महामाया बनाम लक्ष्मी
दो हाथियों द्वारा प्रक्षालित कमलासन पर बैठी बुद्ध की माता माया देवी
शान्ति स्वरूप बौद्धसूचना के आलोक में जब हमने यह खोजना आरंभ किया कि यह प्रतिमा कहां-कहां पर और मिलती है तो और भी विस्मयकारी तथ्य प्रकाश में आए। ये प्रतिमाएं प्रायः सभी बौद्ध स्थलों पर ही मिलती हैं। इनमें प्रमुख हैं सांची का धम्मद्वार, भरहुत के भग्नावशेष, अमरावती के भग्नावशेष, बोधगया रेलिंग, अजन्ता, गांधार, गजलक्ष्मी विहार, ऐलोरा। यद्यपि कहने को तो कुछ हिन्दू स्थलों में भी यह प्रतिमा अंकित है, किन्तु यह बौद्ध धर्म पर प्रतिक्रांति की विजय के बाद की कृतियां हैं।
भारत के धार्मिक क्षेत्र विशेषकर हिन्दू धर्म में बहुत से पात्र आपको ऐसे मिल जाएंगे, वास्तव में जिनका कभी कोई अस्तित्व ही नहीं रहा। मगर आज प्रचार तंत्र की कृपा के कारण वे वास्तविक पात्रों से भी अधिक वास्तविक लगते हैं। ये पात्र या तो कपोलकल्पित होते हैं या परास्त लोगों की विरासत पर अपना कब्जा जमाने की दृष्टि से उनके मौलिक स्वरूप में परिवर्तन करके विजेता वर्ग द्वारा अपने अनुकूल बना लिए गए हैं।
इसी मानसिकता के बल पर विजेता वर्ग अपने दोषों को दूसरों के यानी परास्त वर्ग के मत्थे मढ़ देने में भी सफल हो जाते हैं, बिलकुल उसी प्रकार जिस प्रकार परास्त लोगों की कीर्ति को छीनकर, उस पर अपना रंग चढ़ा कर स्वयं कीर्तिवान बन जाते हैं।
बौद्धों के अंतिम सम्राट वृहद्रथ मौर्य छल-कपट से ही सही पर वह पुष्यमित्र शुंग के विश्वासघात के कारण पराभव को प्राप्त हुए। इसके पश्चात विजेताओं के सामने यह समस्या उत्पन्न हुई की उनके पास न तो बौद्धो की तरह कोई महानायक थे और न ही उनके सरीखा महान साहित्य। न ही उनके पास बौद्धों की भांति गौरवशाली विरासत थी और ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी शिक्षाएं। इस अभाव से परिचित पुष्यमित्र शुंग ने अपने शासन काल में गप्पबाजी एवं कल्पनाओं के आधार पर इस कभी को दूर करने का अभियान आरंभ किया।
रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, गीता जैसे ग्रंथों का लेखन कार्य इसी समय किया गया। चालाकी यह की गई कि उन्हें हजारों वर्ष पुराना घोषित करके बुद्ध से पूर्व का लिखा हुआ सिद्ध किया गया। इन चालाकियों पर से पर्दा न उघड़ जाए, इसलिए परास्त लोगों से पढ़ने-लिखने का अधिकार छीन कर उनकी शिक्षा पर बलपूर्वक प्रतिबंध लगा दिया गया। ऐसे अनेक प्रतिबंधों के माध्यम से परास्त समुदाय (बौद्धों) को अपना गौरवशाली इतिहास भूल जाने को विवश किया गया।
मुझे बचपन से ही लक्ष्मी देवी का चित्र इस बात के लिए प्रेरित करता रहा कि मैं इस पात्र की वास्तविकता के बारे में छानबीन करूं। मेरी इस धारणा के ये कारण थे। जैसे 1. जिस संस्कृति में स्त्री को कभी सम्मान ही नहीं मिला उसमें स्त्री का पूजनीय स्थान कहां से आ टपका, 2. लक्ष्मी धन की देवी कैसे हो गई, 3. लक्ष्मी के साथ हाथी का अभिन्न संबंध एक नए प्रकार के संदेह को जन्म देता है, 4. लक्ष्मी का कमल के फूल पर आसीन होना, आदि आदि। ऐसे अनेक प्रतीक जिससे मुझमें यह जानने की ललक पैदा हुई कि हो न हो यह देवी बौद्ध धर्म से संबंधित है।
इस संदेह के चलते यह बात समझ में आने लगी कि भगवान बुद्ध की माता 'महामाया' को गर्भधारण करने वाली रात में एक अनौखा स्वप्न दिखाई दिया था। जिसमें एक छः दांतों वाला एक सफेद हाथी अपनी सूंड में कमल का फूल लिए महामाया को अपनी कुक्षी (कोख) में प्रवेश करते दिखाई दिया था। इस कारण लोक में हाथी को बुद्ध का प्रतीक मान कर पूजा जाने लगा। हाथी एक सम्मानित पशु हो गया। सांची की कला हो या अजंता की गुहाओं के भित्ति चित्र, हाथी के चित्रण के बिना पूरे ही नहीं हुए। हाथी के प्रति आदर-सम्मान इतना अधिक बढ़ गया कि आम गृहस्थ लोग हाथी का चित्र अपने मकान की दीवार अथवा प्रवेश द्वार पर बनाने लगे।
यही स्थिति कमल के फूल की भी हुई। कमल का फूल भी भगवान बुद्ध का पर्याय माना जाने लगा। कारण यह कि जिस प्रकार बदबूदार बदसूरत कीचड़ में पैदा होकर भी कमल का फूल कीचड़ अथवा गंदे पानी की गंदगी से निर्लिप्त रहता है तथा दुर्गंध में उत्पन्न होकर भी सुगंध फैलाता है। बिलकुल उसी प्रकार भगवान बुद्ध भी दुख से पीड़ित इस लोक में उत्पन्न हो कर दुख दूर करने के मार्ग की देशना कर के सुखी जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
महायानी बौद्ध देशों में विशेष कर जापान के बौद्धों में भगवान बुद्ध का 'सद्धम्मपुण्डरीक' नामक उपदेश विशेष रूप से सम्मानीय माना जाता है। भगवान बुद्ध ने यह उपदेश राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर दिया था। इस सुत्त के नाम में प्रयुक्त 'पुण्डरीक' शब्द का अर्थ होता है-सफेद कमल का फूल। भगवान बुद्ध की अधिकतर प्रतिमाएं कमल के फूल पर ही स्थित होती हैं। कमल का फूल भी हाथी की भांति बुद्ध का पर्याय अथवा प्रतीक बन गया। यही कमल का फूल लक्ष्मी के साथ जोड़ दिया गया।
इन सभी कारणों से मुझे लगता था कि लक्ष्मी का यह रूप मौलिक नहीं हो सकता। इसे अवश्य ही किसी बौद्ध देवी अथवा प्रमुख बौद्ध पात्र या मान्यता को तोड़-मरोड़ कर गढ़ा गया होगा।
एक दिन जब में प्रसिद्ध इतिहासकार माननीय दामोदर धर्मानंद कोसम्बी द्वारा लिखित पुस्तक 'प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता' का अध्ययन कर रहा था तो इसी बीच मेरी पुरानी मान्यता के समर्थन के एक चौंकाने वाला तथ्य प्रगट हो गया। पुस्तक में चित्र संख्या 84 में सांची धम्मद्वार का एक चित्र अंकित था। जिस पर लिखा था-"84. (दायें) दो हाथियों द्वारा प्रक्षालित कमलासन पर बैठी बुद्ध की माता माया देवी। बाद में इसी विषय को गजलक्ष्मी (विष्णु नारायण की पत्नी लक्ष्मी) मान लिया गया। सांची के विशाल स्तूप के तोरण-द्वार से।"
इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। मुझे लगा जैसे आज कोई विशाल खजाना मिल गया है। इससे पूर्व सभी पुराविदों ने उक्त चित्र को 'लक्ष्मी' अथवा 'गजलक्ष्मी' लिखकर ही अपना ज्ञान प्रकट किया था। कनिंगम जैसे महान पुराविद ने भी तथा रीस डेविडस जैसे प्रसिद्ध बौद्ध विद्वानों ने भी ऐसी ही सूचनाएं दी थीं।
इन विदेशी विद्वानों की समस्या ये थी कि ये उन भारतीय विद्वानों के ज्ञान/मार्ग दर्शन के आधार पर निर्णय लेते थे जो बौद्ध धम्म को बलात समाप्त करने अथवा यहां से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार थे। ये तथाकथित विद्वान ही 'महामाया' को 'गजलक्ष्मी' के रूप में स्थापित करने वाले थे। उन दिनों भारत में हमारे जैसे समर्पित एवं जागरूक पाठक/लेखक/विद्वान तो थे नहीं, इसलिए एक तरफा ज्ञान की ही तूती बोलती थी।
या ये प्रतिमाएं इसलिए बनाई गई हैं कि इसे गजलक्ष्मी ही सिद्ध किया जा सके। हिन्दू मान्यता की पोषक देवी 'लक्ष्मी' ही माना जा सके। असल में महामाया के माया शब्द को धन दौलत का पर्याय बना दिया गया और बिलकुल इसी अर्थ में यानी धन-दौलत के पर्याय के रूप में 'लक्ष्मी' शब्द गढ़ दिया गया। महामाया के वास्तविक स्वरूप को हड़पने के लिए शब्दों के परिवर्तित रूप का सहारा लिया गया।
'लक्ष्मी' के शब्द के साथ में इतनी अवधारणाएं जोड़ दी गई किं कहीं-कहीं तो ये बहुत ही अप्रासांगिक सी जान पड़ती है।
माननीय दामोदर धर्मानन्द कोसम्बी जी की चौंकाने वाली इस सूचना ने जैसे मेरे दिमाग में तूफानी हलचल पैदा कर दी। इस सूचना के आलोक में जब हमने यह खोजना आरंभ किया कि यह प्रतिमा कहां-कहां पर और मिलती है तो और भी विस्मयकारी तथ्य प्रकाश में आए। ये प्रतिमाएं प्रायः सभी बौद्ध स्थलों पर ही मिलती हैं। इनमें प्रमुख हैं सांची का धम्मद्वार, भरहुत के भग्नावशेष, अमरावती के भग्नावशेष, बोधगया रेलिंग, अजन्ता, गांधार, गजलक्ष्मी विहार, ऐलोरा। यद्यपि कहने को तो कुछ हिन्दू स्थलों में भी यह प्रतिमा अंकित है, किन्तु यह बौद्ध धर्म पर प्रतिक्रांति की विजय के बाद की कृतियां हैं।
यूं तो हम यहां पर यह भी बताना चाहते थे कि प्रतिक्रांतिवादियों ने किन-किन बौद्ध मान्यताओं, पात्रों एवं स्थानों का रूपांतरण करके अपने अनुकूल बना लिया है। पर स्थानाभाव के कारण हम इस विषय को यहीं पर विराम देते हैं इस आश्वासन के साथ कि निकट भविष्य में इस विषय पर एक सार्थक पुस्तक अवश्य प्रस्तुत की जाएगी।
समतायुग, पेज नं. 19-20, बुद्ध पूर्णिमा 2012 में छप चुकी हैं।

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