सपने सच होते हैं, बस देर लगती है
पूरा चांद कभी-कभी बहुत भरा हुआ लगता है
मनोज अभिज्ञानअधूरेपन में उसकी पूरी सुंदरता है। शायद सच में सुंदर वही है जो थोड़ा कम है, थोड़ा छूटा हुआ है, थोड़ा बिखरा हुआ है। और सच कहूँ, इस खामोश सुबह में, आधे चांद को देखकर, मैंने अजीब-सी राहत महसूस की। जैसे किसी ने कंधे पर हाथ रखकर कहा हो—“अधूरा होना तुम्हारी कमजोरी नहीं, तुम्हारा मनुष्य होना है।” और मनुष्य होकर जीना ही शायद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कल रात मैं बस सोने ही जा रहा था। रोशनी बंद कर दी थी, मोबाइल साइड में रख दिया था कि अचानक स्क्रीन जगमगा उठी। उसका वीडियो कॉल था। कुछ पल को दिल की धड़कन तेज हो गई—रात में कौन कॉल करता है, फिर याद आया कि वहां तो सुबह हो गई होगी। कॉल उठाया तो सामने वही चेहरा था, हल्की मुस्कान लिए, नींद से आधी खुली आंखें। उसने कहा, “मैं बस उठी ही हूं… सोचा, तुम अभी जाग रहे होंगे।”
वह बिस्तर पर थी, पर सबकुछ उजला था। बेडशीट, पर्दे, तकिए, यहां तक कि उसकी नाइटसूट तक सफेद। उस सफेदी में अजीब-सी शांति थी—जैसे किसी ने समय को रोक दिया हो। मुझे लगा, यह कोई दृश्य नहीं, प्रतीक है। सफेद—न कुछ कहता, न कुछ छिपाता। बस सबकुछ अपने में समेटे हुए।
मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा। वह हँस पड़ी—“क्या हुआ, ऐसे क्यों देख रहे हो?”
मैंने धीरे से कहा, “कभी ऐसा सपना देखा था मैंने… बिल्कुल ऐसा ही। तुम्हें पता है।”
वह रुक गई, उसकी मुस्कान हल्की पड़ गई। “कभी कभी सपने और हकीकत में फर्क ही नहीं होता!” उसने कहा।
उसकी आवाज़ में बस एक शून्य था, जिसमें शब्द घुलते चले जा रहे थे।
कहते हैं, कुछ पल ऐसे होते हैं जो पूरे जीवन की स्मृति बन जाते हैं। यह वही पल था।
वह कोई खास बात नहीं कर रही थी—बस अपने तकिए को सीधा कर रही थी, बालों को पीछे कर रही थी, खिड़की की तरफ देख रही थी। लेकिन उन सामान्य-सी हरकतों में मुझे जीवन की असाधारणता महसूस हो रही थी। जैसे कोई मुझे बता रहा हो कि सौंदर्य कभी दिखावे में नहीं, सहजता में होता है।
मैंने पूछा, “आज अस्पताल नहीं जाना?”
उसने कहा, “जाऊंगी, लेकिन थोड़ा देर से।”
वह हँस रही थी, पर उस हँसी में गहराई थी।
“देखो, ज़िंदगी कितनी ज़िद्दी है न,” उसने कहा, “हम छोड़ देना चाहते हैं, और वो कहती है—नहीं, मैं अभी बाकी हूँ।”
मैं चुप रहा। मुझे लगा, वह जीवन को सिर्फ समझती नहीं, जीती भी है।
कभी-कभी वह ऐसे वाक्य बोल देती है जो साधारण बातचीत में दर्शन की तरह उतर जाते हैं।
उसने आगे कहा, “मैंने अब यह मान लिया है कि कुछ लोग सिर्फ सुबह के लिए बने होते हैं। वे रातों में नहीं ठहरते।”
उसने अपनी कॉफी उठाई, और उस छोटे से वाक्य में मुझे अपने जीवन की सारी रातें दिखाई दीं—वो सभी लोग जो आए, ठहरे, फिर चले गए, जैसे वे भी किसी और सुबह के हिस्से हों।
कॉल की स्क्रीन पर उसके कमरे की सफेदी फैलती जा रही थी। मुझे लगा, वह खुद उस सफेदी का हिस्सा बनती जा रही है।
शायद यही ‘शांति’ है जिसकी हम तलाश करते हैं—वह जो शोर के बीच भी मौन रहती है।
वह जो किसी सवाल का जवाब नहीं देती, पर प्रश्नों को अर्थ दे देती है।
मैंने उससे कहा, “तुम्हारे कमरे में सबकुछ सफेद क्यों है?”
वह मुस्कराई, “क्योंकि हर रंग थका देता है। सफेद में सब रंग समा जाते हैं, इसलिए यह कभी थकाता नहीं।”
कितनी साधारण बात कही, लेकिन कितनी गहरी।
हम सब अपने जीवन में रंग जोड़ते रहते हैं—इच्छाओं, संबंधों, आकांक्षाओं के रूप में—और फिर थक जाते हैं।
सफेद वही शून्य है जिसमें सब कुछ मिट जाता है, और सिर्फ अस्तित्व बचता है।
वह कॉफी पीते हुए खिड़की के बाहर देखने लगी।
उसने कैमरा खिड़की की तरफ मोड़ा, और अचानक कहा, “कभी-कभी लगता है, हम दोनों एक कहानी के दो सिरों पर खड़े हैं। बीच का हिस्सा किसी और ने लिख दिया है।”
मैंने कहा, “शायद वही ज़िंदगी है—जहाँ शुरुआत और अंत अपने हैं, लेकिन मध्य किसी और का।”
वह मुस्कुराई, फिर बोली, “शुरुआत और अंत में फर्क क्या है? दोनों ही अनिश्चित हैं।”
मैंने कहा, “लेकिन अनिश्चितता ही तो स्थिरता है। अगर सब निश्चित हो जाए तो जीवन खत्म हो जाएगा।”
वह धीरे से बोली, “तो फिर शायद हम दोनों उस स्थिरता की तलाश में हैं जो अस्थिरता में छिपी है।”
इतना कहकर उसने फोन कैमरा नीचे किया। एक पल को लगा जैसे वह रो रही हो, पर अगले ही पल वह मुस्कराने लगी।
मैंने कहा, “तुम बहुत बदल गई हो।”
वह बोली, “नहीं, बस थक गई हूँ। कुछ सपनों का भार बहुत ज़्यादा था।”
मैंने कहा, “लेकिन तुमने तो सब हासिल किया—नाम, काम, सम्मान।”
वह हँसी, “हाँ, लेकिन शांति नहीं। शायद वो कहीं तुम्हारे इस हिस्से में रह गई है।”
उसकी आँखों में कुछ चमक उठा—शायद कोई पुरानी याद, कोई अधूरी चाह, या कोई ऐसा सुकून जो सिर्फ पहचान में मिलता है।
एरोन के स्कूल में चिल्ड्रन डे की पार्टी है। सबको अपना फेवरेट फूड लेकर जाना है। शाम को उसने कहा था, “पापा, कल सब शेयर करेंगे न? तो मैं डोनट्स ले जाऊंगा।”
बच्चों के लिए बांटना बस चीज़ें बांटना नहीं होता, वह उनके भीतर की मनुष्यता का अभ्यास भी होता है। हम बड़े लोग जिन्हें आत्मनिर्भरता कहते हैं, बच्चे उसे सह-अस्तित्व के रूप में जीते हैं। उनके लिए खुश रहना तभी संभव है जब सामने वाला भी खुश हो।
मैंने उसे बताया। वह बोली, “So, tomorrow is Children’s Day there, right? He must be excited.”
मैंने मुस्कुरा कर कहा, “Yes. He’s excited..”
She: “Can I talk to him?”
I: “Of course.”
एरोन ने फोन लिया। उधर से आवाज़ आई, “Hey champ! What are you taking for the party?”
वह उछल पड़ा, “Donuts! You wanna see?”
वह मुस्कुराई। स्क्रीन पर उसका चेहरा जैसे किसी पुराने मातृत्व की छाया लिए हुआ था।
वह डॉक्टर है—पेडियाट्रिशियन। रोज बच्चों से घिरी रहती है, पर आज एरोन की मुस्कान में उसे अपने सारे थके हुए दिनों का अर्थ मिल गया।
वह बोली, “You know, every child I meet reminds me that the world is still worth saving.”
फिर थोड़ी देर चुप रही और कहा, “But this one—he makes me wish I could be there.”
एरोन को क्या पता कि ये शब्द कितनी दूर से, कितने समय के पार से उसके लिए आए हैं।
उसने बस हंसते हुए कहा, “You can come next time, aunty. We’ll have sandwiches together.”
और वह वहीं, फोन के दूसरी तरफ, कुछ देर के लिए बिल्कुल चुप हो गई।
फिर धीरे से बोली, “I’d love that, Aaron.”
मैंने देखा, उसके कमरे की खिड़की से हल्की धूप भीतर आ रही थी। उस रोशनी में उसका चेहरा किसी देवदूत की तरह लग रहा था। शायद इसलिए कि बच्चों के प्रति प्रेम में हमेशा कुछ दिव्यता होती है—कुछ ऐसा जो समय से परे है। किसी बच्चे के प्रति स्नेह में कोई 'इच्छा' नहीं होती, बस शुद्ध करुणा होती है।
उसने मुझसे कहा, “You know, I sometimes wonder if the world would heal faster if adults learned to love the way children do—without any agenda.”
मैंने जवाब दिया, “Maybe that’s why we celebrate Children’s Day. To remember what we’ve forgotten.”
फोन पर उसने धीरे से कहा, “He reminds me of hope.”
मैंने कहा, “Yes. And maybe that’s why you heal children—because somewhere you’re still one of them.”
वह मुस्कुराई।
कॉल लंबी चलती रही। हम जीवन की बातें करते रहे, बीते सालों के किस्से, और आने वाले कल की अनिश्चितताओं पर हँसते रहे।
लेकिन भीतर कहीं दोनों को पता था—यह बातचीत सिर्फ शब्दों की नहीं, पुराने रिश्ते की आखिरी सांसों जैसी है। हर हँसी के बीच एक ठहराव था, जैसे हम दोनों उस अव्यक्त को महसूस कर रहे हों जो कहा नहीं जा सकता।
जब उसने कहा, “अब मुझे निकलना होगा,” तो मेरी आँखें स्क्रीन पर टिक गईं।
वह उठी, कैमरा थोड़ा हिला, और सफेद परदे उसके पीछे लहराने लगे।
उसने कहा, “सपने सच होते हैं, बस देर लगती है।”
और फिर कॉल कट गई।
स्क्रीन काली हो गई, पर कमरे में जैसे उसकी सफेदी रह गई हो।
मैं देर तक उस अंधेरे में जागता रहा, सोचता रहा कि शायद जीवन यही है—किसी वीडियो कॉल की तरह—थोड़ी रोशनी, थोड़ी दूरी, थोड़ी देर।
और कभी-कभी, वह एक पल जिसमें सब कुछ थम जाता है—वही हमारा पूरा जीवन बन जाता है।
मैं सोच रहा था—
क्या हर सफेदी के पीछे कोई अनकहा दर्द छिपा होता है?
या फिर दर्द ही वह रंग है जो सफेद को इतना गहरा बना देता है?
अभी सुबह के पाँच बजे हैं। कमरे में हल्की-हल्की ठंड है, लेकिन खिड़की के पार का आसमान जैसे किसी शांत कविता से भरा हुआ है। मैंने बाहर झाँका तो ऊपर आधा चाँद टंगा था—किसी पुराने दोस्त की तरह, जो हर बार पूरा नहीं आता, लेकिन जितना आता है उतना ही हमसे दिल की बात कह जाता है।
अर्धचंद्र में अजीब-सी करुणा होती है। पूरा चांद कभी-कभी बहुत भरा हुआ लगता है, बहुत साफ, बहुत निश्चित। लेकिन आधा चांद—उसमें अधूरापन है, और शायद इसी अधूरेपन में उसकी पूरी सुंदरता है। शायद सच में सुंदर वही है जो थोड़ा कम है, थोड़ा छूटा हुआ है, थोड़ा बिखरा हुआ है।
और सच कहूँ, इस खामोश सुबह में, आधे चांद को देखकर, मैंने अजीब-सी राहत महसूस की।
जैसे किसी ने कंधे पर हाथ रखकर कहा हो—
“अधूरा होना तुम्हारी कमजोरी नहीं, तुम्हारा मनुष्य होना है।”
और मनुष्य होकर जीना ही शायद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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