गुरु नानकदेव: उनके विचारों का सच्चा निदर्शक गुरुग्रन्थ साहिब नामक महान् ग्रन्थ ही है

कार्तिकी पूर्णिमा अधिक अर्थपूर्ण लगती है...

हजारी प्रसाद द्विवेदी

 

आज से 500 वर्ष पहले गुरु नानकदेव का आविर्भाव हुआ था। भारतवर्ष के अधिकतर महापुरुषों के समान गुरु नानक का जीवन-चरित भी चामत्कारिक कथाओं से ढँका हुआ है। उनकी 'जनम-साखियाँ' तो बहुत मिलती हैं, परन्तु सबमें श्रद्धातिरेक के कारण चामत्कारिक कथाओं से ऐतिहासिक तथ्य ढँक गये हैं। ई० ट्रम्प ने, जिन्होंने तत्कालीन भारत सरकार के अनुरोध पर गुरुग्रन्थ साहिब का अंग्रेजी अनुवाद किया था, एक ऐसी जनम-साखी का उल्लेख किया है जो 16वीं शताब्दी के अन्त में या सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में लिखी गयी थी। यह उसी लिपि में है जिसमें गुरुग्रन्थ साहिब की सबसे पुरानी प्रति लिखी गयी है और इस पर पाँचवें गुरु (गुरु अर्जनदेव) के हस्ताक्षर भी हैं।

ट्रम्प का कहना है कि यह जनम-साखी परवर्ती जनम-साखियों की तुलना में चामत्कारिक और करामाती कथाओं से बहुत-कुछ मुक्त है। सिक्ख धर्म के प्रसिद्ध विद्वान् एम० ए० मेकालिफ ने एक और पुरानी जनम-साखी की चर्चा की है जो पुष्पिका के अनुसार 1588 ई० में लिखी गयी थी, अर्थात् यह गुरु नानक की तिरोभाव-तिथि से सिर्फ 50 वर्ष बाद की है। इसमें भी चामत्कारिक घटनाएँ हैं। जनम-साखियों का इन दिनों और भी अध्ययन हो रहा है।

कई भारतीय विश्वविद्यालयों के शोधार्थी इस कार्य में लगे हैं। हो सकता है कि नये ऐतिहासिक तथ्यों का प्रामाणिक या अधिक-से-अधिक प्रामाणिक विवरण उपलब्ध हो। इन पुराने विवरणों में कुछ-न-कुछ ऐतिहासिक तथ्य अवश्य हैं। उनके आधार पर गुरु नानकदेव के जीवन के सम्बन्ध में कुछ जानकारी मिल जाती है। पर वस्तुतः गुरुजी के विचारों का सच्चा निदर्शक गुरुग्रन्थ साहिब नामक महान् ग्रन्थ ही है। इस महान् ग्रन्थ के पहले महले में गुरु नानकदेव की वाणियाँ संगृहीत हैं। इसमें निम्नांकित रचनाएँ हैं-

1. जपु
2. पट्टी (आसा राग में)
3. ओअंकार (रामकली राग में)

4. सिद्ध गोष्ठि (रामकली राग में)
5. बारह माह (तुखारी राग में), और
6. तीन वारा (माझ, आसा और मलार राग में)

इसमें गुरुजी के प्रामाणिक उपदेश ही नहीं हैं, उनका शान्त-शोभन, उदात्त और मोहन रूप भी उपलब्ध होता है।

कोई आश्चर्य नहीं कि इस महान् ग्रन्थ को गुरु का प्रति-रूप ही मान लिया गया है। वस्तुतः गुरु का जैसा महिमामय व्यक्तित्व और उनका चिन्मय रूप इस ग्रन्थ में अत्यन्त स्पष्ट होकर प्रकट हुआ है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इस महान् ग्रन्थ का पहला महला आदिगुरु नानकदेव की वाणियों का संकलन है।

आधुनिक ढंग से विवेचना करनेवाले विद्वान् इसमें ऐसे सन्देहात्मक पदों को ढूंढ लेते हैं जो किसी प्रकार गुरु की रचना नहीं हो सकते । परन्तु उन्हें ऐसी बात कहने का साहस भी सिर्फ इसलिए होता है कि इस महला से गुरुजी का शान्त-मनोरम व्यक्तित्व बहुत उजागर होकर प्रकट हुआ है। उदाहरण के लिए किसी कल या कल्य कवि की छापवाले उन तथाकथित सवैयों को लिया जा सकता है जिनमें गुरु नानक को परम भक्तिभाव से भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। एक पद इस प्रकार है-

कवि कल्य सुजसु गावै गुरु नानक राजु जोगु जिनि माणिओ। सतजुगि तै माणिओ छलिओ बलि बावन भाइग्रो। त्रेते तै माणिश्रो राम रघुवंसु कहाइओ।। दुम्रापर क्रिसन मुरारि कंसु किरतारथु कीश्रो। कलियुग प्रमाणु नानक गुरु अंगदु अमरु कहाइओ । स्त्री गुरु राजु अविचलु अटलु आदिपुरुखि फुरमाइश्रो।।
उग्रसैण कउ राजु अझै भगतह जन दीओ।।
(महला')

स्पष्ट ही यह गुरुजी की अपनी वाणी नहीं हो सकती । पर ऐसा क्यों कहा जाता है? इसलिए कि गुरु की वाणियों से उनका जो स्वरूप प्रकट होता है उससे यह मेल नहीं खाता। फिर भी गुरुजी के ग्रारम्भिक जीवन के सम्बन्ध में जनम-साखियों से बहुत-कुछ प्रकाश पड़ता है। कुछ बातें उनमें अवश्य अतिरंजित और काल्प-निक हैं। परन्तु बहुत-सी सूचनाएँ प्रामाणिक भी हैं। गुरुजी का जन्म तालवण्डी ग्राम के एक खत्री-परिवार में हुआ था। गाँव के मालिक एक मुसलमान रईस (राय सलार) थे।

गाँव का वाता-वरण ही ऐसा था जिससे गुरुजी के बालचित्त पर साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रभाव पड़ा। उन्हें पाठशाला में पढ़ने को भी भेजा गया था और अन्य विद्यार्थियों की तुलना में उनकी गम्भीरता, शालीनता और भगवन्निष्ठा का आभास भी उन्हीं दिनों मिल चुका था। उनकी एक बड़ी बहन थी जिसका नाम नानकी बताया जाता है। नानक का विवाह भी हुआ था। उनकी पत्नी सुलक्खनी थीं।

नानक का मन घर के कामों में नहीं लगता था। वे साधु-संग, एकान्तवास और अध्यात्म-चिन्तन में लगे रहते थे। माता-पिता उन्हें गृहस्थी के बन्धन में बाँधना चाहते थे । बहनोई जयराम की सहायता से उन्हें पंजाब के सूबेदार दौलतखाँ लोदी के एक कर्मचारी के मोदीखाने में नौकरी मिल गयी। परमात्मा' जिसे अपना बनाना चाहता है उसके लिए सुयोग भी विचित्र प्रकार से दे देता है। कहा जाता है कि उस नौकरी के बन्धन से उन्हें एक विचित्र प्रकार से मुक्ति मिल गयी।

आटा तौलते समय वे एक, दो, तीन गिनते-गिनते जब तेरह पर आये तो तेरह शब्द के पंजाबी उच्चारण 'तेरा' पर उनका ध्यान दूसरी ओर चला गया। 'मैं तेरा हूँ' इस भावना ने उन्हें तन्मय कर दिया। हाथ तौलते रहे, मुँह 'तेरा' 'तेरा' की रट में लग गया। सारा भाण्डार तौल दिया गया, 'तेरा' 'तेरा' 'तेरा'। यद्यपि यह 'तेरा' वाला अभिप्राय (अर्थात् मोटिव्) मध्यकालीन और भी अनेक सन्तों के साथ जुड़ा हुआ है, पर गुरु नानक के मुख से निःसृत वाणियों के प्रकाश में यदि देखा जाये तो इसका अन्र्तानहित मर्मार्थ बिल्कुल ठीक लगेगा। कदाचित् गुरु नानकवाली यह कहानी सबसे पुरानी भी है। इसे वास्तविक मान लेने में बिल्कुल हिचक नहीं होती।

नतीजा जो होना था, वही हुआ। नौकरी छूट गयी। नानक की अध्यात्म-भावना के विकास का मार्ग प्रशस्त हो गया। साधु-संग, भ्रमण और धर्मोपदेश का अवकाश प्राप्त हुआ । उन्होंने कामरूप से लेकर मक्का-मदीने तक की यात्रा की। उन्हें संसार बाँध नहीं सका, पर संसार के बन्धन से छुटकारा देने और दिलाने का रहस्य उन्हें अवश्य प्राप्त हो गया। इन सारी यात्राओं में गुरु के मुख से जो अनुभूत सत्य प्रकट हुआ, वह अनायास गीत-रूप में उच्छ्वसित हुआ।

सौभाग्य से उन्हीं के गाँव के एक मुसलमान रागी 'मरदाना' बराबर उनके साथ रहते रहे और उन्होंने यथासम्भव उन वाणियों को राग के ढाँचे में बाँधकर स्मरण रखा। निरन्तर मनन से गुरु के अन्तरतर की निर्मल ज्योति जाग पड़ी और वे राम-नाम जपते-जपते राममय हो गये । वे उस ज्ञान के अधिकारी हुए जो बाह्य जगत् की जानकारी से भिन्न होता है।

बाह्य जगत् की जानकारी मायामुख होती है। उसे पाकर मनुष्य और भी उलझता है, और भी कल्पना-विलास की ओर अग्रसर होता है, और अपनी ही कल्पनाओं के ताने-बाने से अपने को ही उलझानेवाली जानकारियों का जाल बुनता है। वैष्णव कवि (कवि कर्णपूर) ने कहा था कि तार्किक लोग अपनी कल्पनाओं का ही नाम 'शास्त्र' दिया करते हैं। जो जितना ही कल्पना-कुशल होता है, वह उतना ही बड़ा तार्किक मान लिया जाता है-

ये यत्राधिक कल्पना-कुशलिनस्ते तत्र विद्वत्तमाः ।
स्वीयं कल्पनमेव शास्त्रमिति ते मन्यन्तयहो ताकिकाः ।।

इसी कल्पना-विलास को सन्तजन 'मायामुख' ज्ञान कहते हैं। गुरु नानक ने 'मनमुख' कहा है। ऐसा मनुष्य जो मन के इशारे पर ही चलता है और अन्तरतर में विराजमान अन्तर्यामी गुरु की ओर मन को नहीं ले जाता, 'मनमुख' होता है। इस अवस्था में शब्दो पर कसरत करने का मोह उत्पन्न होता है।

अन्तरतर की वास्तविक अनुभूति को वह छू-छूकर हट जाता है। गुरुजी की वाणियों में भटके हुए लोगों के लिए 'मनमुख' शब्द का प्रयोग अधिक है। मनमुख मनुष्य खोटी राशि का होता है, परन्तु वह भी गुरु की शरण आने पर मुक्ति पाता है-

गुरु सरणाई छूटीऐ, मनमुख खोटी रास।

सन्त लोग कहते हैं कि जब वास्तविक ज्ञान का उदय होता है तो वह अन्तरतर में बैठे हुए महागुरु की ओर उन्मुख होता है। गुरु अपने भीतर ही विराजमान होता है। जब दृष्टि उसकी ओर फिरती है तो सही ज्ञान स्वयमेव उद्भासित हो उठता है। वह भव-बन्धन से छुटकारा देता है। वेदान्तशास्त्र में इसी को 'विद्या' कहते हैं- 'सा विद्या या विमुक्तये'। बाकी सब अविद्या है : मनमुख ज्ञान है। इसके लिए बाह्य जगत् से दृष्टि फेरकर अन्तर-तर में स्थित 'गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणं' महागुरु की ओर दृष्टि फिरानी पड़ती है।

एक बार उसे पा लेने पर प्रकाश स्वयं श्रवि-भूत होता है। निरन्तर ध्यान और मनन से वह अवस्था प्राप्त होती है जब एक क्षण के लिए लगता है कि ज्योति एकाएक जग उठी, पर तुरन्त ही वह सम्पूर्ण अस्तित्व को आत्मसात् करती है और गुरुमुखी ज्ञानी स्वयं गुरु-रूप हो जाता है। परम गुरु की असीम कृपा से नाम-रूपी रत्न प्राप्त होता है और मनुष्य मनमुख ज्ञान से निवृत्त होकर गुरुमुख ज्ञान प्राप्त करता है-

जिसनो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ।
गुरुमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ।।
अनुभवी सन्तजन बताते हैं, और सच्चे भक्तों को देखकर साधारण मनुष्य भी अनुभव करता है, कि निरन्तर भगवच्चिन्तन, एक अपूर्व रसायन है। उससे कभी न बुझनेवाली एक विचित्र प्यास निरन्तर बढ़ती ही जाती है। गुरु नानक ने स्वयं कहा है-
हरिचरण मकरन्द लोभित मनो अनदिनो मोहि होइ पिग्रासा।
क्रिपा जल देहि नानक सारिंग को होइ जाते तेरे नाइ बासा।

भगवान के चरण-कमल के मकरन्द-पान का लोभी मन-अमर निरन्तर और भी तृष्णार्त होता जाता है। यह वह प्यास है जो तृप्ति नहीं जानती, निरन्तर बढ़ती ही जाती है। वे भगवान को आर्तकण्ठ से पुकारकर कहते हैं, 'हे करुणानिधान! अपनी कृपा का जल देते रहो, वह कृपा-जल जो निरन्तर अपनी ओर खींचते-खींचते एक दिन जलाशय में ही निवास करने के लिए हंस को उत्प्रेरित करता है।' नानक को यह अभिलषित कृपा-जल पूरी मात्रा में मिला था। उन्होंने छककर इसका पान किया था और सारे संसार को भी बाँटा था।

जनम-साखियों की सहायता से नानक के आध्यात्मिक विकास की विभिन्न सीढ़ियों का आभास-मात्र मिलता है। गुरुग्रन्थ साहिब के पहले महले में संगृहीत पदों में उनका विकसित रूप ही उपलब्ध होता है। फिर भी हम उन भक्तजनों के ऋणी हैं जिन्होंने उनके जीवन का कुछ रूप जनम-साखियों के रूप में सुरक्षित रखा है। यद्यपि गुरु की शुद्ध वास्तविक चिन्मय मूर्ति उनकी वाणियों में ही मिलती है, पर वह उनका आरूढ़ रूप है। आरुरुक्षु रूप का यत्किचित् आभास जन्म-साखियाँ ही देती हैं।

साधना के ऊँचे शिखर पर पहुँचे हुए भक्त को 'आरूढ़' कहते हैं, चलती भाषा में उसे 'पहुँचा हुआ' ही कहा जाता है। पर वह जब मार्ग में चलते-चलते ऊपर उठने का प्रयास करता होता है, पहुँच जाने की आकांक्षा रखता है, उसे आरुरुक्षु कहते हैं। साधारणजन उसी में ज्यादा रुचि रखते हैं और वह जनम-साखियों से ही थोड़ा-बहुत देखने को मिलता है। इसीलिए इनके रचयिताओं के हम कृतज्ञ हैं।

कुछ साक्ष्यों के आधार पर गुरु नानक का जन्म अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल 3) को हुआ था, ऐसा माना गया है। पर काफी अर्से से उनकी जन्म तिथि का उत्सव कार्तिकी पूर्णिमा को मनाया जाता है। कुछ विद्वान् इस तिथि को ही उनकी सही जन्म तिथि मानते हैं। आजकल यह उत्सव इसी तिथि को मनाया जाता है। वैसे तो गुरुजी-जैसे महानुभाव की जो भी जन्म तिथि हो वही पवित्र और स्मरणीय है, पर मुझे कार्तिकी पूर्णिमा अधिक अर्थपूर्ण लगती है। शरद् ऋतु की इस अन्तिम पूर्णिमा को सारे भारत में न जाने कब से बहुत महत्त्व दिया जाता है। इस तिथि के साथ भारतवर्ष की धर्म-साधनाओं का विशाल और समृद्ध इतिहास जुड़ा हुआ है। कार्तिकी पूर्णिमा शामक ज्योत्स्ना से अधिक निर्मल और पवित्र होती है।

गुरु नानक जैसे निर्मल यशवाले महामानव के आविर्भाव के लिए इस तिथि को अगर उपयुक्त समझा गया तो उचित ही हुआ। अगर उनकी मृण्मय काया के आविर्भाव की यही तिथि हो तो यह सोने में सुगन्ध है। वस्तुतः सिक्ख गुरुओं ने मृण्मय गुरु-रूप को कभी महत्त्व नहीं दिया। उनके चिन्मय रूप को - ज्ञानमय विग्रह को- ही वे अधिक महत्त्व देते आये हैं। इसके दो बड़े प्रमाण हैं।

एक तो गुरु की वाणी को ही गुरु का स्वरूप समझना और दूसरे, गुरु-परम्परा में विन्दु-सृष्टि को अधिक महत्त्व न देकर नाद-सृष्टि की महिमा पर बल देना। गुरु की परम्परा दो रूपों में चलती है: (1) विन्दु-सृष्टि, जो पुत्र-पौत्र-परम्परा का, और (2) नाद-सृष्टि, जो शिष्य-प्रशिष्य-परम्परा का नाम है। गुरु नानक के पुत्र थे, पर दूसरे गुरु का स्थान उन्हें न मिलकर शिष्य-प्रशिष्यों को मिला।

ऐसा भी हुआ है कि बाद में पुत्र-परम्परा और शिष्य परम्परा एक-दूसरे से मिल गयी है, पर उसका कारण योग्यता ही रही है। पुत्र यदि गुरु के जलाये प्रदीप को वहन करने में समर्थ है तो वह भी नाद-परम्परा का ही उत्तराधिकारी है। स्वयं को सिक्ख या शिष्य कहने का अर्थ भी नाद-परम्परा को ही अधिक गौरव देने की भावना का फल है। इसलिए गुरु की जन्म तिथि को यदि पूर्ण, शामक और निर्मल ज्ञान तथा परमानन्द का विग्रह या प्रतीक शरत्-पूर्णिमा के चन्द्रमा के साथ जोड़ दिया गया तो इसमें न तो कोई आश्चर्य है, न अनौचित्य।

कार्तिकी पूर्णिमा का चन्द्रमा निर्मल और शामक ज्ञान का प्रतीक है-

जगन्तापहरं दिव्यं परमानन्दविग्रहम् । वन्दे शरच्चन्द्रनिभं गुरु ब्रह्मस्वरूपिणम् ।।
परन्तु उससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मध्यकाल के निर्गुणमार्गी सन्तों में गुरु नानक का ही व्यक्तित्व शरच्चन्द्र के समान स्निग्ध, शामक और आह्लादजनक है।

उनके पूर्ववर्ती सन्तों में कबीर अद्भुत शक्तिशाली व्यक्तित्व लेकर पैदा हुए थे। परन्तु उनके व्यक्तित्व में तीखापन भी है। वे कसकर व्यंग्य करते हैं, तीखी और तिलमिला देनेवाली आलोचनाओं से पण्डित और मौलवी दोनों पर चोट करते हैं, परन्तु नानक का व्यक्तित्व अत्यन्त मृदु और शान्त है। उनकी भाषा में शरच्चन्द्रमा की किरणों की ही भाँति शामक गुण है। उनके व्यंग्यों में भी तीखापन या कटुता नहीं है, यद्यपि वे चोट करने में भी कम समर्थ नहीं हैं।

इसीलिए मध्यकालीन निर्गुणमार्गी सन्तों में सच्चे अर्थों में वे शरच्चन्द्र हैं। उनकी आविर्भाव-तिथि इस पूर्णिमा को मानने के संगत कारण हैं। यह केवल भक्तों की कल्पना नहीं है, सुचिन्तित योजना है। निर्मल आकाश में शुभ्र राजहंस की तरह भ्रमण करनेवाला चन्द्रमा ही उनके व्यक्तित्व की ओर संकेत कर सकता है। उनकी मीठी वाणियों में अजीब आकर्षण है, मधुर वचन को वे भक्त का आवश्यक गुण मानते हैं-

बाबा बोलीऐ पति होइ।
ऊतम से दर ऊतम कहीअहि नीच करम बहि रोइ।।

सच पूछिए तो मध्यकालीन सन्तों की ज्योतिष्क-मण्डली में गुरु नानकदेव ऐसे सन्त हैं जो शरत्काल के पूर्णचन्द्र की तरह ही स्निग्ध, उसी प्रकार शान्त-निर्मल रश्मि के भाण्डार थे।

कई सन्तों ने कस-कसके चोटें मारीं, व्यंग्य-वाण छोड़े, तर्क की छुरी चलायी, पर महान् गुरु नानकदेव ने सुधालेप का काम किया। यह आश्चर्य की बात है कि विचार और आचार की दुनिया में इतनी बड़ी क्रान्ति ले आनेवाला, किसी का दिल दुखाये बिना, किसी पर आघात किये बिना, कुसंस्कारों को छिन्न करने की शक्ति रखने-बाला, नयी संजीवनी धारा से प्राणिमात्र को उल्लसित करनेवाला यह सन्त मध्यकाल की ज्योतिष्क-मण्डली में अपनी निराली शोभा से शरत् पूर्णिमा के पूर्णचन्द्र की तरह ही ज्योतिष्मान् है। इसलिए इस दिन उसकी याद आये बिना नहीं रह सकती । वह सब प्रकार से लोकोत्तर है। उसका उपचार प्रेम और मैत्री है। उसका शास्त्र सहानुभूति और हित-चिन्ता है। वह कुसंस्कारों के अन्धकार को अपनी स्निग्ध ज्यो

से भेदता है, मुमूर्षु प्राणधारा को अमृत-भाण्ड उँडेलकर प्रवाहशील बनाता है। वह भेदों में अभेद देखता है, नानात्व में एक का सन्धान बताता है, वह सब प्रकार से निराला है। शुभ्र ज्योत्स्ना से धवलित कार्तिकी पूर्णिमा को अनायास उसके चरणों में नत हो जाने की इच्छा होती है।

गुरु नानक ने प्रेम का सन्देश दिया है, क्योंकि मनुष्य-जीवन का जो चरम प्राप्तव्य है वह स्वयं प्रेमरूप है। प्रेम ही उसका स्वभाव है। प्रेम ही उसका साधन है। वे कहते हैं- 'अरे ओ मुग्ध मनुष्य ! सच्ची प्रीति से ही तेरा मान-अभिमान नष्ट होगा, तेरी छोटाई की सीमा समाप्त होगी, परम मंगलमय शिव तुझे प्राप्त होगा । उसी सच्चे प्रेम की साधना तेरे जीवन का परम लक्ष्य है। वाह्य आडम्बरों को तू धर्म समझ रहा है, बद्धमूल संस्कारों को तू आस्था मानता है? नहीं प्यारे, यह सब धर्म नहीं है। धर्म तो स्वयं रूप होकर भगवान के रूप में तेर भीतर विराजमान है। उसी अगम अगोचर प्रभु की शरण पकड़। क्या पड़ा है इन छोटे अहंकारों में ! ये मुक्ति के नहीं, बन्धन के हेतु हैं।'

गुरु की वाणियों में एक अद्भुत सहज भाव और पवित्र निष्ठा है। इसमें प्रभु के लिए व्याकुल पुकार है, श्रात्म-समर्पण का तीव्र आवेश है और अपनी दुर्बलताओं से विचलित होने की सम्भाव-नाओं के प्रति सजगता भी है। 'हे प्रभो! यदि मोतियों के रत्न-जटित महल हों और उनमें कस्तूरी, केशर, अगरु और चन्दन की लुभावनी सुगन्ध का लेप भी मिल रहा हो तो भी ऐसा हो कि इस विशाल ऐश्वर्य से मेरा मन विचलित न हो जाये और मैं तुम्हारा नाम भूल न जाऊँ' -

मोती त मन्दर ऊसरहि रतनी त होहि जड़ाउ, कस्तूरि कुंगू अगरि चन्दन लीपि आवै चाउ।
मतु देखि भूला वीसरै तेरा चित्ति न आवै नाउ ।।
हाय-हाय, हरि के बिन जीवन कैसा ! बलिहारी जाऊँ उस हरि की। मैंने अपने गुरु को देख लिया है। हरि से भिन्न और कोई ठिकाना नहीं है।

मालिक मेरे, यदि हीरों और लालों से जडी धरती हो, उस पर लालों से जड़ा पलंग हो और उस पर मणि-रत्नों के आभरण से भूषित मन-मोहिनी बाला प्रेम-रंग की वार्ता करने का प्रसाद दे रही हो तो भी ऐसा हो कि इस मनोरम सौन्दर्य से मेरा मन विचलित न हो जाये और मैं तुम्हारा नाम भूल न जाऊँ'-

हरि बिनु जीऊ जलि बलि जाउ।
मैं आपणा गुरु पूछि देखिश्र, अवरू नाहीं थाउ। धरती त हीरे लाल जड़ती पलंधि लाल जड़ाउ। मोहणी मुखि मणी सोहै करै रंगि पसाउ, मति देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै ताउ।।

इस मधुर तन्मयता ने गुरु की वाणी में अपूर्व माधुर्य भर दिया है। वे हउम या अहंकार भाव को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु समझते हैं और इसके त्याग के द्वारा ही भगवान की प्राप्ति को सुलभ मानते हैं-

मन रे हउमै छोड़ि गुमानु। हरि गुरु सरवरु सेवि तू पाहिं दरगह मानु।।

जनम-साखियों में गुरु नानक की यात्राश्रों का बड़ा मनोहारी चित्र बनता है। इनमें निश्चय ही कुछ कल्पना और श्रद्धातिरेक जुड़े हुए हैं। पर वे महान् परिव्राजक थे, इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता और इसमें भी कोई सन्देह नहीं रह जाता कि इन यात्राओं में उनका प्रधान सम्बल उनका सत्य-परायण सहज जीवन और निरहंकार मधुर व्यक्तित्व ही था। अपने जीवन के सत्तर वर्षों में लगभग एक-तिहाई उम्र उन्होंने यात्रा में ही बितायी थी। उन दिनों की कठिन परिस्थितियों में उनकी यात्राएँ अद्भुत साहसपूर्ण कही जायेंगी। पाँच बार उन्होंने लम्बी यात्राएँ कीं । उद्देश्य साधु-संग और भगवद्भक्ति का प्रचार था।

पहली यात्रा पूरब की थी। उस समय उनकी आयु 31 वर्ष की थी। साथ में उनके प्रिय शिष्य मरदाना थे। उनकी यह यात्रा कामरूप तक की थी। वे पानीपत, गोरखमाता, वाराणसी, नालन्दा होते हुए कामरूप गये और फिर अपने स्थान को लौट श्राये । लौटते समय पाकपत्तन (माण्टगुमरी) में शेख फ़रीद के शिष्य शेख इब्राहीम से धर्मालाप किया। सर्वत्र उनके मोहक व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता था। मरदाना की बीन पर उनकी रचनाएँ श्रोताओं को मुग्ध कर देतो थीं। दूसरी यात्रा सन् 1506 में शुरू हुई। इस बार वे दक्षिण की ओर गये। सिरपा, बीकानेर, अजमेर, आबू होते वे पुरी गये और उधर से नागपत्तन और श्रीलंका तक उनके जाने का विवरण मिलता है। इस बार उनके साथ सैदो और धेबी नाम के दो जाट शिष्य भी थे।

तीसरी यात्रा 8वर्ष बाद सन् 1514 में शुरू हुई। इस यात्रा में वे उत्तर की ओर कैलास और मानसरोवर की ओर गये । साथ नासू और सीहा नाम के दो शिष्य थे। मानसरोवर में उनका योगियों के साथ सत्संग हुआ। इसी यात्रा में वे तिब्बत और दक्षिणी चीन भी गये। चौथी यात्रा पश्चिम की ओर हुई। वे हाजी के रूप में मक्का गये। बताया जाता है कि इसी यात्रा में वे यरूशलम, दमिश्क और अल्लेप्पों होते हुए बग़दाद पहुँचे और अनेक मुस्लिम सन्तों और पण्डितों से सत्संग किया। उनकी प्रेममयी वाणी ने सर्वत्र जादू का असर किया। कहते हैं कि बग़-दाद में उन्होंने बहील के शाह को सिक्ख धर्म की दीक्षा दी। पंजाब-यात्रा में उन्होंने मुख्य रूप से पंजाब का भ्रमण किया।

उन्होंने पाकपत्तन, देयालपुर, कगापुर, सुलतानपुर, जलालाबाद, तिरिया आदि स्थानों में धर्मप्रचार किया। वे जब बटाला होते हुए अमीनाबाद पहुँचे तो बाबर ने उन्हें साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया और इस प्रकार बाबर से उनकी भेंट सम्भव हुई। गुरुजी ने अपनी मीठी और स्पष्ट वाणी से बाबर के कुकृत्यों की खरी आलोचना की। बाबर पर उसका प्रभाव भी पड़ा। इस प्रकार उन्होंने अपनी लम्बी यात्राओं से देश का कोना-कोना छान डाला। पड़ोसी देशों की भी यात्रा की और एक ओर जहाँ उन्होंने मनुष्यों के दुःख कष्ट का अनुभव किया, वहीं उनके अन्धविश्वासों और गलत मान्यताओं को दूर करने का प्रयास भी किया। यात्रा-वृत्तान्तों में कई करामाती प्रसंगों की भी चर्चा है।

पर उनको हटा देने पर गुरु की अत्यन्त साहसिक प्रकृति, भगवान पर अखण्ड विश्वास, अपूर्व जिज्ञासा और दीनदलित पर दयाभाव का परिचय अवश्य मिलता है। उनकी वाणी की मोहकता, उनके व्यक्तित्व का आकर्षण और उनकी भगवन्निष्ठा का प्रभाव इन यात्रा-वृत्तान्तों से स्पष्ट हो जाता है। यद्यपि परवर्ती पुस्तकों में उन्हें शास्त्रार्थी विजेता के रूप में चित्रित करने का भी प्रयास है पर यह उनकी नहीं, उस काल की श्रद्धालु जनता की मनोवृत्ति का प्रतिफलन है। गुरु नानक बहुत वाद-विवाद में नहीं पड़ते थे। वे अपने पवित्र आचरण के द्वारा ही विरोधी को सत्य का साक्षात्कार करा देते थे। कितने ही विरो-धियों ने जो उनके चरणों में आत्म-समर्पण किया वह शास्त्रार्थ-वैदुष्य को देखकर नहीं, अत्यन्त प्रभावशाली आचरण और मधुर व्यवहार के कारण ही किया ।

गुरु के जीवन-काल में ही उनका प्रभाव, सूर्य के प्रकाश के समान फैलने लगा था। उनके मन में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं था। उन्होंने किसी की निन्दा नहीं की और एक पर-मात्मा को छोड़कर किसी की स्तुति भी नहीं की। दुःख से वे उद्विग्न नहीं हुए, सुख की वासना मन में नहीं रखी। वे जीवन में कभी भी लोभ, मोह और अभिमान के वशीभूत नहीं हुए, हर्ष और शोक से विचलित नहीं हुए। भगवान का परम अनुग्रह जिसे मिल जाता है वही इस प्रकार का विगतस्पृह हो सकता है। गुरुजी ऐसे लोगों को 'निराश' कहते हैं। निराश, अर्थात् जिसके मन में प्राप्ति और संचय की कोई स्पृहा न हो। गुरु की कृपा से, प्रभु के अनुग्रह से ही यह सम्भव है।

जो गोविन्द के साथ पानी की धारा में पड़े हुए पानी की बूंद के साथ एकमेक हो गया होता है, उसे ही इस प्रकार की निस्पृहता प्राप्त होती है। गुरुजी अपनी यात्राश्रों में सैकड़ों प्रकार के लोगों से मिले । विरोधियों से भी और प्रशंसकों से भी; चोरों, ठगों श्रौर लुटेरों से भी; पण्डितों, योगियों और तान्त्रिकों से भी; शेखों, काज़ियों और मुल्लाओं से भी - सर्वत्र उनके मृदुल स्वभाव और सत्यशील आचरण ने विजय पायी। कटुता कहीं नहीं आयी। विरोध ने वैर का रूप कभी नहीं लिया। यह ऐसी सिद्धि है जिस पर सहज ही विश्वास करना कठिन है, पर है सत्य। ऐसे ही निवँर, निर-हंकार, निस्पृह मनुष्य के माध्यम से परमात्मा अपना तेज संसार को देता है। एक भजन में ऐसे भक्तजन का चित्रण इस प्रकार किया गया है-

जो नर दुबु मै दुखु नही मानै।
सुख सनेहु अरु भै नहिं जाके कंचन माटी जानै । नहि निन्दा नहि अस्तुति जाके लोभ मोह अभिमाना। हरस सोक ते रहे नियारउ नाहिं मान अपमाना।
आसा मनसा सकल त्यागै जग ते रहै निरासा।
काम क्रोध जिह परसे नाहीं तेहि घटि ब्रह्म निवासा।
गुर किरपा जिह नर कउ कीनीं तिह इह जुगुति पिछानी । नानक लीन भयो गोविन्द सिउ ज्यों पानी संगि पानी।।

वस्तुतः यही गुरु के आकर्षक व्यक्तित्व का रहस्य भी है और स्वरूप भी । उन्होंने तथाकथित छोटी जातियों को भी भर-पूर सम्मान दिया। भेदभाव तो उनमें लेशमात्र नहीं था। हिन्दू और मुसलमान दोनों को वह समान भाव से स्नेह करते थे। कैसा भेदभाव ? गुरु ने कभी अपने को किसी से अलग नहीं माना। उन्होंने कहा था कि एक ही ज्योति से संसार उत्पन्न किया गया है, इसमें कौन अच्छा है कौन बुरा -

एक जोति ते जग ऊपजा कौन भले कौन मन्दे!
किसी ने ठीक ही कहा था-
नानक शाह फकीर
हिन्दू का गुरु मुसलमान का पीर।

गुरु नानकदेव के भजनों में निरीह भक्ति-निर्भर सन्त का जीवन प्रतिफलित हुआ है। विचारों में उनका मत कबीर आदि निर्गुणिया सन्तों के मत से मिलता-जुलता है, लेकिन न तो इन भजनों में कबीर का अक्खड़पन है और न खण्डन-मण्डन की प्रवृत्ति। नानक कबीर की भाँति समाज के निचले स्तर से नहीं आये थे, इसलिए उनकी उक्तियों में भुक्तभोगी की तीव्रता नहीं है। अत्यन्त सहज उदार भाव ही उनकी उक्तियों का प्रधान आकर्षण है। जाति-पाँति, छुग्राछूत और बाह्याचारों के प्रति आक्रमण का भाव इनकी उक्तियों में भी है। किन्तु यह आक्रमण प्रधान रूप से बौद्धिक है, कबीर के समान अनुभूतिजन्य नहीं है।

विनय और मृदुता में इनकी तुलना भक्तवर रैदास के साथ की जा सकती है। परन्तु यदि इनके भक्तों की त्यागभावना, दुःख बर्दाश्त करने की शक्ति और अपार धैर्य को देखा जाये तो यह मानना पड़ेगा कि जैसी अद्भुत प्रेरणादायिनी शक्ति इनकी वाणियों ने दी है वैसी मध्ययुग के किसी अन्य सन्त की वाणियों ने नहीं दी है। इतिहास साक्षी है कि सिक्ख भक्तों को दीवार में चुन दिया गया है, फाँसी पर लटका दिया गया है और जितनी प्रकार की अमानुषिक पीड़ाएँ दी जा सकती हैं, सब दी गयी हैं। और फिर भी इन भक्तों ने निराशा या पराजय का भाव नहीं दिखाया।

जिन वाणियों से मनुष्य के अन्दर इतना बड़ा अपरा-जेय आत्मबल और कभी समाप्त न होनेवाला साहस प्राप्त हो सकता है, उनकी महिमा निस्सन्देह अतुलनीय है। सच्चे हृदय से निकले हुए भक्त के अत्यन्त सीधे उद्‌गार और सत्य के प्रति दृढ़ रहने के उपदेश कितने शक्तिशाली हो सकते हैं, यह नानक की वाणियों ने स्पष्ट कर दिया है। इनकी भाषा में किसी प्रकार का घुमाव या जटिलता नहीं है। बहुत ही सीधी-सादी भाषा और बहुत ही निर्मल प्रतिपादन-शैली- यही नानक की रचनाओं की विशेषता है। इनकी निरीहता में कोई हीनता-ग्रन्थि नहीं, विरुद्ध पड़नेवाले विचारों के प्रति कोई हिंसा का भाव भी नहीं, और जो लोग सत्य मार्ग से विचलित हैं उनके लिए घृणा का भाव भी नहीं।

इनकी सभी वाणियों में एक बात प्रमुख रूप से आयी है-जो भी सुनना चाहे उसे वे सुना देना चाहते हैं कि ऐ मनुष्य, तुझे बड़े पुण्य से मनुष्य का शरीर प्राप्त हुआ है, उसे व्यर्थ के मिथ्याचारों में फंसकर यों ही न गँवा दे-रैणि गँवाई सोइ कै, दिवसु गवाइआ खाइ। हीरे जैसा जनमु है, कउडी बदले जाइ।।

जीवन की सार्थकता वे भगवान के नामस्मरण और निरन्तर ध्यान में मानते थे। जिसे यह महान् तत्त्व प्राप्त हो गया है, उसके लिए किसी भी अन्य तत्त्व की आवश्यकता नहीं। और सारी बातें गौण हैं, मुख्य है भगवानका भजन । इसी परम तत्त्व को पाने के कारण संसार की समस्त पीड़ाएँ और यातनाएँ विफल हो जाती हैं। नानक और उनके अनुयायियों ने इस परम सत्य को पा लिया था ।

गुरु की वाणियों को पढ़ने पर उनके अत्यन्त निरीह निरहं-कार और समर्पित-चित्त मीठे व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। महाप्रभु चैतन्य देव ने कहा था- 'तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना ।' (अपने को तृण से भी अधिक नीचे और वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु होकर सदा भगवान की सेवा करनी चाहिए ।) गुरु नानक ने और भी कहा है- 'मालिक मेरे, मैं तुझसे यही माँगता हूँ कि जो लोग नीच से भी नीच जाति के समझे जाते हैं, मैं उनका साथी बनूँ। बड़ा कहानेवाले नामधारी लोगों के साथ चलने की मेरी इच्छा नहीं है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि तेरी कृपा-दृष्टि वहीं होती है जहाँ इन गरीबों की सम्हाल होती है'-नीचा अन्दरि नीच जाति नीची हू अति नीचु।
नानकु तिन कै संगि साथि वडिग्रा सिउ किआ रीस। जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस।।

गुरु नानक मानते थे कि एक परमात्मा ही अखण्ड और सर्व-शक्तिमान् सत्ता है। उसी की आज्ञा से यह समस्त चराचर जगत् रूपायित हो रहा है। वह हुक्मी निराकार है और उसी के हुक्म से सबकुछ आभासित होता है। वह हुक्म तत्त्व बहुत-कुछ अनु-ग्रह का समानधर्मा है, कुछ अधिक भी है। भक्तों में भगवान के अनुग्रह की बड़ी महिमा गायी गयी है। वह भगवान का अनुग्रह या हुक्मी का हुक्म है जिससे जीव उनका 'निज जन' बनता है।

उसी से मनुष्य बड़प्पन पाता है-

हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई।
हुकमी होनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई।।

जिसने इस हुकम को जान लिया है उसमें अहंकार और ममता का भाव समाप्त हो जाता है। नानक ने इस रहस्य को समझ लिया था, इसलिए उनमें अहंकार या भ्रमकार का लेश भी
नहीं मिलता-

हुकमै अन्दरि सभ को बाहरि हुकम न कोइ।
नानक हुकमै जे बुझै त हौमै कहै न कोइ।।

ऐसे ही सर्पितचेता तन्मय महापुरुष के बारे में कहा जाता है कि उसकी वाणी विश्वव्यापी छन्दोयोजना के साथ एकमेक हो जाती है। वह जो कुछ कहता है वह उत्तम काव्य बन जाता है, जो कुछ करता है वह धर्म बन जाता है, जो कुछ सोचता है वह दर्शन बन जाता है। विश्वव्यापी चेतना के साथ एकमेक बनी इस सरल-सहज वाणी में काव्य मूर्तिमान हो उठा है। वैसी प्रवाहमयी अर्थप्रसू वाणी में ब्रह्माण्डव्यापी सहज ज्योति मूर्तिमती
हो उठी है-

'सारा आकाश विराट थाल है जिसमें सूर्य और चन्द्रमा के दीपक सजे हुए हैं। नक्षत्र-मण्डल इस थाल के मोती हैं, मलया-निल ही धूप है और वायु ही चंवर कर रही है। सारी वनराजि रंग-विरंग फूलों से इस आरती को साज रही है। यह कैसी अद्भुत श्रारती है तेरी, हे भव-खण्डन प्रभो ! तुम्हारा अनहद नाद ही इस विराट भारती की भेरी की भाँति बज रहा है। सहस्र-सहस्र मूर्तियों में तू-ही-तू सर्वत्र विराजमान है।

सहस्र-सहस्र तेरे चरण हैं और फिर भी तेरे कोई चरण नहीं है, क्योंकि तू निराकार है। समस्त संसार में व्याप्त सहस्र गन्ध की सुरभि तुझसे ही निकल रही है। तेरी ही ज्योति सबमें जगमगा रही है और उसी महान् ज्योति से सभी प्रकाशित हो रहे हैं। गुरु की साखी से ही यह ज्योति प्रकट होती है। हे मेरे अगम अगोचर, जो तुझे अच्छा लगे वही तेरी आरती है।'

गगनमै थालु रविचन्द दीपक बने तारिकामण्डल जनक मोती।
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलन्त जोत ।
कैसी आरती होइ। भवखण्डना तेरी आरती।
अनहहा सबद बाजन्त भेरी। सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि
कउ सहस मूरति नना एक तोही।
सहस पद विमल नन एक पद गन्ध बिन सहस तव गन्ध
इव चलत मोही।
सभ महि जोति जोति है सोइ।
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ।
गुरु साखी जोति परगटु होइ।
जो तिसु भावै सु आरती होइ।

कहते हैं कि जब गुरु जगन्नाथपुरी गये थे और वहाँ की आरती देखी थी तब यह ब्रह्माण्डव्यापिनी आरती अनायास उनके मुख से निकल पड़ी थी। यह सही अर्थों में भावनाओं का अनायास उद्रेक मुखरित करती है- जिसे 'स्पान्टेनियस् आउटबर्स्ट आफ फीलिंग्स' कहा करते हैं। कविता और होती क्या है !

नानक की श्रद्धा और भक्ति का आश्रय यही विराट सत्ता है। वह निराकार, अखण्ड, अद्वय सर्वशक्तिमान है। उसी के हुक्म से यह विश्व रूपायित हो रहा है। युग-युग के भारतीय मनीषियों की यह वाणी नयी शक्ति और नया तेज लेकर गुरु के मुख से उच्चरित हुई थी । गीता में कहा गया है- 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छद्धः स एव सः ।' मनुष्य श्रद्धामय है, जो जिस पर श्रद्धा करता है, वह वही हो जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि भक्तजनों ने गुरु को भगवान के स्वयंरूप के रूप में देखा । परन्तु वह भक्तों का दृष्टिकोण है। स्वयं नानक ने अपने-आपको सर्वा-त्मना भगवान को समर्पित कर दिया था। निरीह शरणागत भक्त की भाषा में उन्होंने कहा था-

जेता देहि तेता हउ खाउ।
बिश्र दरु नाहीं के दरि जाउ।
नानकु एकु कहै अरदासि।
जीउ पिण्ड सभु तेरै पासि।

परम गुरु को आश्चर्य चकित भाव से अनुभव करते हुए उन्होंने कहा है- 'हे प्रभो ! वह द्वार और घर कैसा है जिसमें तू बैठकर सभी जीवों की सँभाल कर रहा है! अनेक असंख्य पूजा और भजनवाले तेरे गुणों का गान कर रहे हैं। न जाने कितने राग और कितनी रागिनियाँ और न जाने कितने उन्हें गानेवाले हैं। हवा, पानी और पवन तेरे द्वार पर खड़े होकर तेरा यशोगान कर रहे हैं। चित्रगुप्त भी, जो कार्य-अकार्य का लेखा-जोखा रखते हैं वह भी तेरे ही गुणगान करते हैं। तेरे ही सँवारे हुए शिव, ब्रह्मा
और देवी तेरे गुणगान करते हुए शोभा पा रहे हैं। इन्द्रराज भी इन्द्रासन पर बैठे हुए तेरे ही गुणगान कर रहे हैं। सिद्ध और साधु लोग समाधि में मगन होकर तेरे ही गुणों का मनन करते हैं।

जो लोग जितेन्द्रिय, सत्यवादी, सन्तोषी और वीर हैं वे लोग भी तेरे ही गुणों का गुणगान करते हैं। बड़े-बड़े पण्डित, ऋषि, मुनि युग-युग से वेदों के द्वारा तेरी ही यशोगाथा लिख रहे हैं। मन मोहनेवाली रमणियाँ स्वर्ग और पाताल लोक में तेरे ही गुणों का गान कर रही हैं। तेरी उत्पन्न की हुई सृष्टि और अड़सठ तीर्थ, बड़े-बड़े योद्धा और महाबली शूरगण तेरे ही गुणों का गान करके बलशाली बने हैं। चार खाणि और चौरासी लाख योनि के जीवन तेरा यशोगान कर रहे हैं।

अखण्ड मण्डल और ब्रह्माण्ड में तैने जिन लोगों को धारण कर रखा है वे तेरा गुणगान कर रहे हैं। वे जीव, जो तुझे प्राप्य हैं, गुणगान करके तेरी रसमय भक्ति का आस्वादन कर रहे हैं। मैं कैसे तेरी रचना की विशालता का वर्णन करूँ ? यह सत्य स्वरूप तो चिरकाल सत्य है, प्रचल सनातन है। प्रभु ने रंगविरंग की माया की सृष्टि की है। वह प्रभु, स्वयं सृष्टि की रचना करता है और स्वयं उसे देखता है। वह सर्वसमर्थ है। जो उसे अच्छा लगता है वही करता है। वह बादशाह है और बादशाहों का बादशाह है। नानक भी प्रभु की आज्ञा से ही इस लोक में निवास कर रहे हैं।'

समर्पण की महिमामयी मूर्ति है प्रिया। भक्त अपना चरम प्रेम-निवेदन नारी के रूप में करता है। इसी भावना का परिपाक मधुर रस में होता है। आत्म-समर्पण के चरम उल्लास में नानक भी कह उठते हैं-

हम घरि साजन आये। साचै मेलि मिलाए।
सहजि मिलाए हरि मन भाए पंच मिले सुखु पाइन।
साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ । अनदिनु मेल भइआ मनु मानिआ घर मन्दर सोहाए। पंच सबद धुनि अनहद बाजे हम घरि साजन आए।...सखी मिलहु रसि मंगल गावहु हम घरि साजन आए।। 'आओ बहनो, सहेलियों के गले मिलें और मिलकर अपने परम समर्थ प्रिय की प्रेम-कहानियों की चर्चा करें।

वाह री सखियो, उस सजे साहब में सब गुण-ही-गुण हैं। तभी हममें सारे अवगुण आ गये हैं, क्योंकि हम सीमा से बँधे हुए हैं, वह असीम है। उसी के बल से समस्त जीव में शक्ति संचरित होती है। वही तुम्हारा स्वामी है। उसी के यश का हम गान करते हैं। आओ, सुहागिनों से पूछें कि किस प्रकार उन्होंने उस महान् प्रभु का प्रेम प्राप्त किया। बहनो, वे बतायेंगी कि उन्होंने सहज सन्तोष का श्रृंगार किया था और मीठी बानी खोलकर प्रभु को प्राप्त किया था। गुरु के शब्दों को सुनने के बाद उसे रसीले प्रिय से मिलन हुआ था ।'

द्भुत है गुरु की वाणी की सहज बेधक शक्ति । कहीं कोई आडम्बर नहीं, कोई बनाव नहीं, सहज हृदय से निकली हुई सहज प्रभावित करने की अपार शक्ति । सहज जीवन बड़ी कठिन साधना है। सहज भाषा बड़ी बलवती आस्था है। सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। गुरु का अनाडम्बर सहज धर्म ऐसी ही सहज वाणी से प्रचारित हो सकता था। कितनी अद्भुत निर्णयमान शैली है। कहीं भी पाण्डित्य का दुर्धर बोझ नहीं और फिर भी पण्डितों को आन्दोलित करनेवाली यह वाणी धन्य है।

कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़े पुराना। कोई नामु जपै जपमाली - लागै तिसै धिआना।
अबही कबही किछ न जाना तेरा एको नाम पछाना। न जाना हरे मेरी कवण गते हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी
कोई किरपा राखहु मेरी लाज पते।

ऐसी मीठी, निरहंकार सीधी वाणी से गुरु ने भटकती जनता को उसका लक्ष्य बताया। आज विद्वान् चकित हैं, पण्डित अचरज में हैं- कितनी बड़ी ताकत और कैसा निरीह रूप ! कालिदास ने ठीक कहा था- 'ध्रुवं वपुः कांचन पद्मर्धार्म यन्मृदुप्रकृत्या च संसार मेव च ।' जो रून से स्वर्णकमल के धर्मवाला होता है, वह निश्चय ही स्वभाव से मृदु होता है किन्तु सारवान भी होता है।

सारवन ही होता है। गुरु नानक देव ऐसे ही कांचन पद्मधर्मी महामानव थे-

'मृदु प्रकृत्या च संसार मेव च।'
ऐसे थे नानक, शरणागति के विश्वासी, मधुर, शान्त, प्रेमी,
निरहंकार।

उनका ऐसा ही स्वरूप है। गुरु ने कहा- 'अपने-आपको उलीचकर दे दो, जो कुछ है उसे महाग्रहीता को निछावर कर दो, इसलिए नहीं कि ऐसा करने से सामाजिक मंगल की साधना होती है। बल्कि इसलिए कि वह प्रभु स्वयं महादाता है, परम देवणहारू है, उसका प्रेम इसी मार्ग से पाया जाता है। यह वह भक्ति है जो सबकुछ को छापकर सत्य का जयोद्घोष करती है।'

इतिहास साक्षी है कि गुरु के इन उपदेशों ने सामाजिक क्रान्ति का द्वार खोल दिया। वह प्रक्रिया जारी है। आज भी उसकी प्रभाविनी शक्ति कार्यरत है।

पाँच सौ वर्ष बीत गये। भारतवर्ष के विशाल श्राकाश के नीचे न जाने कितनी घटनाएँ घटीं, धरती को न जाने कितनी बार रक्तस्नान से सिक्त होना पड़ा, अन्याय और शोषण ने न जाने कितने ताण्डव किये, पर कार्तिकी पूर्णिमा का चाँद अपनी स्निग्ध शामक शोभा उसी प्रकार बिखेरता जा रहा है, गुरु की पवित्र वाणी उतनी ही स्निग्ध ज्योति विकीर्ण कर रही है।

उतरो महागुरो, एक बार और उतरो ! हम तुम्हारी ऊँचाई तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। आज भी मनुष्य की क्षुद्र अहमिका विक्षिप्त नर्तन कर रही है, आज भी भय और लोभ की आशंका और तृष्णा की धमाचौकड़ी व्याप्त है। एक बार और भ्राओ, रक्षा करो मनुष्यता की, धर्म की, सत्य की ! बड़ी आशा और विश्वास से हम तुम्हारा स्मरण कर रहे हैं। जय हो तुम्हारी अमर वाणियों की, जय हो तुम्हारी शरणागति की, जय हो तुम्हारी निर्मल पवित्र स्मृति की, जय हो, जय हो!
 


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