जारी कर करके बाकी साथियों से हथियार डालने की अपील की। महाराष्ट्र में जाकर एक बड़े पोलित ब्यूरो मेंबर ने आत्मसमर्पण किया।
किसी ने कल्पना नहीं की थी कि नक्सली आंदोलन का संभयात: सबसे प्रखर चेहरा भूपति महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के समक्ष हथियार और हत्या के रास्ते को अलविदा कहेगा। उससे कुछ महीने पहले पत्नी हिंसा का रास्ता छोडऩे का ऐलान करेगी कहेगी मैं इस तरीके से ऊब चुकी हूं। दो दिन पहले एक दूसरे सेंट्रल कमेटी मेंबर माड़वी हिड़मा को उसकी पत्नी और दूसरे साथियों सहित आंध प्रदेश पुलिस ने मार गिराया।
हिमांशु कुमार लिखते हैं कि भारत के सिपाहियों ने हिड़मा की हत्या कर दी। हमारे शहर में रहने वाले मिडिल क्लास ने तालियां बजाई की एक आतंकवादी मारा गया।जबकि सबसे बड़ा आतंकवादी हमारा मिडिल क्लास है जो ना अनाज उगाता है ना खेती करता है ना कपड़ा बनाता है ना खदान खोदता है ना मछली पकड़ता है ना सब्जी उगाता है लेकिन सबसे ज्यादा खाता है।
यह मिडिल क्लास चाहता है कि आदिवासी का जंगल काट दो, खदानें खोद लो, किसान को लूट लो, मजदूर से कम मजदूरी में काम करवाओ ताकि हम शहर में बिना मेहनत किए अय्याशी की जिंदगी जी सकें। लेकिन इतिहास हिड़मा को कैसे याद करेगा?
सिद्धार्थ रामू लिखते हैं कि आपको हिडमा और बासवराजू जैसे सैकड़ों शहीदों के महान लक्ष्यों, उनकी महान कुर्बानियों, जनता से असीम प्यार और न्यायपूर्ण दुनिया के स्वप्नों को सलाम नहीं करना है, मत कीजिए। आपको जो रास्ता सही लगता है, उस पर ईमानदारी से चलिए। उसके लिए जरूरी कुर्बानी दीजिए। काम कीजिए। आप कर भी रहे हैं। मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं।
पर लाइन की आड़ में किसी और को चुप करने की और इन महान शहीदों को सलाम करने से रोकने की कोशिश मत कीजिए। लाइन को धार्मिक आस्था मत बनाइए। लाइन छुईमुई का पेड़ नहीं होती है। कौन सी लाइन सही और कौन सी गलत यह लिखने- कहने से नहीं, प्रयोग में साबित होता है। आप या तो कुचले जायेंगे या सुरक्षित होंगे।
अनुज लुगून कहते हैं कि लोग कहते हैं कि संघर्ष का फलां तरीका सही है, फलां गलत है। लेकिन हकीकत में क्या है?
सोनम वांगचुक ने तो संघर्ष का गांधीवादी तरीका अपनाया। दिल्ली तक पैदल मार्च किया, धरने दिये। उपवास किया। लेकिन फिर भी जेल में है। देशद्रोही का आरोप लगा दिया गया।
हिड़मा ने तो जल, जंगल, जमीन की लड़ाई के लिए हथियार उठाया। उसे खूंखार देशद्रोही कहा गया और वह मार दिया गया।
अगर आप संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची की ताकतवर तरीके से माँग करते हैं, अगर आप घन घोर केंद्रिकता के दौर में स्वायत्तता की ताकतवर माँग करते हैं तो यही होना है।
झारखंड में पत्थलगड़ी आंदोलन वालों के साथ भी यही हुआ। आदिवासी इलाकों में यही मूल स्थिति है।
अगर आप संविधान सम्मत अधिकारों की मांग किसी भी तरीके से करते हैं और उस मांग से अगर शासन- सत्ता पोषित पूंजीवाद को दिक्कत हो रही है तो आपके साथ भी यही होगा।
आप जेल में होंगे या मारे जायेंगे या देशद्रोही साबित होंगे। नक्सल, अर्बन नक्सल कहे जायेंगे। यह लोकतंत्र के लिए घातक है।
आदिवासी लोग पिछले छह हजार सालों से युद्ध कर रहे हैं
सोमवार, 22 जुलाई 1947 को संविधान-सभा में जयपाल मुंडा कहते हैं कि श्रीमान् जी, जब मैंने पंडित जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुना, मैंने सोचा कि किसी भाषण की आवश्यकता नहीं होगी।
लेकिन चूंकि इस हाउस के भिन्न-भिन्न दलों ने एक-एक करके जिस झंडे को हम इस देश का राष्ट्रीय झंडा स्वीकार करने वाले हैं, उसके प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करने तथा उसे स्वीकार करने का प्रयत्न किया, तो मैंने सोचा कि मैं भी कुछ कहूं उन तीन करोड़ आदिवासियों की ओर से जो कि इस देश के सच्चे स्वामी हैं, इस भूमि के प्रथम पुत्र हैं, भारत के अति प्राचीन शिष्ट जन हैं और जो पिछले 6 हजार वर्षों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिये युद्ध कर रहे हैं।
अपने इन लोगों की ओर से इस झंडे को देश का झंडा स्वीकार करने में मुझे बड़ी खुशी है।
श्रीमान् जी, इस हाउस के बहुत से सदस्य यह सोचने लगे हैं कि झंडे फहराने का श्रेय आर्य सभ्यता को है। श्रीमान् जी, आदिवासी झंडा फहराने में और अपने झंडे के लिये युद्ध करने में सर्वप्रथम हैं। जो सदस्य विहार प्रांत से आये हैं मेरी इस बात का समर्थन करेंगे कि प्रति वर्ष छोटे नागपुर के जतरा, मेलों और उत्सवों में जब भिन्न-भिन्न आदिवासी समुदाय अपने-अपने झंडे लेकर क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तब प्रत्येक समुदाय ‘जतरा’ में एक विशेष मार्ग से आता है।
केवल एक ही मार्ग से आता है और अन्य कोई दल उस मार्ग से नहीं आ सकता। प्रत्येक गांव का एक झंडा होता है और उस झंडे की नकल कोई दूसरा दल नहीं कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति उस झंडे को चुनौती देता है तो श्रीमान् जी, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि वह विशेष दल उस झंडे की प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिये अपने अन्तिम खून की बूंद बहा देता है।
अब से वहां दो झंडे होंगे, एक वह जो वहां 6 हजार वर्षों से है और दूसरा यह राष्ट्रीय झंडा जो कि हमारी स्वतंत्रता का चिह्न होगा जैसा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बतलाया है। यह राष्ट्रीय झंडा आदिवासियों को एक नया संदेश देगा कि स्वतन्त्रता के लिये उनका 6 हजार वर्षों से चल रहे युद्ध का अन्त हो गया है और वे अब इस देश में उतने ही स्वतंत्र हैं जैसे कि अन्य व्यक्ति। श्रीमान जी, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जो झंडा पेश किया है, भारत के आदिवासियों की ओर से उसे स्वीकार करने में मुझे बड़ा हर्ष है।
सोशल मीडिया में अशोक उइके ने लिखा है कि नक्सलवाद को जन्म देने वाला कौन? अपने देश के लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर करने वाला कौन? लाकतांत्रिक देश में हथियार उठाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या सिर्फ नक्सली जिम्मेदार हैं? या बड़ी राजनीतिक पार्टियों की नीतियां भी इसमें दोषी हैं? आखिर इन सवालों को नजर अंदाज क्यों?
इससे बेहतर छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों सहित पूरे देश में घट रहे युद्ध संबंधित घटनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर सकता। बहरहाल यह युद्ध थमने चाहिए...

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