डॉ. आंबेडकर का दार्शनिक, वैचारिक और सामाजिक - राजनीतिक चिंतन

बाबा साहेब बौद्ध धम्म दीक्षा दिवस

सिद्धार्थ रामू

 

डॉ. आंबेडकर का दार्शनिक, वैचारिक और सामाजिक- राजनीतिक चिंतन और बौद्ध धम्म- संदर्भ बाबा साहेब बौद्ध धम्म दीक्षा दिवस 14 अक्टूबर (1956)

1- पारलौकि शक्ति ( ईश्वर, अल्लाह या गॉड आदि) और डॉ. आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर किसी तरह की पारलौकिक ईश्वरी शक्ति में विश्वास नहीं करते थे। उनका किसी ईश्वर, भगवान, अल्लाह या गॉड में रत्ती भर भी विश्वास नहीं था।

बुद्ध और उनका बौद्ध धम्म भी किसी पारलौकिक शक्ति (ईश्वर, भगवान या देवी-देवता) में विश्वास नहीं करता है।

इन अर्थों में बुद्ध और आंबेडकर दोनों नास्तिक थे।

2- आंबेडकर किसी ऐसी किताब में विश्वास नहीं करते थे, जो ईश्वर या ईश्वर के दूतों की वाणी होने का दावा करती हो।

वेद अपौरूषेय ( ईश्वर की वाणी) होने का दावा करता है। कुरान-बाइबिल अल्लाह और गॉड के पैगंबर या संदेश वाहक की वाणी होने का दावा करते हैं। बुद्ध और उनके बौद्ध धम्म में कोई ऐसी किताब नहीं है, जो ईश्वर या पैगंबर की वाणी होना का दावा करती हो।

इस अर्थ में भी डॉ. आंबेडकर नास्तिक थे, क्योंकि भारतीय उपहाद्वीप की वैदिक-ब्राह्मणवादी दर्शन-चिंतन परंपरा में उस व्यक्ति को नास्तिक कहा जाता है, जो वेदों में विश्वास न करता हो।

3- डॉ. आंबेडकर अंतिम सत्य में विश्वास नहीं करते थे। जिस अंतिम सत्य की अभिव्यक्ति का दावा वेद, कुरान और बाइबिल करते हैं।

डॉ. आंबेडकर बुद्ध की इस बात में विश्वास करते थे कि हर चीज प्रति क्षण परिवर्तनशील है। कोई चीज शाश्वत नहीं है, कोई चीज अंतिम नहीं है। यदि कुछ शाश्वत है, सनातन है, तो वह नित परिवर्तनशीलता।

4- डॉ. आंबेडकर का मानना था कि प्रकृति और समाज के संचालन में किसी पराशक्ति की कोई भूमिका नहीं है।

बुद्ध और बौद्ध धम्म के इस दर्शन-चिंतन में डॉ. आंबेडकर विश्वास करते थे कि प्रकृति अन्तर्निहित प्राकृतिक नियमों और समाज, समााजिक नियमों से संचालित होता है। प्रकृति और समाज के संचलान में किसी पराशक्ति की कोई भूमिका नहीं है।

इसी अर्थ में बौद्ध धम्म को लॉ ऑफ नेचर के रूप में परिभाषित किया गया है। बुद्ध धम्म मतबल लॉ ऑफ नेचर है।

5- डॉ. आंबेडकर बुद्ध के इस विचार के हिमायती थे कि दर्शन का काम दुनिया की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि दुनिया को बदलना है।

बुद्ध और मार्क्स की तुलना करते हुए डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि दोनों इस बात के हिमायती थे कि दर्शन का काम दुनिया की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि दुनिया को बदलना है।

यही वजह है कि डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध की तरह खुद को दर्शन-चिंतन और लेखन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने दर्शन-चिंतन के आधार पर दुनिया ( भारत) को बदलने के लिए आजीवन संघर्ष किया और कुर्बानियां दी।

6- बुद्ध की तरह डॉ. आंबेडकर की किसी सामाजिक श्रेणीक्रम ( ऊंच-नीच या वर्चस्व-अधीनता की व्यवस्था) में विश्वास नहीं करते थे।

बुद्ध और बौद्ध धम्म की सामाजिक-श्रेणीक्रम में विश्वास नहीं करता है। यहां तक बौद्ध-धम्म और बुद्ध लैंगिक आधार पर स्त्री -पुरूष में से कोई ऊंच या नीच है, को पहले दर्जे का है, को दूरे दर्जे का इसमें विश्वास नहीं करता है। इसी से स्वतंत्रता, समता और बंधुता का सूत्र निकला है।

डॉ. आंबेडकर आजीवन भारतीय समाज में सामाजिक असमानता के मुख्य आधार वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष करते रहे । उनकी नजर में वर्ण-व्यवस्था का विनाश और पितृसत्ता का विनाश समान रूप से अनिवार्य और अपरिहार्य है। वर्ण-व्यवस्था सामाजिक असमानता का आधार है, तो पितृसत्ता लैंगिक असमानता का। भारत में दोनों एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं।

7- बुद्ध का बौद्ध संघ पूरी तरह से लोकतांत्रिक सिद्धातों और विचारों पर आधारित था। बौद्ध संघ के हर भिक्खु के वोट का मूल्य समान था। किसी को भी वीटों पॉवर नहीं था, यहाँ तक बुद्ध को वीटो पॉवर नहीं था। उनके भी वोट का मूल्य संघ के किसी भिक्खु के वोट के मूल्य के बराबर था।

संघ में सभी बुनियादी निर्णय वोट के आधार पर होता था। गुप्त मतदान था। चुनाव अधिकारी नियुक्त होता था। यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो निर्णय रद्द हो जाता था।

8- बुद्ध निर्मित संघ स्वतंत्रता, समता, बंधुता आधारित न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का साधन था। संघ की स्थापना किसी अध्यात्मिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति के उन्नति के लिए हुई थी। समाज और व्यक्ति इंसानियत की उन्नत शिखरों को छू सकें, इसके लिए संघ की स्थापना हुई थी।

डॉ. आंबेडकर के लिए बौद्ध धम्म और संघ सामाजिक और इंसानी उन्नति के साधन थे।

8- डॉ. आंबेडकर के लिए बुद्ध भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुए सबसे प्रबुद्ध ( enlightened) इंसान थे। वे बुद्ध की तरह पूरी इंसानियत को प्रबुद्ध ( enlightened) बनान चाहते थे। डॉ. आंबेडकर ने प्रबुद्ध भारत ( enlightened India ) का स्वप्न देखा।

9- बुद्ध खुद को मुक्तिदाता नहीं, बल्कि मार्गदाता के रूप में देखते थे। डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध को मार्गदाता के रूप में ही स्वीकार किया। बुद्ध और डॉ. आंबेडकर के यहां मुक्तिदाता कोई सिद्धांत नहीं है, न मुक्तिदाता के लिए कोई जगह है।

अंत में बुद्ध की तरह डॉ. आंबेडकर ने साफ-साफ कहना था कि किसी बात को इसलिए मत स्वीकार करो कि किसी किताब लिखी है, परंपरा से चली आ रही है, या किसी ने कही है, बल्कि हर चीज को मानने और स्वीकार करने की कसौटी यह है कि वह तर्कसंगत है या नहीं, विवेकसंगत है या नहीं, न्यायसंगत है या नहीं और अंतिम कसौटी यह है कि जनकल्याणकारी ( बहुजनों के लिए) है या नहीं।

स्वयं डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में शुरू में ही स्पष्ट कर दिया है कि बौद्ध धम्म की विरासत और परंपरा में चला आर रहा, वह सबकुछ अप्रमाणिक है, जो तर्कसंगत नहीं, विवेक संगत नहीं और जनकल्णाकारी नहीं है। जो तर्कसंगत, विवेकसंगत और जनकल्याणकारी है, वही प्रमाणिक है।

डॉ. आंबेडकर के लिए बुद्ध और उनका धम्म स्वतंत्रता,समता, वंधुता और न्याय पर आधारित लोकतांत्रिक गणतंत्रात्मक प्रबुद्ध भारत का निर्माण का मार्ग और साधन था। किसी अध्यात्मिक आकांक्षा या व्यक्तिगत निर्वाण के लिए उन्होंने बुद्ध और उनके धम्म को नहीं अपनाया था।

यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 


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